
ईरान में युद्ध और होर्मुज़ स्ट्रेट में बाधा के बीच वैश्विक ईंधन क़ीमतों को कम करने की कोशिशों के तहत अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने गुजरात के जामनगर में रिलायंस रिफ़ाइनरी का दौरा किया है।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने वैश्विक ईंधन क़ीमतों को कम करने और सप्लाई चेन को बेहतर बनाने के लिए गुजरात के जामनगर में मुकेश अंबानी की रिलायंस रिफ़ाइनरी का दौरा किया है।
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अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो वैश्विक ईंधन क़ीमतों को नियंत्रित करने के लिए भारत दौरे पर हैं और जामनगर में रिलायंस रिफ़ाइनरी का दौरा किया है।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो इस समय भारत दौरे पर हैं और बुधवार को गुजरात के जामनगर में मुकेश अंबानी के स्वामित्व वाली रिलायंस की रिफ़ाइनरी पहुँचे हैं.
भारत के पश्चिमी तट पर स्थित रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के स्वामित्व वाली दुनिया की सबसे बड़ी तेल रिफ़ाइनरी रूस और वेनेज़ुएला समेत कई देशों से कच्चा तेल लेती है और उसे रिफ़ाइन करके तैयार ईंधन वैश्विक बाज़ारों में भेजती है. इससे मध्य-पूर्व में पैदा होने वाले संकटों से बचकर ईंधन की आपूर्ति जारी रखने में मदद मिलती है.
ट्रंप प्रशासन वैश्विक स्तर पर डीज़ल की बढ़ती क़ीमतों को कम करने की कोशिश कर रहा है. रुबियो की यह यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब ईरान में युद्ध और होर्मुज़ स्ट्रेट में बाधा के कारण ईंधन की क़ीमतों में तेज़ उछाल आया है. अगले महीने होने वाले अमेरिकी मिडटर्म इलेक्शन से पहले यह एक बड़ा मुद्दा बन गया है.
ब्रिटिश अख़बार फ़ाइनैंशियल टाइम्स से एसएंडपी में अपस्ट्रीम स्ट्रैटिजी के निदेशक राजीव लाला ने कहा, "अमेरिका को डीज़ल की ज़रूरत है और वह भी जल्द. भारत के पश्चिमी तट पर स्थित रिफ़ाइनरियां यह ज़रूरत पूरी कर सकती हैं."
रुबियो ने मंगलवार को मुंबई में पत्रकारों से कहा कि भारत एक "रिफ़ाइनिंग सुपरपावर" है और बाज़ार पर पड़ रहे दबाव को कम करने में मदद कर सकता है.
जब उनसे पूछा गया कि विदेश मंत्री किसी तेल रिफ़ाइनरी के प्रमुख से मिलने क्यों जा रहे हैं, तो उन्होंने कहा, "आपके पास ऐसी कंपनी है, जिसकी तेल शोधन क्षमता बहुत विशाल है. मुझे लगता है कि मुझे इनसे जाकर बात करनी चाहिए."
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बेटे डोनाल्ड ट्रंप जूनियर ने पिछले साल नवंबर में जामनगर का दौरा किया था, जबकि उनकी बेटी इवांका ट्रंप और उनके पति जेरेड कुशनर ने 2024 में जामनगर में अंबानी के बेटे अनंत की शादी से पहले आयोजित भव्य तीन दिवसीय समारोह में हिस्सा लिया था.
फ़ाइनैंशियल टाइम्स ने लिखा है, ''भारत भले ही कच्चे तेल का एक बड़ा आयातक है, लेकिन निजी क्षेत्र की उसकी रिफाइनरियां, ख़ासकर रिलायंस, फ़िलहाल डीज़ल का उत्पादन और निर्यात करके भारी मुनाफ़ा कमा रही हैं. इसकी वजह वैश्विक ऊर्जा संकट के चलते रिफाइंड ईंधन की कमी है.''
डेटा उपलब्ध कराने वाली कंपनी केप्लर के प्रमुख रिफाइनिंग विश्लेषक सुमित रितोलिया ने कहा कि डीज़ल का 'क्रैक स्प्रेड' यानी ईंधन की थोक क़ीमत और उसे बनाने के लिए ज़रूरी कच्चे तेल की लागत के बीच का अंतर, फ़िलहाल करीब 63 डॉलर प्रति बैरल है. यह युद्ध से पहले के स्तर से तीन गुना अधिक है.
डीज़ल का उत्पादन भी बढ़ने की उम्मीद है. रितोलिया के मुताबिक़, भारत का अक्तूबर में डीज़ल निर्यात बढ़कर लगभग 7.30 लाख बैरल प्रतिदिन हो सकता है, जो एक साल पहले 6.53 लाख बैरल प्रतिदिन था. इसमें रिलायंस की हिस्सेदारी करीब 5.50 लाख बैरल प्रतिदिन रहने का अनुमान है.
उन्होंने कहा, "ऐसा नहीं है कि रुबियो के दौरे के बाद जामनगर में डीज़ल का उत्पादन दो गुना या चार गुना बढ़ जाएगा. जामनगर पहले से ही अपनी अधिकतम क्षमता पर काम कर रहा है, क्योंकि जब इतना अच्छा मुनाफ़ा मिल रहा हो, तो कौन उत्पादन नहीं करना चाहेगा?"
पिछले सप्ताह भारत सरकार ने निर्यातकों को एक और राहत दी. सरकार ने डीज़ल निर्यात पर लगने वाले कर को लगभग आधा कर दिया. इसे 16 रुपये (0.16 डॉलर) प्रति लीटर से घटाकर 8.50 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया.
जामनगर दौरे का मक़सद
रुबियो का जामनगर का एजेंडा क्या है? इस सवाल के जवाब में उन्होंने सीएनएन न्यूज़ 18 से एक इंटरव्यू में कहा, ''रिलायंस एक बेहद महत्वपूर्ण कंपनी है और उसके पास ऊर्जा को रिफाइन करने की जबर्दस्त क्षमता है. पेट्रोलियम तब तक बेकार है, जब तक उसे रिफाइन करके इस्तेमाल के लायक उत्पाद में न बदला जाए.''
रुबियो ने कहा, ''हमें लगता है कि भारत को अपनी सप्लाई चेन और ऊर्जा की सप्लाई में विविधता लाने में रिलायंस आगे भी मदद कर सकती है. उदाहरण के लिए, वेनेज़ुएला अपना ऊर्जा उत्पादन बढ़ा रहा है और भारत के पास उसके कुछ कच्चे तेल को रिफाइन करने का लंबा अनुभव रहा है.''
''लेकिन रिलायंस उन गिनी-चुनी कंपनियों में भी शामिल है, जिन्होंने अमेरिका में रिफाइनिंग क्षमता में निवेश किया है. उसने अमेरिका के भीतर रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाने में निवेश किया है. इसलिए, जब हम इतने क़रीब थे, तो लगा कि उनके ऑपरेशन को देखने जाना चाहिए और उनके साथ कुछ समय बिताकर इस बारे में बात करनी चाहिए कि हम मिलकर और बेहतर तरीक़े से कैसे काम कर सकते हैं.''
वेनेज़ुएला की अमेरिका समर्थित अंतरिम सरकार देश की बदहाल अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने के लिए तेल निर्यात बढ़ाने की कोशिश कर रही है. यह घटनाक्रम जनवरी में अमेरिकी कमांडो कार्रवाई के दौरान क्रांतिकारी समाजवादी नेता निकोलस मादुरो को पकड़े जाने के बाद सामने आया है.
केप्लर के सुमित रितोलिया ने एफटी से बताया कि वेनेज़ुएला के कच्चे तेल का सबसे बड़ा ख़रीदार अमेरिका है, जबकि भारत दूसरे स्थान पर है. हाल के महीनों में भारत ने वेनेज़ुएला से लगभग 2.90 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल आयात किया, जिसमें से 90 फ़ीसदी जामनगर रिफाइनरी में आया.
इस महीने ट्रंप ने पुतिन के साथ एक समझौता किया, जिसके तहत रूसी डीज़ल को वैश्विक बाज़ार में उतारा जाएगा.
इसके बाद पिछले सप्ताह ट्रंप ने रूसी तेल ख़रीदने वालों पर लगने वाले 100 फ़ीसदी तक के टैरिफ़ से छूट दे दी. अमेरिकी कांग्रेस ने मॉस्को पर दबाव बनाने के लिए इन टैरिफ़ को मंज़ूरी दी थी. इस क़दम से भारत चिंतित हो गया था, क्योंकि वह रूसी कच्चे तेल का एक बड़ा ख़रीदार है.
थिंक टैंक अटलांटिक काउंसिल में साउथ एशिया के सीनियर फेलो माइकल कुगलमैन ने एक्स पर लिखा है, ''रुबियो की भारत की पिछली यात्रा मुख्य रूप से संबंधों को बेहतर बनाने और सद्भावना बढ़ाने की कोशिश थी, लेकिन इसमें बुनियादी मतभेदों को दूर नहीं किया जा सका. उनकी मौजूदा यात्रा अधिक ठोस दिखाई देती है. इसमें सुरक्षा, ऊर्जा और निवेश जैसे मुद्दों पर सीधे बातचीत हो रही है. इन मुद्दों को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव रहा है, लेकिन इनके मामलों में सहयोग का पुराना रिकॉर्ड भी रहा है.''
अमेरिका बदलता रुख़
अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''भारत के तेल आपूर्ति के स्रोत और ख़ास तौर पर रिलायंस की तेल ख़रीद, पहले भी ट्रंप की जियोपॉलिटिकल रणनीति से जुड़ी चुनौतियों के केंद्र में रहे हैं.''
पिछले साल, जब अमेरिकी प्रशासन यूक्रेन युद्ध को लेकर मॉस्को पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा था, तब प्रशासन के अधिकारियों ने रूसी तेल पर निर्भरता को लेकर रिलायंस और उसके मालिक मुकेश अंबानी पर परोक्ष रूप से निशाना साधा था.
रुबियो की यह यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब कहा जा रहा है कि वॉशिंगटन और नई दिल्ली एक साल से अधिक समय तक चली बातचीत के बाद व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के क़रीब हैं. भारत के कुल निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी क़रीब 20 फ़ीसदी है.
मंगलवार को व्हाइट हाउस में पत्रकारों ने जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से समझौते की संभावनाओं के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा, "वे समझौता करना चाहते हैं. हम समझौता करेंगे. हां, हम काफ़ी क़रीब हैं."
राष्ट्रपति ने कहा कि यह "काफ़ी अलग तरह का समझौता हो सकता है", लेकिन उन्होंने इस बारे में विस्तार से कुछ नहीं बताया.
इस साल रूस अब भी भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है. ब्लूमबर्ग के मुताबिक़ रूस से तेल की आपूर्ति बढ़कर लगभग 20 लाख बैरल प्रतिदिन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है, जो भारत के कुल तेल आयात का करीब 40 फ़ीसदी है. 2022 में यूक्रेन पर रूस के आक्रमण से पहले यह हिस्सेदारी मुश्किल से दो फ़ीसदी थी.
ब्लूमबर्ग ने लिखा है, ''वेनेज़ुएला से भारत को होने वाली तेल की आपूर्ति भी 2019 के बाद के अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है, हालांकि यह मात्रा काफी कम, लगभग 1.87 लाख बैरल प्रतिदिन है. वहीं, अमेरिका से भारत को तेल की आपूर्ति लगभग आधी होकर 1.65 लाख बैरल प्रतिदिन रह गई है. इसकी वजह माल ढुलाई की बढ़ती लागत है, जिसने अमेरिकी तेल की प्रतिस्पर्धात्मकता कम कर दी है.''
जामनगर दौरा, क्या कहते हैं एक्सपर्ट
रुबियो के जामनगर रिफ़ाइनरी के दौरे के लिए जहाँ भारत की उर्जा क्षमता को श्रेय दिया जा रहा है, वहीं इसे लेकर एक बहस भी छिड़ गई है.
इंडियन एक्सप्रेस में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ सी. राजामोहन ने एक लेख में लिखा कि यह दौरा भारत-अमेरिका संबंधों पर होने वाली आम चर्चा से कहीं ज़्यादा अहम है.
उन्होंने लिखा, "जामनगर भारत की जटिल ऊर्जा राजनीति को समझने का एक मौक़ा देता है. इसी ऊर्जा राजनीति ने हाल के समय में दिल्ली के वॉशिंगटन, मॉस्को और तेहरान के साथ संबंधों को आकार दिया है."
"मुंबई में रुबियो की टाटा और अडानी समूहों के प्रतिनिधियों से मुलाक़ात और जामनगर में मुकेश अंबानी के साथ बातचीत यह भी दिखाती है कि भारतीय कारोबारी जगत और देश की विदेश नीति के बीच जुड़ाव बढ़ रहा है. जैसे-जैसे भारतीय कंपनियों का आर्थिक प्रभाव और दुनिया भर में उनकी पहुंच बढ़ रही है, वैसे-वैसे वे भारत की कूटनीति का एक अहम हिस्सा बनती जा रही हैं."
हालांकि इसके जवाब में भारत के पूर्व विदेश सचिव और पूर्व राजनयिक कवंल सिब्बल ने एक्स पर लिखा, लेख में यह बात सही कही गई है कि भारत के बड़े कारोबारी समूह देश की विदेश नीति के लिए अहम साबित हो सकते हैं.
"लेकिन इन कारोबारी समूहों को इतना ताक़तवर भी नहीं बनने देना चाहिए कि वे राजनीति और सरकारी नीतियों को नियंत्रित करने लगें. अमेरिका में सैन्य-औद्योगिक गठजोड़ के मामले में ऐसा देखने को मिलता है."
"अमेरिका ने रूसी डीजल पर प्रतिबंधों में जो छूट दी है, उसकी 60 दिन बाद समीक्षा की जाएगी. रुबियो के इस बयान से हमें कुछ राहत मिलती है, लेकिन आगे की स्थिति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है."
"यह अमेरिकी मिडटर्म इलेक्शन को देखते हुए लिया गया एक रणनीतिक फ़ैसला है. मौजूदा अमेरिकी प्रशासन बार-बार दिखा चुका है कि वह अपना रुख़ बदल सकता है."
बीते शुक्रवार को जाने-माने कॉलमिस्ट प्रताप भानु मेहता ने भी इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक लेख में लिखा था, "यह (भारत के साथ रिश्ता) महज़ कॉर्पोरेट हितों की एक मिलीजुली चीज़ बन कर रह गया है."
जामनगर रिफ़ाइनरी
जामनगर की रिफ़ाइनरी रूसी यूराल कच्चे तेल को रिफ़ाइन करने वाली शीर्ष तीन कंपनियों में शामिल है.
इसकी शुरुआत 1999 में हुई थी और 2008 में इसे विस्तार दिया गया.
यह दुनिया का सबसे बड़ा सिंगल-साइट रिफ़ाइनिंग कॉम्प्लेक्स है, जिसमें एक्सपोर्ट और घरेलू मार्केट के लिए दो अलग-अलग यूनिटें हैं.
क्लिक ऑयल एंड गैस नाम की वेबसाइट के अनुसार, सिर्फ़ क्षमता के मामले में ही नहीं बल्कि अपने क्षेत्रफल के मामले में भी यह अनोखा रिफ़ाइनरी कॉम्प्लेक्स है. इसका क्षेत्रफल 30 वर्ग किलोमीटर है जो मध्यम आकार के किसी ब्राज़ीली शहर से भी बड़ा है.
पर्यावरण को लेकर काम करने वाली संस्था क्लाइमेट ट्रेस के मुताबिक़, "जामनगर रिफ़ाइनरी कॉम्प्लेक्स 7,500 एकड़ से ज़्यादा क्षेत्र में फैला है. इसकी 14 लाख बैरल कच्चा तेल प्रतिदिन प्रासेस करने की क्षमता, टेक्सस में उत्तरी अमेरिका की सबसे बड़ी गैल्वेस्टन बे रिफ़ाइनरी की क्षमता से दोगुने से भी ज़्यादा है."
AI outlook — possibilities, not facts
रूसी डीज़ल पर प्रतिबंधों में दी गई छूट की 60 दिन बाद समीक्षा की जाएगी।
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