
इसरो के कर्मचारी नौकरी जाने के डर से असंतुष्ट हैं, जबकि चेयरमैन वी. नारायणन और इन-स्पेस के प्रमुख पवन कुमार गोयनका ने स्पष्ट किया कि इसरो का निजीकरण नहीं हो रहा है और वह अंतरिक्ष मिशनों में केंद्रीय भूमिका निभाता रहेगा, निजी क्षेत्र के साथ सहयोग करके।
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इसरो एक सरकारी संगठन है जो भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का केंद्र है। हाल के वर्षों में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने के लिए सुधार किए गए हैं, जिनमें इन-स्पेस जैसी एजेंसियों की स्थापना शामिल है।
इसरो कर्मचारियों का 'असंतोष' और चेयरमैन की सफ़ाई
Author, इमरान क़ुरैशी
पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
प्रकाशित 2 मिनट पहले
पढ़ने का समय: 6 मिनट
भारतीय स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइज़ेशन (इसरो) एक बार फिर ख़बरों में है. लेकिन इस बार कारण हैं इसरो के कर्मचारी जिन्हें नौकरी जाने का डर सता रहा है.
इसरो के चेयरमैन वी. नारायणन की तरफ़ से आई सफाई के बाद भी इन लोगों के बीच असंतोष दिख रहा है.
सबसे पहले बात, भारत को विकास के क्षेत्र में नई ऊंचाईयां देने वाले प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक इसरो से जुड़ी हालिया घटनाओं की.
बीते 21 अगस्त को इन-स्पेस(इंडियन नेशनल स्पेस प्रोमोशन एंड ऑथराइज़ेशन सेंटर) के चेयरमैन पवन कुमार गोयनका ने एक इंटरव्यू में कहा, "अंत में, इसरो कोई लॉन्च व्हीकल नहीं बनाएगा. ये काम प्राइवेट सेक्टर या पब्लिक सेक्टर यूनिट्स करेंगी."
इन-स्पेस को छह साल पहले एक स्वतंत्र सिंगल-विंडो एजेंसी के तौर पर बनाया गया था, ताकि प्राइवेट कंपनियों और स्टार्टअप्स की स्पेस से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा सके, उन्हें मंज़ूरी दी जा सके और उनकी निगरानी भी की जा सके.
गोयनका के लॉन्च व्हीकल वाले बयान के जवाब में, कर्मचारियों के नौ संगठनों ने 'इसरो परिवारों' से जुड़ी चिंताओं के आधार पर कई सवाल उठाए और डिपार्टमेंट ऑफ़ स्पेस से लिखित स्पष्टीकरण मांगा, क्योंकि यह मामला "उन हज़ारों युवा नागरिकों के लिए भी ज़रूरी था जो राष्ट्रीय स्पेस प्रोग्राम(इसरो) में करियर बनाना चाहते हैं."
इसलिए बढ़ी इसरो कर्मचारियों की चिंता
'बेंगलुरु स्पेस एक्सपो 2026' में सवालों का जवाब देते हुए नारायणन ने कहा, "स्पेस सेक्टर में सुधार छह साल पहले शुरू किए गए थे. इन सुधारों के तहत, हमें प्राइवेट सेक्टर और स्टार्टअप कंपनियों का साथ देना है और स्पेस इकोसिस्टम को बढ़ाने में मदद करनी है. पीएसएलवी या जीएसएलवी को लॉन्च करने में जो बजट खर्च होता है, उसका लगभग 80 फ़ीसदी प्राइवेट इंडस्ट्रीज़ से आता है. हमारे लिए 450 इंडस्ट्रीज़ काम कर रही हैं."
उन्होंने आगे कहा कि एक समय था जब सैटेलाइट्स को तीन-चार साल में एक बार लॉन्च किया जाता था. अब एक साल में 50 लॉन्च व्हीकल का लक्ष्य है, जिन्हें "अकेले इसरो लॉन्च नहीं कर सकता. यह काम भारत में भारतीयों की ओर से ही किया जाएगा. 50 लॉन्च व्हीकल का काम भारत में भारतीयों द्वारा पूरा किया जाएगा."
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उन्होंने यह भी कहा कि "इसरो का निजीकरण नहीं हो रहा है. इसरो एक सरकारी संगठन है और हम काम कर रहे हैं. यह एक सरकारी निवेश है. लेकिन बात बस इतनी है कि हम कई गतिविधियों में शामिल हैं. इकोसिस्टम को बढ़ना होगा."
कर्मचारियों की परेशानी
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कर्मचारी संघ की पहली चिंता यह है कि "इसरो के लॉन्च-व्हीकल और सैटेलाइट बनाने के काम से धीरे-धीरे पीछे हटने से रिसर्च के बाद होने वाले एक्सपेरिमेंट पर असर पड़ेगा, इन-हाउस काम कम होगा, मंज़ूर पदों की संख्या फ्रीज़ या कम हो जाएगी और टेक्निकल, साइंटिफ़िक, एडमिनिस्ट्रेटिव, स्टोर, परचेज़ क्वालिटी, सेफ़्टी और इंडस्ट्रियल कैडर में प्रमोशन और स्किल डेवलपमेंट के रास्ते बंद हो जाएंगे."
उनके बयान में कहा गया, "ग्रुप ए, बी और सी के पदों पर नियमित भर्ती, जो पहले से ही खाली पदों और कर्मचारियों के रिटायर होने या नौकरी छोड़ने की वजह से सीमित है, वो और कम हो जाएगी. इससे उन काबिल युवाओं को मौका नहीं मिलेगा जो इसरो को सम्मानजनक सरकारी करियर के तौर पर देखते हैं, न कि किसी प्राइवेट कॉन्ट्रैक्टर के वर्कफ़ोर्स के तौर पर."
कर्मचारी संघों ने यह भी साफ़ किया है कि उनकी चिंता "भारतीय इंडस्ट्री के प्रति दुश्मनी या तय दायरे में एनएनआईएल (न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड) के ज़रिए सही व्यावसायीकरण का विरोध नहीं है. चिंता इस बात की है कि 'डिपार्टमेंट ऑफ़ स्पेस' का कोई ऐसा आधिकारिक पॉलिसी डॉक्यूमेंट नहीं है जो प्राइवेट भागीदारी को बढ़ावा देने और इसरो की अपनी चीज़ें बनाने की क्षमता को खत्म करने के बीच साफ़ अंतर बताए."
कर्मचारी संघों की चिट्ठी में कहा गया, "बिना बहस के ऐसी पॉलिसी स्वीकार नहीं की जा सकती जो इसरो को सिर्फ़ रिसर्च एंड डेवलपमेंट तक सीमित कर दे, जबकि देश के लॉन्च-व्हीकल बनाने और लॉन्च इंफ़्रास्टक्चर को चलाने का काम सरकारी हाथों से निकल जाए."
उनका तर्क था कि "इसरो से विकसित की गई तकनीक देश की संपत्ति है. इसका ट्रांसफ़र पारदर्शी, जवाबदेह और रणनीतिक, सुरक्षा और रोज़गार से जुड़ी बातों के हिसाब से होना चाहिए, न कि अख़बार की रिपोर्ट के ज़रिए कर्मचारियों के सामने पेश किया जाए."
इसरो चेयरमैन का जवाब
इसरो के चेयरमैन वी. नारायणन का इस मामले में जवाब था कि "अगर एक या दो लोग चिट्ठी लिखते हैं, तो तुरंत लिखित जवाब नहीं दिया जा सकता. कृपया समझें, हम 20,000 कर्मचारी हैं. लेकिन हम कर्मचारियों से बात करेंगे."
एक मौके पर उन्होंने यह भी कहा कि अगर "हमारे साथियों को कोई जायज़ चिंता है, तो उसे दूर करना हमारी ज़िम्मेदारी है."
उन्होंने कहा, "हम लगातार अपने कर्मचारियों के साथ बातचीत करते रहे हैं."
हालांकि, कर्मचारी संघ के सदस्यों का कहना था कि चेयरमैन और कर्मचारी संघ के सदस्यों के बीच होने वाली रेगुलर मीटिंग्स पिछले कुछ सालों से बंद हो गई हैं.
कर्मचारी संघ से जुड़े कुछ लोगों को इसरो चेयरमैन का जवाब "दिखावटी" लगा.
असल में, कैमरे पर बात न करने की एक वजह यह डर भी था कि उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई हो सकती है.
इन-स्पेस चेयरमैन की सफ़ाई
'बेंगलुरु स्पेस एक्सपो 2026' की एक कॉन्फ़्रेंस में इन-स्पेस के चेयरमैन पवन कुमार गोयनका ने कहा, "इस कमरे में या बाहर मौजूद जो भी लोग यह सोचते हैं कि इन सबमें इसरो की भूमिका कम हो जाएगी, उन्हें फिर से सोचना चाहिए.
चंद्रयान सिरीज़, गगनयान, इंडियन स्पेस स्टेशन, चांद पर भारतीय का जाना, शुक्र और मंगल मिशन, दोबारा इस्तेमाल होने वाला हेवी-लिफ़्ट व्हीकल, नेवआईसी(नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन) को मज़बूत करना, एसडीएस सीरीज़ के सैटेलाइटों के साथ, मुझे नहीं लगता कि इसरो के पास कभी इतना सारा काम एक साथ रहा है.
इसरो इन सबकी रीढ़ की हड्डी और आधार बना हुआ है."
उन्होंने कहा, "लेकिन हममें से हर किसी की एक भूमिका है, पूरी व्यवस्था तभी आगे बढ़ती है जब हम सब मिलकर काम करते हैं."
सवाल आख़िर यह था कि अगर इसरो के पास इतना सारा काम है, तो फिर इतने सारे लोग स्टार्टअप्स में शामिल होने के लिए संगठन क्यों छोड़ रहे थे?
गोयनका ने कहा, "देखिए, जहां तक मुझे पता है, डेटा के हिसाब से 12,500 वैज्ञानिकों में से सिर्फ़ 125 ने नौकरी छोड़ी है. यह कुल संख्या का एक फ़ीसदी है. किस संस्था में लोग नौकरी नहीं छोड़ते? प्राइवेट सेक्टर में तो यह दर 10, 12 और 15 फ़ीसदी तक होती है.
इसरो के सभी प्रोजेक्ट तय समय के अनुसार चल रहे हैं. काम में कोई ढिलाई नहीं है. यह इसरो बनाम इंडस्ट्री की बात नहीं है, बल्कि इसरो और इंडस्ट्री मिलकर दुनिया का मुक़ाबला कर रहे हैं."
AI outlook — possibilities, not facts
इसरो और कर्मचारी संघों के बीच बातचीत जारी रहेगी और नीति स्पष्टीकरण दिया जाएगा।
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