
अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों के लिए वोटिंग जारी, भारत की नजर टैरिफ, एच-1बी वीजा और रूस से तेल आयात पर
अमेरिका में मिडटर्म चुनाव के लिए वोटिंग चल रही है, जिसमें हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की 435 और सीनेट की 35 सीटों पर मतदान होगा। ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के पास फिलहाल दोनों सदनों में बहुमत है। भारत की नजर टैरिफ, एच-1बी वीजा और रूस से तेल खरीदने जैसे मुद्दों पर है।
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अमेरिका में मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के बीच में होते हैं। इनमें हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की सभी 435 सीटें और सीनेट की 35 सीटों के लिए वोटिंग होती है। ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के पास फिलहाल दोनों सदनों में बहुमत है।
अमेरिका में मिडटर्म इलेक्शन के लिए वोटिंग हो रही है. इस चुनाव के लिए अर्ली वोटिंग भी शुरू हो चुकी है. मोटे अनुमानों के तहत दावा किया जा रहा है चार करोड़ अमेरिकी अपना वोट डाल चुके हैं.
लेकिन, चुनाव तीन नवंबर को होने हैं और चुनाव ख़त्म होते ही वोटों की गिनती का काम शुरू हो जाएगा.
भारत के हिसाब से देखें तो चार नवंबर की सुबह को चुनावी नतीजे आने शुरू हो जाएंगे. ज़ाहिर है, इस चुनाव पर पूरी दुनिया के साथ भारत की भी नज़र है.
दरअसल, अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स यानी निचले सदन की 435 सीटों और सीनेट यानी ऊपरी सदन की 35 सीटों के लिए वोटिंग होनी है.
फिलहाल ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के पास दोनों सदन में बहुमत है. जबकि, डेमोक्रेट्स को दोनों सदन में कंट्रोल हासिल करने के लिए चार-चार सीटों का नेट फ़ायदा चाहिए.
ये मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति ट्रंप की लोकप्रियता का ही इम्तिहान नहीं, बल्कि अमेरिकी कांग्रेस में उनके नियंत्रण की परीक्षा भी है.
अगर इन चुनावों में ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी दोनों सदन में बहुमत गंवा देती है, तो उनके लिए फ़ैसले पास कराना थोड़ा मुश्किल हो जाएगा.
अब सवाल ये है कि सदनों की स्थिति बदलने से क्या भारत को टैरिफ़, एच-1बी वीजा और रूस से तेल ख़रीदने जैसे मुद्दों पर राहत मिल सकेगी?
ये चुनाव राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के बीच में पड़ते हैं, इसीलिए इन्हें मिडटर्म कहा जाता है.
अमेरिकी कांग्रेस के दो हिस्से हैं, पहला हाउस ऑफ़ रिप्रेज़ेंटेटिव्स और दूसरा सीनेट.
कांग्रेस का एक ज़रूरी काम फ़ेडरल कानून बनाना और पास करना है. ये ऐसे कानून होते हैं जो पूरे देश में लागू होते हैं.
मिडटर्म चुनाव के नतीजों से तय होगा कि ट्रंप की पार्टी या विपक्षी डेमोक्रेट्स में से कौन अमेरिकी कांग्रेस यानी वहां की संसद को कंट्रोल करेंगे.
इन नतीजों को इस बात का पैमाना भी माना जा रहा है कि अमेरिका के लोग राष्ट्रपति ट्रंप के अब तक के काम से कितने ख़ुश हैं.
बात अगर हाउस ऑफ़ रिप्रेज़ेंटेटिव्स की हो तो इस चुनाव में कांग्रेस के निचले सदन के सभी 435 सदस्य चुने जाएंगे. हाउस सदस्यों का कार्यकाल दो साल का होता है. आम तौर पर प्रस्तावित कानून हाउस में ही पेश किए जाते हैं और वहीं उन पर बहस होती है.
हाउस की मौजूदा स्थिति की बात करें तो 435 सीटों में से 219 सीटें रिपब्लिकन के पास हैं. जबकि 214 सीटों पर डेमोक्रेट्स का कब्जा है. दो सीटें फ़िलहाल ख़ाली हैं.
जबकि 'सीनेट' यानी ऊपरी सदन की 100 में से 35 सीटों पर चुनाव होगा. चुने गए सीनेटर छह साल का कार्यकाल पूरा करते हैं. वो हाउस से मिले प्रस्तावित कानूनों को मंज़ूरी देते हैं या रोक देते हैं.
ऊपरी सदन की 100 सीटों में से 53 सीटें रिपब्लिकन के पास हैं. 45 सीटों पर डेमोक्रेट्स का कब्जा है. डेमोक्रेटिक पार्टी को 2 निर्दलीय सीनेटरों का भी समर्थन हासिल है.
तीन नवंबर को ही अमेरिका के ज़्यादातर हिस्सों में वोटर राज्य स्तर के नेताओं को भी चुनेंगे.
इनमें सबसे ज़्यादा चर्चा कैलिफ़ोर्निया, फ़्लोरिडा, जॉर्जिया और मिशिगन में होने वाले गवर्नर के चुनाव की भी है.
मिडटर्म इलेक्शन में किस के पक्ष में हवा?
पहले भी अमेरिकी वोटर राष्ट्रपति की पार्टी को 'सबक' सिखाने के लिए उनके ख़िलाफ़ वोट देते रहे हैं. और हालिया सर्वे बताते हैं कि मौजूदा राष्ट्रपति की अप्रूवल रेटिंग कम है.
पोलिंग वेबसाइट सिल्वर बुलेटिन के मुताबिक़, उन्होंने अपना दूसरा टर्म 50 प्रतिशत से थोड़ा ज़्यादा अप्रूवल रेटिंग के साथ शुरू किया था. लेकिन अक्तूबर की शुरुआत में ये घटकर लगभग 37 प्रतिशत रह गई. इसी दौरान 61 प्रतिशत लोगों ने उन्हें नापसंद किया.
हालांकि, हर सदन की सभी सीटों पर कड़ी टक्कर नहीं होती. कुछ सीटें रिपब्लिकन या डेमोक्रेट के लिए सेफ़ मानी जाती हैं.
बीबीसी के अमेरिकी सहयोगी सीबीएस न्यूज़ ने इस बार आयोवा और न्यू हैम्पशायर जैसे राज्यों में सीनेट की दस सीटों और एरिज़ोना और ओहायो जैसे राज्यों में हाउस की 42 सीटों को कड़े मुक़ाबले वाली सीटों के तौर पर मार्क किया है.
ट्रंप की पार्टी के सांसद कम होने से भारत पर क्या असर पड़ेगा?
अगर अमेरिकी संसद में रिपब्लिकन पार्टी के सदस्य कम हुए तो भारत के साथ अमेरिका के रिश्तों पर क्या असर पड़ सकता है.
इसे समझने के लिए ये जान लेते हैं कि ट्रंप के दोनों कार्यकाल में अमेरिका और भारत से रिश्ते कैसे रहे हैं.
भारत को अमेरिका में दोनों ही पार्टियों का समर्थन मिलता रहा है. फिर भी भारत सरकार ने कई बड़े समझौते रिपब्लिकन राष्ट्रपतियों के साथ किए हैं.
भारत को ट्रंप के कार्यकाल से भी यही उम्मीद थी. पीएम मोदी और ट्रंप के रिश्ते भी बेहतर दिखे हैं. पहले टर्म के दौरान प्रधानमंत्री ने ट्रंप को व्हाइट हाउस में भारत का सबसे अच्छा दोस्त तक कहा था.
भारत के नज़रिए से ट्रंप का दूसरा कार्यकाल उतार-चढ़ाव भरा रहा है. इतना अलग कि भारत सरकार ने डील करने के तरीकों में बदलाव तक किया है.
कई मौकों पर खुलकर व्हाइट हाउस के बयानों पर प्रतिक्रिया भी दी है.
टैरिफ़ डील के दौरान ही अमेरिका ने भारत पर दबाव डाला कि वो अमेरिकी कृषि उत्पादों और डेयरी सामान के लिए अपना बाज़ार ज़्यादा खोले.
वहीं, भारत ने जब अपने एग्रीकल्चर और मेडिसिन एक्सपोर्ट के लिए टैरिफ़ में छूट मांगी, तो अमेरिका ने उसे मानने से इनकार किया था.
विशेषज्ञों के मुताबिक़ टैरिफ़ की सबसे बड़ी आलोचना इसी बात के लिए होती है कि ये अमेरिका को ज़्यादा फ़ायदा पहुंचाने वाला है और भारतीयों की जेब पर इसकी मार पड़ने वाली है.
सितंबर 2026 में न्यूयॉर्क में 'एशिया सोसाइटी' के एक कार्यक्रम के दौरान भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने आतंकवाद और व्यापार नीतियों के मुद्दे पर अमेरिका, ख़ासतौर पर ट्रंप प्रशासन की आलोचना की थी.
जयशंकर ने कहा था कि हमारा सहयोगी अगर हमारी चिंताओं को नहीं समझता तो स्पष्ट तौर पर इसका असर दोनों देशों के संबंधों पर पड़ेगा.
विशेषज्ञों का कहना है कि ये एक इकलौता ऐसा मुद्दा नहीं है जहां पर दोनों देश आमने-सामने आए हों और कई मामलों में दोनों देशों में असहमति देखने को मिली है.
टैरिफ़ पर टकराव
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत के साथ टकराव की बात करें तो 'टैरिफ़' का मामला सबसे चर्चित रहा है.
ट्रंप प्रशासन ने बार-बार भारत के हाई इंपोर्ट टैरिफ़ की आलोचना की और भारत को 'टैरिफ़ किंग' तक कह दिया था.
रेसिप्रोकल टैरिफ़ के नाम पर अमेरिका ने भारत के कई ज़रूरी एक्सपोर्ट पर भारी टैरिफ़ लगा दिए. इसमें स्टील, एल्युमीनियम, कपड़ा और ज्वैलरी शामिल हैं.
इसी दौरान अमेरिका ने भारत को जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज यानी जीएसपी के तहत मिलने वाली ख़ास छूट को भी खत्म कर दिया था.
इस छूट की वज़ह से भारतीय सामान बिना टैरिफ़ के अमेरिकी बाज़ार में बिकता था.
हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई आए थे, लेकिन वो देश की राजधानी दिल्ली नहीं गए. उन्होंने इस दौरान दोनों देशों के रिश्तों पर बातचीत की थी, लेकिन दौरे का फ़ोकस बिज़नेस पर ज़्यादा दिखा.
रुबियो ने 'द इंडियन एक्सप्रेस' को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि कोई भी टैरिफ़ भारत को सज़ा देने या नुक़सान पहुंचाने के लिए नहीं है. उनके मुताबिक़ अमेरिका की बड़ी विदेश नीति में रूस और यूक्रेन के बीच चल रही जंग भी शामिल है.
रुबियो के बयान से ये बात साफ़ है कि अमेरिका भारत के साथ रिश्ते को अहम मानता है और टैरिफ़ को सज़ा नहीं, बल्कि रूस-यूक्रेन युद्ध से जुड़ी नीति का हिस्सा बताता है. टैरिफ़ का ख़तरा पूरी तरह टला नहीं है.
इमिग्रेशन और वीज़ा से जुड़ा मुद्दा
अमेरिकी नौकरियों को बचाने के नाम पर बनी नीतियों का सीधा असर भारत की टेक्नोलाज़ी. इंडस्ट्री और अमेरिका में बसे भारतीयों पर पड़ा.
एच-1बी वीज़ा का बड़ा हिस्सा भारतीय टेक प्रोफ़ेशनल्स को मिलता है. ऐसे में आवेदनों की कड़ी जांच, ज़्यादा रिजेक्शन और फ़ीस बढ़ाने या अतिरिक्त शुल्क लगाने के प्रस्तावों ने टीसीएस, इन्फ़ोसिस और विप्रो जैसी बड़ी भारतीय आईटी कंपनियों को प्रभावित किया है.
बिना दस्तावेज़ वाले प्रवासियों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई हुई. इसमें कई भारतीयों को वापस भेजा गया, जिसकी भारत में काफ़ी आलोचना भी हुई.
दूसरा मुद्दा है रूस से ट्रेड का, पेट्रोलियम और एनर्जी की सप्लाई चेन पर भारत अपने हितों की नीति पर चलता है और यही अमेरिकी विदेश नीति से टकराती रही है.
भारत, रूस से सस्ता कच्चा तेल ख़रीदता रहा और अमेरिका बार-बार इस पर दबाव बनाता रहा.
भारत के साथ रिश्तों पर अमेरिकी सांसदों का रुख़ कैसा?
वॉशिंगटन की कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस (सीईआईपी) थिंक टैंक में साउथ एशिया प्रोग्राम के डायरेक्टर मिलन वैष्णव ने अल जज़ीरा से कहा, "सीनेट में कई डेमोक्रेट और रिपब्लिकन सांसद हैं, जो ट्रंप प्रशासन के अमेरिका-भारत रिश्तों को संभालने के तरीके से नाराज़ हैं."
मिडटर्म इलेक्शन के परिणाम को लेकर वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक 'विल्सन सेंटर' में दक्षिण एशिया मामले के जानकार माइकल कुगेलमैन ने अल जज़ीरा से कहा, "उन्हें शक है कि ट्रंप की फॉरेन पॉलिसी पर चुनाव के नतीजों का असर पड़ेगा. जब बात इंडिया की हो तो बदलाव मुश्किल है."
"ट्रंप कानूनी तौर पर तीसरे टर्म के लिए चुनाव नहीं लड़ सकते. वो ऐसी पॉलिसी पर चलते रहेंगे जो नई दिल्ली के साथ डील करने में अमेरिका को फ़ायदा पहुंचाएंगी"
हालांकि दोनों सदनों में अगर ट्रंप की पार्टी कमज़ोर पड़ती है तो कानून पास कराने के लिए विपक्ष के समर्थन की ज़रूरत पड़ेगी. और ट्रंप की ऐसी कई नीतियां हैं, जिनका डेमोक्रेट्स खुलकर विरोध कर चुके हैं. ऐसे में टैरिफ़ जैसे मुद्दों पर भारत को राहत मिल सकती है.
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अगर रिपब्लिकन पार्टी दोनों सदनों में बहुमत खो देती है, तो ट्रंप को कानून पास कराने के लिए डेमोक्रेट्स के समर्थन की आवश्यकता होगी।
Possible · Within weeks
टैरिफ जैसे मुद्दों पर भारत को राहत मिल सकती है अगर ट्रंप की पार्टी कमजोर पड़ती है।
Possible · Within weeks

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