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अमेरिका-ईरान शांति समझौते से पाकिस्तान की सुर्खियां, क्या भारत के लिए झटका?
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BBC हिंदी6/16/2026Politics6 min readIndia

अमेरिका-ईरान शांति समझौते से पाकिस्तान की सुर्खियां, क्या भारत के लिए झटका?

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अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते पर सहमति बनी है, जिसमें पाकिस्तान ने अहम भूमिका निभाई है. इस घटनाक्रम ने भारत में बहस छेड़ दी है कि क्या वह इस अहम कूटनीतिक पहल में अलग-थलग पड़ गया है.

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अमेरिका और ईरान के बीच चार महीने से चल रहे संघर्ष को ख़त्म करने के लिए एक शांति समझौते पर सहमति बनने की घोषणा की गई है. मध्य पूर्व के देशों से लेकर दुनियाभर में इसका स्वागत किया गया है.

अमेरिका और ईरान की बातचीत में पाकिस्तान एक अहम डिप्लोमैटिक खिलाड़ी बनकर उभरा है. इस समझौते ने भारत में भी बहस छेड़ दी है कि क्या हाल के वर्षों में इस क्षेत्र की सबसे अहम कूटनीतिक घटना में से एक में वह अलग-थलग पड़ गया.

पाकिस्तान, खाड़ी और अन्य देशों की कोशिशों से हुए इस समझौते की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफ़ी तारीफ़ हुई है.

ख़ासकर पाकिस्तान को इस प्रक्रिया में अलग-अलग दौर में अहम भूमिका निभाने वाला माना जा रहा है.

यह समझौता दोनों देशों के बीच चल रही जंग को ख़त्म करने और होर्मुज़ स्ट्रेट को फिर से खोलने वाला है. इस समझौते पर 19 जून को स्विट्ज़रलैंड में औपचारिक रूप से हस्ताक्षर किया जाएगा.

सोमवार को इस समझौते पर बनी सहमति का स्वागत करते हुए भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उम्मीद जताई कि इससे शांति बहाल करने और अहम समुद्री रास्तों से होकर जहाज़ों के आने-जाने की आज़ादी सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी.

उन्होंने कहा कि इससे "पूरी दुनिया में गंभीर आर्थिक मुश्किलें" पैदा हुईं और कई देशों में जान-माल का नुक़सान हुआ.

पाकिस्तान का भारत ने नहीं लिया नाम

पीएम मोदी ने उम्मीद जताई कि, "हम बाक़ी मुद्दों पर बातचीत के ज़रिए एक टिकाऊ समझौते तक पहुंचने की उम्मीद करते हैं."

हालांकि, मोदी ने शांति समझौते में पाकिस्तान की भूमिका का कोई ज़िक्र नहीं किया.

भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों से ख़राब रिश्ते रहे हैं, लेकिन पिछले साल तनाव तब तेज़ी से बढ़ गया जब कश्मीर के पहलगाम में कम से कम 26 भारतीय पर्यटकों की हत्या कर दी गई थी.

भारत ने हमले के लिए पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहराया और पाकिस्तान के अंदर 'आतंकवादी ठिकानों' पर हवाई हमले किए. हालाँकि भारत के इस आरोप को पाकिस्तान ख़ारिज करता है.

इसके बाद परमाणु हथियार रखने वाले दोनों पड़ोसी देशों के बीच क़रीब चार दिनों तक संघर्ष चला. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बाद में दोनों देशों के बीच युद्धविराम की घोषणा की.

राष्ट्रपति ट्रंप कई बार कह चुके हैं कि उन्होंने यह युद्धविराम कराया था.

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने नई दिल्ली में एक ब्रीफिंग के दौरान इस घटनाक्रम का स्वागत किया और उम्मीद जताई कि यह युद्धविराम इलाक़े में स्थायी शांति का रास्ता तैयार करेगा.

उन्होंने कहा कि भारत होर्मुज़ स्ट्रेट से बिना किसी रुकावट के आवाजाही की आज़ादी चाहता है और शांति तथा क्षेत्रीय स्थिरता लाने वाली सभी कोशिशों का स्वागत करता है.

जायसवाल ने यह भी उम्मीद जताई कि इस समझौते से यूक्रेन में शांति की कोशिशों को तेज़ी मिलेगी.

दुनिया भर के नेताओं ने इस समझौते को पश्चिम एशिया के लिए एक बड़ी कूटनीतिक कामयाबी बताया है.

पाकिस्तान, जो बातचीत में मध्यस्थता करने वाले देशों में से एक है, उसने सबसे पहले इस समझौते की घोषणा की.

प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने कहा कि दोनों पक्ष "लेबनान समेत सभी मोर्चों पर मिलिट्री ऑपरेशन को तुरंत और हमेशा के लिए रोकने" पर सहमत हो गए हैं.

उन्होंने आगे कहा कि मध्यस्थता निभाने वाले देश इस हफ़्ते "तकनीकी मुद्दों पर बातचीत" का आधार तैयार करने के लिए मिलेंगे.

बाद में, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी समझौते की पुष्टि करते हुए कहा कि उन्होंने होर्मुज़ स्ट्रेट में ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी नौसेना की नाकेबंदी को ख़त्म करने की मंज़ूरी दे दी है.

उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, "सभी को बधाई. दुनिया के जहाज़ों अपने इंजन चालू करो. तेल का फ़्लो जारी रहने दो."

पाकिस्तान को इस डील से क्या मिलेगा?

बीबीसी से बात करते हुए, वुडरो विल्सन इंटरनेशनल सेंटर फॉर स्कॉलर्स में साउथ एशिया इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर माइकल कुगेलमैन ने कहा कि अमेरिका-ईरान डील में पाकिस्तान की भूमिका मिडिल ईस्ट में उसकी स्थिति को मज़बूत कर सकती है और भारत के साथ उसकी स्ट्रेटेजिक दुश्मनी में उसे बढ़त दिला सकती है.

उन्होंने कहा कि यह समझौता सिर्फ़ पाकिस्तान के लिए एक कूटनीतिक कामयाबी नहीं है, बल्कि पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने की भारत की कोशिशों के लिए भी एक झटका है.

कुगेलमैन ने कहा, "अमेरिका और ईरान के बीच इस डील को करवाने में पाकिस्तान की कोशिशों ने भारत के साथ रणनीतिक मुक़ाबले में उसे एक बड़ी जीत दिलाई है."

उन्होंने कहा कि मिडिल ईस्ट दोनों देशों के लिए रणनीतिक तौर पर एक अहम इलाक़ा है, जो एनर्जी, इन्वेस्टमेंट और राजनीतिक वर्चस्व का सोर्स है. उन्होंने कहा कि इस समझौते का मतलब है कि भारत को इस इलाक़े में पाकिस्तान की बढ़ती हैसियत का सामना करना पड़ेगा.

उन्होंने कहा, "पाकिस्तान को अब मिडिल ईस्ट के कई बड़े खिलाड़ी एक अहम पावर ब्रोकर और शायद एक नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर के तौर पर देखते हैं."

कुगेलमैन का मानना ​​है कि इस कूटनीतिक सफलता से पाकिस्तान के नेताओं की घरेलू प्रतिष्ठा बढ़ सकती है, ऐसे समय में जब सरकार और सेना दोनों को राजनीतिक दबाव और लोगों की नाराज़गी को लेकर आलोचना का सामना करना पड़ रहा है.

उन्होंने समझाया, "यह आतंकवाद और राजनीतिक अस्थिरता से जुड़ी सालों की नेगेटिव हेडलाइन के बाद देश की अंतरराष्ट्रीय छवि को फिर से बनाने में मदद कर सकता है."

पूर्व भारतीय डिप्लोमैट और साउथ एशियन सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा की संस्थापक निरुपमा मेनन राव ने बीबीसी को बताया कि पाकिस्तान के शामिल होने पर भारत का संदेह दशकों की दुश्मनी से उपजा है. हालांकि, उन्होंने तर्क दिया कि कूटनीति को भावनाओं के बजाय इसे देशों के हितों के नज़रिए से देखा जाना चाहिए.

उन्होंने कहा, "पाकिस्तान जो भूमिका निभा रहा है, उसका जवाब देने में कुछ रुकावट है, क्योंकि पाकिस्तान के साथ हमारे रिश्ते बहुत ख़राब हैं."

फिर भी राव ने ज़ोर देकर कहा कि इस मुद्दे को भावनाओं के बजाय नतीजों से आंका जाना चाहिए.

उन्होंने समझाया, "कूटनीति कोई नैतिकता का खेल या क्रिकेट का स्कोरकार्ड नहीं है जिसमें जीतने और हारने वाले स्पष्ट दिखते हों."

इससे क्या कोई सीख मिलती है?

भारत सरकार के आधिकारिक स्वागत के बावजूद, विपक्षी नेता और राजनीतिक टिप्पणीकार मानते हैं कि इस बड़ी कूटनीतिक पहल में भारत कोई ख़ास भूमिका निभाने में नाकाम रहा और अब ख़ुद को किनारे पर पा रहा है.

कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने एक्स पर एक पोस्ट में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व और कूटनीतिक कदमों पर सवाल उठाए.

उन्होंने लिखा, "भारत के लिए यह पल उभरते वर्ल्ड ऑर्डर में हमारी जगह को लेकर अजीब सवाल खड़े करता है. यह समझौता पाकिस्तान, सऊदी अरब, क़तर और तुर्की की कोशिशों से हुआ. ईरान के साथ अपने सांस्कृतिक रिश्तों और प्रधानमंत्री मोदी के राष्ट्रपति ट्रंप के साथ बहुत ज़्यादा प्रचारित निजी रिश्ते के बावजूद, भारत तस्वीर में कहीं भी नहीं था."

खेड़ा ने कहा कि भारत सरकार इन रिश्तों का फ़ायदा उठाने, भारत की कूटनीतिक अहमियत बढ़ाने, या शांति की कोशिश में कोई ख़ास योगदान देने में नाकाम रही है.

उन्होंने कहा, "सालों तक, भारत ने आतंकवाद को स्पॉन्सर करने और एक्सपोर्ट करने में पाकिस्तान की भूमिका को उजागर करने के लिए काम किया. यूपीए सरकार के तहत, लगातार डिप्लोमैटिक कोशिशों की वजह से पाकिस्तान को एफ़एटीएफ़ की ग्रे लिस्ट में डाला गया. फिर भी आज, पाकिस्तान ने ख़ुद को ग्लोबल स्टेबिलिटी में एक स्टेकहोल्डर और शांति की एक किरण के तौर पर सफलतापूर्वक पेश किया है."

सीनियर जर्नलिस्ट और लेखक कल्लोल भट्टाचार्य का मानना ​​है कि शांति लाने में पाकिस्तान की भूमिका का स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि क्षेत्रीय स्थिरता भारत के हितों को भी पूरा करती है.

ख़ासकर फारस की खाड़ी क्षेत्र से तेल और गैस की सप्लाई और आर्थिक विकास के लिए इस पर भारत की निर्भरता को देखते हुए.

वो कहते हैं, "इसके बजाय, भारत को ईरान के साथ अपने संबंधों को सुधारने और उन्हें नए सिरे से व्यवस्थित करने की ज़रूरत है, जो उसका एक पुराना साझेदार रहा है."

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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