
श्रीलंका सरकार ने मन्नार बेसिन में हाइड्रोकार्बन की खोज के लिए अंतरराष्ट्रीय निवेश आकर्षित करने हेतु नीलामी प्रक्रिया शुरू की है, जो देश की आर्थिक संकट से उबरने की उम्मीद है।
श्रीलंका ने मन्नार बेसिन में तेल और गैस की खोज के लिए अंतरराष्ट्रीय नीलामी शुरू की है। अनुमान है कि इस क्षेत्र में दो अरब बैरल तेल और नौ ट्रिलियन क्यूबिक फ़ीट गैस मौजूद है, जिसे आर्थिक संकट के समाधान के रूप में देखा जा रहा है।
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मन्नार बेसिन में 1960 के दशक से तेल और गैस की खोज के प्रयास किए जा रहे हैं। केयर्न लंका ने 2011 में गैस की मौजूदगी की पुष्टि की थी, लेकिन व्यावसायिक कारणों से परियोजना बंद हो गई थी।
श्रीलंका के पश्चिमी समुद्री क्षेत्र में मौजूद मन्नार बेसिन में तेल और प्राकृतिक गैस की खोज तेज़ करने की तैयारी चल रही है.
श्रीलंका पेट्रोलियम विकास प्राधिकरण ने गहरे समुद्र में मौजूद चार प्रमुख क्षेत्रों के लिए 'एसएल2026-01' नाम से अंतरराष्ट्रीय नीलामी की प्रक्रिया आधिकारिक तौर पर शुरू कर दी है.
गहरे समुद्र का यह क्षेत्र क़रीब 33,964 वर्ग किलोमीटर में फैला है. इस नीलामी का मुख्य मक़सद यहां अंतरराष्ट्रीय निवेश लाना है. हालांकि, श्रीलंका सरकार फ़िलहाल अपने पैसे से गहरे समुद्र में कोई नई ड्रिलिंग नहीं कर रही है.
इसके बजाय 1967 से 2019 के बीच अलग-अलग चरणों में जुटाए गए 2डी और 3डी भूकंपीय आंकड़ों का दोबारा अध्ययन किया गया है.
इसके साथ ही, 2011 में केयर्न कंपनी की ओर से कुओं से जुटाए गए आंकड़ों का भी इस्तेमाल किया गया.
आधुनिक आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और बेहतर सॉफ़्टवेयर की मदद से इन पुराने आंकड़ों की दोबारा जांच की गई. इसके आधार पर ऐसे चार प्रमुख क्षेत्रों की पहचान कर नक़्शा तैयार किया गया है, जहां हाइड्रोकार्बन मिलने की संभावना है.
इस इलाक़े में क़रीब दो अरब बैरल कच्चा तेल और नौ ट्रिलियन क्यूबिक फ़ीट प्राकृतिक गैस होने का अनुमान है.
ये क्षेत्र समुद्र में 100 मीटर से लेकर 3,000 मीटर तक की गहराई में हैं.
श्रीलंका सरकार की योजना लंदन और कुआलालंपुर में निवेशकों के लिए सम्मेलन आयोजित करने की है. इसके ज़रिए सरकार अंतरराष्ट्रीय तेल कंपनियों से करोड़ों डॉलर का निवेश लाना चाहती है.
आर्थिक संकट से जूझ रहे श्रीलंका के लिए समुद्र में मौजूद ये संसाधन नई उम्मीद बनकर सामने आए हैं.
पेरादेनिया यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस चांसलर और जाने-माने भूवैज्ञानिक प्रोफ़ेसर अतुल सेनारत्ने ने बीबीसी तमिल से कहा, "दुनिया भर में तेल और गैस की खोज के लिए खोदे जाने वाले कुओं में केवल 10 से 15 प्रतिशत ही सफल होते हैं."
"लेकिन श्रीलंका के मन्नार बेसिन में चार परीक्षण कुएं खोदे गए थे. इनमें से दो में अच्छी गुणवत्ता वाली प्राकृतिक गैस मिली. इस हिसाब से यहां कामयाबी की दर 50 प्रतिशत रही."
उन्होंने कहा, "1960 और 1970 के दशक में की गई ड्रिलिंग केवल 700 मीटर की गहराई तक पहुंच पाई थी. लेकिन अब यह पुष्टि हो चुकी है कि तीन हज़ार मीटर यानी तीन किलोमीटर की गहराई में अरबों साल पुरानी चट्टानों की परतों के बीच बहुत अच्छी गुणवत्ता वाली गैस मौजूद है."
"यह न केवल देश के ऊर्जा संकट का घरेलू समाधान दे सकती है, बल्कि अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने का भी बहुत बड़ा मौक़ा बन सकती है."
श्रीलंका की मन्नार खाड़ी में तेल और प्राकृतिक गैस की खोज 1960 के दशक में ही शुरू हो गई थी. गहरे समुद्र में ड्रिलिंग करके प्राकृतिक गैस की मौजूदगी खोजने और उसकी पुष्टि करने वाली पहली कंपनी 'केयर्न लंका' थी.
केयर्न ने अगस्त 2011 में मन्नार बेसिन में गहरे समुद्र में परीक्षण कुएं खोदने शुरू किए थे. कंपनी ने आधिकारिक तौर पर बताया था कि समुद्र की सतह से क़रीब 4,300 मीटर यानी 14 हज़ार फ़ीट की गहराई में प्राकृतिक गैस मिली है.
इस खोज के बाद 'डोराडो' और 'बाराकुडा' नाम के कुओं में परीक्षण किए गए. इन परीक्षणों में हर दिन 28 लाख क्यूबिक फ़ीट प्राकृतिक गैस का बहाव दर्ज किया गया.
हालांकि, उस समय वहां मिली गैस की मात्रा सीमित थी. यह अनुमान लगाया गया कि उस गैस को निकालकर बाज़ार में बेचना फ़ायदेमंद नहीं होगा. क़रीब 15 करोड़ डॉलर का निवेश करने के बाद केयर्न ने 2015 में अपना लाइसेंस छोड़ दिया और श्रीलंका से बाहर चली गई.
साल 2017 में भूवैज्ञानिक रत्नायके और उनकी टीम ने मन्नार बेसिन को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय शोध रिपोर्ट प्रकाशित की. इसमें वैज्ञानिक रूप से यह पुष्टि हुई कि इन चट्टानों की परतें हाइड्रोकार्बन और कच्चा तेल बनने के लिए ज़रूरी 'तापीय परिपक्वता' के स्तर तक पहुंच चुकी हैं.
श्रीलंका के पूर्व ऊर्जा मंत्री चंपिका रणवका ने बीबीसी तमिल से कहा कि केयर्न के जाने के बाद अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को आकर्षित करने के लिए नीलामी और निमंत्रण जारी किए गए थे. लेकिन किसी भी अंतरराष्ट्रीय कंपनी ने श्रीलंका में निवेश करने में दिलचस्पी नहीं दिखाई.
पूर्व बिजली ढांचा और ऊर्जा मंत्री उदय गम्मनपिला ने बीबीसी तमिल से कहा, "मन्नार बेसिन में गैस होने की पुष्टि पहले ही हो चुकी है. लेकिन समुद्र तल के नीचे से इसे निकालने और बिजली बनाने या कारख़ानों में इस्तेमाल करने लायक़ ढांचा तैयार करने के लिए अरबों डॉलर का निवेश करना होगा."
कैबिनेट के प्रवक्ता और मंत्री नलिंदा जयतिस्सा ने बीबीसी तमिल से सरकार का पक्ष रखते हुए कहा, "हमारी सरकार इस मुद्दे पर गंभीरता से ध्यान दे रही है. पहले चरण के तहत हमने सीलोन पेट्रोलियम कॉरपोरेशन और श्रीलंका पेट्रोलियम विकास प्राधिकरण के साथ मिलकर अंतरराष्ट्रीय नीलामी की प्रक्रिया घोषित की है."
मंत्री ने कहा, "हमने इस बात पर ज़ोर दिया है कि खोज का काम बहुत सावधानी से होना चाहिए. यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इस इलाक़े के प्राकृतिक वातावरण को किसी भी तरह का नुक़सान न हो. ख़ास तौर पर मन्नार क्षेत्र के मछुआरा समुदाय पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए."
विशेषज्ञों का कहना है कि श्रीलंका की ओर से गहरे समुद्र के क्षेत्रों की नीलामी केवल आर्थिक गतिविधि नहीं है. यह हिंद महासागर में बड़ी ताक़तों के बीच चल रही भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से भी क़रीबी रूप से जुड़ी हुई है.
रियर एडमिरल जयरत्ने का कहना है कि भारत अपनी दक्षिणी सीमा की सुरक्षा और इस क्षेत्र में दूसरे देशों की सैन्य मौजूदगी रोकने पर गंभीरता से ध्यान देगा. उन्होंने कहा कि भारत इस पूरे मामले पर नज़र रखेगा.
श्रीलंका की समुद्री जीवविज्ञानी डॉक्टर आशा डी वोस ने कहा, "जलवायु परिवर्तन की वजह से बदलते मौसम का असर मन्नार के समुद्री क्षेत्र पर पहले ही पड़ रहा है. ऐसे में गहरे समुद्र में ड्रिलिंग की गतिविधियां बहुत बड़ी आपदा का कारण बन सकती हैं."
श्रीलंका पेट्रोलियम विकास प्राधिकरण के महानिदेशक नील डी सिल्वा ने कहा, "हमें भरोसा है कि पुराने अध्ययनों से मिले आंकड़ों और आधुनिक तकनीक की मदद से हम अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को आकर्षित कर पाएंगे."
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