
जलवायु परिवर्तन के बीच मानसिक स्वास्थ्य और ब्लड प्रेशर की दवाएं शरीर को ठंडा रखने की प्राकृतिक क्षमता को कैसे प्रभावित करती हैं।
जलवायु परिवर्तन के कारण भीषण गर्मी बढ़ रही है, और डॉक्टर चेतावनी दे रहे हैं कि मानसिक स्वास्थ्य, ब्लड प्रेशर तथा दिल की बीमारियों की कुछ आम दवाएं शरीर के तापमान को नियंत्रित करने की क्षमता पर असर डाल सकती हैं।
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जलवायु परिवर्तन की वजह से दुनिया भर में हीटवेव की समस्या गंभीर होती जा रही है।
Author, नाओमी मिहारा
पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
प्रकाशित 22 अगस्त 2026, 07:07 IST
अपडेटेड 4 घंटे पहले
पढ़ने का समय: 9 मिनट
इस साल जून में जब यूरोप में भीषण गर्मी पड़ रही थी, तो इलियाना ओकुमुस को समझ नहीं आया कि उन्हें दूसरों के मुक़ाबले इतनी ज़्यादा तकलीफ़ क्यों हो रही है.
वह कहती हैं, "जैसे ही मैं अपने अपार्टमेंट से बाहर निकलती, मेरे चेहरे पर पसीना आने लगता."
ब्रसल्स में बिना एयर कंडीशनिंग वाले सबसे ऊपरी मंज़िल के अपार्टमेंट में रहने वाली 28 साल की इलियाना ने राहत पाने के लिए हर मुमकिन कोशिश की. जैसे ऑफिस या आस-पास के कैफ़े जाना. लेकिन इससे भी उन्हें बहुत राहत नहीं मिली.
वह बताती हैं, "शरीर का तापमान सामान्य होने में मुझे आधा या एक घंटा लग जाता था. एक दिन तो अपार्टमेंट के अंदर तापमान 34 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था. मुझे लगता है कि मैं उस दिन लगभग 18 घंटे सोयी थी."
उन्हें जागने में मुश्किल हो रही थी और चिंता थी कि कहीं उनका ब्लड प्रेशर तो कम नहीं हो गया है.
ओकुमुस के लिए भीषण गर्मी कोई नई बात नहीं थी. वह दुनिया के दूसरे हिस्सों में 40 डिग्री सेल्सियस वाली गर्मी का सामना कर चुकी थीं.
फिर भी इस बार गर्मी का उन पर इतना बुरा असर पहली बार हुआ था. जब उन्होंने सोशल मीडिया पर ऐसे लोगों की पोस्ट देखीं, जिन्हें भी वैसी ही तकलीफ़ें हो रही थीं, तब उन्हें गर्मी और उन दवाओं के बीच संबंध समझ ाया जो उन्होंने दो साल पहले डिप्रेशन और एंग्जाइटी के लिए लेनी शुरू की थीं.
जलवायु परिवर्तन की वजह से हीटवेव की समस्या गंभीर होती जा रही है.
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ऐसे में डॉक्टर और स्वास्थ्य संगठन चेतावनी दे रहे हैं कि कुछ आम दवाएं, जिनमें मानसिक स्वास्थ्य, ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियों की दवाएं शामिल हैं. ये शरीर के तापमान को नियंत्रित करने की क्षमता पर असर डाल सकती हैं और लोगों में गर्मी से जुड़ी बीमारियां होने की वजह बन सकती हैं.
गर्मी और मानसिक स्वास्थ्य की दवाएं
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डिप्रेशन, एंग्जाइटी और बाइपोलर डिसऑर्डर जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कई दवाएं गर्मी से होने वाले ख़तरों को बढ़ा सकती हैं.
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ये दवाएं हाइपोथैलेमस पर असर डालती हैं. हाइपोथैलेमस दिमाग़ का वह हिस्सा है जो शरीर के तापमान को कंट्रोल करता है.
रॉबर्ट फेडर न्यू हैम्पशायर के रिटायर्ड साइकियाट्रिस्ट और 'मेडिकल सोसाइटी कंसोर्टियम ऑन क्लाइमेट एंड हेल्थ' की स्टीयरिंग कमिटी के सदस्य हैं.
वह कहते हैं, "दिमाग़ का यह हिस्सा हमें अपनी एक्टिविटी कम करने, ज़्यादा पसीना बहाने और मेटाबॉलिज्म कम करने के लिए प्रेरित करता है. ये सभी गर्मी से निपटने के लिए फ़ायदेमंद बदलाव हैं."
इन दवाओं में सबसे ज़्यादा लिखी जाने वाली एंटीडिप्रेसेंट दवाएं शामिल हैं, जैसे सेलेक्टिव सेरोटोनिन रीअपटेक इनहिबिटर्स और सेरोटोनिन और नॉरपेनेफ्रिन रीअपटेक इनहिबिटर्स.
इन कैटिगरी की दवाओं में सर्ट्रालाइन, फ्लुओक्सेटीन, एस्सिटालोप्राम और वेनलाफैक्सिन शामिल हैं.
ये दवाएं दिमाग में सेरोटोनिन के रीअपटेक को रोककर काम करती हैं. सेरोटोनिन एक प्राकृतिक केमिकल है जो मूड और शरीर के दूसरे कामों को कंट्रोल करता है.
हाइपोथैलेमस में अत्यधिक सेरोटोनिन शरीर के तापमान को नियंत्रित करने में बाधा डाल सकता है और अत्यधिक पसीना आने का कारण बन सकता है. यह समस्या लगभग पांच में से एक व्यक्ति को प्रभावित करती है जो एंटीडिप्रेसेंट ले रहा है और इससे इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी हो सकती है.
फेडर कहते हैं, "जब आप पहले से ही ज़्यादा तापमान के कारण इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी से जूझ रहे हों, तो यह समस्या और भी बढ़ जाती है."
ट्राइसाइक्लिक एंटीडिप्रेसेंट एक पुराना प्रकार का एंटीडिप्रेसेंट है. ये ज़्यादा पसीना आने की वजह बन सकता है, या फिर इसे आने से रोक सकता है. ऐसा होना अपने आप में एक समस्या है और इस वजह से शरीर का तापमान बढ़ाता है.
इन एंटीडिप्रेसेंट का "एंटीकोलीनर्जिक" प्रभाव होता है. इसका मतलब है कि वे एसिटाइलकोलीन नामक न्यूरोट्रांसमीटर की गतिविधि को रोकते हैं. ये पसीना आने समेत कई अलग-अलग शारीरिक कार्यों में शामिल होता है.
लॉस एंजिलिस में 36 साल की करियर कोच कैरोलीन फ्रैसेनेट पर इस गर्मी में तीन अलग-अलग तरह की साइकियाट्रिक दवाएं लेने का मिला-जुला असर पड़ा.
ये दवाएं एंटीडिप्रेसेंट, मूड स्टेबलाइज़र और एडीएचडी थीं. जुलाई में बहुत लंबी और उमस भरी हीटवेव के दौरान, उन्हें अपना ध्यान केंद्रित करने में मुश्किल होने लगी. वे ज़्यादा चिड़चिड़ा महसूस करने लगीं और उन्हें सामान्य से ज़्यादा पसीना आने लगा.
शुरू में उन्हें लगा कि ये लक्षण ख़राब खान-पान और कम पानी पीने की वजह से हैं. फिर उनके मेंटल हेल्थ सपोर्ट ग्रुप के एक दोस्त ने उन्हें गर्मी और दवाओं के बीच संबंध बताने वाले लेख भेजे. ग्रुप के दूसरे लोगों ने भी कहा कि उन्होंने भी ऐसी ही दिक्कतें महसूस की हैं.
वे कहती हैं, "अपनी मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों और अपनी दवाओं के साइड इफ़ेक्ट्स के बारे में अच्छी जानकारी होने के बावजूद, इस बात का मुझे बिल्कुल पता नहीं था."
दूसरे तरह की साइकियाट्रिक दवाओं का भी असर हो सकता है. स्किज़ोफ्रेनिया और बाइपोलर डिसऑर्डर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली एंटीसाइकोटिक दवाएं हाइपोथैलेमस में डोपामाइन को रोकती हैं. जिससे शरीर को ठंडा रखने वाली सामान्य प्रतिक्रियाएं नहीं हो पातीं.
पिछली हीटवेव पर हुई स्टडीज़ में एंटीसाइकोटिक दवाओं के इस्तेमाल और मौत के ज़्यादा जोखिम के बीच संबंध पाया गया है. एडीएचडी के इलाज में इस्तेमाल होने वाले स्टिमुलेंट्स, जैसे कि रिटालिन, शरीर में गर्मी बढ़ाते हैं और ब्लड वैसील्स को सिकोड़ते हैं.
जिससे शरीर की प्राकृतिक रूप से ठंडे होने की प्रक्रिया में बाधा आती है. फेडर का कहना है कि ये दवाएं थकान या ज़्यादा मेहनत का पता भी नहीं चलने देतीं, यानी लोगों को यह एहसास नहीं हो पाता कि उनका शरीर बहुत ज़्यादा गर्म हो रहा है.
बीटा-ब्लॉकर्स से लेकर डाइयुरेटिक्स तक
हीटवेव के प्रति शरीर की संवेदनशीलता को सिर्फ मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी हुई दवाएं ही नहीं बढ़ाती. बल्कि ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियों की दवाएं भी ऐसी दवाओं का एक और ग्रुप हैं जो गर्मी के प्रति शरीर के रिएक्शन पर असर डालती हैं.
डाइयुरेटिक्स, एसीई (एंजियोटेंसिन-कन्वर्टिंग एंजाइम) इनहिबिटर्स और एआरबी एस (एंजियोटेंसिन II रिसेप्टर ब्लॉकर्स), जिनका इस्तेमाल आमतौर पर हाई ब्लड प्रेशर के इलाज में किया जाता है, शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बिगाड़ सकते हैं.
इनमें से बाद वाली दो तरह की दवाएं उस हार्मोन पर भी असर डाल सकती हैं जो आमतौर पर प्यास लगने का संकेत देता है.
लोगन हार्पर यूनिवर्सिटी ऑफ़ कोलोराडो एंशुट्ज़ के क्लाइमेट एंड हेल्थ प्रोग्राम में फ़ैमिली फ़िज़िशियन और असिस्टेंट फ़ेलोशिप डायरेक्टर हैं.
वह कहते हैं, "इन सबके मिले-जुले असर से शरीर में पानी की इतनी ज़्यादा कमी हो सकती है कि किडनी फ़ेल होने, हार्ट अटैक आने या शरीर के कई दूसरे ज़रूरी अंगों पर गंभीर असर पड़ने का ख़तरा बढ़ जाता है."
वहीं दिल की बीमारियों में आम तौर पर इस्तेमाल होने वाली दवा 'बीटा-ब्लॉकर्स' त्वचा तक खून के बहाव को कम कर सकती हैं. जिसका मतलब है कि शरीर उतनी असरदार तरीके से गर्मी बाहर नहीं निकाल पाता.
ट्राइसाइक्लिक एंटीडिप्रेसेंट्स के अलावा, एंटीकोलिनर्जिक दवाओं के दूसरे प्रकार, जिनका इस्तेमाल पार्किंसंस रोग, ओवरएक्टिव ब्लैडर, सांस की बीमारियों और एलर्जी जैसी कई तरह की समस्याओं के इलाज में होता है. वे सभी शरीर के पसीना आने और शरीर को ठंडा रखने के सिस्टम पर असर डाल सकते हैं.
हार्पर कहते हैं, "अक्सर लोग कई दवाएं एक साथ लेते हैं, जो उनके शरीर को ठंडा रखने की क्षमता को बाधित कर सकती हैं और अंगों को नुकसान पहुंचने की संभावना को बढ़ा सकती हैं."
वे आगे कहते हैं कि यह विशेष रूप से बुजुर्गों के मामले में सच है. जो आम तौर पर गर्मी से होने वाली बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं.
कुछ दवाएं हल्की गर्मी को भी गंभीर समस्या बना सकती हैं. अमेरिका में बुजुर्ग मरीजों पर किए गए एक अध्ययन में, जो ड्यूरेटिक्स, एंटीसाइकोटिक्स, बीटा ब्लॉकर्स, स्टिम्यलन्ट और एंटीहाइपरटेंसिव जैसी दवाएं ले रहे थे, यह निष्कर्ष निकाला गया कि बुजुर्ग मरीजों को हीटवेव की अनुपस्थिति में भी गर्मी से संबंधित बीमारियों की वजह से अस्पताल में भर्ती होने का खतरा अधिक हो सकता है.
हार्पर कहते हैं, "यह सब जानते हैं कि इन दवाओं के कॉम्बिनेशन से एक बार में एक दवा लेने की तुलना में जोखिम बढ़ जाता है."
हालांकि वे आगे कहते हैं कि अभी तक यह पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है कि कौन से दवाओं का कॉम्बिनेशन सबसे अधिक खतरनाक हैं.
सामाजिक-आर्थिक कारक भी जोखिम को प्रभावित करते हैं. हार्पर कहते हैं, "हो सकता है किसी का काम शारीरिक श्रम वाला हो जिसमें उसे बहुत गर्मी सहन करनी पड़ती हो, या हो सकता है वह घर के बाहर ही रहता हो. या शायद आप किसी शहरी हीट आइलैंड में रहते हों और आपके पास एयर कंडीशनिंग का खर्च उठाने की क्षमता न हो."
दक्षिणी नेवाडा में टौरो यूनिवर्सिटी में इमरजेंसी मेडिसिन फिजिशियन असिस्टेंट और असिस्टेंट प्रोफेसर, सेसिलिया अहोनोनु ने हाल ही में इसे खुद देखा.
लास वेगास में कम्युनिटी हेल्थ आउटरीच इवेंट के दौरान जब तापमान लगभग 43 डिग्री सेल्सियस था, तो वह 60 साल के एक व्यक्ति से मिलीं जो पार्क में सो रहा था. वह कहती हैं, "वह पीला दिख रहा था, उसे बहुत पसीना आ रहा था और उसकी हार्ट रेट तेज़ थी."
वह व्यक्ति जो डाइयूरेटिक और एसएसआरआई दवाएं ले रहा था, उसे यह एहसास नहीं हुआ कि उसका शरीर कितना ज़्यादा गर्म हो गया है.
अहोनोनु कहती हैं, "उसने वही किया जो हममें से ज़्यादातर लोग करते और अपने लक्षणों का कारण भीषण गर्मी को मानता."
लेकिन जब उन्होंने और सवाल पूछे, तो एक और संभावित कारण सामने आया- उसकी दवाएं.
अहोनोनु ने उन्हें गर्मी से बचाव के बुनियादी उपाय बताए, जैसे ज़्यादा पानी पीना, तेज़ धूप के समय बाहर न निकलना. और उन्हें आस-पास के कूलिंग सेंटर्स की लिस्ट दी.
उन्होंने उन्हें उन गंभीर लक्षणों के बारे में भी आगाह किया जिन पर ध्यान देना ज़रूरी है, क्योंकि वे हीट स्ट्रोक का संकेत हो सकते हैं, जो एक संभावित मेडिकल इमरजेंसी है.
वह कहती हैं, "अगर किसी की मानसिक स्थिति में कोई बदलाव या कन्फ्यूज़न दिखे, या कोई व्यक्ति सामान्य व्यवहार न कर रहा हो, तो उस व्यक्ति को तुरंत नज़दीकी इमरजेंसी रूम ले जाना चाहिए."
बेहतर जानकारी
डॉक्टर सलाह देते हैं कि बिना डॉक्टरी सलाह के दवाएं बंद न करें. हार्पर का कहना है कि वे चाहते हैं कि डॉक्टर खुद गर्मी और दवाओं के बीच संबंध के बारे में बेहतर ट्रेनिंग लें और जागरूक हों.
वे कहते हैं, "मुझे लगता है कि जब भी कोई डॉक्टर नई दवा लिखे, तो उन्हें एक मिनट निकालकर सबसे ज़्यादा जोखिम वाले साइड इफ़ेक्ट्स की लिस्ट बतानी चाहिए."
"कुछ दवाएं ऐसी होती हैं, खासकर ज़्यादा जोखिम वाले लोगों के लिए, जिनमें गर्मी से जुड़ी बीमारी के बारे में भी बताना चाहिए."
ओकुमुस के लिए इस गर्मी में उनके अनुभव ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या वे दवा लेना जारी रखना भी चाहती हैं या नहीं.
उनका कहना है कि बस यह जानना कि यह उनकी दवाओं का एक साइड इफ़ेक्ट है, न कि शरीर में कोई और गड़बड़ी, उन्हें राहत देता है.
वे कहती हैं, "इससे मुझे पता चलता है कि ठीक है, यह एक असल बात है, न कि कोई अचानक होने वाली घटना."
"इस बात ने ही बहुत मदद की है."
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