
दिल्ली-एनसीआर में एच1एन1 के 1,700 से ज़्यादा मामले सामने आए हैं; डॉक्टर सतीश कौल ने लक्षणों और बचाव के तरीकों के बारे में जानकारी दी।
दिल्ली-एनसीआर में स्वाइन फ्लू (एच1एन1) के 1,700 से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ सामान्य फ्लू जैसे दिखने वाले इन लक्षणों को नज़रअंदाज़ न करने की सलाह दे रहे हैं, क्योंकि ये गंभीर स्थिति में जानलेवा हो सकते हैं।
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एच1एन1 इंफ्लुएंज़ा ए वायरस का एक सबटाइप है जो श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है। यह मुख्य रूप से ड्रॉपलेट इंफेक्शन के माध्यम से फैलता है।
बदलते मौसम और बढ़ती उमस में ज़ुकाम होना आम बात है. लेकिन कुछ ऐसे ही लक्षण आपको एच1एन1 वायरस भी देता है, जिसे हम स्वाइन फ्लू भी कहते हैं.
और इस समय दिल्ली समेत देश कई हिस्सों में स्वाइन फ्लू के मामले बढ़ रहे हैं.
अकेले दिल्ली-एनसीआर में इस साल अब तक एच1एन1 के 1,700 से ज़्यादा कन्फर्म्ड केस आ चुके हैं. न्यूज़ एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, स्वास्थ्य अधिकारियों ने शुक्रवार को ये जानकारी दी है.
ऐसे में स्वाइन फ्लू के बढ़ते मामलों के बीच जागरूक रहना ज़रूरी है, क्योंकि डॉक्टरों के मुताबिक़, सामान्य फ्लू जैसे दिखने वाले ये लक्षण किसी भी समय घातक हो सकते हैं.
फोर्टिस गुरुग्राम में इंटरनल मेडिसिन के प्रिंसिपल डायरेक्टर और यूनिट हेड डॉक्टर सतीश कौल ने बताया कि एच1एन1, इंफ्लुएंज़ा ए वायरस का सबटाइप है.
इसे आम भाषा में स्वाइन फ्लू भी कहते हैं. इंफ्लुएंज़ा वायरस के और भी टाइप हैं, जैसे- एच3एन2, एच9एन1.
एच1एन1 वायरस हमारे शरीर के अंदर जाकर रेस्पेरेटरी ट्रैक्ट जैसे- नाक, गले और छाती पर असर डालता है. इसकी वजह से निमोनिया भी हो सकता है.
ज़्यादा फैलने पर ये पूरे फेफड़ों को भी अपने चपेट में ले सकता है. रेस्परेटरी फेल्योर भी हो सकता है.
डॉक्टर सतीश ने बताया, "एच1एन1 वायरस मुख्यतः ड्रॉपलेट इंफ्केशन से फैलता है. खांसने से, छींकने से जो ड्रॉपलेट्स गिरते हैं, वो जब हवा में जाते हैं तो उसके दायरे में जो लोग भी आते हैं, उनसे यह वायरस फैलता है."
वो कहते हैं, "आप ऑफिस में बैठे हैं, किसी ने छींक मारी या खांसी आई तो उसके हाथों में यह वायरस आ जाता है. उसने कोई पहले टेबल टॉप पकड़ा फिर दरवाज़े का हैंडल पकड़ा या कोई चीज़ पकड़ी तो वहां वायरस आ जाता है. जब इन चीज़ों को कोई दूसरा व्यक्ति पकड़ता है तो वो भी संक्रमित हो सकता है."
उनके मुताबिक़, इस वायरस से संक्रमित होने पर सर्दी, खांसी, ज़ुकाम, बुखार, बदन टूटने जैसे लक्षण दिखते हैं. आमतौर पर 85 फ़ीसदी मरीज़ों में यही लक्षण दिखते हैं, जो तीन से पांच दिनों में अपने आप ठीक भी हो जाते हैं.
हालांकि, खांसी, कमज़ोरी और थकान एक-दो सप्ताह या कभी-कभी उससे अधिक समय तक रह सकती है. प्रदूषण और ख़राब एयर क्वालिटी के कारण इस मौसम में खांसी और सांस से जुड़े लक्षण अधिक लंबे समय तक महसूस हो सकते हैं. लेकिन ये ठीक हो जाते हैं.
डॉक्टर सतीश कहते हैं लेकिन बाकी 15 फीसदी लोगों में ये गंभीर रूप ले सकता है. उनके मुताबिक़, "अगर आपको लगता है कि इस संक्रमण के कारण आपको सांस में दिक्क़त हो रही है, खांसी में बलगम के साथ खून आ रहा है, हाथ पैर नीले पड़ रहे हैं, सांस की गति तेज़ हो रही है तो आपको हॉस्पिटल इमर्जेंसी में जाकर डॉक्टर को दिखाना चाहिए. इसका मतलब इंफ्लुएंज़ा गंभीर रूप धारण कर गया है."
उनके मुताबिक़, इन गंभीर लक्षणों को अनदेखा करने पर ये इंफ्लुएंज़ा आपको आईसीयू भी पहुंचा सकता है और कुछ मामलों में जानलेवा भी हो सकता है.
नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में छपे एक लेख के मुताबिक इस वायरस से सबसे ज्यादा ख़तरा उन लोगों को है,- जिनकी उम्र 65 साल से ज्यादा है; जिन्हें कोमॉर्बिडिटी है, यानी जो लोग डायबीटिक या हाइपरटेंसिव हैं, हृदय रोग से ग्रसित हैं, अस्थमा है या इम्यूनोसप्रेशन पर हैं; मोटापे से ग्रसित लोगों, प्रेग्नेंट महिलाओं और 5 साल से कम उम्र के बच्चों को भी ये वायरस गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है.
स्वाइन फ्लू के लक्षण दिखने में सीजनल फ्लू जैसे लगते हैं, इसलिए कई बार लोगों को पता भी नहीं लगता कि उन्हें स्वाइन फ्लू हुआ है. लेकिन दोनों में फ़र्क़ है. डॉक्टर सतीश के मुताबिक़, अगर किसी को तेज़ बुखार के साथ सर्दी, खांसी, ज़ुकाम, बदन में दर्द है, बुखार उतर ना रहा हो, डायरिया हो रहा तो संभव है कि ये एच1एन1 हो.
इसका पता लगाने के लिए पीसीआर-बेस्ड टेस्ट होता है, जो बहुत आसानी से कराया जा सकता है. इसमें गले से या नाक से स्वैब लिया जाता है और 24 घंटे के अंदर रिपोर्ट आ जाती है.
अगर रिपोर्ट पॉजिटिव आती है तो सबसे पहले मरीज़ को आईसोलेट हो जाना चाहिए, ताकि बाकी लोग उससे ग्रसित ना हों. उसके बाद मरीज़ को सिम्प्टमैटिक ट्रीटमेंट यानी हाइड्रेशन, बुखार उतारने के लिए दवा और खांसी, ज़ुकाम है तो नेबुलाइजेशन जैसे उपाय करने चाहिए. अगर मरीज़ हाई रिस्क कैटिगरी में आते हैं उन्हें तुरंत एंटी फ्लू दवा शुरू करनी चाहिए.
अगर संक्रमण के लक्षण वाले लोगों को किसी वजह से बाहर जाना पड़ रहा है, तो उन्हें फ्लू हाइज़ीन का ध्यान रखना चाहिए ताकि ये संक्रमण दूसरे लोगों में ना फैले. जैसे- खांसी, सर्दी, ज़ुकाम है तो एक रूमाल का इस्तेमाल करें; छींक मारते समय, कोहनी का इस्तेमाल करें; नाक के ऊपर हाथ रखिए ताकि वो ड्रॉपलेट्स फैलें ना; हाथ धोएं; मास्क पहनें.
फ्लू से बचाव का सबसे कारगर उपाय है, सालाना इंफ्लुएंजा वैक्सीन लगवाना. डॉक्टर सतीश बताते हैं कि 65 साल से ऊपर के हर व्यक्ति को ये वैक्सीन ज़रूर लेनी चाहिए. वैक्सीनेशन से स्वाइन फ्लू होने की संभावना 40-50 प्रतिशत तक हो जाती है और अगर होता भी है तो उसकी गंभीरता कम रहती है. हर बार मौसम बदलने पर सितंबर-अक्टूबर के महीने में हमें इस वैक्सीन के बारे में अपने डॉक्टर से बात करनी चाहिए. अगर किसी व्यक्ति को काम की वजह से काफी ट्रैवल करना पड़ता है, तो उसे भी ये वैक्सीन लगवा लेनी चाहिए भले ही उसकी उम्र 65 साल से कम क्यों ना हो.
AI outlook — possibilities, not facts
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Very likely · Within months
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