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नेपाल बाढ़: खोज और बचाव अभियान में अंतरराष्ट्रीय मदद, भारत और चीन की टीमें तैनात
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BBC हिंदी1 hour agoWorld5 min readIndia

नेपाल बाढ़: खोज और बचाव अभियान में अंतरराष्ट्रीय मदद, भारत और चीन की टीमें तैनात

नेपाल में विनाशकारी बाढ़ के बाद राहत और बचाव कार्यों के लिए भारत और चीन के विशेषज्ञ पहुंच चुके हैं, जबकि बेली ब्रिज और फोरेंसिक उपकरणों की मांग की गई है।

Quick Look

नेपाल में भीषण बाढ़ के बाद खोज और बचाव अभियान जारी है। भारत और चीन की विशेषज्ञ टीमें सुरंगों में फंसे लोगों को निकालने के लिए तैनात की गई हैं। सरकार ने बेली ब्रिज, फोरेंसिक तकनीक और राहत सामग्री के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से समन्वय किया है।

AI-generated summary

Why It Matters

नेपाल में हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़ से बुनियादी ढांचे और जलविद्युत परियोजनाओं को व्यापक नुकसान हुआ है। सरकार ने खोज और बचाव के लिए अंतरराष्ट्रीय सहायता का समन्वय शुरू किया है।

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नेपाल में विनाशकारी बाढ़ के बाद खोज और बचाव अभियान जारी है. नेपाल चार या पांच तरह की मदद को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ काम कर रहा है.

अधिकारियों ने कहा है कि इस मदद का कुछ हिस्सा मिल चुका है और कुछ जल्द मिलने वाला है.

नेपाल के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लोक बहादुर पौडेल छेत्री ने कहा, "हमने शुरू से ही खोज और बचाव के लिए 'टनल टीम', कहीं फंसे ज़िंदा लोगों का पता लगाने के लिए 'स्कैनर', तत्काल 'डीएनए' टेस्ट करने में सक्षम फोरेंसिक तकनीक, शवों को रखने के लिए फ्रीजर और बेली ब्रिज उपलब्ध कराने के संबंध में समन्वय किया है."

माना जा रहा है कि भोटेकोशी-त्रिशूली गलियारे के साथ स्थित कई जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंगों में कई मज़दूर फंसे हुए हैं.

कुछ लोग खोज और बचाव कार्यों में विदेशी विशेषज्ञों की मदद न लेने को लेकर कई लोगों की जान जोखिम में डालने के लिए सरकार की आलोचना कर रहे हैं.

लेकिन मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने दावा किया है कि इसमें कोई सच्चाई नहीं है.

लोक बहादुर पौडेल छेत्री ने कहा, "सरकार का कहना है कि उसने शुरू में खोज और बचाव के लिए मदद नहीं मांगी थी, लेकिन अब चीन और भारत से (विशेषज्ञों की) टीमें प्रभावित क्षेत्रों में पहुंच गई हैं और काम कर रही हैं."

"घटना वाले दिन कुछ भ्रम की स्थिति थी, लेकिन हमने तुरंत मित्र देशों के साथ समन्वय शुरू कर दिया. ऐसा नहीं है कि हम मदद नहीं लेंगे."

लेकिन 2015 के भूकंप के बाद पुनर्निर्माण प्राधिकरण का नेतृत्व करने वाले गोविंदा राज पोखरेल का कहना है कि सरकार समय की ज़रूरतों के साथ तालमेल बिठाने में सक्षम नहीं रही है.

उनका कहना है, "दान देने वाले देशों की ओर से मदद करने में रुचि दिखाने के बावजूद, सरकार ने शुरू में कोई ख़ास मांग नहीं रखी. कुछ इलाक़ों में जहां सड़क नेटवर्क पूरी तरह से ठप हो गया है, वहां बचाव और राहत कार्यों के लिए हेलीकॉप्टर अभी तक नहीं पहुंच पाए हैं. हमने भूकंप के दौरान हेलीकॉप्टरों का अनुरोध किया था और वे पहुंचे भी थे."

"इसी तरह, ऐसा नहीं है कि बाढ़ के स्तर को देखकर भारी नुक़सान का आकलन नहीं किया गया, और न ही ऐसा है कि सरकारी एजेंसियों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि शवों को रखने के लिए पर्याप्त बैग और फ्रीजर नहीं थे. लेकिन 400-500 शवों का भी सही ढंग से प्रबंधन नहीं किया गया."

अधिकारियों के मुताबिक़, बुधवार को आई भीषण बाढ़ के बाद बचाव अभियान के लिए कुछ विशेषज्ञ टीमें नेपाल पहुंच चुकी हैं और बचाव सामग्री हासिल करने की प्रक्रिया जारी है.

नेशनल डिज़ास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी (एनडीआरआरएमए) के कार्यकारी प्रमुख धर्मराज उप्रेती ने बीबीसी को बताया, "हमें बचाव अभियान चलाने में कठिनाई हो रही थी क्योंकि बाढ़ से आई मिट्टी भोटेकोशी-त्रिशूली क्षेत्र में पनबिजली परियोजना की कुछ सुरंगों के 20 मीटर के भीतर जमा हो गई थी. भारत और चीन की विशेषज्ञ टीमें वर्तमान में हमारी सुरक्षा एजेंसियों के सहयोग से वहां काम कर रही हैं."

"अन्य देशों ने भी बचाव कार्य में मदद की पेशकश की है, लेकिन शनिवार से ही घटनास्थल पर काम चल रहा है. अगर हमें लगता है कि और मदद की ज़रूरत है, तो हम विशेषज्ञों को बुलाएंगे."

गृह मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय आपातकालीन संचालन केंद्र (एनईओसी) के प्रमुख फणींद्र प्रसाद पौडेल ने रविवार दोपहर बीबीसी न्यूज़ नेपाली को बताया कि चिलिमे परियोजना में भारत के सुरंग विशेषज्ञों सहित 24 लोगों की एक टीम तैनात की गई है और ऊपरी त्रिशूली परियोजना में 16 चीनी विशेषज्ञों की एक टीम तैनात की गई है.

इसके अलावा, एनडीआरआरएमए के कार्यकारी प्रमुख उप्रेती ने बताया कि मलबे के अंदर या ज़मीन से दिखाई न देने वाले क्षेत्रों में किसी भी ज़िंदा शख़्स का पता लगाने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक 'स्कैनर' भी मिल गया है.

नेपाल के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के अनुसार, भारत से फोरेंसिक विशेषज्ञों की एक टीम भी नेपाल पहुंच चुकी है. प्रवक्ता छेत्री ने बताया कि इसी तरह भारत, चीन और संयुक्त अरब अमीरात से विभिन्न प्रकार की सहायता सामग्री भी नेपाल पहुंच चुकी है.

उन्होंने कहा, "जो सहायता सामग्री आ चुकी है उसका अधिकांश भाग 'खोज और बचाव' में उपयोग के लिए है."

अब तक जो सामान आया है, उसमें तिरपाल, रस्सियां, शवों को ढकने वाले थैले, जनरेटर, सोलर लाइट्स और दवाइयां शामिल हैं.

प्राधिकरण के उप्रेती ने कहा, "अब इस सामान को संबंधित स्थानों पर भेजने की प्रक्रिया चल रही है."

भारत से ऐसे वाहन लाए जाने पर बात हो रही है जो दुर्गम इलाक़ों में इस्तेमाल किए जा सकें.

उन्होंने बताया, "ऐसे दो वाहन आने की प्रक्रिया में हैं."

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता छेत्री ने कहा, "हम ऐसी स्थिति में हैं जहां हमें किसी भी समय किसी भी सामग्री की आवश्यकता हो सकती है. इसी आधार पर हम मित्र देशों के साथ समन्वय कर रहे हैं."

उन्होंने कहा कि फ़िलहाल खोज और बचाव की कोशिशें जारी हैं, लेकिन राहत और उसके बाद के पुनर्निर्माण में भी मदद की ज़रूरत होगी.

सड़क विभाग के अनुसार, हाल ही में आई बाढ़ के कारण लगभग 40 पुल बह गए हैं.

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता छेत्री ने कहा, "जिस दिन बाढ़ आई, उसी दिन हमने 'बेली ब्रिज' के बारे में बात की थी. ये पुल चीन और भारत से आ रहे हैं और इनकी संख्या लगभग 40 है."

'बेली ब्रिज' एक अस्थायी और पोर्टेबल पुल होता है.

एनडीआरआरएमए के प्रमुख उप्रेती का कहना है कि राहत कार्यों के मामले में ज़्यादा घबराने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि काठमांडू और नारायणगढ़ जैसे स्थान प्रभावित नहीं हुए हैं.

उन्होंने कहा, "चूंकि केवल एक कॉरिडोर प्रभावित हुआ है, इसलिए हम खाद्य सामग्री स्वयं ही उपलब्ध करा सकते हैं. इसलिए हमने इसके लिए बाहरी सहायता नहीं मांगी है. हालांकि, हमने उन लोगों से राहत कार्यों में मदद करने का अनुरोध किया है जिन्होंने इच्छा जताई है, जिसमें शवों के प्रबंधन के लिए आवश्यक सामग्री भी शामिल है. अब अगले चरण में, हमें अस्थायी आवासों की भी ज़रूरत होगी."

बाढ़ से घनी आबादी वाले इलाक़ों और बुनियादी ढांचे को व्यापक नुक़सान पहुंचा है, इसलिए अनुमान है कि पुनर्निर्माण के लिए काफ़ी धन की ज़रूरत होगी.

नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा है कि वित्त मंत्रालय और विदेश मंत्रालय 'आपदा के बाद की ज़रूरतों' (पोस्ट डिज़ास्टर नीड असेसमेंट- पीडीएनए) को लेकर रिपोर्ट को "जितनी जल्दी हो सके" तैयार करने के लिए सक्रिय रूप से चर्चा कर रहे हैं.

नेपाल के भूकंप पुनर्निर्माण प्राधिकरण के सीईओ रहे और अर्थशास्त्री पोखरेल का कहना है कि 'बचाव और राहत कार्य' के बाद पुनर्निर्माण क्षेत्रों की पहचान की जानी चाहिए.

उनका कहना है, "पेयजल और स्कूल जैसी जरूरतों की पहचान करने के बाद, विकास साझेदारों के सामने रखने के लिए एक रिकवरी फ़्रेमवर्क तैयार किया जाना चाहिए."

नेपाल के वित्त मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, फ़िलहाल नुक़सान का विवरण जुटाने के लिए केवल शुरुआती काम ही चल रहा है.

मंत्रालय के प्रवक्ता अमृत लमसाल ने कहा, "अलग-अलग देशों से मदद देने की बात की जा रही हैं. चूंकि नुक़सान देश के एक ख़ास क्षेत्र तक ही सीमित है, इसलिए हमें विश्वास है कि हम 'पीडीएनए' का काम एक महीने के भीतर पूरा कर लेंगे."

उन्होंने कहा, "घटना के बाद किसी न किसी स्तर पर हमें यह समझ आ गया था कि हम किन क्षेत्रों में मदद हासिल कर सकते हैं. 'पीडीएनए' के बाद यह और भी स्पष्ट हो जाएगा."

What to Watch

AI outlook — possibilities, not facts

  • एक महीने के भीतर पीडीएनए रिपोर्ट तैयार की जाएगी।

    Likely · Within months

Open Questions

  • सुरंगों में फंसे मजदूरों की सटीक संख्या क्या है?
  • पुनर्निर्माण के लिए कुल वित्तीय आवश्यकता कितनी होगी?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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