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Backसुप्रीम कोर्ट की फ़ॉर्म-6 पर टिप्पणी के बाद चुनाव आयोग फिर सवालों के घेरे में
सुप्रीम कोर्ट की फ़ॉर्म-6 पर टिप्पणी के बाद चुनाव आयोग फिर सवालों के घेरे में
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सुप्रीम कोर्ट की फ़ॉर्म-6 पर टिप्पणी के बाद चुनाव आयोग फिर सवालों के घेरे में

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसने फ़ॉर्म-6 के किसी संशोधित रूप को मंज़ूरी नहीं दी है, जिसके बाद चुनाव आयोग के दावों पर सवाल उठ रहे हैं।

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सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने मतदाता सूची में नाम जुड़वाने वाले फ़ॉर्म-6 के किसी संशोधित रूप को मंज़ूरी नहीं दी है। इस टिप्पणी के बाद चुनाव आयोग के उस दावे पर सवाल खड़े हो गए हैं जिसमें उसने कहा था कि एसआईआर से जुड़े फ़ॉर्म-6 के डिक्लेरेशन को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है।

AI-generated summary

Why It Matters

सुप्रीम कोर्ट मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और फ़ॉर्म-6 से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है। चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के बीच फ़ॉर्म-6 के संशोधित रूप को लेकर विरोधाभास सामने आया है।

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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए इस्तेमाल होने वाले फ़ॉर्म 6 को लेकर बड़ी टिप्पणी की है.

बार एंड बेंच और लाइव लॉ के मुताबिक़ चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया (सीजेआई) सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान कहा कि, 'सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म-6 के किसी संशोधित रूप को मंज़ूरी नहीं दी थी.'

उन्होंने कहा, "किसी भी मोडीफ़ाइड फ़ॉर्म-6 को हमने मंज़ूर नहीं किया है. यह साफ़ है."

अदालत ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड सामने आने के बाद वह देखना चाहती है कि फ़ॉर्म में बदलाव किसने किया.

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर चुनाव आयोग की 26 सितंबर की प्रेस रिलीज़ को लेकर सवाल उठ रहे हैं.

कई लोग इसे चुनाव आयोग के उस दावे से जोड़ रहे हैं जिसमें कहा गया था कि फॉर्म-6 के साथ लगाया गया एसआईआर (स्पेशल इंटेसिव रिवीज़न- विशेष गहन पुनरीक्षण) का डिक्लेरेशन सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है.

लेकिन पूरा मामला क्या है? चुनाव आयोग ने क्या कहा था और सुप्रीम कोर्ट ने आज क्या कहा?

क्या है पूरा मामला

26 सितंबर को चुनाव आयोग की बैठक के बाद जारी आधिकारिक प्रेस नोट में फॉर्म-6 को लेकर कहा गया था, कि एसआईआर के दौरान फ़ॉर्म-6 के साथ लगाए गए डिक्लेरेशन (घोषणा) को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है.

इसी प्रेस नोट में आयोग ने कहा था कि एसआईआर के दौरान इस डिक्लेरेशन (घोषणा) का इस्तेमाल होगा, जबकि एसआईआर नहीं होने की स्थिति में रजिस्ट्रेशन ऑफ़ इलेक्टर्स रूल्स, 1960 के तहत लागू फ़ार्म इस्तेमाल किए जाएंगे.

यानी फ़ॉर्म-6 को लेकर किए गए चुनाव आयोग के दावे और सीजेआई की 5 अक्तूबर को की गई टिप्पणी में फ़र्क है.

चुनाव आयोग ने दावा किया था कि एसआईआर के लिए फॉर्म-6 डेक्लेरेशन सुप्रीम कोर्ट ने बरक़रार रखा है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आज कहा कि उसने किसी संशोधित फ़ॉर्म-6 को मंज़ूरी नहीं दी है.

सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दो चुनाव आयुक्तों को अभियोजन से मिली छूट की वैधता और मुख्य चुनाव आयुक्त पर चुनाव से जुड़े एकतरफा फ़ैसले लेने के आरोपों पर विचार करने पर सहमति जताई है.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को सर्वसम्मति के बिना कोई फ़ैसला लेने से रोकने के लिए अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर चुनाव आयोग का कोई फ़ैसला कानून के मुताबिक नहीं पाया गया, तो उसे रद्द कर दिया जाएगा. एजेंसी के मुताबिक़ सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त को निलंबित करने की मांग वाली याचिका पर चुनाव आयोग और केंद्र को नोटिस जारी किया.

कोर्ट ने एक सप्ताह में जवाब मांगा है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग के फैसले सर्वसम्मति से या बहुमत के आधार पर होने चाहिए.

एक याचिकाकर्ता की ओर अदालत में पेश हो रहे सीनियर वकील विकास सिंह ने कहा कि एकतरफ़ा फ़ैसलों के कारण मतदाता सूची खुद ही प्रभावित हो गई थी. इस पर जस्टिस बागची ने पूछा कि क्या अदालत प्रतिवादियों को सुने बिना एकतरफ़ा ऐसा आदेश पारित कर सकती है?

लाइव लॉ के मुताबिक जस्टिस बागची ने कहा, "अगर रिकॉर्ड से पता चलता है कि कोई फ़ैसला सर्वसम्मति से नहीं लिया गया था, तो हम उन फ़ैसलों पर रोक लगाएंगे और कहेंगे कि वे अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं. लेकिन क्या हम एकतरफ यह फैसला कर सकते हैं कि सभी फैसले एकतरफा थे? हम उम्मीद करते हैं कि वे स्पष्ट और पारदर्शी तरीके से जवाब देंगे."

जब विकास सिंह ने कहा कि चुनाव आयोग की प्रेस विज्ञप्ति खुद ही समाचार रिपोर्टों को स्वीकार करने के बराबर है, तो चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अदालत केवल अख़बारों की ख़बरों के आधार पर कोई आदेश पारित नहीं कर सकती.

सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल याचिकाओं में ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ एसआईटी जांच की मांग की गई है. साथ ही मतदाता सूचियों के देशव्यापी विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को गैरक़ानूनी घोषित करने की मांग की गई है.

इस मामले में सुनवाई सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और वी. मोहना की पीठ कर रही है. ये याचिकाएं 'द इंडियन एक्सप्रेस' की एक रिपोर्ट के कुछ दिन बाद दाखिल की गई थीं. रिपोर्ट में बताया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में मतदाता सूचियों के एसआईआर से जुड़े फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज की थीं.

आइए जानते हैं अब तक पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से बाहर हुए लोगों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा है?.

"ये सिर्फ़ उपचुनाव हैं, बस इतनी-सी बात है."

भारत के चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने 26 सितंबर, 2026 को इन शब्दों के साथ पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से बाहर किए जाने का दावा करने वाले लोगों की याचिका पर जल्द सुनवाई से इनकार कर दिया था.

याचिकाकर्ताओं के वकील ने अदालत से कहा था कि नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा क्षेत्रों में मतदाता सूची से बाहर हुए लोग अप्रैल में विधानसभा चुनाव के दौरान वोट नहीं दे पाए थे.

वकील ने कहा कि अगर उनकी अपील पर फ़ैसला नहीं हुआ, तो वे छह अक्तूबर को होने वाले उपचुनाव में भी वोट नहीं दे पाएंगे.

उन्होंने तीन जजों की बेंच को बताया कि 18 हज़ार से ज़्यादा अपील लंबित हैं. लेकिन बेंच ने मामले की तुरंत सुनवाई की मांग स्वीकार नहीं की.

ये बात इसलिए भी अहम हो जाती है क्योंकि कॉकरोच जनता पार्टी सहित मुख्य विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया है.

मतदाताओं की जांच का बड़ा अभियान

यह सुनवाई उस मामले की नई कड़ी थी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट में एक साल से ज़्यादा समय से सुनवाई चल रही है.

इस मामले के केंद्र में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर है. भारत के चुनाव आयोग ने मतदाता सूची को अपडेट करने के लिए घर-घर जाकर जांच का यह अभियान शुरू किया था.

चुनाव आयोग का कहना है कि मृत, एक से ज़्यादा जगह दर्ज, दूसरी जगह जा चुके मतदाताओं और ऐसे लोगों के नाम हटाने के लिए यह प्रक्रिया ज़रूरी है, जो भारत के नागरिक नहीं हैं.

इस प्रक्रिया को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे मतदाताओं पर दस्तावेज़ दिखाने का बोझ डाला गया और वोट देने के योग्य नागरिकों से उनका अधिकार छीन लिया गया.

अदालत ने बिहार में एसआईआर की प्रक्रिया जारी रहने दी और मई में इसे क़ानूनी भी ठहराया.

लेकिन पश्चिम बंगाल में अदालत ने इस प्रक्रिया पर कहीं ज़्यादा सक्रिय भूमिका निभाई.

लाखों मतदाताओं की जांच की ज़िम्मेदारी ऐसे ट्राइब्यूनल को दी गई, जिनमें सेवा में मौजूद न्यायिक अधिकारी और हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज शामिल हैं.

इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि मतदाता सूची से बाहर हुए लोग तब तक वोट नहीं दे सकते, जब तक उनकी अपील पर सुनवाई नहीं हो जाती.

बिहार में शुरुआत और चुनौतियां

एसआईआर के ख़िलाफ़ याचिकाओं पर पहली सुनवाई जुलाई 2025 में हुई थी. उस समय बिहार में विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले एसआईआर शुरू किया गया था.

दो जजों की बेंच ने कहा था कि यह सवाल "लोकतांत्रिक गणराज्य के कामकाज की जड़ तक जाता है."

अदालत ने सुनवाई के लिए तीन मुद्दे तय किए थे.

क्या चुनाव आयोग के पास ऐसा करने का अधिकार है?

क्या आयोग की अपनाई गई प्रक्रिया क़ानून के मुताबिक़ है?

क्या इसके लिए तय समय बहुत कम है?

अदालत ने एसआईआर की प्रक्रिया नहीं रोकी. हालांकि, उसने चुनाव आयोग को सुझाव दिया कि मतदाताओं की पहचान की जांच के लिए आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड को भी दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार किया जाए.

चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने मतदाता सूची का मसौदा प्रकाशित होने से रोकने की मांग वाली याचिका पर विचार नहीं किया.

हालांकि, उन्होंने याचिकाकर्ताओं से कहा, "अगर हम आपसे सहमत हुए, तो हम सब कुछ रद्द कर देंगे."

अगस्त में बेंच ने चुनाव आयोग को मतदाता सूची के मसौदे से बाहर हुए क़रीब 65 लाख लोगों के नाम और उन्हें हटाने की वजह प्रकाशित करने का निर्देश दिया.

चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, "अगर पूनम देवी का नाम हटाया गया है, तो पूनम देवी को पता चलना चाहिए कि उनका नाम हटाया गया है और क्यों हटाया गया है."

आठ सितंबर को अदालत ने आदेश दिया कि आधार कार्ड को पहचान साबित करने वाले 12वें मान्य दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार किया जाए.

हालांकि, अदालत ने यह भी साफ़ किया कि आधार कार्ड को "नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जाएगा."

30 सितंबर को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने के बाद चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, "हर व्यक्ति को अपील करने का अधिकार है."

याचिकाकर्ताओं की दलीलों पर सवाल करते हुए चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने पूछा था कि "अगर मतदाता सूचियों को हर साल बिना बदलाव के कॉपी-पेस्ट किया जाता रहे, तो क्या होगा?"

हालांकि, उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि अदालत किसी नतीजे पर नहीं पहुंच रही है.

जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने भी कहा कि ये सवाल हैं, "हमारा निष्कर्ष नहीं."

बिहार में एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर 29 दिनों तक सुनवाई हुई थी. अदालत ने 29 जनवरी को अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था.

उस समय तक बिहार में एसआईआर की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी और नवंबर 2025 में बिहार विधानसभा चुनाव भी कराए जा चुके थे.

सॉफ़्टवेयर की गड़बड़ियां, 'तार्किक विसंगतियां' और बंगाल में ट्राइब्यूनल

जनवरी तक एसआईआर की प्रक्रिया पश्चिम बंगाल पहुंच चुकी थी. यहां इस मामले में एक नया शब्द सामने आया— 'तार्किक विसंगति'.

मतदाताओं के दस्तावेज़ों में दिखाई देने वाले अंतर के आधार पर उन्हें जांच के लिए चिह्नित किया गया. इनमें पिता के नाम या माता-पिता की उम्र में अंतर जैसी बातें शामिल थीं.

जनवरी में अदालत ने दर्ज किया कि क़रीब एक करोड़ 36 लाख मतदाताओं को इस श्रेणी में रखा गया था.

चार फ़रवरी को चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि वर्तनी की ग़लतियों की वजह से "सही और वास्तविक लोगों को मतदाता सूची से बाहर नहीं छोड़ा जा सकता."

इसके पांच दिन बाद जस्टिस बागची ने नोटिस जारी करने के लिए इस्तेमाल किए गए आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस आधारित सॉफ़्टवेयर पर सवाल उठाए.

उन्होंने कहा कि बंगाली परिवारों में 'कुमार' बीच का नाम होता है. लेकिन 'तपन कुमार रॉय' की जगह 'तपन रॉय' लिखा होने जैसे अंतर के कारण भी तार्किक विसंगति का नोटिस जारी हो गया.

उन्होंने कहा, "ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि सॉफ़्टवेयर के इस्तेमाल के कारण बड़े पैमाने पर नोटिस भेजे जा रहे हैं."

इस स्वचालित तरीक़े की आलोचना करते हुए वरिष्ठ वकील मोहन कटारकी ने कहा कि "सुप्रीम कोर्ट असली गड़बड़ी को नहीं पकड़ पाया."

उन्होंने बीबीसी से कहा, "एसआईआर का मक़सद मृत और दूसरी जगह जा चुके मतदाताओं के नाम हटाना था. इसके बजाय एक गुप्त एल्गोरिदम के ज़रिए 13 करोड़ भारतीयों के नाम हटा दिए गए. इसके लिए 'तार्किक विसंगति', 'मैपिंग नहीं होना' और 'उम्र में अंतर' जैसी वजहें दी गईं. मशीन ने वर्तनी के अंतर को भी गड़बड़ी मान लिया. मशीन के कोड को लेकर कोई पारदर्शिता नहीं है. ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को गुमराह किया."

20 फ़रवरी को अदालत ने कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार और चुनाव आयोग के बीच "भरोसे की कमी" है, क्योंकि दोनों इस बात पर सहमत नहीं हो सके कि दावों पर फ़ैसला किन अधिकारियों को करना चाहिए.

अदालत ने कलकत्ता हाई कोर्ट से कहा कि वह सेवा में मौजूद और रिटायर्ड न्यायिक अधिकारियों को उपलब्ध कराए.

इन अधिकारियों को 'तार्किक विसंगति' और मतदाता सूची के पुराने रिकॉर्ड से नहीं जोड़े जा सके लोगों के दावों की जांच करनी थी.

चार दिन बाद अदालत ने इस प्रक्रिया के बड़े पैमाने को देखते हुए न्यायिक अधिकारियों की संख्या बढ़ा दी.

अदालत ने ओडिशा और झारखंड से भी अधिकारियों को बुलाने की अनुमति दी.

इसके साथ ही अदालत ने कहा कि अंतिम मतदाता सूची जारी होने के बाद पूरक सूचियां भी प्रकाशित की जा सकती हैं. बाद में शामिल किए गए नाम भी अंतिम मतदाता सूची का हिस्सा माने जाएंगे.

10 मार्च को अदालत ने हाई कोर्ट के रिटायर्ड जजों की अध्यक्षता में अपीलीय ट्राइब्यूनल बनाने का आदेश दिया.

इस दौरान चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, "अब ऐसी स्थिति आ गई है, जहाँ हमें दोनों पक्षों की नीयत पर संदेह हो रहा है."

उनका इशारा चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच मतभेदों की तरफ़ था.

एक अप्रैल तक क़रीब 60 लाख आपत्तियों में से 46 लाख से ज़्यादा पर फ़ैसला हो चुका था.

उस दिन हुई सुनवाई में जस्टिस बागची ने कहा कि मतदाता सूची से किसी नाम को ग़लत तरीक़े से हटाने या जोड़ने की ग़लती को चुनाव के बाद ट्राइब्यूनल ठीक कर सकते हैं.

उन्होंने कहा, "अगर किसी व्यक्ति को आज मतदाता सूची से बाहर कर दिया जाता है और वह इस चुनाव में वोट नहीं दे पाता, लेकिन पूर्व चीफ़ जस्टिस की अध्यक्षता वाले ट्राइब्यूनल को लगता है कि उसे बाहर करना उचित नहीं था, तो हमें कोई वजह नहीं दिखाई देती कि उस फ़ैसला को बदला क्यों नहीं जा सकता और उस व्यक्ति का नाम दोबारा सूची में क्यों नहीं जोड़ा जा सकता."

अप्रैल में मतदान नज़दीक आने तक 34 लाख से ज़्यादा अपील दायर हो चुकी थीं.

13 अप्रैल के अपने आदेश में अदालत ने कहा कि जिन अपील पर 21 या 27 अप्रैल तक फ़ैसला हो जाएगा, उनके नतीजे पूरक मतदाता सूचियों में शामिल किए जाएंगे.

लेकिन अदालत ने यह भी कहा कि "सिर्फ़ अपील लंबित होने" के आधार पर सूची से बाहर हुए लोगों को वोट देने का अधिकार नहीं मिलेगा.

चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, "अगर हम इसकी अनुमति देते हैं, तो फिर मतदाता सूची में शामिल लोगों के वोट देने के अधिकार को भी रोक देना चाहिए."

जस्टिस बागची ने कहा कि किसी को यह नहीं मानना चाहिए कि बेंच "उस सतर्क मतदाता की अनदेखी कर रही है, जिसका नाम सही या ग़लत वजह से सूची में नहीं है."

उन्होंने कहा कि वोट देने का अधिकार "राष्ट्रीयता और देशभक्ति की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति" है.

उन्होंने एक काल्पनिक स्थिति का उदाहरण दिया.

अगर 2002 की मतदाता सूची से जोड़े जा सकने वाले यानी 'मैप किए गए' मतदाताओं में से 15 प्रतिशत लोग वोट नहीं दे पाते और उस सीट का नतीजा दो प्रतिशत वोट के अंतर से तय होता है, तो उन्होंने कहा, "हमें निश्चित रूप से इस पर विचार करना होगा."

हालांकि, उन्होंने इस पर कोई राय नहीं दी.

उन्होंने कहा कि इतने बड़े स्तर की प्रक्रिया में "ग़लती की कुछ गुंजाइश हमेशा रहती है." अपील की व्यवस्था ऐसी ग़लतियों को ठीक करने के लिए ही बनाई गई है.

बिहार पर फ़ैसला: 'व्यापक और बिना तय सीमा वाला अधिकार'

27 मई को अदालत ने बिहार के मामले में अपना फ़ैसला सुनाया.

चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस बागची की बेंच ने एसआईआर को क़ानूनी ठहराया.

अदालत ने कहा कि संविधान के प्रावधान और जनप्रतिनिधित्व क़ानून, दोनों ही चुनाव आयोग को "जिस तरीक़े को वह उचित समझे", उस तरीक़े से विशेष पुनरीक्षण कराने की अनुमति देते हैं.

फ़ैसले में इसे चुनाव आयोग को मिला "व्यापक और बिना तय सीमा वाला अधिकार" माना गया.

अदालत ने कहा कि सवाल यह नहीं है कि वह ख़ुद इससे बेहतर तरीक़ा चुनती या नहीं. सवाल यह है कि चुनाव आयोग का चुना हुआ तरीक़ा "स्पष्ट रूप से ज़रूरत से ज़्यादा" था या नहीं.

अदालत ने कहा कि क़ानून "सबसे कम पाबंदी वाले तरीक़े को अपनाना अनिवार्य नहीं बनाता."

फ़ैसले में कहा गया कि जहां कोई समस्या "व्यवस्था में गहराई तक फैली और बड़े स्तर पर मौजूद" हो, वहां उससे निपटने के लिए उठाए गए व्यापक क़दम को सिर्फ़ इसी आधार पर अनुपात से ज़्यादा नहीं माना जा सकता.

अदालत ने यह समझाते हुए कि वह चुनाव आयोग के चुने तरीक़े की जगह अपनी पसंद का तरीक़ा क्यों लागू नहीं करेगी, कहा, "यह अदालत इस बात की समीक्षा नहीं कर सकती कि एसआईआर के लिए आयोग ने जो प्रक्रिया और तरीक़ा अपनाया, वह सबसे अच्छा या सबसे उचित विकल्प था या नहीं."

फ़ैसले में यह स्वीकार किया गया कि यह प्रक्रिया "जिस तरह शुरुआत में तैयार की गई थी, उससे दस्तावेज़, पारदर्शिता और लोगों की पहुंच को लेकर वाजिब चिंताएं पैदा हुई थीं."

लेकिन अदालत ने कहा कि उसके अपने दख़ल से इन चिंताओं को दूर कर दिया गया.

इनमें आधार कार्ड को मान्य दस्तावेज़ों में शामिल करना और मतदाता सूची से बाहर किए गए क़रीब 65 लाख मतदाताओं की सूची प्रकाशित करना शामिल था.

अदालत ने कहा कि आंकड़ों से यह साबित नहीं होता कि "मतदान के अधिकार से लोगों को इतने बड़े या व्यवस्थित स्तर पर वंचित किया गया कि इसमें संवैधानिक कमी दिखाई दे."

अदालत ने कहा कि "किसी व्यक्ति विशेष का नाम बाहर होने" जैसे मामलों को अपील के ज़रिए निपटाया जा सकता है.

फ़ैसले में कहा गया कि किसी प्रक्रिया का असर उसकी केवल सैद्धांतिक रूपरेखा के आधार पर नहीं, बल्कि उसे लागू किए जाने के तरीक़े के आधार पर जांचा जाना चाहिए.

याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फ़ैसले का सहारा लिया था.

उस फ़ैसले के मुताबिक़, क़ानूनी रूप से यह मानकर चला जाता है कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची में पहले से मौजूद हैं, वे सही तरीक़े से उसमें शामिल किए गए हैं.

लेकिन अदालत ने कहा कि इस मान्यता को सबूत देकर ग़लत साबित किया जा सकता है. अदालत ने यह भी कहा कि पुराना फ़ैसला "किसी मामले पर न्यायिक फ़ैसला देने की प्रक्रिया तक सीमित" था.

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  • सुप्रीम कोर्ट एक सप्ताह में चुनाव आयोग और केंद्र सरकार के जवाब पर विचार करेगा।

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  • फॉर्म-6 में बदलाव किसने किया?
  • क्या चुनाव आयोग के एकतरफा फैसले रद्द किए जाएंगे?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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