
चुनाव आयोग द्वारा फॉर्म 6 में जोड़े गए अतिरिक्त घोषणा-पत्र, जिसमें आवेदक के माता-पिता या दादा-दादी के पिछली मतदाता सूची में नाम होने की जानकारी मांगी गई, विवाद का विषय बना हुआ है। चुनाव आयोग का कहना है कि यह एसआईआर से जुड़ी अलग आवश्यकता थी, जबकि आलोचकों और दो अन्य चुनाव आयुक्तों का मानना है कि यह वैधानिक फॉर्म में बदलाव है और इसके लिए नियमों में संशोधन आवश्यक था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि उसने संशोधित फॉर्म 6 को मंजूरी नहीं दी है और रिकॉर्ड मांगे हैं कि इसे किसने बदल दिया।
AI-generated summary
फॉर्म 6 भारत में मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए उपयोग किया जाने वाला कानूनी आवेदन है। इसका उपयोग पहली बार मतदान करने वाले लोगों द्वारा किया जाता है। मौजूदा विवाद ऑनलाइन पंजीकरण प्रक्रिया में जोड़े गए एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र को लेकर है, जिसमें आवेदक या उसके माता-पिता के साथ दादा-दादी के किसी पिछली मतदाता सूची में नाम होने के बारे में जानकारी मांगी गई।
प्रकाशित 3 मिनट पहले
पढ़ने का समय: 10 मिनट
फॉर्म 6 भारत में मतदाता सूची में किसी व्यक्ति का नाम शामिल कराने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला लीगल आवेदन है.
ख़ासकर पहली बार मतदान करने वाले लोगों के लिए. मौजूदा विवाद ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया में जोड़े गए एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र को लेकर है, जिसमें आवेदक या उसके माता-पिता के साथ दादा-दादी का किसी पिछली मतदाता सूची में नाम होने के बारे में जानकारी मांगी गई.
इसे जोड़ने के लिए वास्तव में किसने मंज़ूरी दी थी, यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है.
फॉर्म 6 का इस्तेमाल
फॉर्म 6 में योग्य मतदाता के रजिस्ट्रेशन के लिए ज़रूरी जानकारी ली जाती है. जैसे नाम, जन्मतिथि, पता और अन्य संबंधित विवरण. यह फॉर्म रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960 के तहत निर्धारित है.
इसलिए इसे केवल ऐसा ऑनलाइन फॉर्म नहीं माना जा सकता, जिसे चुनाव आयोग अपनी सुविधा के अनुसार स्वतंत्र रूप से बदल सके.
चुनाव आयोग के अनुसार, कोई भारतीय नागरिक जो चार क्वॉलिफाइंग डेट एक जनवरी, एक अप्रैल, एक जुलाई या अक्तूबर में से किसी एक तारीख़ को 18 वर्ष की उम्र पूरी कर चुका है या पूरी करने वाला है, फॉर्म 6 के ज़रिए आवेदन कर सकता है. बशर्ते वह संबंधित निर्वाचन क्षेत्र का निवासी हो और किसी अन्य आधार पर अयोग्य न हो.
आपका 18वां जन्मदिन एक जनवरी, एक अप्रैल, एक जुलाई या एक अक्तूबर को होना ज़रूरी नहीं है. आपको संबंधित क्वॉलिफाइंग डेट पर 18 वर्ष या उससे ज़्यादा उम्र का होना चाहिए. ये उम्र तय करने की कटऑफ तारीखे़ं हैं, न कि जन्मदिन की निर्धारित तारीख़ें या आवेदन करने की एकमात्र तारीख़ें.
मिसाल के तौर पर, अगर आप 15 फ़रवरी 2026 को 18 साल के होते हैं, तो एक जनवरी को आपकी उम्र अभी 17 साल थी, लेकिन एक अप्रैल तक आप 18 साल के हो चुके होंगे. इसलिए एक अप्रैल 2026 आपकी पहली लागू क्वॉलिफाइंग डेट होगी. आपको जनवरी 2027 तक इंतज़ार नहीं करना होगा.
छोड़कर सबसे अधिक पढ़ी गईं आगे बढ़ें
सबसे अधिक पढ़ी गईं
समाप्त
क्या बदलाव किया गया?
छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
Dinbhar: आवाज़ वही, अंदाज़ नया
देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां.
एपिसोड
समाप्त
द इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल के अनुसार, ऑनलाइन प्रक्रिया में एसआईआर से जुड़ा एक सेक्शन जोड़ा गया था, जिसमें आवेदकों को तीन विकल्पों में से एक चुनना था.
आवेदक का नाम पिछली एसआईआर के दौरान तैयार मतदाता सूची में था?
माता-पिता या दादा-दादी का नाम उस पिछली मतदाता सूची में था?
आवेदक के माता-पिता या दादा-दादी का नाम उस पिछली सूची में नहीं था?
पड़ताल में इन्हीं तीन विकल्पों का उल्लेख किया गया था. महत्वपूर्ण बात यह है कि इस सेक्शन को अनिवार्य नहीं बताया गया था, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार, इसका जवाब दिए बिना आवेदक अपना आवेदन जमा नहीं कर सकता था.
जवाब के आधार पर आवेदक या उसके रिश्तेदार से पुरानी मतदाता सूची से जुड़े विवरण मांगे जा सकते थे, जैसे रिश्तेदार का नाम और संबंध, ईपीआईसी नंबर, राज्य, ज़िला, विधानसभा क्षेत्र, पार्ट नंबर और क्रम संख्या.
मिसाल के तौर पर, 18 साल का कोई व्यक्ति 2000 के दशक की शुरुआत में हुई एसआईआर के दौरान ख़ुद मतदाता नहीं हो सकता था. इसलिए इस अतिरिक्त सवाल के कारण उसके माता-पिता या दादा-दादी का अतीत रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया के लिए प्रासंगिक हो गया.
इससे उन परिवारों को लेकर सवाल उठे, जिनका नाम पुरानी मतदाता सूचियों में नहीं था. हालांकि, पुरानी मतदाता सूची में नाम नहीं होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि कोई व्यक्ति आज मतदाता बनने के लिए अयोग्य है.
इसे किसने बदला?
यहाँ दो अलग-अलग सवाल हैं. ऑनलाइन प्रक्रिया में अतिरिक्त शर्तें किसने जोड़ीं और फॉर्म 6 में क़ानूनी रूप से बदलाव करने का अधिकार किसके पास है.
अतिरिक्त सेक्शन चुनाव आयोग के ईसीआईनेट रजिस्ट्रेशन पोर्टल पर दिखाई दिया.
चुनाव आयोग ने अतिरिक्त एसआईआर घोषणा-पत्र होने की बात स्वीकार की है, लेकिन उसका कहना है कि उसने वैधानिक फॉर्म 6 में कोई बदलाव नहीं किया.
अब तक उपलब्ध जानकारी के मुताबिक यह निर्णायक रूप से स्पष्ट नहीं है कि सॉफ्टवेयर में बदलाव को किस व्यक्ति ने मंज़ूरी दी.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का नाम एकतरफ़ा फ़ैसले लेने के आरोपों के संदर्भ में सामने आया है, लेकिन यह कोई न्यायिक निष्कर्ष नहीं है कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से इसी बदलाव का आदेश दिया था.
जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 की धारा 28 के तहत केंद्र सरकार चुनाव आयोग से परामर्श के बाद संबंधित नियम बनाती या उनमें बदलाव करती है. वैधानिक बदलाव के लिए निर्धारित अधिसूचना और संसदीय प्रक्रिया ज़रूरी होती है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़ अन्य दो चुनाव आयुक्तों विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने इस पर आपत्ति जताई थी. दोनों का कहना था कि 1960 के नियमों में बदलाव किए बिना वैधानिक फॉर्म में बदलाव नहीं किया जा सकता.
2021 में चुनाव क़ानून में संशोधन के बाद क़ानून मंत्रालय के विधायी विभाग ने 17 जून 2022 को नियमों और फॉर्म 6 में संबंधित संशोधनों को औपचारिक रूप से अधिसूचित किया था. यह एक औपचारिक क़ानूनी संशोधन था, जबकि मौजूदा ऑनलाइन बदलाव विवादित है.
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस बदलाव को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर निशाना साधा है.
राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा है, ''अब यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि ज्ञानेश कुमार ने फॉर्म 6 में ग़ैर-क़ानूनी और एकतरफ़ा तरीक़े से बदलाव किया. यह इस बात का एक और सबूत है कि उन्होंने बीजेपी की मदद करने के लिए अपने पद का दुरुपयोग किया. लोकतंत्र पर इस आपराधिक हमले में शामिल वह और बाक़ी सभी लोग जवाबदेह ठहराए जाएंगे.''
राहुल गांधी की इस पोस्ट के जवाब में चुनाव आयोग ने कहा, ''24 जून 2025 को बिहार में एसआईआर कराने का आदेश चुनाव आयोग की सर्वसम्मत मंज़ूरी से जारी किया गया था. इस आदेश को भारत के माननीय सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 के अपने फ़ैसले में बरकरार रखा है.
26 सितंबर 2026 को जारी अपनी प्रेस नोट संख्या 120 के बिंदु 1(iii) में चुनाव आयोग ने कहा है कि एसआईआर के लिए फॉर्म 6 के साथ संलग्न घोषणा-पत्र को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है."
विवाद की टाइमलाइन
24 जून 2025: चुनाव आयोग ने बिहार में एसआईआर का आदेश दिया. नए एनरॉलमेंट के आवेदनों के साथ एनेक्सर डी नामक अलग घोषणा-पत्र रखा गया.
16 मई 2026: विवेक जोशी ने दर्ज किया कि वैधानिक फॉर्म 6 और 8 में एसआईआर आदेश या दिशानिर्देश के ज़रिए बदलाव नहीं किया जा सकता. उन्होंने प्रस्ताव को नियमों में संशोधन के लिए सरकार के पास भेजने की सिफ़ारिश की.
19 मई 2026: सुखबीर सिंह संधू ने फाइल पर जोशी की आपत्ति से सहमति जताई.
27 मई 2026: सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में एसआईआर कराने के चुनाव आयोग के अधिकार को बरकरार रखा और दस्तावेज़ी प्रक्रिया तैयार करने के लिए आयोग के कुछ अधिकारों को माना, लेकिन कहा कि ये अधिकार असीमित नहीं हैं.
13 अगस्त 2026: संधू ने कथित "अनधिकृत/अवैध बदलाव" हटाने की मांग की और पहली बार के मतदाताओं को परेशान किए जाने के ख़िलाफ़ चेतावनी दी.
23 सितंबर 2026: द इंडियन एक्सप्रेस ने चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों पर अपनी पड़ताल प्रकाशित की.
26 सितंबर 2026: चुनाव आयोग ने कहा कि एसआईआर घोषणा-पत्र को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है और एसआईआर की अवधि के बाहर सामान्य वैधानिक फॉर्म लागू होंगे.
पाँच अक्तूबर 2026: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि उसने संशोधित फॉर्म 6 को मंज़ूरी नहीं दी है और यह पता लगाने के लिए रिकॉर्ड मांगे कि इसे किसने बदला.
अभी विवाद किन मुद्दों पर है?
1. यह संशोधन था या अलग घोषणा-पत्र?
आलोचकों और रिपोर्ट किए गए आंतरिक रिकॉर्ड में दोनों चुनाव आयुक्तों का कहना है कि आवेदन प्रक्रिया में एक अनिवार्य अतिरिक्त सवाल जोड़ना प्रभावी रूप से वैधानिक फॉर्म में बदलाव था और इसके लिए नियमों में संशोधन ज़रूरी था. चुनाव आयोग का कहना है कि फॉर्म 6 में बदलाव नहीं किया गया और घोषणा-पत्र एसआईआर से जुड़ी अलग ज़रूरत थी.
2. क्या सुप्रीम कोर्ट ने इसे मंज़ूरी दी थी?
चुनाव आयोग ने 26 सितंबर के अपने बयान में बिहार एसआईआर के फ़ैसले का हवाला दिया था. लेकिन उस मामले में जिस घोषणापत्र पर विचार हुआ था, वह जून 2025 के आदेश से जुड़ा 'एनेक्सर डी' था.
रिपोर्टिंग में इसे बाद में जोड़े गए उस घोषणापत्र से अलग बताया गया है, जिसमें आवेदक और उसके रिश्तेदारों के पिछली एसआईआर मतदाता सूची में नाम होने की जानकारी मांगी गई थी.
पाँच अक्टूबर को चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट कहा, "किसी संशोधित फॉर्म 6 को हमने मंज़ूरी नहीं दी है. यह स्पष्ट है. जब रिकॉर्ड पेश किए जाएंगे, तो हम देखना चाहेंगे कि इसे किसने संशोधित किया."
यह स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण है, लेकिन अभी यह अंतिम फ़ैसला नहीं है कि विवादित घोषणा-पत्र ग़ैर-क़ानूनी है. अदालत रिकॉर्ड और मंज़ूरी की प्रक्रिया की जांच कर रही है.
3. क्या इससे योग्य मतदाताओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है?
चिंता यह है कि जिन पहली बार के मतदाताओं के परिवार का नाम पुरानी मतदाता सूचियों में नहीं है, उन्हें अतिरिक्त अनिश्चितता या सत्यापन की प्रक्रिया से गुज़रना पड़ सकता है. संधू की आपत्ति में भी योग्य युवा आवेदकों को परेशान किए जाने से बचाने की बात कही गई थी.
हालांकि, तीसरे विकल्प में आवेदक यह बता सकता था कि उसका या संबंधित परिवार के सदस्यों का पुरानी सूची में नाम नहीं था. इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि पुरानी सूची में माता-पिता या दादा-दादी का नाम होना मतदाता रजिस्ट्रेशन की अनिवार्य शर्त थी.
4. क्या चुनाव आयोग में सामूहिक निर्णय प्रक्रिया को दरकिनार किया गया?
एक संबंधित याचिका में आरोप लगाया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद एकतरफ़ा फ़ैसले लिए. पाँच अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में नोटिस जारी किया और फॉर्म 6 से जुड़ी याचिका को भी इसके साथ जोड़ दिया. हालांकि, अदालत ने अंतरिम तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त के कामकाज़ पर रोक नहीं लगाई. ये आरोप अभी अदालत के विचाराधीन हैं.
रिपोर्टों के मुताबिक, जिन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में एसआईआर पूरा हो चुका है, वहाँ ऑनलाइन आवेदन से यह अतिरिक्त घोषणा-पत्र हटा दिया गया है. चुनाव आयोग का कहना है कि यह एसआईआर के दौरान लागू होता है, जबकि एसआईआर के बाहर सामान्य वैधानिक फॉर्म 6 लागू होता है.
फ़िलहाल मुख्य अनसुलझे सवाल हैं- इस अतिरिक्त घोषणा-पत्र का क़ानूनी आधार क्या था, इसे किसने अधिकृत किया और क्या ऑनलाइन प्रक्रिया में इसे जोड़कर चुनाव आयोग ने अपने अधिकारों की सीमा पार की?
फॉर्म 7 क्या है?
फॉर्म 7 का इस्तेमाल मतदाता सूची से किसी नाम को हटाने के लिए अनुरोध करने या किसी व्यक्ति के नाम को मतदाता सूची में शामिल किए जाने पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए किया जाता है.
वहीं, फॉर्म 8 का इस्तेमाल पहले से रजिस्टर्ड मतदाता की ओर से अपना रजिस्ट्रेशन स्थानांतरित करने, जानकारी में सुधार कराने, वोटर आईडी कार्ड बदलवाने या विकलांगता की जानकारी दर्ज कराने के लिए किया जाता है.
मुख्य अंतर यह है कि फॉर्म 7 किसी प्रविष्टि को चुनौती देने या हटाने के लिए है, जबकि फॉर्म 8 मौजूदा मतदाता के रजिस्ट्रेशन में बदलाव या उसे अपडेट करने के लिए है.
फॉर्म 7 के तीन मुख्य इस्तेमाल हैं-
मतदाता सूची में पहले से दर्ज किसी दूसरे व्यक्ति का नाम हटाने का अनुरोध.
किसी दूसरे व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल किए जाने पर आपत्ति.
अपना ख़ुद का नाम मतदाता सूची से हटाने का अनुरोध.
किसी दूसरे व्यक्ति का नाम हटाने के लिए फॉर्म में ये आधार दिए गए हैं:
रजिस्टर्ड मतदाता की मृत्यु हो चुकी है.
व्यक्ति मतदान की उम्र की पात्रता पूरी नहीं करता.
अनुपस्थित/स्थायी रूप से स्थानांतरित व्यक्ति अब उस पते पर नहीं रहता जहाँ उसका नाम रजिस्टर्ड है.
पहले से रजिस्टर्ड व्यक्ति का एक ही या किसी अन्य स्थान पर और रजिस्टर्ड है.
व्यक्ति नागरिकता की ज़रूरी शर्त पूरी नहीं करता.
फॉर्म 8 क्या है?
निवास स्थान बदलना: आप नए पते पर चले गए हैं और अपना मतदाता रजिस्ट्रेशन नए पते पर स्थानांतरित करना चाहते हैं.
विवरण में सुधार: मतदाता सूची या वोटर आईडी में दर्ज जानकारी में सुधार करना है.
वोटर आईडी कार्ड बदलना: मौजूदा विवरण बदले बिना नया ईपीआईसी चाहिए.
विकलांगता की जानकारी दर्ज करना: चुनावी रिकॉर्ड में विकलांगता की स्थिति दर्ज करानी है.
ईपीआईसी का मतलब इलेक्टर्स फ़ोटो आइडेंटिटी कार्ड यानी वोटर आईडी कार्ड है.
उदाहरण के लिए, अगर कोई पहले से रजिस्टर्ड मतदाता पटना से नोयडा चला जाता है, तो उसे नए मतदाता के रूप में फॉर्म 6 भरने के बजाय फॉर्म 8 के ज़रिए अपना रजिस्ट्रेशन नए पते पर स्थानांतरित कराना चाहिए.
कौन सा फॉर्म कब?
पहली बार मतदाता के रूप में रजिस्ट्रेशन कराना है- फॉर्म 6
किसी नाम पर आपत्ति या नाम हटाने का अनुरोध करना है- फॉर्म 7
पहले से रजिस्टर्ड हैं और पता बदल गया है-फॉर्म 8
मतदाता सूची में आपकी जानकारी ग़लत है- फॉर्म 8
वोटर आईडी खो गई या ख़राब हो गई है- फॉर्म 8
विकलांगता की जानकारी दर्ज करानी है- फॉर्म 8
AI outlook — possibilities, not facts
सुप्रीम कोर्ट अतिरिक्त घोषणा-पत्र की वैधता पर अपना अंतिम निर्णय देगा।
Very likely · Within months
यदि घोषणा-पत्र अवैध पाया जाता है, तो चुनाव आयोग को अपनी ऑनलाइन प्रक्रिया को बदलना पड़ सकता है।
Likely · Within weeks

MPs from the 'India' block, including Rahul Gandhi and Priyanka Gandhi, marched from Parliament to the Election Commission to protest against vote theft and SIR of voter lists. After being stopped by the police, the leaders staged a protest on the road and demanded the resignation of the Chief Election Commissioner.

Opposition India Bloc MPs marched from Parliament to the Election Commission headquarters in protest against alleged vote theft and special intensive revision of the voter list. When stopped near Niti Aayog, the MPs staged a protest on the road and demanded the resignation of the Chief Election Commissioner.

Opposition India Bloc MPs on Tuesday took out a march from Parliament to the Election Commission headquarters to protest against alleged vote theft and Special Intensive Revision of Voter List (SIR), but were stopped in front of the Niti Aayog office and staged a protest on the road. They raised slogans against Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar and were carrying cutouts of him in RSS uniform.

The Election Commission, for the first time, sought information about the names of voters' families in the old voter list by adding an additional declaration in Form 6, which was opposed by the Election Commissioners and the Supreme Court clearly said that it has not approved the revised Form 6, while the matter is still under consideration.
Samajwadi Party chief Akhilesh Yadav stated the party's focus is on winning all 403 Assembly seats in Uttar Pradesh rather than the Rajya Sabha elections, confirming nominations of Ram Gopal Yadav and Dhanraj Parimal Nathwani for the upper house polls while BJP has fielded eight candidates. Nominations close today, with polling on October 16.

The BJP has announced its candidates for eight of the 12 Rajya Sabha seats from Uttar Pradesh, including Dharampal Singh, Prakash Pal, Shruti Gangwar, Vidyasagar Sonkar, Radhakant Ojha, Gopi Krishna Pandey, Priyanka Singh Rawat and Ram Pratap Singh Chauhan. The party says that this is routine work, but political analysts believe that this is an attempt to create social and caste balance in view of the 2027 Uttar Pradesh Assembly elections.