
साल 2025 में भारतीय सिनेमा ने 13,395 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार किया, लेकिन हिंदी फ़िल्म उद्योग के सामने बजट, मार्केटिंग और स्टार्स की फ़ीस को लेकर क्या चुनौतियां हैं?
साल 2025 में भारतीय सिनेमाघरों ने 13,395 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई की। ट्रेड एनालिस्टों और फिल्म निर्माताओं के साथ बातचीत में हिंदी फिल्म उद्योग के बॉक्स ऑफिस गणित, मार्केटिंग के तरीकों और बजट की चुनौतियों पर चर्चा की गई।
AI-generated summary
कोविड-19 महामारी के बाद हिंदी फिल्म उद्योग मंदी से बाहर निकल रहा है और 2025 में बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड कमाई दर्ज की गई है।
साल 2025 में भारतीय सिनेमाघरों की कमाई ने नया रिकॉर्ड बनाया. देशभर के बॉक्स ऑफ़िस का कुल कारोबार 13,395 करोड़ रुपये से अधिक रहा. साल 2026 के अंत तक इसके 15 हज़ार करोड़ रुपये के पार पहुंचने का अनुमान है.
लेकिन हिंदी सिनेमा में फ़िल्में बनाने और उनकी मार्केटिंग का मॉडल कैसे काम करता है? फ़िल्म उद्योग के सामने आज क्या मुश्किलें हैं?
साल 2025 और साल 2026 में अक्तूबर तक बॉक्स ऑफ़िस पर हुई ज़बरदस्त कमाई को देखें, तो कोविड-19 महामारी के बाद आई सुस्ती से हिंदी फ़िल्म उद्योग काफ़ी हद तक बाहर निकल चुका है.
लेकिन कोई फ़िल्म बनती कैसे है? उसका बजट किन-किन हिस्सों में बंटा होता है? हर फ़िल्म की कमाई का गणित क्या होता है? कोई फ़िल्म हिट या फ़्लॉप कैसे तय होती है? क्या सोशल मीडिया प्रोमोशन और समीक्षाएं बॉक्स ऑफ़िस पर फ़िल्म की कमाई बढ़ाने में मदद करती हैं?
इन सवालों के जवाब जानने के लिए हमने ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श, सिनेमाघर संचालक राज बंसल और अक्षय राठी, निर्माता कुमार मंगत पाठक और अनुप्रिया नागर से बात की.
साल 2025 और 2026 की सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली हिंदी फ़िल्मों में बड़े सीक्वल और सितारों से सजी एक्शन फ़िल्मों का दबदबा रहा.
इनमें 'धुरंधर: द रिवेंज' ने 1,848 करोड़ रुपये, 'धुरंधर' ने 1,350 करोड़ रुपये, 'छावा' ने 809 करोड़ रुपये, 'सैयारा' ने दुनियाभर में 579 करोड़ रुपये और 'बॉर्डर 2' ने 464 करोड़ रुपये की कमाई की.
इस साल रिलीज़ हुई 'दृश्यम 3' अब तक 490 करोड़ रुपये और 'हनुमान अंश' 435 करोड़ रुपये की कमाई कर चुकी हैं.
वहीं, 'वॉर 2', 'सिकंदर', 'सन ऑफ़ सरदार 2', 'टॉक्सिक' और 'बंटवारा' जैसी फ़िल्मों ने काफ़ी निराश किया.
ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श कहते हैं, "अगर किसी डिस्ट्रीब्यूटर ने कोई फ़िल्म 10 रुपये में ख़रीदी है और सरकारी टैक्स, सिनेमाघर का किराया और दूसरे ख़र्च चुकाने के बाद उसके हाथ में 10 रुपये आ जाते हैं, तो उसकी लागत निकल जाती है."
"इसके बाद मिलने वाले 10 या 11 रुपये से ऊपर की रकम में कमीशन आता है. यह 15 या 20 प्रतिशत हो सकता है और निर्माता के साथ हुए समझौते की शर्तों पर निर्भर करता है."
वह कहते हैं, "अगर कोई फ़िल्म 10 रुपये में ख़रीदी गई और उसने साढ़े 12 रुपये का कारोबार किया, तो इसका मतलब है कि आपका कमीशन निकल गया. इसके बाद मुनाफ़ा शुरू होता है."
"कुछ समझौतों में यह मुनाफ़ा निर्माता और वितरक के बीच आधा-आधा बांटा जाता है. यह उनके बीच हुए समझौते पर निर्भर करता है."
तरण आदर्श के मुताबिक़, विदेशों में फ़िल्म दिखाने के अधिकार शुरुआत में ही बेच दिए जाते हैं या फिर फ़िल्म को कमीशन के आधार पर रिलीज़ किया जाता है. विदेशों में कुल कमाई का 40 प्रतिशत हिस्सा मिलता है.
अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के बीच रिलीज़ हुई फ़िल्मों के बारे में तरण आदर्श कहते हैं कि 'छावा', 'सैयारा', 'बॉर्डर 2', 'धुरंधर' और 'धुरंधर: द रिवेंज' "वास्तविक ब्लॉकबस्टर" हैं.
वह कहते हैं, "दुर्भाग्य से हमें 'वास्तविक' शब्द का इस्तेमाल करना पड़ता है, क्योंकि कई बार निर्माता अपनी फ़िल्मों की बॉक्स ऑफ़िस कमाई को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं."
"फ़िल्म 'धुरंधर' ने अपने सीक्वल के साथ जिस तरह का कारोबार किया, उसने खेल बदल दिया. 'छावा' को शानदार शुरुआत मिली. 'सैयारा' ऐसे समय में आई, जब लोगों को इस बात पर बहुत संदेह था कि प्रेम कहानियां अब चल भी सकती हैं या नहीं."
तरण आदर्श कहते हैं कि नए चेहरों वाली प्रेम कहानियां पहले भी सुपरहिट रही हैं. इनमें ऋषि कपूर की 'बॉबी' और कुमार गौरव की 'लव स्टोरी' जैसी फ़िल्में शामिल हैं.
उनके मुताबिक़, 'बॉर्डर 2' को इसकी ब्रांड वैल्यू, सनी देओल और फ़्रैंचाइज़ की लोकप्रियता का फ़ायदा मिला.
तरण आदर्श कहते हैं, "आज दर्शक कोई फ़िल्म देखने जाता है, तो उसके लिए मनोरंजन सबसे महत्वपूर्ण है. दर्शक ऐसा पूरा पैकेज चाहता है, जिसमें ड्रामा, संगीत, एक्शन और भावनाएं हों."
"सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लोग ऐसी फ़िल्म चाहते हैं, जिसे वे अपने परिवार के साथ देख सकें. लेकिन जब हमने केवल बड़े शहरों के दर्शकों को ध्यान में रखकर फ़िल्में बनानी शुरू कीं, तो हमने बड़ी संख्या में दर्शक खो दिए."
तरण आदर्श कहते हैं, "लेकिन दृश्यम 3 जैसी फ़िल्म भी है, जिसमें न गाने हैं, न एक्शन और न ही रोमांस. फ़िल्म के मुख्य अभिनेता अजय देवगन के संवाद भी बहुत कम हैं. वह अपनी आंखों, चेहरे के भाव और हावभाव से अभिनय करते हैं."
उनके मुताबिक़, 'हनुमान अंश' अचानक सामने आई एक ब्लॉकबस्टर फ़िल्म है, जिसे दो करोड़ रुपये के बजट में बनाया गया था.
वह कहते हैं, "धुरंधर, हनुमान अंश और दृश्यम 3 जैसी कई फ़िल्मों ने पुरानी धारणाएं तोड़ी हैं. फ़िल्म उद्योग जिन बातों को किसी फ़िल्म की सफलता के लिए ज़रूरी मानता है, दर्शक उन्हें ग़लत साबित कर रहे हैं."
वह कहते हैं कि "फ़िल्म 'टॉक्सिक' ने भी एक और धारणा तोड़ी. फ़िल्म ने 50 करोड़ रुपये की शानदार शुरुआत की, लेकिन इसकी रिपोर्ट इतनी ख़राब थी कि अगले ही दिन इसकी कमाई गिर गई. इसकी कहानी भी कमज़ोर थी."
तरण आदर्श के मुताबिक़, दर्शकों की स्वाभाविक तारीफ़ ने 'हनुमान अंश' जैसी फ़िल्म को आगे बढ़ाया.
इस फ़िल्म की निर्माता पहली बार कोई फ़िल्म बना रही थीं. मुख्य भूमिका में नया कलाकार था. फ़िल्म में न चकाचौंध थी और न ही प्रचार, क्योंकि इसके निर्माताओं के पास इसके लिए पैसे नहीं थे.
सिनेमाघर संचालक राज बंसल मानते हैं कि आज निर्माता जिस तरह की मार्केटिंग कर रहे हैं, वह ग़लत है.
वह कहते हैं, "आप मॉल और रेस्टोरेंट में जाकर अपनी फ़िल्म का प्रचार करते हैं. फ़िल्म के प्रचार के लिए निजी विमानों में सफ़र करते हैं, लेकिन इससे कोई फ़ायदा नहीं होता."
"आपको प्रिंट मीडिया और टेलीविज़न पर इंटरव्यू देकर अपनी फ़िल्म के बारे में बात करनी चाहिए. आप कपिल शर्मा के शो या किसी दूसरे कार्यक्रम में जाते हैं, लेकिन इससे बॉक्स ऑफ़िस पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता."
राज बंसल कहते हैं, "टेलीविज़न चैनल आपके ट्रेलर को कई मिनट तक मुफ़्त में दिखाता है. इसलिए आपने अपनी फ़िल्म के प्रचार का बजट बचाने के लिए व्यावसायिक रूप से एक अलग रास्ता अपना लिया है. लेकिन आप जिन रास्तों का इस्तेमाल कर रहे हैं, वे फ़िल्म उद्योग को नुक़सान पहुंचा रहे हैं."
उनके मुताबिक़, सोशल मीडिया आज फ़िल्मों की मार्केटिंग का एक नया साधन बन गया है.
वह कहते हैं, "सोशल मीडिया पर अपनी फ़िल्म का प्रचार कीजिए, लेकिन पैसे देकर कराई जाने वाली समीक्षाएं फ़िल्मों के कारोबार को नुक़सान पहुंचा रही हैं."
राज बंसल का आरोप है कि अभिनेता अपनी पीआर एजेंसियों, इन्फ़्लुएंसर्स और पैसे लेकर काम करने वाले प्रशंसकों के ज़रिए दूसरे अभिनेताओं को नीचा दिखा रहे हैं.
वह कहते हैं, "जब किसी अभिनेता की फ़िल्म रिलीज़ होती है, तो उसकी फ़िल्म की आलोचना शुरू कर दी जाती है या उसके पुराने वीडियो निकालकर सामने लाए जाते हैं. इससे फ़िल्म के ख़िलाफ़ नकारात्मक प्रचार होता है."
राज बंसल के मुताबिक़, हिंदी सिनेमा तीन मोर्चों पर नाकाम हो रहा है.
वह कहते हैं, "हमारे पास अच्छी पटकथाएं और अच्छा संगीत नहीं हैं, क्योंकि हम इन पर पैसे ख़र्च नहीं करना चाहते."
"एक और बात कि निर्देशक पूरी फ़िल्म का कप्तान होता है, लेकिन हम उसका सम्मान नहीं करते. जबकि दक्षिण भारतीय सिनेमा में ऐसा नहीं है और उनकी सफलता की यही वजह है."
वह कहते हैं, "मेरे दोस्त का कहना है कि आज सिनेमाघर में फ़िल्म देखना महंगा हो गया है. इसलिए लोग फ़िल्म के ओटीटी पर आने का इंतज़ार करते हैं या मंगलवार को फ़िल्म देखते हैं, जब टिकटों की क़ीमत बहुत कम होती है."
इस साल बड़े बजट की नाकाम फ़िल्मों के बारे में राज बंसल कहते हैं कि 'बंटवारा' अपनी कास्टिंग की वजह से नहीं चली.
वह कहते हैं, "फ़िल्म का मुख्य किरदार सनी देओल ने निभाया था. उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी अपनी फ़िल्मों में पाकिस्तान को निशाना बनाया है. यही उनकी सफलता का फ़ॉर्मूला रहा है. लेकिन इस फ़िल्म में कहानी इसके उलट थी."
राज बंसल कहते हैं कि फ़िल्म में शबाना आज़मी को एक हिंदू महिला की भूमिका दी गई, जबकि उनकी छवि एक कट्टर मुस्लिम की मानी जाती है.
उनके मुताबिक़, सनी देओल ने अपने बेटे को आगे बढ़ाया और प्रीति ज़िंटा को इसलिए लिया गया क्योंकि उनकी तारीख़ें आसानी से मिल सकती थीं और उन्होंने शीर्ष अभिनेत्रियों के मुक़ाबले कम फ़ीस ली.
वह कहते हैं, "लेकिन सच्चाई यह है कि आज उनके नाम पर फ़िल्म नहीं बिकती. इसलिए यह कास्टिंग की नाकामी थी."
राज बंसल 'सन ऑफ़ सरदार 2' को भी बड़े बजट वाली ऐसी फ़िल्म मानते हैं, जिसमें कलाकारों का चुनाव ग़लत था.
वह कहते हैं, "आप संजय दत्त की जगह रवि किशन को लेने के बारे में सोच भी कैसे सकते हैं? इसी वजह से फ़िल्म फ़्लॉप हुई."
वह कहते हैं कि 'दृश्यम 3' के निर्देशक को अपनी कहानी और किरदारों पर पूरा भरोसा था.
इसलिए उन्होंने अक्षय खन्ना को उनकी मांगी हुई फ़ीस नहीं दी और उनकी जगह जयदीप अहलावत को चुना, जो पहले के किरदारों के मुक़ाबले उनकी कहानी में बेहतर बैठते थे.
वह कहते हैं, "फ़िल्म बनी और सुपरहिट हो गई. यह अजय देवगन और निर्देशक के करियर की सबसे बड़ी फ़िल्म है."
"अगर इस फ़िल्म में अक्षय खन्ना होते, तो इसकी सफलता का आधा श्रेय उन्हें मिल जाता."
उनके मुताबिक़, आज हिंदी सिनेमा में पुरुष अभिनेताओं की बहुत अधिक फ़ीस फ़िल्मों के बॉक्स ऑफ़िस पर नाकाम होने की एक बड़ी वजह है.
सिनेमाघर संचालक अक्षय राठी मानते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में हिंदी सिनेमा का कारोबार बहुत तेज़ी से बढ़ा है. भारत के साथ विदेशों में भी इसका बाज़ार फैला है.
वह कहते हैं, "100 करोड़ रुपये की कमाई करने वाली पहली फ़िल्म 'गजनी' थी. उसने रिकॉर्ड तोड़ और कमाई का एक नया पैमाना तय किया."
"साल 2026 में 'धुरंधर 2' के रूप में हमें पहली बार एक हज़ार करोड़ रुपये कमाने वाली फ़िल्म मिली."
अक्षय राठी कहते हैं कि किसी फ़िल्म के हिट या फ़्लॉप होने का फ़ैसला उसकी बॉक्स ऑफ़िस कमाई से अधिक निवेश पर मिलने वाले फ़ायदे के आधार पर किया जाता है.
वह कहते हैं, "'12वीं फ़ेल' जैसी फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर 50 करोड़ रुपये कमाकर हिट हो सकती है. वहीं कोई फ़िल्म 100 करोड़ रुपये कमाने के बावजूद अपने बहुत बड़े बजट के कारण फ़्लॉप हो सकती है."
उनके मुताबिक़, निवेश पर मिले फ़ायदे के लिहाज़ से 'हनुमान अंश' हिंदी सिनेमा के इतिहास की सबसे अधिक मुनाफ़ा कमाने वाली फ़िल्मों में से एक हो सकती है.
वह कहते हैं, "फ़िल्म उद्योग को चलते रहने के लिए हर तरह की फ़िल्म बननी चाहिए. हर फ़िल्म का अपना असर और अपना दर्शक वर्ग होता है."
"यह बहुत ज़रूरी है कि सभी तरह की फ़िल्में लगभग बराबर संख्या में बनें, ताकि भारत में बॉक्स ऑफ़िस का कारोबार लंबे समय तक मज़बूत और बेहतर बना रहे."
हिंदी सिनेमा के कारोबार, मार्केटिंग के तरीक़ों और मौजूदा परेशानियों पर 'दृश्यम 3' के निर्माता कुमार मंगत पाठक कहते हैं कि दर्शक अब पहले के मुक़ाबले बहुत सोच-समझकर फ़िल्म चुनते हैं.
वह कहते हैं, "आज आप दर्शकों को हल्के में नहीं ले सकते. उनके पास बहुत सारे विकल्प हैं. वे सिनेमाघर तभी आएंगे, जब उन्हें लगेगा कि कोई फ़िल्म देखने लायक है."
"निर्माता के तौर पर हमें अच्छी कहानियों, समझदारी से तय किए गए बजट और दर्शकों की पसंद को समझने पर ध्यान देना चाहिए."
कुमार मंगत पाठक कहते हैं कि उनके लिए हर फ़िल्म की शुरुआत कहानी से होती है.
वह कहते हैं, "जब हमने 'ओमकारा' बनाई, तो शेक्सपियर के 'ऑथेलो' का हिंदी रूपांतरण बनाने का जोखिम उठाया था."
"यह आम विषय नहीं था, लेकिन हमें फ़िल्म और उसकी संभावनाओं पर भरोसा था. उस अनुभव ने मुझे सिखाया कि कई बार आपको अपने विश्वास पर भरोसा करना पड़ता है."
"निर्देशक, कलाकारों के चुनाव और बजट पर भी ध्यान देना पड़ता है, लेकिन मेरे लिए कहानी हमेशा पहला क़दम होती है."
फ़िल्म के बजट के बारे में कुमार मंगत पाठक कहते हैं, "इसमें अभिनेताओं की फ़ीस, निर्देशक और तकनीकी कर्मचारियों का मेहनताना, शूटिंग, निर्माण और शूटिंग के बाद होने वाले काम का ख़र्च शामिल होता है."
"इसके बाद मार्केटिंग और प्रचार का ख़र्च आता है. बजट इस पर निर्भर करता है कि आप किस तरह की फ़िल्म बना रहे हैं."
उनके मुताबिक़, 'स्पेशल 26' और 'रेड' जैसी फ़िल्में बनाते समय कहानी के स्तर को समझना और उसी के मुताबिक़ ख़र्च की योजना बनाना ज़रूरी है.
वह कहते हैं, "मेरा मानना है कि आपको फ़िल्म की कमाई की क्षमता के मुताबिक़ पैसा ख़र्च करना चाहिए, क्योंकि फ़िल्म बनाना जितना महत्वपूर्ण है, निवेश की रकम वापस निकालना भी उतना ही ज़रूरी है."
किसी फ़िल्म की पूरी आर्थिक स्थिति समझने के लिए उसके बजट, प्रिंट और प्रचार के ख़र्च, पहले तीन दिनों की कमाई और कुल कमाई को देखा जाता है.
कुमार मंगत पाठक कहते हैं कि निर्माता सबसे पहले फ़िल्म में किए गए कुल निवेश को देखते हैं. इसमें फ़िल्म बनाने और उसके प्रचार पर हुआ ख़र्च शामिल होता है.
वह कहते हैं, "पहले सप्ताहांत की कमाई से इस बात का संकेत मिलता है कि फ़िल्म कैसा प्रदर्शन कर रही है, लेकिन इससे पूरी कहानी पता नहीं चलती."
"आख़िर में आपको यह देखना पड़ता है कि फ़िल्म ने पूरे समय में कितना कारोबार किया और वास्तव में कितनी रकम वापस आई."
उनका कहना है कि बड़े, मध्यम या छोटे बजट की फ़िल्म की कोई एक तय परिभाषा नहीं है. यह फ़िल्म के स्तर, कलाकारों और विषय पर निर्भर करता है.
वह कहते हैं, "फ़िल्म 'प्यार का पंचनामा' इस बात का अच्छा उदाहरण है कि दर्शकों से जुड़ने के लिए किसी फ़िल्म का बजट हमेशा बहुत बड़ा होना ज़रूरी नहीं है."
"दूसरी ओर, बड़े स्तर पर बनाई गई फ़िल्म को अपने स्तर के मुताबिक़ कारोबार भी करना पड़ता है. फ़िल्म को उतनी लागत में बनाना ज़रूरी है, जितनी कमाई करने की उसमें क्षमता हो."
क्या बड़े सितारों वाली महंगी फ़िल्मों का दौर ख़त्म हो रहा है, क्योंकि वे अपनी लागत नहीं निकाल पा रही हैं?
इस सवाल पर कुमार मंगत पाठक कहते हैं, "नहीं, मुझे नहीं लगता कि बड़े बजट की फ़िल्में कहीं जा रही हैं. दर्शक अब भी बड़े पर्दे पर बड़ी फ़िल्में देखना पसंद करते हैं."
"लेकिन बड़ा सितारा या बड़ा बजट किसी फ़िल्म की सफलता की गारंटी नहीं है. 'शैतान' ने दिखाया कि एक मज़बूत विचार भी दर्शकों को सिनेमाघरों तक ला सकता है. फ़िल्म को लोगों से जुड़ना चाहिए और उसकी लागत कारोबार के लिहाज़ से उचित होनी चाहिए."
कुमार मंगत पाठक कहते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में मार्केटिंग और प्रचार का ख़र्च बढ़ा है, क्योंकि फ़िल्मों के प्रचार का तरीक़ा पूरी तरह बदल गया है.
वह कहते हैं, "आज हम डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म, सोशल मीडिया, आउटडोर विज्ञापन, कार्यक्रमों और कई दूसरे माध्यमों का इस्तेमाल करते हैं."
"दर्शकों का ध्यान खींचने की होड़ भी पहले से बहुत अधिक है. लेकिन मेरा मानना है कि अधिक पैसा ख़र्च करने का मतलब हमेशा बेहतर मार्केटिंग नहीं होता."
उनके मुताबिक़, हिंदी फ़िल्म उद्योग की मौजूदा परेशानी यह है कि लागत बढ़ गई है और दर्शक पहले से अधिक सोच-समझकर फ़िल्में चुन रहे हैं.
वह कहते हैं, "कई बार किसी फ़िल्म का बजट इतना अधिक होता है कि उसे केवल अपनी लागत निकालने के लिए भी असाधारण कारोबार करना पड़ता है."
"हमने 'दृश्यम' जैसी फ़िल्मों के साथ देखा है कि एक मज़बूत कहानी और दिलचस्प पटकथा दर्शकों के साथ लंबे समय तक रिश्ता बना सकती है. हमें अच्छी सामग्री पर ध्यान देना और लागत को लेकर व्यावहारिक होना होगा."
कुमार मंगत पाठक कहते हैं कि फ़िल्म उद्योग को बजट तय करते समय अधिक अनुशासित होना होगा और हर फ़िल्म की कमाई की संभावना को ईमानदारी से देखना होगा.
वह कहते हैं, "हर फ़िल्म को बड़े स्तर पर बनाने की ज़रूरत नहीं है."
"हमने 'ओमकारा' और 'स्पेशल 26' से लेकर 'प्यार का पंचनामा' और 'दृश्यम' तक अलग-अलग तरह की फ़िल्में बनाई हैं."
"अलग-अलग विषयों के लिए अलग तरीक़े अपनाने पड़ते हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे पास अच्छी सामग्री और समझदारी से बनाई गई योजना हो."
उनका कहना है कि फ़िल्म बनाने की लागत अधिक वास्तविक होनी चाहिए.
वह कहते हैं, "किसी अभिनेता की फ़ीस का फ़िल्म की कमाई की क्षमता के हिसाब से उचित होना ज़रूरी है. इसका मतलब यह नहीं है कि सितारों को अच्छी फ़ीस नहीं मिलनी चाहिए. बात केवल यह सुनिश्चित करने की है कि फ़िल्म की पूरी आर्थिक योजना सही तरीक़े से काम करे."
"फ़िल्म को आर्थिक रूप से चलने लायक बनाने में सभी लोगों को योगदान देना होगा, क्योंकि निवेश की आख़िरी ज़िम्मेदारी निर्माता की होती है."
कुमार मंगत पाठक कहते हैं, "मेरे लिए हिट वह फ़िल्म है, जो अपनी लागत निकालने के बाद मुनाफ़ा कमाती है. फ़्लॉप वह फ़िल्म है, जो अपनी लागत भी वापस नहीं निकाल पाती."
"किसी फ़िल्म की केवल कुल कमाई देखकर उसका फ़ैसला नहीं किया जा सकता. फ़िल्म का बजट और वास्तव में वापस आई रकम सबसे ज़्यादा मायने रखती है."
वह कहते हैं, "पैनोरमा में 'ओमकारा' से लेकर 'दृश्यम', 'रेड' और 'शैतान' तक हमारा सफ़र अलग-अलग तरह की कहानियों का समर्थन करने और उनके लिए सही राह चुनने का रहा है."
AI outlook — possibilities, not facts
साल 2026 के अंत तक बॉक्स ऑफिस का कारोबार 15 हज़ार करोड़ रुपये के पार पहुंचेगा।
Likely · Within months

Unidentified assailants opened fire on Bollywood actor Tiger Shroff's car in Mumbai on Sunday evening, injuring two people including his driver. Eyewitnesses gave information about the incident.
In June 2016, John Oliver bought nearly $15 million in unpaid medical debt for $60,000 via a shell company, CARP Inc., and transferred it to charity Undue Medical Debt to erase the debt for 9,000 patients, highlighting flaws in the U.S. debt-buying system and inspiring broader medical debt relief initiatives.
Actor Tiger Shroff escaped unhurt after three motorcycle-borne men opened fire outside a Juhu football venue on Sunday. His driver was hospitalised, and the Mumbai Crime Branch has launched an investigation into the incident, which the Lawrence Bishnoi gang reportedly claimed.
Reese Witherspoon has repurchased her production company, Hello Sunshine, from Candle Media in a deal with Paris-based Mediawan. The sale price, reported in the low- to mid-eight-figure range, marks a significant decline from the company's 2021 $900 million valuation.
Reese Witherspoon has repurchased her production company, Hello Sunshine, from Candle Media in partnership with Paris-based Mediawan. The deal, valued in the low- to mid-eight-figure range, marks a significant valuation drop from the company's 2021 $900 million sale.
Deva, renowned Tamil music director, lyricist, and singer known as the godfather of Gaana, died in Chennai at 75 following chest pain. He composed for over 400 films, creating iconic themes for Rajinikanth.