
भारतीय सार्वजनिक जीवन में आंदोलनों की दृश्य शैली और नायक गढ़ने में सिनेमा की भूमिका का विश्लेषण।
यह लेख सिनेमा और आंदोलनों के जटिल रिश्ते का विश्लेषण करता है, बताता है कि कैसे फ़िल्में विरोध प्रदर्शनों की भाषा, दृश्य शैली और नायक को आकार देती हैं। यह 'रंग दे बसंती' जैसी नागरिक-केंद्रित फ़िल्मों और 'धुरंधर' जैसी राज्य-केंद्रित फ़िल्मों के प्रभावों की तुलना करता है, जो वर्तमान विद्यार्थी आंदोलनों के संदर्भ में प्रासंगिक है।
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सिनेमा आंदोलनों को दिखाता भी है और कई बार उन्हें आकार भी देता है, लेकिन यह रिश्ता जितना सीधा दिखाई देता है, वास्तव में उतना सरल नहीं है, क्योंकि हर फ़िल्म आंदोलन की अपनी अलग व्याख्या पेश करती है।
"ज़िंदगी जीने के दो ही तरीक़े होते हैं. एक, जो हो रहा है उसे होने दो और सब कुछ बर्दाश्त करते जाओ. दूसरा, ज़िम्मेदारी उठाओ और उसे बदलने की कोशिश करो." - रंग दे बसंती (2006)
प्रसून जोशी ने 'रंग दे बसंती' फ़िल्म के डायलॉग और गीत लिखे थे.
विद्यार्थी आंदोलनों में जब इस फ़िल्म के गीत फिर से लोकप्रिय हो रहे थे, उसी दौरान जोशी की अध्यक्षता वाले सेंसर बोर्ड पर सवाल उठे, क्योंकि ओटीटी पर रिलीज़ हुई सतलुज फ़िल्म को हटा दिया गया था.
2010 के दशक के फ़िल्मी सितारे इमरान ख़ान ने विद्यार्थियों का समर्थन किया. इसके बाद उन्हें इंस्टाग्राम पर लोगों का काफ़ी प्यार मिला.
फ़िल्मों में अक्सर ख़लनायक की भूमिकाएँ निभाने वाले प्रकाश राज के समर्थन में भी लोगों ने खुलकर अपनी भावनाएँ ज़ाहिर कीं. यह अपने आप में एक दिलचस्प विरोधाभास था.
कॉलेज परिसरों में गूंजते नारे, हाथों में तख़्तियाँ, मोमबत्तियाँ जलाते लोग और इन दृश्यों को क़ैद करता कैमरा. पिछले दो दशकों में भारतीय सार्वजनिक जीवन में यह तस्वीर कई बार दिखाई दी है.
लेकिन इस तरह की छवि को आकार किसने दिया?
इस सवाल का एक जवाब सिनेमा है.
आंदोलन और सिनेमा का रिश्ता कभी एकतरफ़ा नहीं रहा. सिनेमा आंदोलनों को दिखाता भी है और कई बार उन्हें आकार भी देता है.
आंदोलनों की भाषा, उनकी दृश्य शैली, उनके नायक और उनके विरोधियों की छवि गढ़ने में सिनेमा की बड़ी भूमिका रही है.
लेकिन यह रिश्ता जितना सीधा दिखाई देता है, वास्तव में उतना सरल नहीं है.
फ़िल्म और आंदोलन का रिश्ता
हर फ़िल्म, आंदोलन की अपनी अलग व्याख्या पेश करती है.
इन अलग-अलग व्याख्याओं के बीच मौजूद विरोधाभासों को समझने पर ही आंदोलन और सिनेमा के रिश्ते की असली जटिलता सामने आती है.
इस समय देश के कई हिस्सों में विद्यार्थी सड़कों पर उतरते दिखाई दे रहे हैं. ऐसे में इस रिश्ते को एक बार फिर समझने की ज़रूरत महसूस होती है.
इन व्याख्याओं के बीच सबसे बुनियादी फ़र्क़ यह है कि आंदोलन को किस रूप में देखा जाता है. क्या आंदोलन नैतिक चेतना से पैदा होने वाली एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है?
या फिर वह एक सुनियोजित और संगठित राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है?
राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फ़िल्म रंग दे बसंती (2006) में भगत सिंह और उनके साथियों की कहानी एक डॉक्यूमेंट्री के ज़रिए आज के युवाओं के सामने आती है.
धीरे-धीरे अतीत और वर्तमान के बीच की दूरी मिटने लगती है. एक दोस्त की मौत के बाद ये युवा एक भ्रष्ट रक्षा मंत्री की हत्या कर देते हैं.
यह कहानी निजी दुख और क्षति से पैदा हुए अचानक फूट पड़े ग़ुस्से की है. यह किसी संगठित राजनीतिक विचारधारा या लंबी राजनीतिक प्रक्रिया का नतीजा नहीं है.
रंग दे बसंती में संसद के सामने निकाला गया कैंडल मार्च का दृश्य बाद के वर्षों में कई बार वास्तविक आंदोलनों में दिखाई दिया.
कई आलोचकों का मानना है कि इस फ़िल्म ने आंदोलन को एक मज़बूत दृश्य पहचान दी. लेकिन उसने आंदोलन का गहरा राजनीतिक विश्लेषण नहीं किया.
फ़िल्म यह सवाल भी गहराई से नहीं उठाती कि क्या हत्या किसी समस्या का समाधान हो सकती है.
यह भी नहीं पूछा जाता कि संस्थागत प्रक्रियाओं को दरकिनार कर नैतिक ग़ुस्से को सीधे कार्रवाई में बदलना कितना ख़तरनाक हो सकता है.
इसके बिल्कुल उलट जिलो पोंतेकोर्वो की फ़िल्म द बैटल ऑफ़ अल्जीयर्स (1966) है.
यह फ़िल्म फ़्रांसीसी उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ अल्जीरिया के स्वतंत्रता संघर्ष को दिखाती है.
इसमें आंदोलन को एक संगठित और अनुशासित राजनीतिक ढाँचे के रूप में पेश किया गया है. फ़िल्म में गुप्त संपर्क तंत्र, छोटे-छोटे संगठनात्मक समूह और रणनीतिक फ़ैसले अहम भूमिका निभाते हैं.
न्यूज़रील या वार्तापट जैसी शैली में फ़िल्माई गई यह फ़िल्म अपेक्षाकृत निष्पक्ष नज़रिए से कहानी दिखाती है. यह आतंकवाद और आतंकवाद-विरोधी कार्रवाई के बीच धुंधली होती रेखा को भी सामने लाती है.
फ़िल्म किसी एक पक्ष को नायक बनाने से बचती है. फ़्रांसीसी सैन्य अधिकारी कर्नल मैथ्यू को क्रूर दिखाया गया है. लेकिन उसकी सोच और तर्क एक व्यवस्थित ढाँचे में पेश किए गए हैं.
वहीं, अल्जीरियाई प्रतिरोध लड़ाकों को बहादुर दिखाया गया है. फिर भी उनके हाथों निर्दोष लोगों की मौत भी होती है. यह अंतर सिर्फ़ फ़िल्म बनाने की शैली का नहीं है.
यह आंदोलन की राजनीति को समझने के दो अलग-अलग नज़रियों को भी दिखाता है. एक नज़रिया आंदोलन को भावनाओं के अचानक उभार से पैदा हुई घटना मानता है.
दूसरा नज़रिया उसे सत्ता और व्यवस्था के विश्लेषण से जन्मी लंबी राजनीतिक लड़ाई के रूप में देखता है. दिलचस्प बात यह है कि इन दोनों फ़िल्मों का असर भी अलग रहा.
इनमें से एक फ़िल्म कई आंदोलनों के दौरान प्रेरणा का स्रोत बनी. उसके गीत सड़कों और विरोध प्रदर्शनों में गाए गए.
वहीं दूसरी फ़िल्म अमेरिका के पेंटागन में दिखाई गई. वहाँ इसका इस्तेमाल विद्रोह को कुचलने की रणनीतियों को समझने के अध्ययन के तौर पर किया गया.
सिनेमा की छवियाँ और हक़ीक़त
सिनेमा और हक़ीक़त के रिश्ते को समझने के लिए सिर्फ़ यह मान लेना काफ़ी नहीं है कि सिनेमा जीवन की नकल करता है. यह विचार बहुत सीमित है.
अमेरिकी दार्शनिक जूडिथ बटलर ने लैंगिक पहचान और अस्मिता पर एक अहम बात कही है. उनके मुताबिक़ कोई भी सार्वजनिक कार्रवाई पूरी तरह नई या अचानक पैदा नहीं होती.
चाहे वह कोई व्यवहार हो या राजनीतिक विरोध प्रदर्शन. हम जो भी करते हैं, वह किसी न किसी रूप में पहले भी कई बार किया जा चुका होता है.
हम अक्सर अनजाने में उन्हीं चीज़ों को दोहराते रहते हैं. बटलर ने इसे 'उद्धरणीयता' या साइटेशनैलिटी कहा है.
सरल शब्दों में कहें तो हमारी हर कार्रवाई किसी पुरानी कार्रवाई की प्रतिध्वनि होती है. ऐसा तब भी होता है, जब हमें उसका मूल स्रोत याद न हो.
यही बात आंदोलनों पर भी लागू होती है.
मुट्ठी भींचकर नारे लगाना. हाथ में मोमबत्ती लेकर चलना. तख़्तियों पर एक ख़ास अंदाज़ में संदेश लिखना. ये सब हमें बहुत स्वाभाविक और सहज लगते हैं. लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है.
इन अभिव्यक्तियों का एक बड़ा स्रोत सिनेमा भी रहा है.
हालाँकि यह असर सिर्फ़ एक दिशा में नहीं चलता. फ़िल्मकार भी इन्हीं सामाजिक और सार्वजनिक यादों से प्रेरणा लेते हैं.
आख़िर फ़िल्म बनने से पहले भी आंदोलन होते रहे हैं. यानी सिनेमा हक़ीक़त से सीखता है. और वास्तविक आंदोलन भी सिनेमा से सीखते हैं.
इस मायने में सिनेमा और जीवन का रिश्ता एक चक्र की तरह है. दोनों लगातार एक-दूसरे को प्रभावित करते रहते हैं. दोनों एक-दूसरे की छवियों और प्रतीकों को बार-बार दोहराते हैं.
इस रिश्ते का दूसरा और ज़्यादा राजनीतिक पहलू कथाओं की लड़ाई से जुड़ा है. किसी भी घटना का कोई एक तय मतलब नहीं होता.
उसका अर्थ इस बात से तय होता है कि उसे किस तरह बताया जाता है. उसे किस कहानी के ढाँचे में रखा जाता है.
एक ही घटना को प्रेम कथा, त्रासदी, हास्य या व्यंग्य के रूप में पेश किया जा सकता है.
हर शैली उस घटना को अलग अर्थ देती है. उसे अलग नैतिक दिशा देती है. इसी वजह से आंदोलन और सत्ता के बीच संघर्ष हमेशा दो स्तरों पर चलता है. एक संघर्ष सड़कों पर दिखाई देता है.
उसमें नारे होते हैं. पुलिस होती है. लाठीचार्ज होता है. लेकिन इसके साथ-साथ एक और संघर्ष भी चलता है.
यह संघर्ष उस घटना की व्याख्या को लेकर होता है.
सवाल यह होता है कि उस घटना को किस रूप में पेश किया जाए. क्या उसे वीरता की कहानी कहा जाए.
क्या उसे अराजकता बताया जाए. या फिर उसका मज़ाक बनाया जाए.
इतालवी चिंतक एंतोनियो ग्राम्शी के 'वर्चस्व' या हेजेमनी के सिद्धांत से इसे और बेहतर ढंग से समझा जा सकता है.
ग्राम्शी का कहना था कि सत्ता सिर्फ़ पुलिस और क़ानून के दम पर कायम नहीं रहती. वह इस बात पर भी निर्भर करती है कि समाज किन विचारों और कथाओं को स्वीकार करता है.
इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है.
रंग दे बसंती क्रांति को एक रोमांटिक शैली में पेश करती है. फ़िल्म में कहानी भावनात्मक ग़ुस्से से शुरू होती है. और आत्मबलिदान पर जाकर पूरी होती है.
इसके उलट पीपली लाइव (2010) और फिर भी दिल है हिंदुस्तानी (2000) ऐसी स्थितियों को व्यंग्य के नज़रिए से दिखाती हैं.
इन फ़िल्मों में नायक का दुख भी कई बार एक तमाशे या विडंबना में बदल जाता है. यह फ़र्क़ सिर्फ़ शैली का नहीं है.
यह आंदोलन के राजनीतिक अर्थ को लेकर बुनियादी असहमति को भी दिखाता है. समाज में कौन-सी कहानी ज़्यादा प्रभावशाली बनती है, इसका असर भी दूर तक जाता है.
इसी से तय होता है कि किन आंदोलनों को सम्मान और नैतिक समर्थन मिलेगा. और किन आंदोलनों को समय के साथ संदिग्ध, हास्यास्पद या ख़तरनाक मान लिया जाएगा.
रंग दे बसंती/स्वदेस बनाम धुरंधर: कहानी कहने की दिशा
इसी संदर्भ में एक और सवाल पूछा जा सकता है.
रंग दे बसंती और स्वदेस की छवियाँ और प्रतीक विरोध प्रदर्शनों की भाषा का हिस्सा इतनी आसानी से कैसे बन गए?
वहीं, हाल की फ़िल्म धुरंधर की दृश्य शैली ऐसा असर क्यों नहीं छोड़ पाई? यह तब है, जब धुरंधर व्यावसायिक रूप से उतनी ही या उससे भी ज़्यादा सफल रही.
सिर्फ़ लोकप्रियता इसके पीछे की वजह नहीं लगती. धुरंधर ने बॉक्स ऑफ़िस पर रिकॉर्ड कमाई की.
उसका शीर्षक गीत और दृश्य शैली भी काफ़ी चर्चा में रहे.
असल फ़र्क़ इन फ़िल्मों की कहानी कहने की दिशा में है.
रंग दे बसंती और स्वदेस को सरल शब्दों में नागरिक-केंद्रित फ़िल्में कहा जा सकता है. इनका नायक व्यवस्था के बाहर का एक आम नागरिक होता है.
वह व्यवस्था की कमियों से जूझता है. और उसे भीतर या बाहर से बेहतर बनाने की कोशिश करता है.
रंग दे बसंती के युवा भ्रष्ट व्यवस्था के ख़िलाफ़ विद्रोह करते हैं. वहीं, स्वदेस का मोहन भार्गव अमेरिका की अच्छी नौकरी छोड़कर अपने गाँव लौटता है.
वह अपने श्रम और प्रयास से गाँव की समस्याओं को दूर करने की कोशिश करता है. इन दोनों फ़िल्मों में नायक और सत्ता के बीच का रिश्ता सुधार की चाह रखने वाला है.
कई बार यह टकराव वाला भी हो जाता है. लेकिन यह रिश्ता हमेशा एक आम नागरिक की नज़र से दिखाया जाता है. यही वजह है कि इन फ़िल्मों की भाषा और प्रतीक आंदोलनों में आसानी से जगह बना लेते हैं.
आख़िर आंदोलन भी नागरिक और सत्ता के बीच तनाव का ही एक रूप होते हैं. ये फ़िल्में उसी तनाव को परदे पर दिखाती हैं.
धुरंधर इससे बिल्कुल अलग है. यह एक राज्य-केंद्रित कहानी है. इसका नायक हमज़ा भारतीय ख़ुफ़िया तंत्र का एक आधिकारिक प्रतिनिधि है. वह राज्य की ओर से काम करता है.
और राज्य के आदेश पर बाहरी दुश्मनों के ख़िलाफ़ गुप्त अभियान चलाता है.
यहाँ संघर्ष तो है. लेकिन यह नागरिक बनाम सत्ता का संघर्ष नहीं है. यह राज्य बनाम राज्य का संघर्ष है.
इस कहानी का नायक असहमति की आवाज़ नहीं है. वह सत्ता के ही एक औज़ार के रूप में सामने आता है. इसी वजह से ऐसी कहानी आंदोलनों की भाषा नहीं बन पाती.
क्योंकि यह भाषा सत्ता को चुनौती देने के लिए नहीं, बल्कि उसका समर्थन करने के लिए बनाई गई है.
इस अंतर का एक और पहलू भी है. वह है गीतों और दृश्य शैली की बनावट.
रंग दे बसंती और स्वदेस के गीत सामूहिक रूप से गाए जाने के लिए बने हैं.
उन्हें लोग मिलकर गा सकते हैं. उनकी धुनें अपेक्षाकृत सरल हैं. शब्द भी आसान हैं. और उनका भावनात्मक संदेश सामूहिक है.
इसी वजह से ये गीत रैलियों और विरोध प्रदर्शनों में आसानी से गूँजते हैं. इनकी रचना ही लोगों को साथ जोड़ने के लिए की गई है.
इसके उलट धुरंधर का संगीत और दृश्य संसार अलग तर्क पर आधारित है. उसका मक़सद नायक के साहस और पराक्रम को दिखाना है.
वह दर्शक को चकित करना चाहता है. उसका लक्ष्य सामूहिक भागीदारी नहीं है. धुरंधर दर्शक को एक निष्क्रिय दर्शक बनाकर रखता है.
वहीं, रंग दे बसंती और स्वदेस जैसी फ़िल्में दर्शक को कहानी का हिस्सा बनने का निमंत्रण देती हैं. आंदोलनों को ऐसी ही दृश्य भाषा की ज़रूरत होती है. ऐसी भाषा, जो लोगों को शामिल करे.
सिर्फ़ देखने भर पर मजबूर करने वाली भाषा आंदोलन के काम नहीं आती.
यही वजह है कि विरोध की व्याकरण धुरंधर से नहीं ली जाती. वह रंग दे बसंती और स्वदेस जैसी फ़िल्मों से आती है.
ऐसी फ़िल्मों से, जो नागरिक को केंद्र में रखती हैं. और लोगों को सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करती हैं.
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