
विदर्भ के अमरावती और नागपुर ज़िलों में कम बारिश और भीषण गर्मी के चलते संतरे और मौसंबी के बाग सूख रहे हैं, जिससे किसानों पर भारी कर्ज का बोझ बढ़ गया है।
महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में सूखे और अनियमित बारिश के कारण संतरे और मौसंबी की फसल बुरी तरह प्रभावित हुई है। पेड़ों के सूखने और फलों का आकार न बढ़ने से किसानों को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है, जिससे उन पर कर्ज का संकट गहरा गया है।
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विदर्भ क्षेत्र में संतरे और मौसंबी की खेती एक प्रमुख आर्थिक गतिविधि है, जो लाखों हेक्टेयर भूमि पर आधारित है। इस वर्ष सूखे और भीषण गर्मी ने सिंचाई के जलस्रोतों को सुखा दिया है।
खेती के लिए तीन लाख रुपये का कर्ज़ लिया. घर के लिए पांच लाख रुपये का कर्ज़ लिया. कुल आठ लाख रुपये का कर्ज़ है. अब खेत की हालत ऐसी हो गई है. समझ नहीं आ रहा कि कर्ज़ कैसे चुकाऊं. मेरी पत्नी काम पर जाती है और उसी की कमाई से घर चल रहा है. मुझे पूरी रात नींद नहीं आती.
महाराष्ट्र के अमरावती ज़िले के मोर्शी में संतरे की खेती करने वाले रामचंद्र राणे अपना दर्द बता रहे थे. राणे छोटे किसान हैं. उनके पास दो एकड़ ज़मीन है, जिस पर संतरे का बाग़ लगा है.
लेकिन इस साल पेड़ों पर बहुत कम संतरे आए. बारिश के बीच लंबा अंतर होने की वजह से जो संतरे लगे, उनका आकार भी नहीं बढ़ा. इसलिए उन्हें बाज़ार में खरीदार नहीं मिल रहे हैं. अब कर्ज़ कैसे चुकाएंगे और आगे जीवन कैसे चलेगा? राणे के सामने यही सवाल है.
विदर्भ में करीब एक लाख 50 हज़ार हेक्टेयर ज़मीन पर संतरे की खेती होती है. इससे करोड़ों रुपये का कारोबार जुड़ा है. इनमें सबसे ज़्यादा संतरे नागपुर ज़िले और अमरावती ज़िले के वरुड और मोर्शी इलाक़ों में उगाए जाते हैं. नागपुर के काटोल और नरखेड़ तालुका मौसंबी की खेती के लिए जाने जाते हैं. लेकिन अब इन इलाक़ों के किसानों की हालत बेहद ख़राब है.
अंबिया बहार के बहुत से संतरे पेड़ों से गिर गए. जो बचे, उनका आकार नहीं बढ़ा. अब तक मृग बहार के संतरे भी बड़े हो जाने चाहिए थे. लेकिन उनका आकार भी नहीं बढ़ा है. बारिश के बीच लंबा अंतर होने से संतरों की बढ़त रुक गई. इतना ही नहीं, सूखे की वजह से संतरे के पेड़ भी सूखने लगे हैं.
मोर्शी तालुका के दापोरी गांव के किसान गिरीश काले के पास सात एकड़ में संतरे का बाग़ है. लेकिन उनके बाग़ के आधे से ज़्यादा पेड़ सूखे की वजह से सूख गए हैं. अब उन्होंने सूखे हुए पेड़ों को हटाना भी शुरू कर दिया है.
गिरीश बताते हैं, "गर्मियों में तापमान 47 से 48 डिग्री तक पहुंच गया था. उस गर्मी में हमने किसी तरह बाग़ों को बचाया. लेकिन बारिश के मौसम में भी कम बारिश हुई. तेज़ गर्मी और कम बारिश की वजह से बाग़ सूख गया."
"किसी तरह मृग बहार के संतरे लगे, लेकिन उनका आकार छोटा है. अंबिया बहार के संतरे भी बड़े नहीं हुए. इसलिए व्यापारी यहां आ ही नहीं रहे."
गिरीश ने एक निजी साहूकार से पांच लाख रुपये का कर्ज़ लिया है. लेकिन अब वह कहते हैं कि कर्ज़ चुकाने और आगे जीवन चलाने के लिए उनके पास दो एकड़ ज़मीन बेचने के अलावा कोई रास्ता नहीं है.
मोर्शी और वरुड ऐसे इलाक़े हैं, जहां ज़मीन के नीचे पानी की भारी कमी है. यहां नए कुएं खोदने या बोरवेल करने की अनुमति नहीं है क्योंकि पानी का स्तर बहुत नीचे जा चुका है. किसानों का कहना है कि कम बारिश के कारण अब कुओं का पानी भी बाग़ों के लिए पूरा नहीं पड़ रहा है. अक्तूबर में ही कुओं का जलस्तर सबसे नीचे पहुंच गया है.
मोर्शी तालुका के किसान रुपेश वालके के खेत में पेड़ों पर संतरे दिखाई देते हैं. लेकिन उनका कहना है कि इनकी संख्या हर साल के मुक़ाबले कम है. रुपेश कहते हैं, "इस साल गर्मी बहुत तेज़ रही. उसी समय अंबिया बहार के 70 फ़ीसदी संतरे पेड़ों से गिर गए."
नागपुर ज़िले में मौसंबी के बाग़ों की हालत भी इससे अलग नहीं है. काटोल के येरला गांव के किसान स्वप्निल धोटे बताते हैं, "पिछले साल एक पेड़ से 30 किलो मौसंबी मिली थी. इस साल एक पेड़ पर केवल तीन किलो फल हैं. किसी-किसी पेड़ पर ज़्यादा से ज़्यादा सात से आठ किलो मौसंबी दिखाई दे रही है."
महाऑरेंज के निदेशक मनोज जवंजाल को डर है कि अगर बाग़ सूख गए तो किसान 15 से 20 साल पीछे चला जाएगा. वह कहते हैं, "कुओं में जितना पानी आना चाहिए, उतना नहीं आ रहा है. अभी हम फ़रवरी तक बाग़ों को बचा सकते हैं. फ़रवरी तक बाग़ों को कुछ नहीं होगा. असली समस्या उसके बाद शुरू होगी."
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