
सऊदी अरब में एक महिला समेत दो बांग्लादेशी नागरिकों को मौत की सज़ा दिए जाने की ख़बर के बाद महिला कामगारों की सुरक्षा को लेकर चर्चा तेज़ हो गई है।
सऊदी अरब में दो बांग्लादेशी नागरिकों को मौत की सज़ा मिलने के बाद बांग्लादेशी महिला कामगारों की सुरक्षा और प्रताड़ना के मुद्दों पर तीखी प्रतिक्रिया और चिंताएं सामने आई हैं।
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सऊदी अरब और बांग्लादेश के बीच 2015 में घरेलू कामगारों को लेकर समझौता हुआ था, जिसके तहत बड़ी संख्या में महिलाएं वहां जाती हैं।
सऊदी अरब में एक महिला समेत दो बांग्लादेशी नागरिकों को मौत की सज़ा दिए जाने की ख़बर पर बांग्लादेश में तीखी प्रतिक्रिया हुई है.
इस बीच, वहां काम करने वाली बांग्लादेशी महिला कामगारों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई है.
पिछले दो साल में बांग्लादेश से विदेशों में काम करने गईं ज़्यादातर महिला कामगारों की एक बड़ी संख्या सऊदी अरब में है. इसके बाद जॉर्डन का नंबर आता है.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, जनवरी 2024 से इस साल अक्तूबर के मध्य तक बांग्लादेश से 1 लाख 72 हज़ार से ज़्यादा महिला कामगार विदेश गई हैं. इनमें से क़रीब 1 लाख 20 हज़ार महिलाएं सऊदी अरब गईं.
यह भी देखा गया है कि इस साल सितंबर से अब तक 1,500 से ज़्यादा महिला कामगार अपने देश लौट चुकी हैं. इनमें से क़रीब 1,000 महिलाएं सऊदी अरब से लौटी हैं.
लौटने वाली महिला कामगारों के साथ काम करने वाले संगठनों का कहना है कि शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना, वेतन न मिलना या पूरा वेतन न मिलना और यौन उत्पीड़न ऐसे प्रमुख कारण हैं, जिनकी वजह से ज़्यादातर महिला कामगारों को वापस लौटना पड़ता है.
ऐसे ही एक संगठन माइग्रेंट वर्कर्स डेवलपमेंट प्रोग्राम (ओकेएपी) के अध्यक्ष शाकिरुल इस्लाम का कहना है कि हर साल देशभर से कितनी महिलाओं को विदेश से मजबूर होकर लौटना पड़ता है, इसकी पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं है.
उन्होंने बीबीसी बांग्ला से कहा, "पिछले साल जुलाई में लौटने वाली महिलाओं पर किए गए एक अध्ययन में हमने पाया कि 90 फ़ीसदी महिलाएं शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना की वजह से लौटी थीं."
सऊदी अरब में बांग्लादेश के पूर्व राजदूत ग़ुलाम मसीह का कहना है कि घरेलू कामगारों को लेकर सऊदी अरब और बांग्लादेश के बीच एक दशक पहले हुए समझौते में उनकी सुरक्षा के मुद्दे पर ठीक से ध्यान नहीं दिया गया था.
इन मुद्दों पर सवाल पूछे जाने पर बांग्लादेश के माइग्रेंट वेलफ़ेयर मिनिस्ट्री के एक अधिकारी ने सिर्फ़ इतना कहा कि इस विषय पर सऊदी अधिकारियों के साथ नियमित रूप से बातचीत की जा रही है.
विज़न 2030 के तहत सऊदी अधिकारियों ने कुछ साल पहले कामगारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए श्रम क़ानूनों में बदलाव किए थे.
उस समय सऊदी अरब ने कहा था कि इन बदलावों से विदेशी कामगारों को आने-जाने और नौकरी बदलने की ज़्यादा़ आज़ादी मिलेगी.
दिसंबर 2024 में सऊदी प्रेस एजेंसी ने बताया था कि सऊदी अरब ने घरेलू और अन्य कामगारों की नियुक्ति से जुड़े नियमों में बदलाव किया है.
इन नियमों के मुताबिक़, नियोक्ता कामगारों को ऐसा कोई काम करने के लिए मजबूर नहीं कर सकते, जिसका ज़िक्र उनके रोज़गार अनुबंध में नहीं है.
इसी तरह, कामगारों को किसी थर्ड पार्टी के लिए काम करने के लिए मजबूर करना या उनसे ऐसा जोखिम भरा काम कराना भी बैन है, जिससे उनकी सेहत, शारीरिक सुरक्षा या गरिमा को ख़तरा हो सकता है.
लेकिन इन नियमों के बावजूद सऊदी अरब में बांग्लादेशी महिला कामगारों के साथ प्रताड़ना के आरोप बंद नहीं हुए.
पिछले साल सरकारी समाचार एजेंसी बीएसएस ने बताया था कि बांग्लादेश ने 1976 में पहली बार सऊदी अरब में कामगार भेजने शुरू किए थे.
इसके बाद से 30 लाख से ज़्यादा बांग्लादेशी कामगार सऊदी अरब में काम कर चुके हैं. बांग्लादेश में विदेशी मुद्रा भेजने का सबसे बड़ा स्रोत सऊदी अरब है.
लेकिन पिछले दशक की शुरुआत से प्रताड़ना का सामना करने के बाद बड़ी संख्या में महिला कामगारों के स्वदेश लौटने पर व्यापक विरोध हुआ था. इसके बाद 2015 में दोनों देशों ने घरेलू कामगारों को लेकर एक समझौते पर हस्ताक्षर किए.
दो साल के कांट्रैक्ट पर काम करने वाली घरेलू महिला कामगारों को हर महीने 800 सऊदी रियाल वेतन मिलना था. इसमें यह भी कहा गया था कि घरेलू कामगार बिना किसी शुल्क के सऊदी अरब जा सकेंगी.
लेकिन लौटने वाली महिला कामगारों के हवाले से ग़ैर-सरकारी संगठनों ने दावा किया कि कई महिलाओं को उनका वेतन नहीं मिला. कुछ मामलों में वेतन मांगने पर उन्हें प्रताड़ित किया गया और फिर वापस भेज दिया गया.
रियाद और जेद्दा स्थित बांग्लादेशी दूतावासों के सूत्रों का कहना है कि ज़रूरी प्रशिक्षण और कौशल के बिना महिलाओं को बड़ी संख्या में भेजे जाने से यह संकट बढ़ा है.
सऊदी अरब में बांग्लादेश के पूर्व राजदूत ग़ुलाम मसीह का कहना है कि घरेलू कामगारों से जुड़े समझौते में उनके हितों और सुरक्षा पर ठीक से ध्यान नहीं दिया गया था.
उन्होंने बीबीसी बांग्ला से कहा, "उस समझौते में कई अहम बातें शामिल नहीं की गई थीं. इसके बाद एजेंट दूर-दराज़ के गांवों से लड़कियों को लाने लगे और बिना किसी प्रशिक्षण के उन्हें सऊदी अरब भेजने लगे. इससे संकट और जटिल हो गया. गांवों की कई सीधी-सादी लड़कियों को वहां जाकर मुश्किलों का सामना करना पड़ा. हमने उनके लिए एक सुरक्षित शेल्टर होम बनाया. कुछ समय बाद वहां बड़ी संख्या में बांग्लादेशी महिलाएं आने लगीं."
बताया जाता है कि अगस्त 2011 में इंडोनेशिया ने प्रताड़ना के मामलों के बाद महिला कामगारों को विदेश भेजना बंद कर दिया था.
इसके बाद सऊदी अरब ने महिला कामगार भेजने के लिए फ़िलीपींस, बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल की ओर रुख़ किया और उन पर दबाव बनाया.
नेपाल और श्रीलंका ने हर महीने 1,700 रियाल से कम वेतन पर कामगार भेजने से इनकार कर दिया.
दूसरी ओर, फ़िलीपींस ने सऊदी अरब के साथ समझौता किया कि उसकी महिला कामगारों को नियोक्ताओं के घरों के बजाय सऊदी कंपनियों के हॉस्टल में रखा जाएगा.
ऐसी स्थिति में सऊदी अरब के दबाव के बीच बांग्लादेश सिर्फ़ 850 रियाल मासिक वेतन पर घरेलू कामगारों की भर्ती के लिए समझौता करने पर राज़ी हो गया.
बाद में जब बांग्लादेशी महिला कामगारों के साथ प्रताड़ना का मुद्दा उठा, तो अगस्त 2019 में सऊदी अरब के तत्कालीन श्रम और सामाजिक कल्याण राज्यमंत्री ने बांग्लादेशी दूतावास के प्रतिनिधियों पर नाराज़गी जताई.
उनकी नाराज़गी की मुख्य वजह यह थी कि बांग्लादेशी कामगार अपने सऊदी नियोक्ताओं के ख़िलाफ़ शिकायत क्यों कर रही थीं और तुरंत स्वदेश लौटना क्यों चाहती थीं.
उस समय सऊदी अरब में बांग्लादेश के राजदूत रहे ग़ुलाम मसीह ने कहा, "समस्या प्रशिक्षण और भाषा के कौशल की कमी के कारण थी. उस समय सऊदी अधिकारी यही कह रहे थे. घरेलू कामगारों को भेजने से पहले हमने उन्हें वहां मिलने वाली सुविधाओं के बारे में जानकारी देने और घरों में इस्तेमाल होने वाले आधुनिक उपकरण चलाने का प्रशिक्षण देने की बात की थी. लेकिन एजेंसियों की वजह से इन बातों को कोई अहमियत नहीं मिली."
मिस्टर मसीह ने कहा, "हमने बांग्लादेशी कामगारों के लिए भी फ़िलीपींस के कामगारों की तरह हॉस्टल की व्यवस्था करने की कोशिश की. लेकिन कई वजहों से ऐसा नहीं हो सका."
इस साल 9 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट में सऊदी अरब में फ़िलीपींस की महिला कामगारों के साथ कई तरह की प्रताड़ना के मामले सामने आए.
इनमें ज़रूरत से ज़्यादा काम कराना, शोषण, अपमानजनक व्यवहार और कुछ मामलों में यौन उत्पीड़न शामिल हैं.
'एक बार उनके घरों में दाख़िल होने के बाद हम इंसान नहीं रह जाते' शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में उन 19 महिलाओं के अनुभव दर्ज किए गए, जिनके साथ प्रताड़ना हुई थी और जिनसे संगठन ने बातचीत की थी.
इनमें से ज़्यादातर महिलाएं 2023 से 2026 के बीच अपने देश लौट गई थीं.
नेपाल ने इससे पहले 1998 में सऊदी अरब में महिला कामगारों को भेजने पर प्रतिबंध लगा दिया था.
उसी साल कुवैत में प्रताड़ना का सामना करने वाली एक नेपाली घरेलू कामगार की आत्महत्या के बाद पूरे देश में व्यापक आक्रोश फैल गया था.
इसके बाद अधिकारियों ने महिलाओं के सऊदी अरब, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और क़तर जाने पर रोक लगा दी. बाद में 2022 में यह प्रतिबंध हटाया गया, लेकिन सऊदी अरब में नेपाली घरेलू कामगारों को भेजने को लेकर कोई समझौता नहीं हुआ.
बावजूद सऊदी अरब में नेपाली महिला कामगारों की बड़ी संख्या दिखाई देती है, क्योंकि नेपाली महिलाएं अलग-अलग रास्तों से घरेलू कामगार के तौर पर वहां जाती रहती हैं.
इस बीच श्रीलंकाई सरकार ने कहा है कि वो महिला घरेलू कामगारों को सऊदी अरब भेजने में दिलचस्पी नहीं रखता.
एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट पर सऊदी सरकार ने कहा कि घरेलू कामगारों को मौजूदा नियमों के तहत सुरक्षा हासिल है और प्रताड़ना से जुड़ी किसी भी शिकायत को गंभीरता से लिया जाता है और उसकी जांच की जाती है.
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