विमुक्त जनजातियां: कानूनी मुक्ति के 75 साल, सामाजिक मुक्ति अभी भी अधूरी
31 अगस्त 1952 को क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट रद्द हुआ था, लेकिन क्या आज़ाद और घुमंतू जनजातियां वास्तव में सामाजिक और मानसिक रूप से मुक्त हो पाई हैं?
Quick Look
31 अगस्त 2027 को क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के निरसन के 75 वर्ष पूरे होंगे। लेख में विमुक्त और घुमंतू जनजातियों की कानूनी मुक्ति के बावजूद जारी सामाजिक पूर्वाग्रह, संस्थागत भेदभाव और विकास की चुनौतियों पर चर्चा की गई है।
AI-generated summary
Why It Matters
1871 में ब्रिटिश सरकार ने क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट लागू किया था, जिसे 31 अगस्त 1952 को स्वतंत्र भारत में रद्द कर दिया गया।
15 अगस्त 2027 को भारत की आज़ादी के 80 साल पूरे हो जाएंगे। हालांकि, भारत में कुछ समुदायों की आज़ादी का इतिहास अलग है।
जब देश आज़ाद हुआ, संविधान लागू हुआ और नागरिकों को मौलिक अधिकार दिए गए तब भी कुछ लोग इन सबसे वंचित रहे।
लेकिन अंग्रेज़ों के क़ानून के तहत 'जन्मजात अपराधी' क़रार दी गई ख़ानाबदोश जनजातियों को इस कलंक से छुटकारा पाने के लिए पांच साल इंतज़ार करना पड़ा था।
31 अगस्त 1952 को क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट, 1871 को रद्द कर दिया गया और इन समुदायों को 'आज़ाद' (लिबरेटेड) घोषित किया गया।
इसलिए, 31 अगस्त 2027 को इस ऐतिहासिक घटना के 75 साल पूरे हो जाएंगे। हालांकि, सवाल अब भी बना हुआ है, क्या वे जनजातियां, जिन्हें कानून ने 'आज़ाद' कर दिया था, वास्तव में सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और मानसिक रूप से मुक्त हो पाई हैं?
ब्रिटिश सरकार भारत की कई घुमंतू, अर्ध-घुमंतू और पारंपरिक पेशे वाले लोगों को संदेह की नज़र से देखती थी। एक स्थायी गाँव, ज़मीन, स्थायी पता और देश में आजीविका को 'सभ्य' जीवन का मानदंड माना जाता था।
इसी पृष्ठभूमि में 1871 में क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट बनाया गया और कुछ समुदायों को सामूहिक रूप से अपराध से जोड़ दिया गया। इस क़ानून ने किसी व्यक्ति के काम के बजाय उसके जन्म को संदेह का आधार बना दिया।
आज़ादी के बाद भी इस कानून को तुरंत रद्द नहीं किया गया। क्रिमिनल ट्राइब्स लॉज (रिपील) एक्ट कानून को 31 अगस्त 1952 को रद्द किया गया था।
लेकिन कानून से बनाई गई सामाजिक छवि ख़त्म नहीं हुई। लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं कि कई समुदायों के मामले में संदेह की मानसिकता और सामाजिक पूर्वाग्रह अब भी बने हुए हैं।
आज़ादी के बाद अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए संवैधानिक सुरक्षा, आरक्षण और शैक्षणिक-आर्थिक योजनाएं विकसित की गईं।
हालांकि, आज़ाद, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों के लिए एक समान प्रशासनिक पहचान नहीं बनाई गई।
कुछ समुदाय अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की सूची में शामिल हैं। एक ही ऐतिहासिक समूह के समुदाय अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग श्रेणियों में दिखाई देते हैं।
इसलिए, भले ही 'विमुक्त जनजातियां' एक सामाजिक समूह हैं, लेकिन उनके लिए एक समान राष्ट्रीय नीति बनाना मुश्किल हो गया है।
भारत में आखिरी जातिगत जनगणना 1931 में हुई थी। इसमें आज़ाद और घुमंतू समुदायों की सटीक आबादी निर्धारित करने में आने वाली कठिनाइयों का ज़िक्र किया गया है।
जनगणना में जिन लोगों का नाम दर्ज नहीं होता है उन तक सरकार के कल्याणकारी काम नहीं पहुँच पाते। जिनके मुद्दे कम दिखाई देते हैं, उनके लिए अलग बजटीय प्रावधान मिलने की संभावना भी कम होती है।
केंद्र सरकार ने साल 2015 में प्रकाशित रेनके आयोग की सिफारिशों के सारांश में आज़ाद और घुमंतू समुदायों के वर्गीकरण का मुद्दा स्पष्ट रूप से उठाया था।
राष्ट्रीय विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजाति आयोग (इडेट) की सिफारिशों के अनुसार, केंद्र सरकार ने आगे विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदाय विकास एवं कल्याण बोर्ड (डीडब्लूबीडीएनसी) का गठन किया है।
हाल के समय में आज़ाद, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों के लिए एक महत्वपूर्ण योजना, डीएनटी के आर्थिक सशक्तीकरण की योजना (सीईईडी), शुरू की गई है।
हालांकि, यह दिशा महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे लागू करने में बड़ी बाधाएं हैं। कई योजनाओं के लिए जाति प्रमाण पत्र, स्थायी पता, बैंक खाता और अन्य दस्तावेज़ जरूरी होते हैं।
इन जनजातियों का मुद्दा सिर्फ़ ग़रीबी का नहीं है, बल्कि यह ऐतिहासिक कलंक का भी मुद्दा है।
इनकी लगातार शिकायत रही है कि अपराध होने के बाद कुछ समुदायों को शुरुआत में ही संदेह की नज़र से देखा जाता है।
पुलिस व्यवस्था, न्यायिक प्रक्रियाओं, हिरासत और जेलों में अनुभवों को लेकर पारदर्शी अध्ययन की जरूरत है।
मुक्ति सिर्फ़ 1952 में कानून को रद्द करना नहीं है। मुक्ति का मतलब समाज की सामूहिक स्मृति से 'यह व्यक्ति जन्मजात अपराधी है' की सोच को मिटाना है।
पुराने क़ानून से मुक्ति पा चुके जनजातियों के विकास के केंद्र में शिक्षा होनी चाहिए। बिना स्थायी घर वाले परिवारों के बच्चों की शिक्षा लगातार प्रभावित होती है।
31 अगस्त 2027 को इस समुदाय की मुक्ति की 75वीं वर्षगांठ पूरी होगी। इस दिन को सिर्फ याद के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्ममंथन के दिन के रूप में मनाया जाना चाहिए।
अनुसूचित जनजातियों के मुद्दे को सिर्फ किसी एक समूह के विकास के सवाल के रूप में देखना बड़ी गलती है। यह भारतीय लोकतंत्र की अच्छाइयों का सवाल है।
इसलिए 31 अगस्त 2027 को केवल 'मुक्ति दिवस' के रूप में मनाने के बजाय इसे 'मुक्ति की अधूरी यात्रा के राष्ट्रीय पुनर्विचार दिवस' के रूप में देखने की जरूरत है।
क्योंकि मुक्ति का अंतिम अर्थ कानून को ख़त्म करना नहीं है, बल्कि मानवीय गरिमा को बहाल करना है।
Open Questions
- विमुक्त जनजातियों की सटीक आबादी कितनी है?
- संस्थागत पूर्वाग्रह को खत्म करने के लिए ठोस प्रशासनिक कदम क्या होंगे?


