अल्ज़ाइमर्स की शुरुआत युवावस्था से ही हो सकती है, शोधकर्ता जीवनशैली पर ज़ोर दे रहे हैं
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अल्ज़ाइमर्स के लक्षण दिखने से 10-20 साल पहले दिमाग में बदलाव शुरू हो सकते हैं, इसलिए युवावस्था से ही व्यायाम, संतुलित आहार, मानसिक गतिविधियों और सामाजिक संबंधों पर ध्यान देना ज़रूरी है ताकि दिमाग की सेहत बनाए रखी जा सके।
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अल्ज़ाइमर्स डिमेंशिया का सबसे आम प्रकार है और दुनिया भर में डिमेंशिया के ज़्यादातर मामले इसकी वजह से होते हैं। लक्षण दिखने से सालों पहले दिमाग में बदलाव शुरू हो सकते हैं।
Author, ओंकार करंबेलकर
पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता
प्रकाशित 2 मिनट पहले
पढ़ने का समय: 11 मिनट
अल्ज़ाइमर्स का नाम सुनते ही आम तौर पर किसी ऐसे बुज़ुर्ग व्यक्ति का ख़याल आता है, जिसकी याददाश्त धीरे-धीरे कम हो रही हो. लेकिन क्या यह बीमारी केवल बुढ़ापे में होती है या इसकी शुरुआत कई साल पहले ही हो जाती है? दुनिया भर के शोधकर्ता इसी सवाल का जवाब तलाश रहे हैं.
शोध बताते हैं कि अल्ज़ाइमर्स के लक्षण दिखाई देने से 10 से 20 साल पहले ही मरीज़ के दिमाग़ में बदलाव शुरू हो सकते हैं. इसलिए अब इलाज के साथ-साथ इस बात पर भी ध्यान दिया जा रहा है कि कम उम्र और बीच की उम्र में दिमाग़ की सेहत का ख़याल कैसे रखा जाए.
सबसे पहले डिमेंशिया और अल्ज़ाइमर्स का फ़र्क समझना ज़रूरी है. डिमेंशिया में व्यक्ति की याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता और रोज़ के कामकाज पर असर पड़ने लगता है. अल्ज़ाइमर्स, डिमेंशिया का सबसे आम प्रकार है. दुनिया भर में डिमेंशिया के ज़्यादातर मामले अल्ज़ाइमर्स की वजह से होते हैं.
नई भाषा सीखना, नियमित व्यायाम करना, ख़ास तरह का खान-पान अपनाना या शरीर में विटामिन डी का सही स्तर बनाए रखना, क्या इन चीज़ों का आगे चलकर हमारी याददाश्त पर असर पड़ता है? कई शोधों में इस सवाल का जवाब तलाशा जा रहा है.
दिमाग़ में अल्ज़ाइमर्स से जुड़े बदलाव शुरू कब होते हैं?
इन शोधों से अभी कोई पक्का नतीजा नहीं निकला है. लेकिन इतना ज़रूर पता चल रहा है कि दिमाग़ की सेहत का ख़याल रखने के लिए बुढ़ापे का इंतज़ार नहीं करना चाहिए. इसकी शुरुआत युवावस्था से ही हो जानी चाहिए.
इसलिए शोधकर्ता अब दवाओं के साथ-साथ व्यायाम, खान-पान, पढ़ाई-लिखाई और जीवनशैली से जुड़ी दूसरी बातों पर भी ध्यान दे रहे हैं.
इससे जुड़ा एक अहम शब्द है 'कॉग्निटिव रिज़र्व'. आसान भाषा में कहें तो इसका मतलब है, कुछ नुक़सान होने के बाद भी दिमाग़ की काम करते रहने की क्षमता. कुछ लोगों के दिमाग़ में अल्ज़ाइमर्स से जुड़े बदलाव शुरू हो जाते हैं, लेकिन उनकी याददाश्त कम होने के लक्षण काफ़ी देर से दिखाई देते हैं.
शोधकर्ताओं का मानना है कि लगातार सीखने, पढ़ने, नए हुनर सीखने और लोगों से जुड़े रहने से दिमाग़ की कोशिकाओं के बीच का संपर्क मज़बूत हो सकता है. इससे दिमाग़ के किसी हिस्से को नुक़सान होने पर भी वह दूसरे तरीक़ों से अपना काम जारी रख सकता है.
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शोध में यह भी पता चला है कि व्यायाम का दिमाग़ की सेहत से गहरा संबंध हो सकता है. हाल के अध्ययनों में जीपीएलडी1 नाम के एक प्रोटीन पर ध्यान दिया गया है.
जानवरों पर हुए शोध में पाया गया है कि व्यायाम के बाद बनने वाला यह प्रोटीन 'ब्लड-ब्रेन बैरियर' को ठीक से काम करने में मदद कर सकता है. यह बैरियर दिमाग़ को नुक़सान पहुंचाने वाली चीज़ों से बचाता है.
शोधकर्ताओं के मुताबिक़, इससे याददाश्त बनाए रखने और बढ़ती उम्र के साथ दिमाग़ में होने वाले कुछ बदलावों को कम करने में मदद मिल सकती है.
खान-पान और व्यायाम का क्या संबंध है?
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शोधकर्ता यह भी जानने की कोशिश कर रहे हैं कि व्यायाम, खान-पान और पोषण का दिमाग़ की सेहत से क्या संबंध है.
कुछ शोधकर्ताओं ने 'माइंड डाइट' पर ख़ास ध्यान दिया है. इसे मेडिटेरेनियन और डीएएसएच डाइट को मिलाकर तैयार किया गया है. इसमें हरी पत्तेदार सब्ज़ियां, बेरीज़, सूखे मेवे, मछली और ऑलिव ऑयल शामिल होते हैं.
कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि माइंड डाइट लेने वाले लोगों में अल्ज़ाइमर्स का ख़तरा कम हो सकता है. हालांकि, इस पर अभी और शोध किया जा रहा है.
हाल के वर्षों में विटामिन डी पर भी चर्चा हो रही है. साल 2026 में प्रकाशित एक लंबे अध्ययन में पाया गया कि मिड-एज में जिन लोगों के शरीर में विटामिन डी का स्तर ज़्यादा था, उनमें बाद में अल्ज़ाइमर्स से जुड़े 'टाऊ' प्रोटीन की मात्रा कम मिली.
लेकिन शोधकर्ताओं ने साफ़ किया है कि इससे केवल विटामिन डी और टाऊ प्रोटीन के बीच एक संबंध का पता चला है. यह साबित नहीं हुआ है कि विटामिन डी के कारण ही टाऊ प्रोटीन कम हुआ. इसलिए अभी यह नहीं कहा जा सकता कि विटामिन डी सीधे तौर पर अल्ज़ाइमर्स को रोकता है.
इन सभी शोधों से एक बात सामने आती है. अल्ज़ाइमर्स का कोई पक्का इलाज अभी नहीं है, लेकिन कम और बीच की उम्र में अपनाई गई आदतें लंबे समय तक दिमाग़ की सेहत पर असर डाल सकती हैं.
कभी-कभी भूलने और अल्ज़ाइमर्स में क्या फ़र्क है?
कई लोगों को अल्ज़ाइमर्स के बारे में पूरी जानकारी नहीं होती. अगर कोई कभी-कभी कुछ भूल जाता है, तो तुरंत यह नहीं मान लेना चाहिए कि उसे अल्ज़ाइमर्स है. इसकी सही जानकारी डॉक्टर जांच के बाद ही दे सकते हैं.
कभी-कभी किसी का नाम भूल जाना, चाबी कहां रखी है यह याद करने में थोड़ा समय लगना या कोई शब्द याद न आना बढ़ती उम्र के साथ आम बात हो सकती है. इसका मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को अल्ज़ाइमर्स है.
लेकिन याददाश्त से जुड़ी परेशानी जब रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर असर डालने लगे, तब इस पर ध्यान देना ज़रूरी है. जैसे ज़रूरी बातें बार-बार भूलना, जानी-पहचानी जगह पर रास्ता भटक जाना, रोज़ के काम करने में परेशानी होना या फ़ैसले लेने की क्षमता और व्यवहार में बदलाव आना.
नवी मुंबई के फ़ोर्टिस हीरानंदानी अस्पताल में कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. जयेंद्र यादव ने अल्ज़ाइमर्स से जुड़े कुछ सवालों के जवाब दिए.
सवाल: याददाश्त से जुड़ी परेशानी होने पर डॉक्टर से जांच कब करानी चाहिए?
डॉ. जयेंद्र यादव: अगर याददाश्त में बदलाव लगातार हो रहे हों, समय के साथ बढ़ रहे हों या रोज़ के कामकाज पर असर डाल रहे हों, तो डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए.
एक ही सवाल बार-बार पूछना, पैसों के लेन-देन या दवाओं का हिसाब रखने में अचानक परेशानी होना, समय या जगह को लेकर उलझन होना, स्वभाव बदलना या पहले आसानी से होने वाले काम मुश्किल लगने लगना कुछ अहम लक्षण हैं.
समय पर जांच कराने से पता चल सकता है कि ये बदलाव अल्ज़ाइमर्स की वजह से हो रहे हैं या इनके पीछे कोई दूसरी बीमारी, तनाव, नींद की समस्या या विटामिन की कमी है.
सवाल: क्या अल्ज़ाइमर्स मुख्य रूप से आनुवंशिक बीमारी है या जीवनशैली का भी इस पर असर पड़ता है?
डॉ. जयेंद्र यादव: आनुवंशिक कारणों का कुछ असर हो सकता है. लेकिन अल्ज़ाइमर्स केवल जीन की वजह से होने वाली बीमारी नहीं है.
आपकी जीवनशैली, दिल की सेहत, नियमित शारीरिक गतिविधियां, नींद, खान-पान, पढ़ाई-लिखाई और लोगों से मेलजोल, इन सभी का दिमाग़ की सेहत पर असर पड़ता है. डायबिटीज़ और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों को क़ाबू में रखना भी ज़रूरी है.
दिल स्वस्थ रहने से दिमाग़ तक ख़ून सही तरीक़े से पहुंचता है. इसलिए दिल की सेहत का ख़याल रखना दिमाग़ की सेहत के लिए भी ज़रूरी है.
सवाल: अगर माता-पिता, दादा-दादी या नाना-नानी को अल्ज़ाइमर्स हो, तो बच्चों या नाती-पोतों में इसका ख़तरा कितना बढ़ जाता है?
डॉ. जयेंद्र यादव: अगर परिवार के किसी क़रीबी सदस्य को अल्ज़ाइमर्स है, तो परिवार के दूसरे सदस्यों में इसका ख़तरा कुछ बढ़ सकता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें अल्ज़ाइमर्स होगा ही.
ज़्यादातर मामलों में आनुवंशिक कारण, आसपास का माहौल और जीवनशैली से जुड़ी बातें मिलकर असर डालती हैं.
सवाल: अल्ज़ाइमर्स को लेकर आम ग़लतफ़हमियां क्या हैं?
डॉ. जयेंद्र यादव: सबसे आम ग़लतफ़हमी यह है कि अल्ज़ाइमर्स केवल बुज़ुर्गों को होता है. उम्र इसका एक अहम कारण है, लेकिन कुछ दुर्लभ मामलों में युवाओं को भी यह बीमारी हो सकती है.
एक और ग़लतफ़हमी यह है कि अल्ज़ाइमर्स का पता चलने के बाद कोई उम्मीद नहीं बचती.
सच यह है कि अभी इसका पूरा इलाज उपलब्ध नहीं है. लेकिन समय पर बीमारी का पता चलने, सही इलाज, जीवनशैली में बदलाव और ज़रूरी मदद से इसके लक्षणों को संभाला जा सकता है. इससे मरीज़ की ज़िंदगी बेहतर हो सकती है.
यह समझना भी ज़रूरी है कि अल्ज़ाइमर्स बढ़ती उम्र का सामान्य हिस्सा नहीं है. यह एक बीमारी है, जिसके लिए इलाज और देखभाल की ज़रूरत होती है.
सवाल: क्या बीमारी का पता चलने से कई साल पहले इसके शुरुआती लक्षण दिखाई दे सकते हैं?
डॉ. जयेंद्र यादव: हां. शुरुआती लक्षण अक्सर बहुत हल्के होते हैं और बीमारी का पता चलने से कई साल पहले दिखाई दे सकते हैं.
हाल में हुई बातचीत बार-बार भूलना, एक ही सवाल बार-बार पूछना, योजना बनाने या समस्याएं सुलझाने में परेशानी होना, स्वभाव या मन की स्थिति में बदलाव आना और पहले पसंद आने वाली चीज़ों में दिलचस्पी कम होना शुरुआती लक्षण हो सकते हैं.
लेकिन कभी-कभी कुछ भूल जाने का मतलब यह नहीं है कि किसी को अल्ज़ाइमर्स है.
सवाल: सुनने की क्षमता कम होने और डिमेंशिया के ख़तरे के बीच क्या संबंध है?
डॉ. जयेंद्र यादव: सुनने की ऐसी समस्या जिसका इलाज न कराया गया हो, उसका संबंध सोचने-समझने की क्षमता में कमी और डिमेंशिया के बढ़ते ख़तरे से पाया गया है.
जब किसी व्यक्ति को ठीक से सुनाई नहीं देता, तो आवाज़ और बातचीत समझने के लिए उसके दिमाग़ को ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है.
इससे समय के साथ दिमाग़ पर दबाव बढ़ सकता है. दिमाग़ तक पहुंचने वाली और वहां समझी जाने वाली जानकारी भी कम हो सकती है.
इसलिए सुनने की समस्या का समय पर पता लगाकर उसका इलाज कराना ज़रूरी है. इससे बातचीत करने में आसानी हो सकती है, दिमाग़ सक्रिय रह सकता है और सोचने-समझने की क्षमता बनाए रखने में मदद मिल सकती है.
सवाल: दिमाग़ की सेहत के बारे में कौन-सी बात जानना सबसे ज़रूरी है?
डॉ. जयेंद्र यादव: दिमाग़ की सेहत का ख़याल पूरी ज़िंदगी रखना चाहिए. युवावस्था में लिए गए फ़ैसलों और अपनाई गई आदतों का असर बढ़ती उम्र में दिमाग़ पर दिखाई देता है.
नियमित व्यायाम करना, तनाव को संभालना, अच्छी नींद लेना, दिल की सेहत का ख़याल रखना, लगातार सीखते रहना और लोगों से अच्छे रिश्ते बनाए रखना दिमाग़ की सेहत के लिए ज़रूरी है.
अल्ज़ाइमर्स को पूरी तरह रोकने का कोई पक्का तरीक़ा नहीं है. लेकिन बचपन या युवावस्था से अच्छी आदतें अपनाने पर सोचने-समझने की क्षमता कम होने का ख़तरा घटाया जा सकता है.
युवाओं की लाइफ़स्टाइल और अल्ज़ाइमर्स
अल्ज़ाइमर्स को आम तौर पर बुढ़ापे से जोड़कर देखा जाता है. लेकिन दिमाग़ की सेहत और आगे चलकर याददाश्त कितनी अच्छी रहेगी, इसकी नींव कम उम्र से ही पड़ने लगती है.
इसलिए 20 से 30 साल की उम्र के युवाओं को भी अपने दिमाग़ की सेहत का ध्यान रखना चाहिए.
नवी मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल के कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. यतीन सागवेकर ने इस बारे में जानकारी दी.
उन्होंने बीबीसी मराठी से कहा, "याददाश्त कम होने या डिमेंशिया का ख़तरा अचानक नहीं बढ़ता. युवावस्था की आदतों, लाइफ़स्टाइल और सेहत से जुड़े फ़ैसलों का असर कई साल बाद दिख सकता है. इसलिए कम उम्र से ही अच्छी लाइफ़स्टाइल अपनाने से बढ़ती उम्र में दिमाग़ को स्वस्थ रखने में मदद मिल सकती है."
उन्होंने कहा, "शोध से पता चलता है कि डिमेंशिया का ख़तरा बढ़ाने वाली कई चीज़ें जीवन के शुरुआती दौर से ही असर डालने लगती हैं. इसलिए नियमित व्यायाम, संतुलित खाना, अच्छी नींद और सही वज़न बनाए रखना ज़रूरी है. ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल को क़ाबू में रखने से भी लंबे समय तक दिमाग़ की सेहत अच्छी रखने में मदद मिल सकती है."
शारीरिक गतिविधि की कमी, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज़, मोटापा, धूम्रपान, ज़्यादा शराब पीना, ख़ून में चर्बी बढ़ना, डिप्रेशन, अकेलापन और सुनने में परेशानी को डिमेंशिया के बढ़ते ख़तरे से जोड़ा जाता है.
अगर ब्लड प्रेशर, डायबिटीज़, मोटापा और कोलेस्ट्रॉल क़ाबू में न रहें, तो इसका असर ख़ून की नलियों और ख़ून के बहाव पर पड़ सकता है.
इससे दिमाग़ तक ख़ून पहुंचने में भी परेशानी हो सकती है. आगे चलकर इससे याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता कमज़ोर होने का ख़तरा बढ़ सकता है.
दिमाग़ की सेहत के लिए व्यायाम भी बहुत ज़रूरी है. नियमित व्यायाम से शरीर में ख़ून का बहाव बेहतर होता है. शरीर में खाना ऊर्जा में बदलने की प्रक्रिया बेहतर रहती है. सूजन कम करने में भी मदद मिलती है. इसके अलावा, दिमाग़ की कोशिकाओं के बीच संपर्क बेहतर हो सकता है.
एरोबिक एक्सरसाइज़, ताक़त बढ़ाने वाली एक्सरसाइज़ और पूरे दिन एक्टिव रहने की आदत, इन सभी से दिमाग़ की सेहत को फ़ायदा हो सकता है.
दिमाग़ को स्वस्थ रखने के लिए अच्छी नींद भी ज़रूरी है. पर्याप्त और अच्छी नींद याददाश्त को मज़बूत करने में मदद करती है. इससे भावनाओं को संभालना और रोज़मर्रा के काम ठीक से करना भी आसान होता है.
दिमाग़ को सक्रिय रखने के लिए क्या करना चाहिए?
इस सवाल के जवाब में डॉ. यतीन सागवेकर कहते हैं, "नई भाषा सीखना, किताबें पढ़ना, कोई वाद्य यंत्र बजाना या कोई नया हुनर सीखना दिमाग़ के लिए एक चुनौती है. ऐसी गतिविधियां दिमाग़ को एक्टिव रखती हैं.
"इससे दिमाग़ के ठीक से काम करते रहने की क्षमता बेहतर हो सकती है. हालांकि, यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि इससे अल्ज़ाइमर्स से पूरी तरह बचा जा सकता है या नहीं. लेकिन दिमाग़ को लगातार नई चीज़ें सीखने की चुनौती देना फ़ायदेमंद हो सकता है."
सिर्फ़ शरीर और दिमाग़ का ख़याल रखना ही काफ़ी नहीं है. डॉ. यतीन सागवेकर रिश्तों और लोगों के साथ मेलजोल को भी अहम मानते हैं.
वे कहते हैं, "लोगों से मेलजोल और अच्छे रिश्तों का भी दिमाग़ की सेहत पर अच्छा असर पड़ता है. परिवार और दोस्तों के साथ जुड़े रहना, लोगों से बातचीत करना और साथ मिलकर काम करने जैसी गतिविधियों में हिस्सा लेना मानसिक सेहत के लिए अच्छा है. इससे अकेलापन भी कम होता है. मज़बूत सामाजिक रिश्तों को उम्र बढ़ने के साथ स्वस्थ रहने के लिए अहम माना जाता है."
युवाओं को अभी से क्या करना चाहिए?
डॉ. सागवेकर कहते हैं, "युवावस्था से ही कुछ आसान आदतें अपनाकर आगे चलकर दिमाग़ की सेहत का ख़याल रखा जा सकता है.
"नियमित व्यायाम करना, दिल को स्वस्थ रखना, धूम्रपान और ज़्यादा शराब से बचना, अच्छी नींद लेना, लोगों से जुड़े रहना और लगातार कुछ नया सीखते रहना दिमाग़ को स्वस्थ रखने के अहम तरीक़े माने जाते हैं.
"अल्ज़ाइमर्स के बारे में सिर्फ़ बुढ़ापे में ही नहीं सोचना चाहिए. दिमाग़ की सेहत का ख़याल युवावस्था से ही रखना शुरू कर देना चाहिए. यही इसका सबसे अहम संदेश है."
अगर आप अपनी लाइफ़स्टाइल या खान-पान में कोई बड़ा बदलाव करना चाहते हैं, दवा लेना चाहते हैं या व्यायाम शुरू करना चाहते हैं, तो डॉक्टर या सही ट्रेनर की मदद लेना ज़रूरी है.
अपने शरीर और लक्षणों की सही जांच कराने के बाद ही डॉक्टर की सलाह के मुताबिक़ लाइफ़स्टाइल में बदलाव करें. डॉक्टर की सलाह के बिना ख़ुद इलाज करना ख़तरनाक हो सकता है.
What to Watch
AI outlook — possibilities, not facts
भविष्य में अल्ज़ाइमers के इलाज में दवाओं के साथ जीवनशैली में बदलाव को महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जा सकता है।
Likely · Within months
युवावस्था से ही दिमाग की सेहत पर ध्यान देने वाले अभियान बढ़ सकते हैं।
Possible · Within years
Open Questions
- क्या विटामिन डी की पूरक खुराक अल्ज़ाइमर्स को रोकने में कारगर साबित हो सकती है?
- माइंड डाइट का अल्ज़ाइमers पर लंबे समय तक क्या प्रभाव पड़ता है?
- जीपीएलडी1 प्रोटीन का मानव दिमाग पर क्या确切 प्रभाव है?





