मोरल पुलिसिंग क्या है और यह क्यों विवादों में रहती है?
बिहार के जमुई में नाबालिग लड़की के साथ हुई घटना के बाद मोरल पुलिसिंग, इसके कानूनी पहलुओं और सामाजिक प्रभाव पर एक विस्तृत विश्लेषण।
Quick Look
बिहार के जमुई में नाबालिग के साथ यौन हिंसा के बाद 'मोरल पुलिसिंग' पर बहस छिड़ी है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय कानून में इसकी कोई मान्यता नहीं है और यह संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
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Why It Matters
बिहार के जमुई में एक नाबालिग लड़की के साथ हुई यौन हिंसा का वीडियो वायरल होने के बाद मोरल पुलिसिंग पर बहस शुरू हुई है।
बिहार के जमुई में एक नाबालिग लड़की के साथ हुई यौन हिंसा के बाद एक बार फिर से 'मोरल पुलिसिंग' पर बहस छिड़ गई है।
पुलिस ने इस मामले में पॉक्सो एक्ट और भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है।
इस घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिसके बाद कई नेताओं की भी इस पर प्रतिक्रिया आई। वायरल वीडियो पर समाचार चैनल से बातचीत के दौरान बिहार की खेल मंत्री और जमुई से विधायक श्रेयसी सिंह के बयान को लेकर भी विवाद हुआ। उन्होंने अपने बयान में कहा था, "मोरल पुलिसिंग भी सलीके और शालीन तरीके से की जा सकती है." हालांकि, बाद में इस बयान के वायरल होने के बाद इस मुद्दे पर उन्होंने फिर बात की और कहा कि उनके बयान की पूरी क्लिप नहीं चलाई गई थी।
इस घटना के बाद से ये सवाल उठ रहे हैं कि आख़िर 'मोरल पुलिसिंग' क्या है? क्या इसे भारतीय क़ानून में कोई मान्यता प्राप्त है? इससे किन मौलिक अधिकारों पर असर पड़ सकता है?
'मोरल पुलिसिंग' क्या है?
भारतीय क़ानून में 'मोरल पुलिसिंग' नाम का कोई अलग अपराध या क़ानूनी अधिकार नहीं है। आम तौर पर इस शब्द का इस्तेमाल उन कोशिशों के लिए किया जाता है, जिनमें कोई व्यक्ति या समूह अपने बनाए नैतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक या सामाजिक नियम दूसरों पर लागू करने की कोशिश करता है। इसमें कपड़ों, दोस्ती, प्रेम संबंधों, धर्म, जाति, लिंग या किसी व्यक्ति के किसी खास जगह पर जाने को लेकर आपत्ति शामिल हो सकती है।
इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ लॉ मैनेजमेंट एंड ह्यूमैनिटीज़ में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक़, "मोरल पुलिसिंग" का मतलब पुलिस, सतर्कता (विजिलैंटी) समूहों या राजनीतिक रूप से प्रेरित गैर-राज्य तत्वों के ऐसी मनमानी निगरानी और दख़लअंदाज़ी करने से है, जिनमें वे स्वयं को संस्कृति, धर्म, जाति, नस्लीय पहचान और लैंगिक भूमिकाओं का संरक्षक मानते हुए कथित रूप से पारंपरिक भारतीय समाज की पवित्रता को विदेशी प्रभावों से बचाने का दावा करते हैं।"
इसकी क़ानूनी मान्यता क्या है?
लुधियाना जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड की लॉ मेंबर डॉ. कमलजीत कौर के मुताबिक़, भारतीय क़ानून में 'मोरल पुलिसिंग' की कोई क़ानूनी मान्यता नहीं है। वह कहती हैं कि निजी व्यक्तियों या विजिलैंटी समूहों के पास किसी व्यक्ति के कपड़ों, दोस्ती, रिश्तों, संगत या किसी स्थान पर मौजूदगी को लेकर अपनी नैतिक सोच लागू करने का कोई क़ानूनी अधिकार नहीं है।
यह समाज में आम कैसे हुई?
चंडीगढ़ के महर चंद महाजन डीएवी कॉलेज फॉर विमेन में समाजशास्त्र के वरिष्ठ सहायक प्रोफ़ेसर डॉ. बिंदु डोगरा के मुताबिक़, "मोरल पुलिसिंग कोई नया व्यवहार नहीं है." वह इसे समाज की 'कलेक्टिव कॉन्शियसनेस' (सामूहिक चेतना) से जोड़ते हैं। उनके मुताबिक, "हर समाज में कुछ ऐसे नियम और मूल्य बन जाते हैं, जो यह तय करते हैं कि कौन-सा व्यवहार सही है और कौन-सा गलत." वो कहते हैं, "ये नियम धर्म, जाति, आर्थिक वर्ग या लिंग से जुड़े हो सकते हैं. समस्या तब पैदा होती है, जब लोग यह मानने लगते हैं कि वे इन नियमों के 'रखवाले' हैं और उन्हें अपने तरीके से लागू करना भी उनकी ज़िम्मेदारी है."
'मोरल पुलिसिंग की शुरुआत घर से भी हो सकती है'
डॉ. बिंदु डोगरा के मुताबिक़, मोरल पुलिसिंग सिर्फ़ सड़कों पर अजनबी ही नहीं करते, बल्कि यह परिवार और सामाजिक परवरिश में भी मौजूद हो सकती है। वह कहते हैं कि ख़ासतौर पर लड़कियों को छोटी उम्र से ही यह बताया जाने लगता है कि उन्हें क्या पहनना है, कैसे व्यवहार करना है और किन लोगों के साथ संबंध रखने हैं। परिवार के भीतर यह नियंत्रण अक्सर इसलिए नज़र नहीं आता क्योंकि परिवार को व्यक्ति की सहायता प्रणाली के रूप में देखा जाता है।
'मोरल पुलिसिंग' से कौन-से मौलिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं?
डॉ. कमलजीत कौर के मुताबिक़, मोरल पुलिसिंग के विभिन्न रूप संविधान में दिए गए कई मौलिक अधिकारों को प्रभावित कर सकते हैं।
आर्टिकल 14: बराबरी का अधिकार। भारतीय संविधान का आर्टिकल 14 क़ानून के समक्ष समानता और क़ानून के समान संरक्षण की गारंटी देता है।
आर्टिकल 19: बोलने, आने-जाने और इकट्ठा होने की स्वतंत्रता। आर्टिकल 19 नागरिकों को बोलने और विचार प्रकट करने, शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने, संगठन बनाने और देश में स्वतंत्र रूप से आने-जाने समेत कई स्वतंत्रताएं देता है।
आर्टिकल 21: जीवन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गरिमा और निजता। आर्टिकल 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
महिलाओं को क्यों ज़्यादा निशाना बनाया जाता है?
डॉ. बिंदु डोगरा के मुताबिक़, मोरल पुलिसिंग का एक बड़ा हिस्सा लैंगिक मानदंडों से जुड़ा हुआ है। महिलाओं को ऐतिहासिक रूप से कपड़ों, आने-जाने, रिश्तों और यौन व्यवहार के आधार पर अधिक नियंत्रित किया गया है।
समाज का कितना असर?
सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी के मुताबिक़, मोरल पुलिसिंग ऐसे समाज में बढ़ती है जहां दमनकारी और कट्टरपंथी ताक़तों का प्रभाव बढ़ जाता है। वह इसे भारत में महिलाओं के ख़िलाफ़ हमलों और मोरल पुलिसिंग में वृद्धि को मौजूदा राजनीतिक माहौल से भी जोड़ती हैं।
इसका मानसिक प्रभाव क्या हो सकता है?
मोरल पुलिसिंग का शिकार होने वाले व्यक्ति पर इसका मनोवैज्ञानिक असर भी हो सकता है। शबनम हाशमी के मुताबिक़, लगातार बेइज़्ज़ती, धमकी और सामाजिक समर्थन की कमी किसी व्यक्ति के लिए गंभीर मानसिक संकट का कारण बन सकती है।
कोई 'मोरल पुलिसिंग' का निशाना बने तो क्या करे?
सबसे पहले अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करना और ज़रूरत पड़ने पर पुलिस की मदद लेना ज़रूरी है। डॉ. कमलजीत कौर के मुताबिक़, अगर किसी घटना में ऐसा अपराध सामने आता है जिसमें एफ़आईआर दर्ज की जा सकती है, तो संबंधित व्यक्ति पुलिस के पास शिकायत कर सकता है। अगर संबंधित लड़का या लड़की नाबालिग है और ये मामला पॉक्सो एक्ट के दायरे में आता है तो बच्चे से पूछताछ और उसका बयान दर्ज करने की प्रक्रिया बाल-अनुकूल होनी चाहिए।
'मोरल पुलिसिंग' को रोकने के लिए क्या किया जा सकता है?
डॉ. डोगरा के मुताबिक़, ऐसे मामलों को सिर्फ लैंगिकता या सामाजिक नैतिकता के नज़रिए से नहीं, बल्कि क़ानून और अधिकारों के नज़रिए से देखा जाना चाहिए। पुलिस की भूमिका भी महत्वपूर्ण है और सर्वाइवर में यह भरोसा पैदा करना ज़रूरी है कि वे अपने संस्थान या पुलिस को इसकी जानकारी दे सकें।
Open Questions
- जमुई मामले में आरोपियों के खिलाफ क्या ठोस कानूनी कार्रवाई हुई?
- क्या स्थानीय प्रशासन ने मोरल पुलिसिंग रोकने के लिए कोई विशेष कदम उठाए हैं?




