
दिल्ली में 'लहरा दो तिरंगा' मार्च से पहले हिरासत में लिए गए अभिजीत दीपके को शनिवार को रिहा कर दिया गया, जबकि सौरव दास और आशुतोष रांका न्यायिक हिरासत में हैं।
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दीपके को दिल्ली पुलिस ने शनिवार को रिहा कर दिया। उन्हें शुक्रवार को 'लहरा दो तिरंगा' मार्च से पहले प्रिवेंटिव डिटेंशन में लिया गया था। पार्टी के अन्य नेता सौरव दास और आशुतोष रांका अभी भी न्यायिक हिरासत में हैं।
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सीजेपी ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफ़े और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर आंदोलन शुरू किया है। यह आंदोलन युवाओं और छात्रों के बीच लोकप्रिय हो रहा है।
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के फ़ाउंडर अभिजीत दीपके को शनिवार को रिहा कर दिया गया. इसकी जानकारी सीजेपी की लीगल सेल की हेड रत्ना सिंह ने बताया.
बीबीसी संवाददाता जुगल पुरोहित के मुताबिक़, सीजेपी ने कहा कि रिहाई के बाद अभिजीत दीपके वहां से चले गए.
एनसीपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अनीष गवांडे ने एक्स पर पोस्ट कर कहा, "अभिजीत को मनमाने ढंग से हिरासत में रखे जाने के 24 घंटे बाद रिहा कर दिया गया है. मुझे उम्मीद है कि सौरव और आशुतोष को भी जल्द ही तिहाड़ जेल में उनकी ग़ैरक़ानूनी हिरासत से रिहा कर दिया जाएगा."
दरअसल अभिजीत दीपके दिल्ली में अनीष के घर रुके हुए थे.
रिहाई के बाद अभिजीत दीपके की मां अनीता दीपके ने खुशी ज़ाहिर करते हुए कहा, "अब हम काफी बेहतर महसूस कर रहे हैं और राहत मिली है, क्योंकि कल से हम बहुत तनाव में थे. मेरी सास को गुज़रे अभी 10 दिन भी नहीं हुए हैं और उसके बाद हमें यह ख़बर मिली, जिससे हम बहुत परेशान हो गए थे."
दीपके ने शुक्रवार शाम को 'लहरा दो तिरंगा' मार्च का आह्वान किया था लेकिन उन्हें मार्च से पहले ही प्रिवेंटिव डिटेंशन में ले लिया गया था.
सीजेपी के दो दूसरे प्रमुख चेहरे सौरव दास और आशुतोष रांका पहले से ही न्यायिक हिरासत में हैं. उन्हें जंतर-मंतर में बिना अनुमति दाख़िल होने के मामले में पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया है.
शनिवार को दोपहर अभिजीत दीपके को कनॉट प्लेस के पास मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन लाया गया. वहां उन्हें स्पेशल एग्ज़ीक्युटिव मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया.
बार एंड बेंच के मुताबिक़, एसईएम कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ ज़मानत दी.
लाइव लॉ के अनुसार, दीपके को बॉन्ड की शर्तें माननी होंगी. इनमें से एक शर्त ये भी है कि उन्हें एक साल तक शांति बनाए रखनी होगी.
शनिवार शाम को ही वापमंथी छात्र संगठन आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा को भी हिरासत में ले लिया गया था लेकिन उन्हें शनिवार तड़के रिहा कर दिया गया.
मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन के बाहर शनिवार को उस समय तनाव की स्थिति पैदा हो गई जब वकीलों और सुरक्षा बलों के बीच बहस होने लगी.
इस बीच रत्ना सिंह ने सुनवाई में देरी पर सवाल उठाते हुए एक्स पर लिखा, "सुनवाई दोपहर 12 बजे होनी थी. लेकिन शाम 3.38 बजे तक इसके कोई संकेत नहीं मिल रहे. अगर यह जानबूझकर नहीं है तो क्या है."
मौके पर मौजूद बीबीसी संवाददाता जुगल पुरोहित ने बताया था कि हिरासत में लिए गए लोगों से मिलने या उनकी पैरवी करने की अनुमति वकीलों को नहीं देने की वजह से पुलिस स्टेशन के बाहर तनाव का माहौल पैदा हो गया.
उन्होंने बताया कि मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन में विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत है और यहां गेट पर कुछ समय के लिए हंगामा हुआ.
आंदोलन के प्रमुख युवा चेहरों के पुलिस कार्रवाई के दायरे में आने के बावजूद शुक्रवार को कनॉट प्लेस और उसके आसपास सैकड़ों लोग जमा हुए. इनमें से कई लोगों के हाथों में तिरंगा था. इस दौरान कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया.
इंडिया टुडे ने पुलिस सूत्रों के हवाले से बताया कि प्रदर्शन के दौरान करीब 150 लोगों को हिरासत में लिया गया.
अभिजीत दीपके ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े के ख़िलाफ़ अपने आंदोलन को सीजेपी 2.0 कहा था, लेकिन पुलिस की सख़्त कार्रवाई से सवाल उठने लगा है कि इस आंदोलन का अब आगे क्या होगा.
वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई मानते हैं कि सरकार को इस तरह के आंदोलन को बहुत ध्यान से देखना चाहिए. वह कहते हैं, "जब भी किसी राजनीतिक आंदोलन के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई होती है, तो उसमें और उभार आता है."
"कॉकरोच जनता पार्टी का उदय अलग तरीक़े से हुआ है. उसने पेपर लीक जैसे मुद्दे उठाए और उसके प्रदर्शन में हर वर्ग के लोग, ख़ासकर युवा शामिल हुए."
रशीद किदवई कहते हैं, "साल 2014 से मोदी सरकार के ख़िलाफ़ जो भी राजनीतिक विरोध सामने आया, सरकार ने उसे नक्सलियों, विदेशी ताक़तों या देश विरोधी गतिविधियों से जोड़कर उसका असर कम करने की कोशिश की."
"लेकिन जुलाई से अब तक सरकार इस आंदोलन को किसी ख़ास खांचे में फिट नहीं कर पाई है. पहली बार सरकार इस विरोध को क़ाबू करने में विफल रही है. हालांकि, यहां मामला युवाओं का है, इसलिए सरकार कोई मौक़ा नहीं देना चाहती."
वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्रा कहते हैं, "जब इस तरह के विरोध होते हैं या सरकार इतनी ज़्यादा सख़्ती करती है, तो उसके लिए मुश्किल बढ़ जाती है. अब शायद सरकार इसे आसानी से नहीं दबा सकेगी."
"भले ही यह राजनीतिक मुद्दा हो, मगर यह छात्रों और युवाओं का प्रदर्शन है."
बीबीसी हिंदी के कार्यक्रम 'दिनभर' में शामिल वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक मनीषा प्रियम ने कहा, "ये युवा हैं और झंडा ही तो फहरा रहे हैं. इसमें क्या दिक़्क़त होनी चाहिए? इन युवाओं की लड़ाई बिल्कुल भी राजनीतिक नहीं थी. इन्होंने नीट और पेपर लीक जैसे मुद्दे उठाए थे."
वह कहती हैं, "ये बच्चे कोई क़ानून नहीं तोड़ रहे हैं. पुलिस उन्हें किस तरह पीट रही है, यह सबके सामने है. पुलिस बच्चों की पिटाई कर रही है और अगर वे ज़रा-सा कुछ कहते हैं, तो उसे अवमानना बताया जा रहा है."
अभिजीत दीपके को शुक्रवार सुबह दिल्ली पुलिस ने नोटिस देकर मार्च में शामिल नहीं होने को कहा था. नोटिस के मुताबिक़, अभिजीत ने कनॉट प्लेस में लोगों से जमा होने की अपील की थी, लेकिन इसके लिए क़ानूनी अनुमति नहीं ली गई थी. बाद में उन्हें हिरासत में ले लिया गया था.
इससे पहले 13 अक्तूबर को सीजेपी के 14 कार्यकर्ता जंतर-मंतर पहुंचे थे. पुलिस का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने उन्हें रोकने की कोशिश कर रहे पुलिसकर्मियों के साथ धक्का-मुक्की की और उनके काम में बाधा डाली. इस मामले में सौरव और आशुतोष को तिहाड़ जेल भेज दिया गया.
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने विपक्ष पर युवाओं का इस्तेमाल करके अराजकता फैलाने और बांग्लादेश जैसे 'सत्ता परिवर्तन' की कोशिश करने का आरोप लगाया. बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन ने भी विपक्ष पर अराजकता फैलाने का आरोप लगाया.
वहीं, अभिजीत दीपके ने कहा कि सत्ता में बैठे लोगों से जवाब मांगना अराजकता नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियादी अभिव्यक्ति है.
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सीजेपी द्वारा भविष्य में और प्रदर्शन आयोजित किए जाएंगे।
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