
ऑस्ट्रिया में अफ़ग़ानिस्तान की राजदूत मनीज़ा बख़्तारी ने तालिबान की मांग को ठुकराते हुए पद पर बने रहने का फ़ैसला किया।
2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद, ऑस्ट्रिया में अफ़ग़ानिस्तान की राजदूत मनीज़ा बख़्तारी ने पद छोड़ने की तालिबान की मांग को अस्वीकार कर दिया। वह अब भी खुद को अफ़ग़ानिस्तान की वैध राजदूत मानती हैं और दूतावास का संचालन कर रही हैं।
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2021 में तालिबान द्वारा अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता पर कब्ज़ा करने के बाद पूर्व सरकार के कई राजनयिकों के सामने पद छोड़ने का संकट पैदा हो गया था।
साल 2021 में जब अफ़ग़ानिस्तान में तत्कालीन राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी की सरकार गिर गई और तालिबान ने सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया तो तालिबान अधिकारियों ने मनीज़ा बख़्तारी से अपना पद छोड़ने के लिए कहा।
लेकिन ऑस्ट्रिया में अफ़ग़ानिस्तान की राजदूत मनीज़ा बख़्तारी ने तालिबान की यह मांग मानने से इनकार कर दिया। इसी वजह से उन्हें 'आख़िरी राजदूत' भी कहा जाता है।
बीबीसी न्यूज़ के साथ एक इंटरव्यू में मनीज़ा बख्तारी ने बताया कि साल 2021 में जब अफ़ग़ानिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार गिर गई और तालिबान सत्ता में आया तो वह क़रीब 24 घंटों तक बहुत परेशान रहीं। इस दौरान वे लगातार सोचती रहीं कि अब उन्हें क्या करना चाहिए।
वह कहती हैं, "जिस समूह को हम एक दिन पहले तक चरमपंथी कहते थे, वही अब देश चला रहा था."
मनीज़ा बख़्तारी के मुताबिक़, उन्हें लगा कि महिला होने की वजह से तालिबान सरकार उन्हें ऑस्ट्रिया में अफ़ग़ानिस्तान के राजदूत के पद से हटाना चाहेगी। उनके मन में यह सवाल भी था कि अगर वह तालिबान की मांग मानकर पद छोड़ देती हैं तो दूतावास और वहां रखे संवेदनशील दस्तावेज़ों का क्या होगा? आख़िरकार उन्होंने पद पर बने रहने का फ़ैसला किया।
वह कहती हैं, "मुझे एक चुनी हुई सरकार ने अपने देश और अफ़ग़ानिस्तान के लोगों का प्रतिनिधित्व करने के लिए विदेश भेजा था. फिर मैं पद क्यों छोड़ूं?"
हालांकि, तालिबान अधिकारियों ने कुछ साल पहले ही उन्हें उनके पद से हटा दिया था, लेकिन मनीज़ा बख़्तारी विरोध के तौर पर अब भी ख़ुद को अफ़ग़ानिस्तान का राजदूत मानती हैं। वह ऑस्ट्रिया में अफ़ग़ानिस्तान का दूतावास अपने सिद्धांतों और शर्तों के मुताबिक़ चला रही हैं।
मनीज़ा बख़्तारी का जन्म अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में हुआ था। वह बताती हैं कि उनका परिवार जिस अपार्टमेंट में रहता था, वह एक ऐसे इलाक़े में था जहां ज़्यादातर मध्यवर्गीय परिवार रहते थे। उनके पिता अफ़ग़ानिस्तान के जाने-माने कवि, लेखक और विचारक थे।
जब उनसे पूछा गया कि मुजाहिदीन के उभार ने अफ़ग़ानिस्तान और उनके परिवार की ज़िंदगी को किस तरह प्रभावित किया, तो उन्होंने बताया कि उस दौर में उनके पिता को उनके विचारों की वजह से जेल में डाल दिया गया था।
मनीज़ा बख़्तारी बताती हैं कि 1990 के दशक में जब तालिबान की सेना काबुल में दाख़िल हुई तो उनके पिता को तुरंत ख़तरा महसूस होने लगा। उन्होंने फ़ैसला किया कि उन्हें जल्द से जल्द देश छोड़ देना चाहिए।
1996 में जब तालिबान ने पहली बार अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता पर क़ब्ज़ा किया तो उनके पति ने भी देश छोड़ने का बड़ा फ़ैसला लिया। मनीज़ा बख़्तारी कहती हैं, "अगर मेरे पिता देश छोड़कर नहीं गए होते तो उनका भी वही अंजाम होता जो नजीबुल्लाह का हुआ था."
उन्होंने बताया कि हालात को देखते हुए उन्होंने भी हजारों अन्य लोगों की तरह अफ़ग़ानिस्तान छोड़कर पाकिस्तान जाने का फैसला किया।
11 सितंबर 2001 के हमलों और उसके बाद अमेरिका और ब्रिटेन के अफ़ग़ानिस्तान पर हमले के चलते तालिबान की सत्ता का पतन हो गया। इसके बाद पाकिस्तान में रह रहे अफ़ग़ानिस्तान के कई दूसरे शरणार्थियों की तरह मनीज़ा बख़्तारी ने भी अपने देश लौटने का फ़ैसला किया।
वह बताती हैं कि उस समय वह पढ़ाने का काम कर रही थीं तभी अफ़ग़ानिस्तान के विदेश मंत्रालय की ओर से उनसे संपर्क किया गया। वह कहती हैं, "उस समय मैं काबुल यूनिवर्सिटी में लेक्चरर थी और एक ग़ैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) के साथ भी काम कर रही थी. तभी मुझे अफ़ग़ानिस्तान के विदेश मंत्री का फ़ोन आया."
साल 2021 में जब तालिबान ने एक बार फिर काबुल पर क़ब्ज़ा किया उस समय मनीज़ा बख़्तारी ऑस्ट्रिया में अफ़ग़ानिस्तान की राजदूत थीं। वह कहती हैं कि यह ऐसा समय था जब उन्हें नैतिक रूप से स्पष्ट रुख़ अपनाना था और एक मुश्किल फ़ैसला लेना था।
मनीज़ा के मुताबिक़, इसके बाद तालिबान के अधिकारियों ने उनसे संपर्क किया। उन्होंने कहा कि वे सभी राजनयिकों के साथ ज़ूम पर एक बैठक करना चाहते हैं। लेकिन मनीज़ा ने इस बैठक में शामिल होने से इनकार कर दिया। वह बताती हैं कि 2022 में उन्हें तालिबान सरकार की ओर से एक चिट्ठी मिली, जिसमें उन्हें पद से हटाए जाने की जानकारी दी गई थी.
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