
फ्रांस में बढ़ती महंगाई और सार्वजनिक सेवाओं के खराब स्तर के खिलाफ प्रदर्शनों के बाद सरकार ने कड़े कदम उठाने की घोषणा की है।
फ्रांस में महंगाई और खराब सार्वजनिक सेवाओं के खिलाफ हिंसक प्रदर्शनों के बाद प्रधानमंत्री सेबास्तियन लेकोर्नू ने स्थानीय मेयरों को कर्फ्यू लगाने का अधिकार दिया है। राष्ट्रपति मैक्रों की सरकार पर हिंसा को रोकने में विफल रहने के आरोप लग रहे हैं।
AI-generated summary
फ्रांस में बढ़ती महंगाई और सार्वजनिक सेवाओं की खराब गुणवत्ता को लेकर प्रदर्शन हो रहे हैं। शनिवार को 5 लाख से अधिक लोग सड़कों पर उतरे थे।
फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबास्तियन लेकोर्नू ने कहा है कि लोगों और दुकानों की सुरक्षा के लिए फ़्रांस के कुछ शहरों को आंशिक कर्फ़्यू लगाने का अधिकार दिया गया है।
बीबीसी संवाददाता ह्यू शोफ़ील्ड के मुताबिक संकट को लेकर पेरिस में कैबिनेट की बैठक के बाद फ्रांसीसी पीएम ने कई घोषणाएं कीं।
पीएम ने कहा कि अगर दंगे जारी रहते हैं, तो देश में आपातकाल लगाया जा सकता है। तब तक, ज़रूरत के मुताबिक़ कुछ इलाक़ों में रात के समय कर्फ़्यू लगाया जा सकता है।
लेकोर्नू ने कुछ स्थानीय मेयरों को ऐसे कर्फ़्यू लगाने का अधिकार दिया है। हालांकि, व्यावहारिक रूप से ये प्रतिबंध कैसे लागू होंगे, यह अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
मिसाल के तौर पर, पेरिस के प्लास द ला रिपब्लिक के आसपास के इलाक़े में कुछ तय समय के दौरान लोगों की आवाजाही पर रोक लगाई जा सकती है।
प्रधानमंत्री ने बताया कि पुलिस के 200 जांचकर्ता अब उन ऑनलाइन वीडियो की जांच कर रहे हैं, जिनमें लूटपाट करने वालों ने खुद अपनी गतिविधियों को रिकॉर्ड किया था। इसका मक़सद आरोपियों को न्याय के कटघरे में लाना है।
प्रधानमंत्री ने एक बार फिर राजनीतिक धुर-वामपंथियों पर निशाना साधा। लेकोर्नू ने उन पर अगले साल अप्रैल में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले अशांति भड़काने की कोशिश करने का आरोप लगाया।
गृह मंत्री लॉरां न्युनेज़ ने कहा है कि वहां के कई शहरों में हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद हालात पुलिस के काबू से भी बाहर हो गए हैं।
उन्होंने कहा कि प्रशासन हालात की गंभीरता का अंदाज़ा लगाने में विफल रहा।
उन्होंने इस्तीफ़ा देने की भी पेशकश की लेकिन फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने उनसे पद पर बने रहने की गुज़ारिश की।
मैक्रों ने न्युनेज़ से फ्रांस की सड़कों को सुरक्षित बनाने और शनिवार और रविवार की हिंसा के ज़िम्मेदार लोगों को क़ानून के कटघरे में लाने के तरीक़े तलाशने को कहा है।
शनिवार, 17 अक्तूबर को 5 लाख से ज़्यादा लोगों ने बढ़ती महंगाई और अच्छी सरकारी शिक्षा समेत सार्वजनिक सेवाओं की ख़राब क्वालिटी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया। ज़्यादातर प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे। लेकिन बाद में काले कपड़े पहने और चेहरे ढके कुछ प्रदर्शनकारी और तोड़फोड़ करने वाले लोग सामने आए, जिसके बाद हालात बिगड़ गए।
अनुमान है कि करीब 1,500 दुकानों और कारोबारों में लूटपाट और तोड़-फोड़ की गई।
दंगा रोधी पुलिस ने भीड़ पर आंसू गैस के गोले छोड़े और पानी की बौछार की। कई जगह पुलिसकर्मियों को लोगों पर डंडे बरसाते हुए देखा गया। फ्रांस के गृह मंत्रालय के मुताबिक़, शनिवार को करीब 1,000 पुलिसकर्मी घायल हुए, जिनमें सात की हालत गंभीर है।
गृह मंत्री न्युनेज़ पर राजनीतिक विरोधियों, कुछ ट्रेड यूनियनों और सोशल मीडिया मंचों पर लोगों ने आरोप लगाया है कि शनिवार को पहले से तय कई प्रदर्शनों से निपटने के लिए वह पर्याप्त तैयारी नहीं कर पाए और पुलिस की तैनाती भी कम थी।
फ्रांस की संसद के निचले सदन की अध्यक्ष याएल ब्राउन-पिवे ने कहा है कि वह पूरे मामले की जांच के लिए एक जांच समिति गठित करना चाहती हैं।
रविवार रात फ्रांस की राजधानी पेरिस में टूटी हुई दुकानों की कतार के पास एक दीवार पर लाल रंग से लिखा था, "रोशनी के शहर में अंधेरा छाया हुआ है।"
पेरिस को अक्सर 'सिटी ऑफ़ लाइट' यानी 'रोशनी का शहर' कहा जाता है।
फ्रांस में ऐसी अफ़वाहें भी थीं कि राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों देश के कुछ हिस्सों में अस्थायी कर्फ्यू लगा सकते हैं या हालात को शांत करने के लिए आपातकाल लागू कर सकते हैं।
आख़िर में, मैक्रों ने रविवार को टेलीविज़न पर देश को संबोधित किया। उन्होंने लोगों से राष्ट्रीय एकता की अपील की और फ्रांस की जनता को भरोसा दिलाने की कोशिश की कि हिंसा के ज़िम्मेदार लोगों को सज़ा दी जाएगी।
मैक्रों के भाषण की फ्रांस के मीडिया में कड़ी आलोचना हुई है। मीडिया का कहना है कि भाषण में ठोस जानकारी नहीं दी गई।
मीडिया में कई सवाल भी पूछे जा रहे हैं। मसलन, अब तोड़-फोड़ और दंगा करने वालों को क़ानून के कटघरे में कैसे लाया जाएगा? फ्रांस के शहरों और कस्बों को बेहतर तरीक़े से कैसे सुरक्षित किया जाएगा? ख़ासकर तब, जब कुछ हफ़्तों बाद फिर बड़े पैमाने पर प्रदर्शनों का एलान हो चुका है। तोड़फोड़ की वजह से हुए नुक़सान की भरपाई कारोबारियों को कैसे और कब की जाएगी? और शिक्षा के मुद्दे पर छात्रों और शिक्षकों के संगठनों के साथ बातचीत कब शुरू होगी? आख़िर पिछले महीने इन्हीं मुद्दों को लेकर ये प्रदर्शन शुरू हुए थे।
रविवार को फ़्रांस के सबसे बड़े ट्रेड यूनियन में एक, सीजीटी यूनियन की महासचिव सोफी बिने ने मैक्रों पर छात्रों की चिंताओं, महंगाई के संकट और फ्रांस में सार्वजनिक सेवाओं की लगातार गिरती गुणवत्ता को दूर करने में नाकाम रहने का आरोप लगाया।
ऐसा लगता है कि राष्ट्रपति ने अब यह ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री लेकोर्नू को सौंप दी है। फ्रांस में मैक्रों को व्यापक रूप से एक ऐसे राष्ट्रपति के तौर पर देखा जा रहा है, जिनका कार्यकाल अब ख़त्म होने वाला है। वह सत्ता से विदा होने की राह पर हैं।
उनका उत्तराधिकारी बनने के लिए कड़ा मुक़ाबला चल रहा है और छह महीने बाद चुनाव होना है। प्रवासी विरोधी राष्ट्रवादी दक्षिणपंथ की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार मरीन ली पेन और पूंजीवाद विरोधी वामपंथ के नेता ज्यां-ल्यूक मेलोंशों भी सुर्खियों में आने की कोशिश कर रहे हैं।
इससे फ्रांस में पहले से जारी तनाव और बढ़ रहा है। यह तनाव राजनीति के साथ-साथ सड़कों पर भी दिखाई दे रहा है।
फ्रांस की संसद ठप पड़ी है और तीन राजनीतिक धड़ों के बीच गहरे मतभेद हैं। तीनों सत्ता के लिए एक-दूसरे से होड़ कर रहे हैं।
इसके अलावा फ्रांस की आर्थिक परेशानियां भी हैं। निवेशक सरकार पर बढ़ते सार्वजनिक कर्ज़ को काबू में करने के लिए लगातार दबाव बना रहे हैं। लेकिन फ्रांसीसी सरकार को डर है कि अगर उसने सार्वजनिक सेवाओं या कल्याणकारी योजनाओं के बजट में कटौती की, तो और भी ज़्यादा नाराज़ लोग सड़कों पर उतर आएंगे।
इस समय फ्रांस में लोग अक्सर सवाल पूछ रहे हैं, "अब क्या होगा? आगे क्या होगा? क्या हमारा देश टूट चुका है?"
शनिवार की घटनाओं से पूरे फ्रांस में लोग हैरान और परेशान हैं। आंसू गैस से घिरे शहरों, खुलेआम लूटपाट और जलती हुई सार्वजनिक इमारतों की तस्वीरों ने देश को चिंता में डाल दिया है।
जिन लोगों से मैं बात कर रहा हूं, उनमें से कई इस बात से निराश हैं कि वे भविष्य को लेकर चिंतित हैं, लेकिन देश के प्रमुख नेता इसके बजाय एक-दूसरे पर आरोप लगाने में जुटे हुए हैं और मौजूदा अस्थिरता के लिए एक-दूसरे को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं।
शिक्षक और तीन बच्चों के पिता एडुआर ने मुझसे कहा, "जब हम अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं, तब वे इस स्थिति को राष्ट्रपति चुनाव के लिए राजनीतिक लड़ाई का मुद्दा बना रहे हैं।"
मैक्रों और उनके प्रधानमंत्री ने शनिवार की हिंसा और अराजकता के लिए कट्टरपंथी वामपंथी समूहों और उपद्रवियों को ज़िम्मेदार ठहराया। वहीं, कट्टर वामपंथी नेता ज्यां-ल्यूक मेलोंशों ने सरकार पर "अक्षमता" का आरोप लगाया।
राष्ट्रवादी दक्षिणपंथी नेता मरीन ली पेन, जो क़ानून-व्यवस्था के मुद्दे पर सख़्त रुख़ के लिए जानी जाती हैं, ने फ्रांसीसी झंडे के सामने बैठकर राष्ट्रपति के अंदाज़ में एक वीडियो जारी किया। इसमें उन्होंने "थकी हुई, अपनी ऊर्जा खो चुकी और दिशाहीन मैक्रों सरकार" को हिंसा के लिए ज़िम्मेदार ठहराया।
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