
अनिवार्य सैन्य सेवा से छूट को लेकर इसराइली समाज में गहरी दरार
इसराइल में अति-रूढ़िवादी यहूदी समुदाय और सेना के बीच अनिवार्य सैन्य सेवा को लेकर विवाद गहरा गया है। ग़ज़ा युद्ध के बीच, अन्य इसराइली नागरिक इस समुदाय को देश की सुरक्षा में योगदान न देने और सब्सिडी का लाभ उठाने के लिए आलोचना कर रहे हैं, जिससे नेतन्याहू सरकार पर दबाव बढ़ रहा है।
AI-generated summary
अति-रूढ़िवादी यहूदियों को इसराइल के शुरुआती दिनों से सैन्य सेवा से छूट मिली हुई है। यह छूट तब दी गई थी जब समुदाय होलोकॉस्ट के बाद अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहा था।
सड़कों पर विरोध करते उग्र प्रदर्शनकारी इसराइली सुरक्षा बलों को "नाज़ी" बताते हुए उनकी निंदा कर रहे हैं. लेकिन यह लंदन या पेरिस की सड़कों पर फ़लस्तीनी लोगों के समर्थन में हो रही रैली नहीं है.
प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच यह झड़प इसराइल के बीचोंबीच हो रही है. यहां सफ़ेद कमीज़, काली फ़ेडोरा टोपी और लंबे काले कोट पहने सैकड़ों अति-रूढ़िवादी यानी अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स यहूदी सैन्य पुलिस के सामने खड़े हैं.
विवाद की शुरुआत यरूशलम और तेल अवीव के बीच स्थित मोदिइन शहर की एक इमारत से हुई. यहां एक युवा अति-रूढ़िवादी यहूदी (हरेदी) रहता है. उसने इसराइल के नियमों के मुताबिक़ अनिवार्य सैन्य सेवा में हाज़िर होने से इनकार कर दिया. पुलिस इसी सिलसिले में उसे गिरफ़्तार करने पहुंची थी.
बीबीसी के वीडियो में दिखाए गए अक्तूबर की शुरुआत के इस घटनाक्रम जैसी कई घटनाएं पिछले कुछ महीनों में सामने आई हैं. इन घटनाओं ने इसराइली समाज में मौजूद एक गहरी दरार को और उजागर किया है.
यह बढ़ती दरार ऐसे समय में सामने आ रही है, जब इसराइल कई मोर्चों पर लड़ रहा है. इनमें ग़ज़ा में हमास के ख़िलाफ़ जारी संघर्ष भी शामिल है. इसके अलावा, क़ब्ज़े वाले वेस्ट बैंक में फ़लस्तीनियों के ख़िलाफ़ चरमपंथी यहूदी बस्तियों के लोगों की हिंसा भी बढ़ रही है.
कभी एक छोटा अल्पसंख्यक समूह रहे अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स यहूदी आज भी एक अलग समुदाय के तौर पर रहते हैं, हालांकि उनकी संख्या हर साल बढ़ रही है. अभी अनुमान है कि वे इसराइल की कुल आबादी का क़रीब 14 फ़ीसदी हैं. इस समुदाय में जन्म दर भी दूसरे इसराइलियों के मुक़ाबले काफ़ी ज़्यादा है. अगर उनकी आबादी इसी रफ़्तार से बढ़ती रही, तो 2050 तक वे यहूदी इसराइली आबादी का एक-तिहाई हिस्सा हो सकते हैं.
अति-रूढ़िवादी समुदाय के बढ़ने के साथ ही उन्हें पूरे समय धार्मिक पढ़ाई करने के लिए दिए जाने वाले वज़ीफ़े के ख़र्च को लेकर बहस भी तेज़ हो गई है. इस समुदाय को दी जाने वाली सब्सिडी पर सरकार हर साल क़रीब 35 अरब शेकेल (84 लाख पाउंड) खर्च करती है. हाल तक इस समुदाय के लोगों को सैन्य सेवा से छूट भी मिली हुई थी.
अब इस अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स यहूदी समुदाय को एक छोटा और महत्वहीन अल्पसंख्यक समूह नहीं माना जा सकता. इसके साथ ही उन पर इसराइल के व्यापक समाज के साथ ज़्यादा जुड़ने का दबाव भी बढ़ रहा है.
राष्ट्रीय सुरक्षा और अर्थव्यवस्था इस चुनाव के दो अहम मुद्दे हैं. ऐसे में अति-रूढ़िवादी यहूदियों और उन ज़्यादातर इसराइलियों के बीच मतभेद पहले से कहीं ज़्यादा गहरे हो गए हैं, जो मानते हैं कि अति-रूढ़िवादी समुदाय देश की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था में अपनी उचित हिस्सेदारी नहीं निभा रहा है.
मौजूदा किसी भी राजनीतिक गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलने की संभावना नहीं है. वहीं प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू का राजनीतिक भविष्य भी अनिश्चित है. ऐसे में छोटी पार्टियों, जिनमें हरेदी पार्टियां (अल्ट्रा-ऑऱ्थोडॉक्स समूहों की पार्टियां) भी शामिल हैं, की भूमिका एक बार फिर अहम हो सकती है. ये पार्टियां तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं कि इसराइल में अगली सरकार किसकी बनेगी.
सत्ता में बने रहने की कोई भी उम्मीद रखने के लिए नेतन्याहू को अति-रूढ़िवादी पार्टियों का समर्थन बनाए रखना होगा, भले ही इसराइल में उनके विशेष दर्जे को कम करने की मांग लगातार बढ़ रही हो.
अति-रूढ़िवादी यहूदियों के नज़रिए से देखें तो इसराइली राज्य के साथ उनका सामाजिक समझौता अब लगातार दबाव में आ रहा है. उनका लगभग पूरा ध्यान यहूदी धर्म के धार्मिक ग्रंथों, जैसे तोराह और यहूदी बाइबल के अध्ययन पर रहता है. इसी वजह से उनकी शिक्षा व्यवस्था अलग है और हरेदी समुदाय के बहुत से लोग इसराइल की वर्कफ़ोर्स का हिस्सा नहीं हैं.
अति-रूढ़िवादी समुदाय के लिए सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि पारंपरिक धार्मिक संस्थानों यानी येशिवा में पढ़ने वाले छात्रों को इसराइली सेना (आईडीएफ़) में सेवा से मिली छूट बरकरार रहे. यह छूट इसराइल बनने के शुरुआती दिनों से चली आ रही है. उस समय हरेदी समुदाय बहुत छोटा था और होलोकॉस्ट में लगभग पूरी तरह तबाह हो जाने के बाद अपने जीवन और समुदाय को फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रहा था.
लेकिन 7 अक्तूबर के हमलों के बाद इसराइल कई मोर्चों पर युद्ध लड़ रहा है और हालात ज़्यादा गंभीर हो गए हैं. ऐसे में देश की अनिवार्य सैन्य सेवा से अति-रूढ़िवादी समुदाय की लगभग पूरी तरह गैर-मौजूदगी को लेकर विवाद भी बढ़ गया है.
धार्मिक संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों और उनके रब्बियों का मानना है कि अगर युवा अति-रूढ़िवादी पुरुष सेना में जाते हैं, तो वे ऐसे प्रभावों और व्यवहारों के संपर्क में आ सकते हैं, जो उन्हें अपने समुदाय से दूर कर सकते हैं. उनका यह भी मानना है कि अपने समुदाय की परंपराओं पर कायम रहना सिर्फ़ इसराइल ही नहीं, बल्कि पूरे यहूदी समुदाय के अस्तित्व के लिए बेहद ज़रूरी है.
7 अक्तूबर के हमलों के कुछ ही समय बाद जब पूछा गया कि ऐसे आपातकाल के दौरान अति-रूढ़िवादी समुदाय सेना में ज़्यादा योगदान क्यों नहीं दे रहा है, तो इस समुदाय के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक रब्बी डोव लैंडौ ने कहा कि धार्मिक छात्रों को सेना में तो सेवा नहीं ही करनी चाहिए, बल्कि उन्हें घायलों से मिलने या सैनिकों के अंतिम संस्कार में शामिल होने भी नहीं जाना चाहिए.
रब्बी ने कहा कि इतने ख़तरनाक समय में सिर्फ़ तोराह का अध्ययन करने वाले छात्र ही आध्यात्मिक रूप से इसराइल की रक्षा कर सकते हैं. उन्होंने कहा, "बचाव सिर्फ़ तोराह की पढ़ाई से आता है, व्यवस्थित तरीके से तोराह की पढ़ाई से. अगर तोराह की पढ़ाई में किसी तरह की कमी या रुकावट आती है, तो आगे क्या होगा, यह सोचकर डर लगता है... जितने ज़्यादा लोग तोराह पढ़ेंगे और जितना ज़्यादा वे पढ़ाई करेंगे, उतना ही बेहतर होगा. वे हमारी रक्षा करते हैं."
ग़ज़ा में युद्ध शुरू होने के बाद से हुए सर्वेक्षणों में ये बात सामने आ रही है कि इसराइल के बाक़ी लोग अब चाहने लगे हैं कि अति-रूढ़िवादी यहूदियों को सेना में भर्ती किया जाए. बहुत से लोग हरेदी समुदाय के इस रुख़ को अपनी ज़िम्मेदारी से बचना मानते हैं. उन्हें इस बात पर भी गुस्सा है कि इसका खर्च करदाताओं को उठाना पड़ रहा है. इसराइली सेना लंबे समय से सैनिकों की कमी की शिकायत कर रही है, जबकि पिछले तीन वर्षों में कई इसराइलियों को सैकड़ों दिनों तक सैन्य सेवा करनी पड़ी है.
दाहलिया शाइंडलिन इसराइल की जानी-मानी राजनीतिक सलाहकार और चुनावी सर्वेक्षण विशेषज्ञ हैं. उनका कहना है कि यह मुद्दा नेतन्याहू के लिए बेहद अहम है और ग़ज़ा युद्ध के बीच इस समय इसराइली समाज को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण है, ख़ासकर दक्षिणपंथी लोगों के बीच.
वह कहती हैं, "सबसे बड़ा और तुरंत असर डालने वाला मुद्दा दक्षिणपंथी समुदायों का गुस्सा है. वे सरकार से इसलिए नाराज़ हैं कि वह आईडीएफ़ में भर्ती से मिली इस पूरी छूट को बनाए रख रही है. ऐसा उस समय हो रहा है, जब ख़ासकर दक्षिणपंथी ही नहीं, बल्कि इसराइल के पूरे यहूदी समुदाय के लोग इन युद्धों में सेवा कर रहे हैं और बहुत से लोग मारे भी जा रहे हैं."
दो साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया था कि अति-रूढ़िवादी पुरुषों को सैन्य सेवा से मिली छूट प्रभावी तौर पर ख़त्म हो गई है. इसका मतलब था कि पूरे समय धार्मिक पढ़ाई करने वाले लोगों को भी सेना में भर्ती किया जा सकता था.
इस फ़ैसले पर हरेदी समुदाय में भारी गुस्सा दिखा. लाखों अति-रूढ़िवादी यहूदियों ने प्रदर्शन किए और मुख्य राजमार्गों को जाम कर दिया. मोदिइन में हुई घटना की तरह उन्होंने धार्मिक छात्रों को अनिवार्य सैन्य सेवा से बचने के आरोप में गिरफ़्तार करने से रोकने की भी कोशिश की.
तब से रुक-रुककर प्रदर्शन जारी हैं. घनी आबादी वाले हरेदी इलाक़े अक्सर सुरक्षा बलों के साथ टकराव के केंद्र बनते हैं.
यही विवाद इस चुनाव में भी देखने को मिल रहा है. हरेदी समुदाय का पारंपरिक रूप से प्रतिनिधित्व करने वाली दो प्रमुख पार्टियां हैं. इनमें एक है यूनाइटेड टोरा जुडाइज़्म यानी यूटीजे, जो अश्केनाज़ी यहूदियों यानी यूरोपीय मूल के यहूदियों का प्रतिनिधित्व करती है. दूसरी पार्टी शास है, जो बाद में बनी और सेफ़ार्दी और मिज़राही यहूदियों का प्रतिनिधित्व करती है. इनमें उत्तरी अफ़्रीका और मध्य-पूर्व से आए यहूदी शामिल हैं.
दोनों पार्टियों का एजेंडा लगभग एक जैसा है. इसमें धार्मिक पढ़ाई को सबसे ऊपर रखा जाता है, यहां तक कि फ़लस्तीनियों के साथ संबंधों जैसे मुद्दों से भी ऊपर.
यूटीजे और शास, दोनों नेतन्याहू की गठबंधन सरकार का हिस्सा रहे हैं. उन्होंने अपने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को लागू होने से रोकने के तरीक़े तलाशने में किया. कई मौकों पर उन्होंने गठबंधन से बाहर निकलने और सरकार गिराने की धमकी भी दी. यूटीजे ने ऐसा किया भी, लेकिन बाहर से सरकार का समर्थन जारी रखा. वहीं शास गठबंधन में बनी रही.
मध्य-दक्षिणपंथी नेता गादी आइज़नकोट इस महीने होने वाले चुनाव में नेतन्याहू के मुख्य प्रतिद्वंद्वी के तौर पर उभरे हैं. वह हरेदी पार्टियों के रुख़ का समर्थन नहीं करते. उनका साफ़ कहना है कि इसराइल के भीतर अपने नियमों के साथ अति-रूढ़िवादी यहूदियों का एक अलग राज्य जैसा अस्तित्व अब लगातार ज़्यादा विवादास्पद होता जा रहा है.
उन्होंने कहा, "जो देश अपने सबसे अच्छे बेटे-बेटियों को लड़ने और अपनी जान क़ुर्बान करने के लिए भेजता है, वह ऐसी स्थिति को बर्दाश्त नहीं कर सकता, जिसमें देश के भीतर एक अलग राज्य मौजूद हो."
इन सबका असर यह हुआ है कि अति-रूढ़िवादी पुरुषों को सैन्य सेवा से मिली छूट का मुद्दा शास और यूटीजे, दोनों के चुनावी एजेंडे में सबसे ऊपर आ गया है.
हाल में यूटीजे के एक उम्मीदवार एलीआकिम स्टार्क की टिप्पणी ने विवाद को और बढ़ा दिया. उन्होंने सैन्य भर्ती से बचने वाले अति-रूढ़िवादी पुरुषों की स्थिति की तुलना होलोकॉस्ट के दौरान यहूदियों के उत्पीड़न से कर दी. इसके बाद अलग-अलग राजनीतिक दलों के विपक्षी नेताओं ने उनकी कड़ी आलोचना की.
हरेदी मामलों पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता डैनियल गोल्डमैन का कहना है कि हरेदी समुदाय की दोनों प्रमुख पार्टियां ख़ुद को पहले से ज़्यादा घिरी हुई महसूस कर रही हैं और समझौते के लिए उनकी तैयारियां भी कम होती जा रही हैं.
उनका कहना है कि अति-रूढ़िवादी यहूदियों को नहीं लगता कि सेना में सैनिकों की संख्या बढ़ाने के लिए देश को उनके युवाओं की ज़रूरत है. वह कहते हैं, "इसकी एक बड़ी वजह यह है कि हरेदी पार्टियों को लगता है कि राज्य उनके युवाओं को समुदाय से बाहर निकालना चाहता है. वे उन्हें अति-रूढ़िवादी से या तो सामान्य धार्मिक जीवन जीने वाला या फिर धर्मनिरपेक्ष बनाना चाहते हैं, जैसा कि हरेदी समुदाय इसे देखता है. इसी तनावपूर्ण माहौल में उन्होंने अपना रुख़ और सख़्त कर लिया है."
यूटीजे के नेता और पूर्व मंत्री यित्ज़हाक गोल्डनॉफ़ ने तो यहां तक कह दिया है, "सिर्फ़ इसलिए कि सेना है और युद्ध चल रहा है, हरेदी अपने जीवन जीने का तरीक़ा नहीं बदलेंगे... अगर कोई रास्ता नहीं बचा और उन्हें देश छोड़ना पड़ा, तो वे देश छोड़ देंगे."
लेकिन इसका नेतन्याहू गठबंधन की चुनावी स्थिति पर साफ़ असर पड़ रहा है. शास लंबे समय से इस गठबंधन की अहम सहयोगी रही है. उसके समर्थन के बिना नेतन्याहू के गठबंधन को नेसेट में बहुमत के लिए ज़रूरी 60 से ज़्यादा सीटें मिलना मुश्किल होगा.
इसराइल की चुनावी सर्वेक्षण विशेषज्ञ दाहलिया शाइंडलिन का कहना है कि शास और यूटीजे का सैन्य भर्ती से मिली छूट छोड़ने से इनकार नेतन्याहू के गठबंधन को नुकसान पहुंचा रहा है. वह कहती हैं, "यह उन प्रमुख वजहों में से एक है, जिसके कारण गठबंधन 2022 में मिले समर्थन को फिर हासिल नहीं कर पा रहा है. तब उसे 64 सीटें मिली थीं. अभी के सर्वेक्षणों में उसे क़रीब 50 से 52 सीटें मिल रही हैं."
नेतन्याहू को चुनौती देने वाले सभी नेता अति-रूढ़िवादी यहूदियों को मिली सैन्य सेवा से छूट ख़त्म करने और सेना में भर्ती से इनकार करने वाले संस्थानों या लोगों की आर्थिक मदद रोकने के पक्ष में हैं. वामपंथी नेता यायर गोलान ने तो सैन्य सेवा के लिए योग्य लोगों को तुरंत सेना में भर्ती करने की मांग की है.
इसलिए, शास और यूटीजे के इन बयानों के बावजूद कि अगर नेतन्याहू ने उनके समर्थन में कोई कमी की तो वे अपना समर्थन बदल देंगे, फिलहाल उनके पास जाने के लिए कोई और जगह नज़र नहीं आती.
एंशेल फ़ेफ़र कई वर्षों से इसराइली राजनीति पर प्रमुख टिप्पणीकार रहे हैं. अब वह मुख्य रूप से द इकोनॉमिस्ट के लिए इसराइल में संवाददाता के तौर पर काम करते हैं. उनका कहना है कि नेतन्याहू की स्थिति कमज़ोर नज़र आ रही है.
वह कहते हैं, "दो चीज़ें मौजूदा विपक्षी गठबंधन को एक साथ ला रही हैं. पहली, ज़ाहिर तौर पर वे नेतन्याहू को हटाना चाहते हैं. दूसरी, वे अति-रूढ़िवादी यहूदियों के ख़िलाफ़ मौजूदा बेहद विरोधी माहौल का फ़ायदा उठा रहे हैं, ख़ास तौर पर सेना में भर्ती के मुद्दे पर.
"नेतन्याहू कई वर्षों से अति-रूढ़िवादियों को मूल रूप से वह सब देने के लिए तैयार रहे हैं, जो वे चाहते हैं. उन्हें विपक्ष से यह सब मिलने वाला नहीं है."
नाराज़गी और अपने रुख़ पर अड़े रहने वाले इस माहौल के बीच इस साल एक नई हरेदी पार्टी सामने आई है. यह पार्टी शास और यूटीजे की पारंपरिक सोच से अलग रास्ता अपनाने की बात कहती है.
हरेदी पब्लिक पार्टी मूल रूप से एक ऐसे समझौते की पेशकश कर रही है, जिसमें अति-रूढ़िवादी यहूदी इसराइल के लिए ज़्यादा योगदान दें, लेकिन अपनी पहचान की मूल बातों को बनाए रखें.
अति-रूढ़िवादी समुदाय में पहली बार यह पार्टी दो महिला उम्मीदवारों को भी चुनाव मैदान में उतार रही है.
इनमें से एक ज़ीवा गिंज़ ने बीबीसी को सैन्य भर्ती को लेकर अपनी पार्टी का रुख़ बताया. इसमें सबसे अहम बात यह है कि सेना में सेवा देने वाले पुरुषों को अपनी हरेदी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने की अनुमति दी जाए.
वह कहती हैं, "जिस व्यक्ति की ज़िंदगी पूरी तरह तोराह का अध्ययन करने के लिए समर्पित है, उसे पढ़ाई जारी रखने की अनुमति मिलनी चाहिए. जो लोग पूरा दिन बैठकर पढ़ाई नहीं करते, उन्हें इसराइल के बाकी युवाओं के साथ सेना में सेवा करनी चाहिए. ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें कोई युवा हरेदी के रूप में सेना में आए और हरेदी के रूप में ही सेवा पूरी करे."
लेकिन हो सकता है कि इस चुनाव में समझौते की ऐसी कोशिशों का असर दिखने में अभी कुछ समय लगे.
एंशेल फ़ेफ़र कहते हैं कि अति-रूढ़िवादी समुदाय के पक्के वोटरों को अपनी ओर करना मुश्किल है. यहां ज़्यादातर लोग अब भी मूल रूप से वही करते हैं, जो उनके रब्बी उन्हें करने के लिए कहते हैं.
फ़ेफ़र बताते हैं, "और जब लोग दूसरी पार्टियों को वोट देने लगेंगे, तो ज़रूरी नहीं कि वे किसी दूसरी हरेदी पार्टी को ही वोट दें. यही वजह है कि हम [दक्षिणपंथी नेता और राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार] बेन-ग्वीर जैसे लोगों को हरेदी समुदाय में अपनी पकड़ बनाते हुए देख रहे हैं. वह इकलौते ऐसे ग़ैर-हरेदी पार्टी नेता हैं, जो वास्तव में युवा हरेदी लोगों से बात करते हैं. मूल रूप से इसराइल की बाकी पार्टियां ऐसा करने की कोशिश भी नहीं करतीं."
इसका असर चुनावी सर्वेक्षणों में भी दिख रहा है. इनमें उनकी 'ज्यूइश पावर' पार्टी को बढ़त मिलती हुई दिख रही है.
बेन-ग्वीर के कुछ क़दमों को इसराइल की अंतरराष्ट्रीय छवि के लिए नुकसानदेह माना जा रहा है. इनमें क़ब्ज़े वाले वेस्ट बैंक को इसराइल में मिला लेने जैसी नीतियों का समर्थन भी शामिल है. इसके बावजूद, देश के भीतर उनके कट्टर दक्षिणपंथी संदेश को ज़्यादा समर्थन मिल रहा है.
उनकी अति-राष्ट्रवादी सोच पारंपरिक रूप से हरेदी पार्टियों की नीतियों से मेल नहीं खाती. लेकिन दोनों इसराइली राजनीति के दक्षिणपंथी खेमे में हैं.
अंतरराष्ट्रीय आलोचना के बावजूद, ख़ुद को एक ऐसे मज़बूत नेता के तौर पर पेश करने की उनकी छवि, जो इसराइल के दुश्मन माने जाने वालों के ख़िलाफ़ कड़ा रुख़ अपनाने से नहीं डरता, हरेदी समुदाय के उन लोगों को आकर्षित कर सकती है जो पहले से ही कट्टर दक्षिणपंथ की ओर झुकाव रखते हैं.
हमेशा की तरह, इससे छोटी पार्टियों को किंगमेकर यानी सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका निभाने का मौक़ा मिल जाता है. अति-रूढ़िवादी पार्टियां पहले भी यह भूमिका निभाती रही हैं. लेकिन इस बार हो सकता है कि फ़ैसला उनके हाथ में न हो.
दाहलिया शाइंडलिन कहती हैं, "सच यह है कि कोई भी छोटी पार्टी किंगमेकर बन सकती है. मुझे नहीं लगता कि हरेदी पार्टियों को नेतन्याहू से दूर करने के लिए बहुत ज़्यादा कोशिश करनी पड़ेगी... लेकिन बात यह है कि विपक्षी पार्टियां उन्हें अपने साथ लाना चाहेंगी भी या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या वे सैन्य भर्ती के मुद्दे पर गंभीर समझौता करने के लिए तैयार हैं. विपक्षी पार्टियां इस मुद्दे को अपने चुनावी एजेंडे और मतदाताओं से किए वादे का सबसे अहम हिस्सा बना रही हैं."
इस बार ऐसा हो सकता है कि अति-रूढ़िवादी पार्टियां किंगमेकर बनने के बजाय 'किंग' यानी नेतन्याहू की सरकार गिराने में मदद कर दें.
AI outlook — possibilities, not facts
नेतन्याहू सरकार के गठबंधन को सीटों का नुकसान हो सकता है।
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