
पेशाब लीक होना, विशेषकर महिलाओं में सामान्य माना जाता है, लेकिन यह एक मेडिकल कंडीशन है जिसका इलाज संभव है। गर्भावस्था, प्रसव, मेनोपॉज, उम्र, मोटापा या डायबिटीज जैसी वजहों से पेल्विक फ्लोर की मांसपेशियां कमज़ोर हो सकती हैं, जिससे तनाव के समय पेशाब लीक हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर जांच और इलाज कराने से इस समस्या को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है, जिसमें पेल्विक फ्लोर एक्सरसाइज़, जीवनशैली में बदलाव, दवाइयां और ज़रूरत पड़ने पर सर्जरी शामिल हैं।
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पेशाब लीक होना, विशेषकर महिलाओं में उम्र बढ़ने या बच्चे के जन्म के बाद सामान्य माना जाता है, लेकिन यह एक मेडिकल कंडीशन है जिसका इलाज संभव है।
कई महिलाओं को कहीं बाहर घूमने या सफर पर जाने के बारे में सोचते ही डर लगने लगता है.
ख़ासकर लंबी यात्रा के दौरान उनके मन में सबसे पहला सवाल यही आता है कि अगर पेशाब पर कंट्रोल नहीं रहा तो क्या होगा?
कई बार खांसने या छींकने, सीढ़िया चढ़ते वक्त या ज़ोर से हंसने पर महिलाओं का पेशाब लीक हो जाता है. यहां तक कि भारी सामान उठाते समय भी उन्हें पेशाब लीक होने का डर सताता है.
ऐसी महिलाएं धीरे-धीरे इन चीज़ों को करने से बचने लगती हैं. लेकिन डर और शर्म की वजह से वे इस समस्या के बारे में किसी से बात तक नहीं करना चाहतीं.
दरअसल गर्भावस्था, प्रसव, मेनोपॉज, बढ़ती उम्र, मोटापा या डायबिटीज जैसी वजहों से पेल्विक फ्लोर की मांसपेशियां कमज़ोर हो सकती हैं.
इसका असर पेशाब पर कंट्रोल रखने की क्षमता पर पड़ता है. मेडिकल भाषा में इसे 'स्ट्रेस यूरिनरी इनकॉन्टिनेंस' कहा जाता है. आम बोलचाल में इसे पेशाब का लीक होना या यूरिन लीकेज कहा जाता है.
कई महिलाओं को लगता है कि उम्र बढ़ने या बच्चे के जन्म के बाद पेशाब का लीक होना एक 'सामान्य' बात है.
इसलिए वे इलाज कराने के बजाय इस समस्या को सहती रहती हैं. लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक़, किसी भी उम्र में बिना इच्छा के पेशाब निकल जाना ऐसी समस्या नहीं है जिसे नज़रअंदाज़ किया जाए.
समय पर जांच और इलाज कराने से इस समस्या को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है. पेल्विक फ्लोर एक्सरसाइज़, लाइफस्टाइल में बदलाव, दवाइयां और ज़रूरत पड़ने पर सर्जरी भी इसके इलाज में कारगर हो सकती हैं.
इसलिए पेशाब का लीक होना 'उम्र बढ़ने के साथ तो होता ही है' कहकर स्वीकार करने के बजाय इसे सेहत से जुड़ी समस्या के तौर पर गंभीरता से लेने की ज़रूरत है.
कई महिलाओं को लगता है कि 'इसका कोई इलाज नहीं है' या 'इसे तो सहना ही पड़ेगा', लेकिन ऐसा ज़रूरी नहीं है.
पेशाब लीक होने की समस्या अक्सर धीरे-धीरे बढ़ती जाती है. शुरुआत में खांसते या एक्सरसाइज़ करते समय ही पेशाब की कुछ बूंदें लीक होती हैं, लेकिन बाद में इसका असर रोजमर्रा की ज़िंदगी पर भी पड़ने लगता है.
कुछ महिलाओं के लिए इसकी वजह से सफर करना, एक्सरसाइज़ करना, सामाजिक कार्यक्रमों में जाना या यहां तक कि घर से बाहर निकलना भी मुश्किल हो सकता है.
अगर पेशाब लीक होने के साथ जलन, दर्द, पेशाब में खून, बार-बार इंफेक्शन या ब्लैडर पूरी तरह खाली न होने जैसा महसूस हो, तो डॉक्टर से सलाह लेना और भी ज़रूरी हो जाता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि इलाज जितनी जल्दी शुरू किया जाए, नतीजे उतने ही बेहतर हो सकते हैं. पेल्विक फ्लोर की मांसपेशियों की एक्सरसाइज़, वजन को कंट्रोल में रखना, कब्ज और लंबे समय से चल रही खांसी का इलाज जैसे आसान उपायों से भी कई महिलाओं को राहत मिल सकती है.
कुछ मामलों में दवाइयों या किसी खास मेडिकल प्रक्रिया की ज़रूरत भी पड़ सकती है. सबसे ज़रूरी बात यह है कि पेशाब का इस तरह लीक होना ऐसी समस्या नहीं है, जिस पर शर्म की वजह से चुप रहा जाए.
यह एक मेडिकल कंडीशन है और इसका इलाज संभव है. इसलिए तकलीफ को सहते रहने के बजाय किसी विशेषज्ञ से सलाह लेना ही पहला और सबसे ज़रूरी कदम है.
हंसते, खांसते या छींकते समय क्या होता है?
हंसने, खांसने, छींकने, दौड़ने, उछलने या भारी सामान उठाने से पेट के अंदर अचानक दबाव बढ़ जाता है.
आम तौर पर पेल्विक फ्लोर की मांसपेशियां और पेशाब की नली को सहारा देने वाले टिश्यू इस दबाव को संभाल लेते हैं और पेशाब को बाहर निकलने से रोकते हैं.
लेकिन अगर यह सपोर्ट कमज़ोर हो जाए या वहां की मांसपेशियों के बीच तालमेल बिगड़ जाए, तो पेशाब लीक होने लगता है.
इसका मतलब यह नहीं है कि ब्लैडर में ही कोई ख़राबी है, बल्कि यह उस सिस्टम के कमज़ोर होने की वजह से होता है, जो ब्लैडर और पेशाब की नली को सहारा देता है.
महिलाओं में अचानक तेज़ पेशाब लगने की वजह से होने वाला यूरिनरी इनकॉन्टिनेंस, दबाव या जोर पड़ने की वजह से होने वाला यूरिनरी इनकॉन्टिनेंस और इन दोनों का मिला-जुला प्रकार मिक्स्ड यूरिनरी इनकॉन्टिनेंस सबसे आम प्रकार हैं.
कौन-कौन से इलाज उपलब्ध हैं?
इस समस्या का इलाज किस तरह किया जाएगा, यह यूरिन लीकेज के प्रकार, उसकी गंभीरता और उसके पीछे की वजह पर निर्भर करता है.
शुरुआत में पेल्विक फ्लोर एक्सरसाइज़, ब्लैडर ट्रेनिंग, लाइफ़स्टाइल में बदलाव और कुछ व्यवहार से जुड़े उपाय अपनाने की सलाह दी जाती है.
कुछ महिलाओं को दवाइयों या ख़ास मेडिकल डिवाइस से भी फ़ायदा हो सकता है. अगर स्ट्रेस यूरिनरी इनकॉन्टिनेंस लंबे समय तक बना रहता है, तो इंजेक्शन या स्लिंग सर्जरी जैसे इलाज के विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है.
हालांकि, इलाज शुरू करने से पहले सही बीमारी का पता लगना बेहद ज़रूरी है और यह जांच डॉक्टर से ही करवानी चाहिए. खुद से बीमारी का अंदाज़ा लगाकर इलाज या एक्सरसाइज़ शुरू नहीं करनी चाहिए.
पेल्विक फ्लोर क्या होता है?
पेल्विक फ्लोर, पेल्विस के निचले हिस्से में मौजूद मांसपेशियों और लिगामेंट्स का एक समूह होता है. पेल्विस यानी कमर के नीचे, पेट के निचले हिस्से में मौजूद हड्डियों और मांसपेशियों का हिस्सा.
आसान भाषा में कहें तो अगर पेल्विस को एक इमारत माना जाए, तो पेल्विक फ्लोर उसके निचले हिस्से में मौजूद मांसपेशियों और टिश्यू का एक लचीला जाल होता है.
यह हिस्सा रीढ़ की हड्डी के निचले सिरे और दोनों जांघों की हड्डियों से जुड़ा होता है. यह शरीर का वजन संभालने के साथ-साथ पेट के निचले हिस्से के महत्वपूर्ण अंगों को अपनी जगह पर बनाए रखने में मदद करता है.
आसान भाषा में कहें तो ये मांसपेशियां शरीर के निचले हिस्से के अंगों को सहारा देती हैं. पेशाब और मल को कंट्रोल करने, पेट के अंदर दबाव बढ़ने पर अंगों को सहारा देने और सेक्सुअल फंक्शन को सामान्य बनाए रखने में पेल्विक फ्लोर की अहम भूमिका होती है.
प्रेग्नेंसी, डिलीवरी, बढ़ती उम्र, मोटापा, लंबे समय तक रहने वाली कब्ज या कुछ सर्जरी की वजह से पेल्विक फ्लोर की मांसपेशियां कमज़ोर हो सकती हैं. हालांकि, ऐसा ज़रूरी नहीं है कि हर व्यक्ति में होने वाली समस्या की वजह मांसपेशियों का कमज़ोर होना ही हो.
कुछ लोगों में पेल्विक फ्लोर की मांसपेशियां बहुत ज़्यादा टाइट या ओवरएक्टिव हो जाती हैं. ऐसी स्थिति में पेल्विक एरिया में दर्द, पेशाब करने में परेशानी या सेक्स के दौरान दर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं.
इसलिए हर तरह की समस्या में पेल्विक फ्लोर की मांसपेशियों को मज़बूत करने वाली यानी स्ट्रेंथनिंग एक्सरसाइज़ करना ही सही तरीका हो, ऐसा ज़रूरी नहीं है.
उम्र बढ़ने के साथ ब्लैडर और यूरिनरी सिस्टम में क्या बदलाव होते हैं?
पेशाब लीक होने की समस्या किसी भी तरह की हो, डॉक्टर से इसकी जांच करवाना ज़रूरी है. इसे नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए.
उम्र बढ़ने के साथ महिलाओं के यूरिनरी सिस्टम में होने वाले बदलावों के बारे में हमें डॉ. सोनी मेहता ने जानकारी दी.
वह मुंबई के खार स्थित पी. डी. हिंदुजा अस्पताल और एमआरसी में यूरोलॉजिस्ट और एंड्रोलॉजिस्ट कंसल्टेंट के तौर पर काम करती हैं.
बीबीसी मराठी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "उम्र बढ़ने के साथ पेल्विक फ्लोर की मांसपेशियों का सपोर्ट कम हो जाता है. इसकी वजह से सिस्टोसील और रेक्टोसील जैसी समस्याएं हो सकती हैं. इससे ब्लैडर पूरी तरह खाली करने में परेशानी हो सकती है. इसके अलावा यूरिनरी ट्रैक्ट के संकरे होने, बार-बार यूरिनरी इंफेक्शन होने और पेशाब पूरी तरह बाहर न निकल पाने जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं."
"मेनोपॉज के बाद हार्मोनल बदलावों की वजह से पेशाब निकलने की जगह भी संकरी हो सकती है और पेशाब को कंट्रोल करने की क्षमता कम हो सकती है."
उम्र बढ़ने और डिलीवरी के अलावा क्या इसके और भी कुछ कारण हैं?
इस सवाल पर डॉ. मेहता ने कहा, "लंबे समय तक रहने वाली खांसी, पुरानी कब्ज, मोटापा, मेटाबॉलिक सिंड्रोम और डायबिटीज पेशाब लीक होने का ख़तरा बढ़ाने वाले कुछ महत्वपूर्ण कारण हैं.''
"मोटापा और मेटाबॉलिक सिंड्रोम शरीर के सभी अंगों पर असर डालते हैं, जिसमें ब्लैडर भी शामिल है. इसकी वजह से ब्लैडर को कंट्रोल करने वाली नसों पर असर पड़ सकता है और कई तरह की यूरिनरी इनकॉन्टिनेंस की समस्याएं हो सकती हैं."
इस समस्या का पता लगाने के लिए किन जांचों की ज़रूरत पड़ सकती है, इस बारे में डॉ. सोनी मेहता ने कहा, "इसके निदान के लिए पेशाब की सामान्य जांच, यूरिन कल्चर और अल्ट्रासाउंड जैसी शुरुआती जांचों से लेकर यूरोडायनामिक स्टडी जैसी विस्तृत जांच तक कई टेस्ट कराने पड़ सकते हैं."
"इन जांचों के नतीजों का सही तरीके से विश्लेषण करने के लिए यूरोलॉजिस्ट की सलाह और मार्गदर्शन ज़रूरी होता है."
प्रेग्नेंसी के दौरान पेल्विक फ्लोर पर क्या असर पड़ता है और इसका पेशाब पर कंट्रोल से क्या संबंध है?
प्रेग्नेंसी के दौरान पेल्विक फ्लोर पर काफी दबाव पड़ता है. जैसे-जैसे गर्भाशय का आकार बढ़ता है, पेल्विक एरिया पर दबाव भी बढ़ने लगता है.
इसके साथ ही हार्मोनल और शारीरिक बदलाव भी पेशाब पर कंट्रोल रखने में अहम भूमिका निभाने वाली मांसपेशियों और टिश्यू पर असर डालते हैं.
कुछ महिलाओं को डिलीवरी से पहले ही पेशाब लीक होने की समस्या शुरू हो जाती है.
प्रेग्नेंसी के दौरान अगर ऐसी समस्या हो जाए, तो डिलीवरी के बाद भी इसके बने रहने का ख़तरा बढ़ सकता है. उम्र, वजन और पहले हो चुकी प्रेग्नेंसी का भी इस पर असर पड़ता है.
डिलीवरी के बाद जिन महिलाओं में यह समस्या शुरू होती है, उनके बारे में हमने डॉ. माया पी. एल. गाडे से कुछ सवाल पूछे.
वह मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में स्त्री रोग एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ कंसल्टेंट के तौर पर काम करती हैं.
आख़िर नॉर्मल डिलीवरी और सिजेरियन डिलीवरी में इस समस्या का ख़तरा अलग-अलग होता है?
डॉ. माया पी. एल. गाडे ने बताया कि रिसर्च के मुताबिक़, नॉर्मल डिलीवरी के बाद यूरिनरी इनकॉन्टिनेंस यानी पेशाब पर कंट्रोल न रह पाने का खतरा सिजेरियन डिलीवरी की तुलना में ज्यादा होता है.
कई अध्ययनों के संयुक्त विश्लेषण में भी नॉर्मल डिलीवरी के बाद यह समस्या ज़्यादा देखने को मिली है.
हालांकि, सिजेरियन डिलीवरी कराने से यह ख़तरा पूरी तरह ख़त्म नहीं होता, क्योंकि प्रेग्नेंसी का असर भी पेल्विक फ्लोर पर पड़ता है.
डिलीवरी से पहले मौजूद लक्षण, मां की सेहत और डिलीवरी के दौरान हुई जटिलताओं की वजह से हर महिला की स्थिति अलग हो सकती है.
डिलीवरी के बाद होने वाला पेशाब का लीकेज क्या हमेशा कुछ समय के लिए ही होता है?
इस सवाल के जवाब में डॉ गाडे ने कहते हैं, "डिलीवरी के बाद शुरुआती कुछ महीनों में पेल्विक फ़्लोर के ठीक होने की प्रक्रिया के साथ पेशाब लीक होने की समस्या अपने आप कम हो सकती है. लेकिन हर बार ऐसा हो, यह ज़रूरी नहीं है. रिसर्च के मुताबिक़, कई महिलाओं में यह समस्या लंबे समय तक बनी रह सकती है."
"इसलिए डिलीवरी के बाद पेशाब लीक हो रहा हो तो इसे 'नॉर्मल' मानकर नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए. जांच कराने पर यूरिनरी इनकॉन्टिनेंस का सही प्रकार और उसके इलाज का पता लगाया जा सकता है."
कौन से लक्षण दिखाई देने पर डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए?
इस पर उन्होंने कहा, "अगर पेशाब लीक होने की समस्या लगातार हो रही है, बढ़ रही है या एक्सरसाइज़, काम, नींद, रिश्तों या रोजमर्रा की ज़िंदगी पर असर डाल रही है, तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए. इसके अलावा पेशाब करते समय दर्द या जलन होना, पेशाब में खून आना, ब्लैडर पूरी तरह खाली न होना, बार-बार यूरिन इंफेक्शन होना, पेल्विक एरिया से जुड़ी दूसरी परेशानियां या अचानक पेशाब पर कंट्रोल में बदलाव होना भी महत्वपूर्ण लक्षण हैं. सही जांच के जरिए इसकी वजह का पता लगाया जा सकता है."
कीगल एक्सरसाइज़ क्या है?
कीगल एक्सरसाइज़ पेल्विक फ्लोर की मांसपेशियों को सिकोड़ने और फिर रिलैक्स करने पर आधारित एक्सरसाइज़ हैं. 1940 के दशक में डॉ. अर्नोल्ड कीगल ने महिलाओं में यूरिन इनकॉन्टिनेंस के इलाज के लिए पहली बार इन एक्सरसाइज़ की सलाह दी थी.
आज महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों को भी, खासकर प्रोस्टेट सर्जरी के बाद, कीगल एक्सरसाइज़ करने की सलाह दी जाती है.
सही तरीके से करने पर इससे पेशाब पर कंट्रोल बेहतर हो सकता है, डिलीवरी के बाद रिकवरी में मदद मिल सकती है और कुछ मामलों में सेक्सुअल हेल्थ से जुड़ी परेशानियां भी कम हो सकती हैं.
हालांकि, कई बार लोग गलत मांसपेशियों को सिकोड़ने लगते हैं. पेट, नितंब या जांघों की मांसपेशियों को कसने को ही कीगल एक्सरसाइज़ समझ लिया जाता है. इसके अलावा कुछ लोग इन एक्सरसाइज़ को लगातार और ज़रूरत से ज़्यादा भी करते हैं.
जिन लोगों का पेल्विक फ़्लोर पहले से ही ज़्यादा टाइट होता है, अगर वे सिर्फ मांसपेशियों को और कसने यानी टाइटनिंग वाली एक्सरसाइज़ करते रहें, तो दर्द, असहजता या पेशाब से जुड़ी परेशानियां बढ़ सकती हैं.
इसलिए कीगल एक्सरसाइज़ शुरू करने से पहले यह पता लगाना ज़रूरी है कि असल समस्या क्या है. ज़रूरत पड़ने पर पेल्विक फ़्लोर फिजियोथेरेपिस्ट से सही मार्गदर्शन लेना भी महत्वपूर्ण है.
पुरुषों और महिलाओं में पेल्विक फ़्लोर की मांसपेशियों की मूल संरचना एक जैसी होती है, लेकिन महिलाओं में ये मांसपेशियां प्रेग्नेंसी और डिलीवरी के लिए ज़्यादा लचीली होती हैं.
कीगल एक्सरसाइज से कितनी मदद मिलती है?
"पेल्विक फ़्लोर की मांसपेशियों को सिकोड़ने के साथ पेल्विक टिल्ट्स और कोर एक्टिवेशन, बर्ड-डॉग्स और ग्लूट ब्रिज जैसी एक्सरसाइज़ करने से रोजमर्रा की गतिविधियों के दौरान मांसपेशियों की ताक़त और उनके बीच तालमेल बेहतर करने में मदद मिल सकती है."
उन्होंने आगे कहा, "बायोफीडबैक भी एक उपयोगी तरीका है. ईएमजी या प्रेशर आधारित डिवाइस की मदद से महिलाओं को रियल टाइम में यह समझने में मदद मिलती है कि वे सही मांसपेशियों का इस्तेमाल कर रही हैं या नहीं. उन्हें सही तरीके से रिलैक्स कर पा रही हैं या नहीं. खासतौर पर उन महिलाओं के लिए यह ज़्यादा मददगार हो सकता है, जिन्हें यह पहचानने में परेशानी होती है कि पेल्विक फ्लोर की मांसपेशियों को सही तरीके से कैसे एक्टिवेट करना है."
इसके बाद डॉ. कन्नौजिया एक ज़रूरी बात पर ध्यान दिलाते हैं.
वह कहते हैं, "हर पेल्विक फ्लोर को मज़बूत करने की ज़रूरत हो, ऐसा ज़रूरी नहीं है. कुछ महिलाओं में मांसपेशियां बहुत ज़्यादा टाइट या ओवरएक्टिव हो सकती हैं. ऐसी स्थिति में मांसपेशियों को रिलैक्स करना और उनके बीच सही तालमेल बनाना ज़्यादा सही हो सकता है. फिजियोथेरेपिस्ट व्यक्ति की स्थिति की जांच करके उसके हिसाब से सही एक्सरसाइज़ का प्लान तैयार कर सकते हैं."
वह आगे कहते हैं, "पेल्विक फ्लोर की कमज़ोरी का संबंध पेल्विक ऑर्गन प्रोलैप्स से भी हो सकता है. हालांकि, पेशाब से जुड़ी हर समस्या का मतलब यह नहीं है कि पेल्विक फ्लोर की मांसपेशियां कमज़ोर हैं."
"कुछ महिलाओं में ये मांसपेशियां कमज़ोर होने के बजाय ज़रूरत से ज़्यादा टाइट हो सकती हैं. इसलिए पेल्विक हेल्थ फिजियोथेरेपिस्ट से जांच करवाकर यह समझना फायदेमंद हो सकता है कि असल समस्या क्या है."
जीवनशैली में कोई बड़ा बदलाव करना हो, डाइट में बदलाव करना हो, दवाइयां लेनी हों या एक्सरसाइज़ शुरू करनी हो, तो डॉक्टर और सही ट्रेनर की मदद लेना ज़रूरी है.
अपने शरीर और लक्षणों की डॉक्टर से ठीक तरह से जांच करवाने के बाद, उनकी सलाह के मुताबिक़ ही जीवनशैली में बदलाव करना बेहतर होता है. डॉक्टर को दिखाए बिना खुद से इलाज करना नुक़सानदायक हो सकता है.
AI outlook — possibilities, not facts
पेल्विक फ्लोर एक्सरसाइज़ और जीवनशैली में बदलाव से कई महिलाओं को राहत मिल सकती है
Likely · Within weeks
समय पर जांच कराने से इस समस्या को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है
Very likely · Within months
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