
अक्तूबर 2026 में सऊदी अरब की राजधानी रियाद के किंग ख़ालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हुए मिसाइल हमलों ने दुनिया को हैरान कर दिया है। जानिए, संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों के बावजूद हूती विद्रोहियों के पास इतने हाई-टेक हथियार कहाँ से आ रहे हैं।
यमन के हूती विद्रोही चीनी पुर्जों, ईरानी ब्लूप्रिंट और वैश्विक तस्करी नेटवर्क की मदद से हाई-टेक मिसाइलें और ड्रोन तैयार कर रहे हैं। अक्तूबर 2026 में रियाद पर हुए हमलों ने खाड़ी देशों और वैश्विक रक्षा विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है।
AI-generated summary
यमन के हूती विद्रोहियों ने 2014 में राजधानी सना पर कब्जा किया था और 2015 से सऊदी नीत गठबंधन के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं।
मध्य-पूर्व की जियोपॉलिटिक्स इस वक़्त जिस मोड़ पर खड़ी है, उसमें यमन के हूती विद्रोही किसी छोटे-मोटे बाग़ी गुट की तरह नहीं, बल्कि एक पावर की तरह बर्ताव कर रहे हैं.
अक्तूबर 2026 में सऊदी अरब की राजधानी रियाद के किंग ख़ालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हुए मिसाइल हमलों ने पूरी दुनिया के डिफ़ेंस एक्सपर्ट्स को हैरान कर दिया है, जिनमें कम से कम 13 लोगों की मौत हुई और 300 से ज़्यादा लोग घायल हो गए .
एक तरफ़ हूती विद्रोही सऊदी अरब की राजधानी रियाद में हवाई अड्डों से लेकर ऑयल रिफ़ाइनरी को टारगेट कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ़ रेड सी और बाब अल-मंदेब स्ट्रेट के ग्लोबल शिपिंग रूट पर अपना दबदबा कायम कर रहे हैं.
लेकिन सबसे बड़ा सवाल जो आज वॉशिंगटन से लेकर रियाद और तेल अवीव तक हर स्ट्रैटिजिक वॉर-रूम में चर्चा का विषय बना हुआ है वो ये है कि 2015 से संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के सख़्त हथियार प्रतिबंध झेल रहे इस गुट के पास इतने हाई-टेक हथियार कहाँ से आ रहे हैं.
क्या इसमें ईरान का हाथ है, या फिर इसके पीछे चीन की कंपनियों के पुर्ज़ों, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और ग्लोबल स्मगलिंग नेटवर्क के तार जुड़े हैं.
'द वॉल स्ट्रीट जर्नल' और सीएआर का चीनी पुर्ज़ों से 'ख़ैबर शिकन' मिसाइल बनाने का दावा
हूतियों के हथियारों की सप्लाई चेन में आया सबसे बड़ा और चौंकाने वाला दावा अक्तूबर 2026 में सामने आया है.
मध्य-पूर्व की जियोपॉलिटिक्स पर गहरी नज़र रखने वाले विश्लेषक हरिंदर मिश्रा ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी बातचीत में इस बात पर विशेष ज़ोर दिया है कि हूतियों के पास आज जो यूएवी और आधुनिक हथियार आ रहे हैं, उनमें चीनी तकनीक का बहुत बड़ा हाथ है.
उनका कहना है कि इसके अलावा, हूती विद्रोहियों ने ड्रोन तकनीक के मामले में ज़बरदस्त आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है.
इसके साथ ही 'द वॉल स्ट्रीट जर्नल' की ताज़ा रिपोर्ट और युद्ध क्षेत्रों में हथियारों की सप्लाई चेन ट्रैक करने वाली प्रतिष्ठित संस्था कॉन्फ़्लिक्ट आर्मामेंट रिसर्च की जांच से पता चला है कि हूती लड़ाके अब चीन से मंगाए गए पुर्ज़ों की मदद से अपनी ख़ुद की एडवांस्ड मिड-रेंज बैलिस्टिक मिसाइलें बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
कॉन्फ़्लिक्ट आर्मामेंट रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक़, यमनी विद्रोहियों को एक चीनी सप्लायर से ऐसे कई अहम कॉम्पोनेंट्स मिले हैं, जो ईरान की सबसे ताक़तवर और सटीक निशाना लगाने वाली मिसाइलों में से एक ख़ैबर शिकन का ख़ुद का वर्ज़न तैयार करने के लिए ज़रूरी हैं.
हूतियों की इस मिसाइल की रेंज क़रीब 1,200 मील (लगभग 1,930 से 2,000 किलोमीटर) तक हो सकती है, जिससे पूरा सऊदी अरब और इसराइल सीधे उनकी ज़द में आ जाते हैं.
सीएआर की ये रिपोर्ट जुलाई में यमन के अधिकारियों द्वारा दी गई जानकारी पर आधारित है, जब अधिकारियों ने पिछले साल अदन में दो संदिग्ध शिपमेंट्स को ज़ब्त किया था, जिनमें आम सामानों के बीच मिसाइल बनाने के उपकरण छिपाकर रखे गए थे.
सीएआर की रिपोर्ट के मुताबिक इन खेपों में ख़ैबर शिकन सिरीज़ की मिसाइल के सात ख़ास हिस्सों की पहचान की, जिनमें स्टेबलाइज़िंग फ़िन कोर, रॉकेट मोटर आफ़्ट क्लोज़र, नोज़ल अटैचमेंट और रॉकेट मोटर इग्नाइटर शामिल थे.
ईरान ने सस्ती, मोबाइल और सटीक निशाना लगाने वाली इस ख़ैबर शिकन मिसाइल को सबसे पहले साल 2022 में तेहरान में दुनिया के सामने दिखाया था और बीते साल अमेरिका के साथ हुए युद्ध के दौरान अमेरिकी सैन्य अड्डों के ख़िलाफ़ इसका कुछ कामयाबी के साथ इस्तेमाल भी किया था.
कॉन्फ़्लिक्ट आर्मामेंट रिसर्च की रिपोर्ट्स के मुताबिक जब इस तरह का इम्पोर्ट हो रहा हो, तो पूरी संभावना है कि वे या तो पहले से ही मिसाइल मैन्युफ़ैक्चरिंग कर रहे हैं या फिर इसकी कोशिश कर रहे हैं.
हूती आख़िर हैं कौन?
अगर आपको लगता है कि हूती अचानक दुनिया के सामने आ जाने वाला मिलिशिया ग्रुप है, तो ऐसा बिल्कुल नहीं है.
बीबीसी न्यूज़ की रिपोर्ट्स के मुताबिक़, हूती आंदोलन, जिसका आधिकारिक नाम 'अंसार अल्लाह' यानी ईश्वर के समर्थक है, दरअसल यमन के उत्तरी प्रांत सादा के 'ज़ैदी शिया' समुदाय से निकला एक राजनीतिक और हथियारबंद आंदोलन है.
ज़ैदी शिया इस्लाम की एक ऐसी शाखा है जो ईरान और लेबनान के मुख्यधारा के 'ट्वेल्वर शिया' से सैद्धांतिक रूप से थोड़ी अलग है और सदियों से उत्तरी यमन के पहाड़ी इलाक़ों में मज़बूत रहे हैं.
1990 के दशक की शुरुआत में हुसैन बदरुद्दीन अल-हूती ने उत्तरी यमन में सऊदी अरब समर्थित सलाफ़ी और वहाबी विचारधारा के बढ़ते प्रभाव के ख़िलाफ़ ज़ैदी पहचान को बचाने के लिए 'बिलीविंग यूथ' नाम से एक युवा आंदोलन शुरू किया था
सितंबर 2004 में यमनी सेना के हाथों हुसैन अल-हूती के मारे जाने के बाद इस आंदोलन की कमान उनके छोटे भाई अब्दुल-मलिक अल-हूती के हाथों में आ गई, जो आज भी इसके सुप्रीम लीडर हैं.
अमेरिका की प्रतिष्ठित सैन्य एकेडमी 'वेस्ट प्वाइंट' के 'कम्बैटिंग टेररिज़्म सेंटर' की रिसर्च बताती है कि 2004 से 2010 के बीच यमनी सरकार के ख़िलाफ़ 6 राउंड की गुरिल्ला जंग लड़ने के बाद, हूतियों ने 2011 की अरब क्रांति का फ़ायदा उठाया और सितंबर 2014 में यमन की राजधानी सना पर क़ब्ज़ा कर लिया.
इसके बाद मार्च 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन ने यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार को वापस सत्ता में लाने के लिए सैन्य हस्तक्षेप शुरू किया, लेकिन एक दशक से ज़्यादा की बमबारी के बावजूद हूती कमज़ोर होने के बजाय और ताक़तवर होते चले गए
जब हूतियों को हथियारों का पहला जख़ीरा मिला
हूतियों के पास शुरुआती ताक़त कहां से आई? इसका जवाब यमन के भीतर ही छिपा है. वेस्ट प्वाइंट यूनिवर्सिटी के कम्बैटिंग टेररिज़्म सेंटर में प्रकाशित डॉ. माइकल नाइट्स के रिसर्च ' द हूती वॉर मशीन : फ्रॉम गुरिल्ला वॉर टु स्टेट कैप्चर' के मुताबिक़, जब 2014 में हूतियों ने अपने पुराने दुश्मन और पूर्व राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह के साथ हाथ मिलाकर राजधानी सना पर क़ब्ज़ा किया, तो उन्हें यमन की राष्ट्रीय सेना के लगभग 68 फ़ीसदी हथियार गोदामों पर सीधा नियंत्रण मिल गया.
इस स्टेट कैप्चर के दौरान हूतियों के हाथ सोवियत संघ और उत्तर कोरिया से ख़रीदी गईं यमनी सेना की पुरानी स्कड, तोचका बैलिस्टिक मिसाइलें, एंटी-शिप कोस्टल मिसाइलें और हज़ारों टन गोला-बारूद लगा.
इतना ही नहीं, सना में मौजूद यमनी सेना के 'मिसाइल बैटरीज ग्रुप' और 'मिसाइल रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटर' के इंजीनियर और टेक्नीशियन भी हूतियों के कंट्रोल में आ गए, जिन्हें तुरंत उत्तरी यमन के सादा प्रांत की सुरक्षित पहाड़ियों में शिफ़्ट कर दिया गया.
लंदन स्थित थिंक-टैंक 'इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फ़ॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज़' (आईआईएसएस) की अप्रैल 2025 की रिपोर्ट बताती है कि हूतियों ने सोवियत ज़माने की पुरानी हवा से हवा और ज़मीन से हवा में मार करने वाली एसए-2 डिफ़ेंस मिसाइलों को ईरानी गाइडेंस टेक्नोलॉजी की मदद से 'क़ाहिर-1' और 'मुहित' जैसी ज़मीन और समुद्र में मार करने वाली एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइलों में तब्दील कर लिया.
हूती विद्रोहियों के लिए ईरान और हिज़्बुल्लाह का 'बैकडोर सपोर्ट' कैसे काम करता है?
मिडिल ईस्ट एक्सपर्ट हरिंदर मिश्रा के साथ बीबीसी संवाददाता की चर्चा में यह अहम बात निकलकर आई है कि ईरान केवल हूतियों को हथियार नहीं दे रहा है, बल्कि लगातार अपने एक्सपर्ट्स को ज़मीन पर भेजकर उनकी सैन्य गतिविधियों और हथियारों की असेंबली यूनिट्स का बड़े पैमाने पर विस्तार कर रहा है.
जब यमनी सेना का पुराना स्टॉक ख़त्म होने लगा, तब असली खेल शुरू हुआ.
वॉशिंगटन स्थित थिंक-टैंक 'सेंटर फ़ॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़' (सीएसआईएस) की रिपोर्ट द मिसाइल वॉर इन यमन के अनुसार, साल 2016 के मध्य तक युद्ध के मैदान में ऐसी नई मिसाइलें दिखने लगीं जो युद्ध से पहले यमन की सेना के पास कभी थी ही नहीं जैसे 'बुरकान-1' और क़ियाम सीरीज़.
वेस्ट प्वाइंट के कम्बैटिंग टेररिज़्म सेंटर (सीटीसी) की एक अन्य स्टडी द हूती जिहाद काउंसिल : 'कमांड एंड कंट्रोल' इन द अदर हिज्बुल्लाह से पता चलता है कि अब्दुल-मलिक अल-हूती की एक 9-सदस्यीय जिहाद काउंसिल है, जिसके केंद्र में तीन लोगों की एक गुप्त कमान काम करती है,ख़ुद अब्दुल-मलिक, ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स का एक सीनियर और लेबनान के हिज़्बुल्लाह का एक डिप्टी कमांडर है.
आईआईएसएस और सीएसआईएस दोनों की रिसर्च पुष्टि करती है कि समुद्र और हवा में सऊदी और अमेरिकी नौसेना की नाकेबंदी से बचने के लिए ईरान ने साबुत मिसाइलें भेजने के बजाय उन्हें छोटे-छोटे हिस्सों में काटकर भेजना शुरू किया.
मछली पकड़ने वाली पारंपरिक लकड़ी की नावों के ज़रिए अरब सागर, ओमान की ज़मीनी सीमा और सोमालिया के रास्ते इन मिसाइल किट्स, गाइडेंस सिस्टम और इंजन को यमन के होदेदाह और सलीफ़ बंदरगाहों तक पहुंचाया गया, जहां हूती विद्रोहियों से जुड़े टेक्नीशियनों ने उन्हें दोबारा वेल्ड और असेंबल किया.
आईआईएसएस के मिसाइल एक्सपर्ट्स के मुताबिक़, हूती जिन लंबी दूरी की मिसाइलों को मेड इन यमन बताकर लॉन्च करते हैं, उनमें से ज़्यादातर ईरानी मिसाइलों के ही री-ब्रांडेड वर्ज़न हैं जैसे हूतियों की फ़िलिस्तीन-1 और फ़िलिस्तीन-2 मिसाइलें ईरान की ख़ैबर शिकन या फ़त्ताह पर आधारित हैं, जबकि ज़ुल्फ़िकार मिसाइल ईरान की लिक्विड-प्रोपेलेंट रेज़वान मिसाइल का ही रूप है.
इसी तरह हूतियों के क़ासेफ़, समद और वाएद कामिकाज़ी ड्रोन सीधे तौर पर ईरान के अबाबील और शाहेद-136 ड्रोन टेक्नोलॉजी पर बने हैं.
चीन कनेक्शन, ग्लोबल सप्लाई चेन और ईरान पर निर्भरता से आत्मनिर्भरता की ओर?
हूती अब सिर्फ़ ईरान से आने वाली खेप के भरोसे नहीं बैठे हैं, बल्कि उन्होंने अपनी ख़ुद की एक ग्लोबल प्रोक्योरमेंट और मैन्युफ़ैक्चरिंग चेन खड़ी कर ली है. 'द वॉल स्ट्रीट जर्नल' और संयुक्त राष्ट्र (यूएन) पैनल के विशेषज्ञों ने इस नए ट्रेंड पर बेहद चौंकाने वाले तथ्य सामने रखे हैं.
संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की रिपोर्ट्स और हथियार विशेषज्ञों द्वारा जुटाए गए डेटा से पता चलता है कि हूतियों के लिए जा रहे जिन सामानों को रास्ते में ज़ब्त किया गया है, उनमें अब सबसे बड़ा स्रोत चीनी कंपनियां हैं.
डेटा ये भी दिखाता है कि अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहे हूतियों के ज़्यादातर ड्रोन-पार्ट्स सप्लायर्स चीन में स्थित हैं.
संयुक्त राष्ट्र के यमन प्रतिबंध पैनल के पूर्व एक्सपर्ट के मुताबिक इस बात के पुख़्ता सबूत हैं कि हूती कम से कम पिछले दो सालों से चीन से सॉलिड-फ़्यूल बैलिस्टिक मिसाइलों के पुर्ज़े इम्पोर्ट कर रहे हैं.
मिड-रेंज बैलिस्टिक मिसाइलों के ज़रिए हूती क्रूज़ मिसाइलों और ड्रोन की तुलना में कहीं बड़े विस्फोटक पेलोड के साथ सऊदी अरब के भीतरी इलाक़ों तक मार कर सकते हैं, जो उन्हें एक कहीं ज़्यादा ख़तरनाक ताक़त बनाता है. हालांकि, चीन का आधिकारिक तौर पर यही कहना है कि वह यमनी गुट को हथियार बेचने पर लगे संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध का सम्मान करता है.
कॉन्फ़्लिक्ट आर्मामेंट रिसर्च की अक्तूबर 2026 की डिस्पैच रिपोर्ट में इस बात का भी ज़िक्र है कि सितंबर 2026 में एक सिक्योरिटी रिपोर्ट सामने आई थी, जिसमें उत्तरी यमन के एक ऑपरेटर को 2,000 किलोमीटर से ज़्यादा रेंज वाली मल्टीस्टेज बैलिस्टिक मिसाइल और हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल प्रोजेक्ट को डेवलप करने के लिए क्लॉड कोड जैसे एआई टूल का इस्तेमाल करते पाया गया था.
इतना ही नहीं, मार्च 2025 में सीएआर ने पाया कि हूती दुनिया का पहला ऐसा नॉन-स्टेट हथियारबंद गुट बन गया है जिसने अपने ड्रोन में हाइड्रोजन फ़्यूल का इस्तेमाल करने की कोशिश की है.
अरबों डॉलर के डिफ़ेंस पर सस्ते ड्रोन कैसे भारी पड़ रहे हैं?
हूती विद्रोही इतने ताक़तवर कैसे हो गए कि वे सऊदी अरब जैसे अमीर और आधुनिक हथियारों से लैस देश पर लगातार हमले कर रहे हैं? इसे समझने के लिए हमें स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी सिपरी (SIPRI) के फैक्ट्स एंड फ़िगर्स और असिमेट्रिक वॉरफ़ेयर के इकोनॉमिक्स को समझना होगा.
सिपरी के यूएन आर्म्स इंबार्गोस डाटाबेस के मुताबिक़, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 14 अप्रैल 2015 को प्रस्ताव पास करके यमन के हूती विद्रोहियों पर एक अनिवार्य और अनिश्चितकालीन हथियार प्रतिबंध लगाया था.
लेकिन समंदर के हज़ारों किलोमीटर लंबे रास्तों और कमर्शियल ड्यूल-यूज़ इलेक्ट्रॉनिक पुर्ज़ों (जो सिविलियन सामान के नाम पर मंगाए जाते हैं) की वजह से ये प्रतिबंध ज़मीन पर पूरी तरह बेअसर साबित हुआ है.
मार्च 2026 में जारी सिपरी की ताज़ा फैक्ट-शीट ट्रेंड्स इन इंटरनेशनल आर्म्स ट्रांसफ़र्स 2025 के आंकड़ों के अनुसार, साल 2021 से 2025 के बीच दुनिया भर में जितने भी बड़े हथियार इम्पोर्ट किए गए, उसका 26 फ़ीसदी हिस्सा अकेले मिडिल ईस्ट के देशों ने ख़रीदा और मिडिल ईस्ट के कुल हथियार आयात का 54 फ़ीसदी हिस्सा अमेरिका से आया.
सिपरी के डेटा के मुताबिक़, 2021–25 की इस अवधि में सऊदी अरब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक देश रहा, जिसने अमेरिका के कुल हथियार निर्यात का 12 फ़ीसदी और स्पेन के कुल निर्यात का 28 फ़ीसदी हिस्सा अकेले ख़रीदा.
अब ज़रा इस युद्ध का इकोनॉमिक बैलेंस देखिए. आईएसएस और सीएसआईएस के रिपोर्ट्स बताते हैं कि हूती कॉस्ट-असिमेट्री (लागत के अंतर) की रणनीति पर काम कर रहे हैं.
हूतियों का एक कामिकाज़ी ड्रोन या कम दूरी का रॉकेट महज़ कुछ हज़ार डॉलर (2,000 से 20,000 डॉलर) में तैयार हो जाता है, जबकि उसे हवा में मार गिराने के लिए सऊदी अरब या अमेरिकी नौसेना को जो पैट्रियट या स्टैंडर्ड मिसाइल इंटरसेप्टर दाग़ना पड़ता है, उसकी एक मिसाइल की क़ीमत 10 लाख से 40 लाख डॉलर (क़रीब 8 से 33 करोड़ रुपये) तक होती है.
सीएसआईएस के डेटा के मुताबिक़, मार्च 2015 से अप्रैल 2020 के बीच ही सऊदी के नेतृत्व वाले गठबंधन को हूतियों की 162 से ज़्यादा बैलिस्टिक मिसाइलों को हवा में इंटरसेप्ट करना पड़ा था, जो उस समय तक युद्ध के इतिहास में बैलिस्टिक मिसाइल डिफ़ेंस का सबसे बड़ा इस्तेमाल था.
अक्तूबर 2026 की अपनी ताज़ा रिपोर्ट में सीएसआईएस ने चेतावनी दी है कि पारंपरिक एयर डिफ़ेंस इंटरसेप्टर बेहद महंगे और सीमित संख्या में हैं, और अगर लागत का ये अनुपात हमलावर (हूती और ईरान समर्थित गुटों) के पक्ष में बना रहा, तो खाड़ी देशों और अमेरिका को भारी रक़म ख़र्च करने के बाद भी सीमित नतीजे ही मिलेंगे.
हूती विद्रोही सऊदी अरब, इसराइल और रेड सी पर क्यों कर रहे हैं मिसाइल हमले?
अक्तूबर 2023 में गज़ा युद्ध शुरू होने के बाद से हूतियों ने फ़िलिस्तीन के समर्थन के नाम पर रेड सी और अदन की खाड़ी में कमर्शियल जहाज़ों को निशाना बनाना शुरू किया, और अक्तूबर 2024 तक वे 190 से ज़्यादा हमले कर चुके थे.
वेस्ट प्वाइंट (सीटीसी) के मुताबिक़, हूती युद्ध के इतिहास में पहली बार चलते हुए पानी के जहाज़ों पर एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइल दाग़ने वाला गुट बन गए और मार्च 2024 में उन्होंने रूबीमार जहाज़ को डुबो दिया
सितंबर 2026 में हूतियों ने बाब अल-मंदेब स्ट्रेट से सिर्फ़ 50 मील उत्तर में स्थित रणनीतिक बंदरगाह शहर मोचा पर क़ब्ज़ा कर लिया, जिससे ग्लोबल तेल और गैस सप्लाई के इस सबसे अहम समुद्री रास्ते पर उनकी पकड़ और मज़बूत हो गई.
हब्तूर रिसर्च सेंटर और बीबीसी न्यूज़ की रिपोर्ट्स बताती हैं कि हूतियों ने इज़रायल के इलियट पोर्ट और तेल अवीव पर हमले करके न सिर्फ़ अपनी हाइपरसोनिक और लंबी दूरी की मिसाइलों को लाइव वॉर-ज़ोन में टेस्ट किया, बल्कि ख़ुद को अरब दुनिया में एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस के एक बड़े खिलाड़ी के तौर पर प्रोजेक्ट किया.
जब सऊदी अरब समर्थित यमन सरकारी बलों ने हूतियों को पीछे धकेलने के लिए जवाबी अभियान चलाया और रियाद के नेतृत्व वाली नाकेबंदी सख़्त हुई, तो हूतियों ने सीधे सऊदी अरब की आर्थिक लाइफ़लाइन यानी रियाद और दम्माम के इंटरनेशनल एयरपोर्ट्स और ऑयल रिफ़ाइनरियों पर बैलिस्टिक मिसाइलों के लगातार हमले कर दिए.
हूतियों का ये हाई-टेक अपग्रेड क्यों एक बड़ी चेतावनी है
हूती विद्रोहियों की कहानी इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि 21वीं सदी का युद्ध अब सिर्फ़ बड़े देशों की पारंपरिक सेनाओं के बीच नहीं लड़ा जा रहा है.
जैसा कि 'द वॉल स्ट्रीट जर्नल' और कॉन्फ़्लिक्ट आर्मामेंट रिसर्च (सीएआर) कीअक्तूबर 2026 की रिपोर्ट से साफ़ है, एक नॉन-स्टेट हथियारबंद गुट ने ईरानी ब्लूप्रिंट, चीनी कंपनियों के कॉम्पोनेंट्स, ग्लोबल स्मगलिंग नेटवर्क और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई) को मिलाकर अपनी ख़ुद की बैलिस्टिक मिसाइल असेंबली लाइन खड़ी करने की दिशा में क़दम बढ़ा दिया है.
अगर हूती 1,200 मील की मारक क्षमता और 6,000 मील प्रति घंटे की रफ़्तार से दिशा बदलने वाली ख़ैबर शिकन जैसी मिसाइलों का बड़े पैमाने पर घरेलू उत्पादन शुरू करने में कामयाब हो जाते हैं, तो ये न सिर्फ़ सऊदी अरब और इसराइल के एयर डिफ़ेंस के लिए एक नया सिरदर्द होगा, बल्कि ग्लोबल सप्लाई चेन और अंतरराष्ट्रीय हथियार नियंत्रण की पूरी व्यवस्था के लिए भी एक बहुत बड़ा सवालिया निशान होगा.
AI outlook — possibilities, not facts
सऊदी अरब और खाड़ी देशों के बुनियादी ढांचे पर हूती मिसाइल हमले जारी रह सकते हैं।
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