सबा हैदरः अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से निकलकर अमेरिका में चुनाव जीतने तक का सफ़र
उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ियाबाद में पली बढ़ीं सबा हैदर ने अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में इलिनॉयस राज्य की 84वीं डिस्ट्रिक्ट सीट पर जीत दर्ज की है।
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ग़ाज़ियाबाद की रहने वाली सबा हैदर ने अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में डेमोक्रेट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में इलिनॉयस राज्य की 84वीं डिस्ट्रिक्ट सीट पर 71.8 फ़ीसदी वोट हासिल कर जीत दर्ज की है।
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Why It Matters
सबा हैदर उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ियाबाद की रहने वाली हैं और शादी के बाद अमेरिका बस गई थीं। उन्होंने अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में जीत हासिल की है।
उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ियाबाद में पली बढ़ीं सबा हैदर ने हालिया अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में इलिनॉयस राज्य की 84वीं डिस्ट्रिक्ट सीट के चुनाव में जीत दर्ज की है।
सबा डेमोक्रेट पार्टी से चुनाव में खड़ी थीं और उन्हें 71.8 फ़ीसदी वोट मिले।
सबा हैदर का परिवार मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर का है और बाद में यह परिवार दिल्ली से सटे ग़ाज़ियाबाद में बस गया।
उनकी स्कूलिंग ग़ाज़ियाबाद में हुई है और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से वाइल्ड लाइफ़ साइंस में एमएससी की पढ़ाई की। उनके पिता ने बताया कि शादी के बाद 20 साल पहले वो अमेरिका चली गईं और वहीं बस गईं।
सबा हैदर के भाई ने समाचार एजेंसी एएनआई को बताया कि उन्होंने योगा टीचर के रूप में भी काम किया है।
उन्होंने कहा, "चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद से ही हम सभी के लिए यह बेहद खुशी और जश्न का मौका रहा है। यह हमारे पड़ोसियों, समुदाय, परिचितों और पूरे ग़ाज़ियाबाद शहर के लिए गर्व की बात है।"
"दरसअल, यह पूरे देश की जीत है। यह सिर्फ हमारी बहन, ग़ाज़ियाबाद या हमारे पैतृक शहर बुलंदशहर की जीत नहीं है, बल्कि पूरे भारत की जीत है।"
"एक तरह से यह उपलब्धि भारत की सभी बेटियों को समर्पित है। यह उन्हें आगे बढ़ने और अपने सपनों को पूरा करने के लिए प्रेरित करेगी, क्योंकि सच में उनके सामने पूरा आसमान खुला है।"
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बात करते हुए सबा हैदर के भाई अब्बास हैदर ने कहा, "सबा शादी के बाद साल 2007 में पति के साथ अमेरिका चली गईं, उनके पति सॉफ़्टवेयर में नौकरी करते थे।"
"सबा का भारत में ही योगा के प्रति काफ़ी लगाव था और अमेरिका जाकर भी वह वहां शिक्षकों को योगा सिखाती थीं। वह वहां टीचर्स की योगा ट्रेनर बन गईं।"
सबा हैदर का स्टेट एसेंबली तक पहुंचने का सफ़र काफ़ी दिलचस्प रहा है। इससे पहले न तो वह और न ही उनका परिवार कभी राजनीति से जुड़ा हुआ था।
सबा हैदर ने एक निजी समाचार चैनल से बात करते हुए कहा, "मैं किसी राजनीतिक परिवार से ताल्लुक नहीं रखती हूं। मेरी मां एक छोटा सा स्कूल (ग़ाज़ियाबाद में) चलाती हैं। मेरे पिताजी रिटायर इंजीनियर हैं। मेरा भाई बिज़नेस करता है। यही मेरी विरासत रही है।"
उन्होंने अपनी जीत पर कहा, "मैं यही कहूंगी कि स्काई इज़ द लीमिट एंड स्काई इज़ द बिगिनिंग।"
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक ख़बर के मुताबिक़, पिता सैयद अली हैदर इंजीनियर थे और रिटायर हो चुके हैं। उनकी मां के अनुसार, उनकी बेटी की दिलचस्पी बचपन से ही सार्वजनिक मामलों में थी।
स्कूल में होने वाली डिबेट और भाषण प्रतियोगिताओं ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाने में मदद की। पढ़ाई में रुचि और सार्वजनिक चर्चाओं में हिस्सा लेने की इच्छा ने धीरे-धीरे उनकी राजनीति में दिलचस्पी बढ़ाई।
वह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से वाइल्डलाइफ़ साइंसेज में विशेषज्ञता हासिल की और गोल्ड मेडल जीता। यह उनकी अकादमिक यात्रा की एक अहम उपलब्धि थी।
सबा हैदर ने अपनी चुनावी जीत पर समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा, "यह सच में ऐसा अनुभव है जिसपर यकीन नहीं हो रहा है। हमने पिछले 15 महीने से काफ़ी कड़ी मेहनत की थी। यहां चुनावों की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है। अमेरिका चौंकाने वाला देश है। अगर कुछ भी ग़लत हो जाता है तो कुछ भी बिगड़ सकता है।"
सबा हैदर की जीत के बाद उनके भारत में उनके परिवार में जश्न का माहौल है। उनकी चुनावी जीत के साथ ही मीडिया के कैमरे, पड़ोसी, रिश्तेदार और क़रीबी उनके घर पर पहुंचने लगे।
सबा की मां शहनाज़ हैदर ने कहा, "मेरी ज़िंदगी सफल हो गई है। लोग कह रहे हैं कि मेरी बेटी एशियाई मूल की पहली महिला है जो वहां तक पहुंची है। मेरी मेहनत काबयाब हो गई। वोटों की गिनती के दौरान सारे घर वाले रात भर जगते रहे। कभी वह मैसेज का जवाब देती थी कभी नहीं देती थी। फिर सुबह छह बजे जब मैं स्कूल में थी तब उसका मैसेज आया कि मां मैं जीत गई हूं। मैं कुर्सी से उछल गई।"
"मैं स्कूल चलाती हूं। मैं जल्दी जल्दी स्कूल से घर आई और सबको बताया कि सबा जीत गई है। हम सब इतने दिनों से जिसके लिए मेहनत कर रहे थे आज उसका फल मिल गया।"
सबा हैदर के पिता सैयद अली हैदर ने बताया, "मैं वहां चुनाव में रहा हूं। जो ज़्यादा लोगों तक डोर-टू-डोर पहुंच सकेगा और अपने इरादों को, अपनी बातों को मनवा लेगा वही वोट पाएगा।"
"वहां पहले से मतदान की पेटियां मॉल या लाइब्रेरी जैसी जगहों पर रख दी जाती हैं और उसमें लोग अपनी सहूलितय से पहले से ही वोट डाल सकते हैं। कभी उस तरफ गए तो अपना वोट डाल दिया। जबकि वोटिंग के अंतिम दिन कतार में खड़े होकर वोट डालना होता है।"
सबा हैदर के पिता ने बताया कि उनका इस बार भी इरादा था कि सीनेटर के लिए चुनाव लड़ें, लेकिन मामला किन्हीं वजहों से आगे नहीं बढ़ पाया। इसलिए वह स्टेट रिप्रेज़ेंटेटिव के लिए चुनाव लड़ीं।
सबा के भाई ने बताया कि ग्रेजुएशन में सबा ने गोल्ड मेडल हासिल किया। फिर उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से वाइल्ड लाइफ़ साइंसेस में एमएससी की। वहां भी उन्हें गोल्ड मेडल मिला।
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, "सबा ने जिम कॉर्बेट नेशनल टाइगर रिज़र्व में टाइगर पर चार महीने रिसर्च की। वह शादी कर के तकरीबन 20 साल पहले भारत से अमेरिका गई थीं। तब ऐसा न शायह उन्हें मालूम था और न हमें मालूम था कि आगे जाकर वह राजनीति में जाएंगीं।"
सबा अमेरिका में स्कूल में पैरेंट टीचर्स एसोसिएशन (पीटीए) की अध्यक्ष बनीं। फिर वो क्षेत्रीय पीटीए की प्रमुख बनीं। इस तरह से सबा हैदर अपने बच्चों के स्कूल में पैरेंट्स-टीचर एसोसिएशन की प्रमुख आवाज़ बन गईं।
सबा हैदर के पिता सैयद अली हैदर ने बताया, "वहां जो स्थानीय लोग और समुदाय थे सबा को उनके लिए काम करना था। वह काउंटी बोर्ट की कमीश्रनर थीं, उसमें आठ ज़िले थे। उनका काम था सारे स्कूल, खेलकूद के लिए ज़मीन आवंटित कराना। तो यह क्षेत्रीय स्तर पर काम था।"
Open Questions
- सबा हैदर अपने कार्यकाल के दौरान किन प्राथमिकताओं पर काम करेंगी?

