भारत निर्वाचन आयोग: मतदाता सूची सुधार प्रक्रिया में ईआरओ को मिले अधिक अधिकार
महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी ने ईसीआईनेट सॉफ़्टवेयर में बदलाव और ईआरओ के अधिकारों के विस्तार के लिए पांच प्रमुख मांगें रखीं।
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भारत निर्वाचन आयोग ने एसआईआर प्रक्रिया के दौरान निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) को सुनवाई से जुड़े व्यापक अधिकार दिए हैं। महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी एस. चोकलिंगम ने सॉफ़्टवेयर में सुधार और मतदाताओं की सुविधा के लिए पांच महत्वपूर्ण मांगें रखी हैं।
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Why It Matters
निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के नियम 20(3) के तहत ईआरओ को दावेदारों को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश देने का अधिकार है। महाराष्ट्र चुनाव कार्यालय ने ईसीआईनेट सॉफ़्टवेयर में सुधार के लिए 24 सितंबर को चुनाव आयोग को पत्र लिखा था।
भारत के चुनाव आयोग ने हाल ही में राज्यों के मुख्य चुनाव अधिकारियों के साथ बैठक की।
महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी एस. चोकलिंगम ने बीबीसी मराठी को बताया कि बैठक में एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान सुनवाई से जुड़े अधिकार निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों यानी ईआरओ को देने की घोषणा की गई है।
महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी कार्यालय ने 24 सितंबर को दिल्ली में चुनाव आयोग को एक पत्र भेजा था। बीबीसी मराठी को इस पत्र की एक प्रति मिली है।
यह पत्र ईसीआईनेट सॉफ़्टवेयर में ज़रूरी बदलाव करने से जुड़ा है, ताकि ईआरओ यानी निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी अपने अधिकारों का सही और प्रभावी तरीक़े से इस्तेमाल कर सकें।
चुनाव कार्यालय ने पांच मांगें रखीं
इस पत्र में चुनाव कार्यालय ने पांच मांगें रखी हैं। इनका सीधा संबंध एसआईआर प्रक्रिया के दौरान मतदाताओं के नाम सूची में शामिल करने से है।
ये पांच मांगें क्या हैं, अब कौन से बदलाव किए जा रहे हैं और कौन से बदलाव अभी तक नहीं हुए हैं, इसे लेकर महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी एस. चोकलिंगम ने बीबीसी मराठी से बात की।
1. ईआरओ और एईआरओ को फ़ैसला लेने की सुविधा मिले
इस समय 'प्रमुख व्यक्तियों' और विदेश में रहने वाले मतदाताओं की श्रेणी में पहचाने गए लोगों को व्यक्तिगत सुनवाई से छूट देने की व्यवस्था उपलब्ध है।
लेकिन दूसरी श्रेणियों के मतदाताओं के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।
यह भी संभव है कि मतदाता सूची में कुछ प्रमुख व्यक्तियों की अलग से पहचान या रिकॉर्ड दर्ज न हो।
इसके अलावा बुज़ुर्ग मतदाता, विकलांग व्यक्ति और दूसरे कमज़ोर वर्गों के मतदाता भी ऐसी परिस्थितियों में हो सकते हैं, जिनके कारण वे व्यक्तिगत सुनवाई के लिए उपस्थित न हो पाएं।
निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के नियम 20(3) के तहत ईआरओ को किसी दावेदार, आपत्ति दर्ज कराने वाले व्यक्ति या जिसके ख़िलाफ़ आपत्ति दर्ज की गई है, उसे अपने सामने व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश देने का अधिकार है।
यह अधिकार ईआरओ के विवेक पर निर्भर है।
इसे देखते हुए ईसीआईनेट सॉफ़्टवेयर में ऐसी व्यवस्था करने की मांग की गई है, जिससे ईआरओ और सहायक निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी यानी एईआरओ हर मामले में यह तय कर सकें कि व्यक्तिगत सुनवाई की ज़रूरत है या नहीं।
इसके लिए ईआरओ और एईआरओ के लॉगइन में 'टेक एक्शन' वाले हिस्से में मौजूद दो विकल्पों के अलावा तीसरा विकल्प जोड़ने की मांग की गई है।
इस विकल्प का नाम 'एक्ज़ेम्प्टेड फ़्रॉम हियरिंग' यानी 'सुनवाई से छूट' रखने का प्रस्ताव है।
2. दूसरे दस्तावेज़ देने का विकल्प मिले
चुनाव आयोग की ओर से भेजे गए नोटिस के पीछे दस्तावेज़ों की एक सूची दी गई है।
आयोग ने साफ़ किया है कि यह सूची केवल उदाहरण के तौर पर दी गई है और इसमें सभी तरह के दस्तावेज़ शामिल नहीं हैं।
इसलिए दस्तावेज़ों की सूची में 14वें विकल्प के रूप में 'अन्य या उसके बराबर का कोई दूसरा दस्तावेज़' जोड़ने की मांग की गई है।
इससे मतदाता अपने दावे के समर्थन में या नोटिस का जवाब देते समय कोई दूसरा संबंधित दस्तावेज़ भी अपलोड कर सकेगा।
विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह यानी पीवीटीजी, बेघर लोगों और व्यावसायिक यौनकर्मियों यानी सीएसडब्ल्यू की श्रेणी में आने वाले मतदाताओं के पास चुनाव आयोग की सूची में बताए गए दस्तावेज़ों में से कोई भी दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं हो सकता है।
ऐसे मामलों में मतदाता सूची से जुड़ी मार्गदर्शिका के अध्याय सात और अध्याय आठ के प्रावधानों पर विचार किया जा सकता है।
अध्याय सात नागरिकता तय करने और अध्याय आठ सामान्य निवास स्थान तय करने से जुड़ा है। इनमें ऐसे वर्गों के लोगों के लिए संबंधित प्रावधान किए गए हैं।
अगर ईआरओ को किसी दूसरे दस्तावेज़ की उपयोगिता और वैधता पर भरोसा हो जाता है, तो संबंधित विसंगति पर फ़ैसला करते समय उस दस्तावेज़ पर विचार किया जा सकता है।
इस बीच, अख़बारों में छपी ख़बरों के मुताबिक़, दिल्ली में एसआईआर से जुड़े मामले में चुनाव आयोग के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है, "अगर उनके पास कोई भरोसेमंद आधार या सबूत है, तो उसे संबंधित अधिकारी के सामने पेश किया जा सकता है। दस्तावेज़ों की यह सूची पूरी नहीं है।"
उन्होंने यह भी कहा कि उम्र से जुड़ी विसंगति को साबित करने के लिए "भाई या बहन का जन्म प्रमाणपत्र शायद पर्याप्त हो सकता है।"
3. बीएलओ के बयान या पंचनामे के आधार पर फ़ैसले का अधिकार मिले
फ़िलहाल नाम से जुड़ी कुछ तार्किक विसंगतियों यानी 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' के मामलों में ईआरओ स्तर पर फ़ैसला करने के लिए बूथ लेवल अधिकारी यानी बीएलओ का बयान या पंचनामा पर्याप्त माना जाता है।
लेकिन दूसरे प्रकार की विसंगतियों के लिए अतिरिक्त दस्तावेज़ों की ज़रूरत होती है। इसके बाद इन दस्तावेज़ों की जांच ज़िला चुनाव अधिकारी यानी डीईओ के स्तर पर की जाती है।
प्रस्ताव है कि सभी तरह की तार्किक विसंगतियों के मामलों में ईआरओ को अपने स्तर पर ही समस्या हल करने का विकल्प दिया जाए।
अगर ईआरओ को लगता है कि बीएलओ का बयान या पंचनामा फ़ैसला लेने के लिए पर्याप्त आधार है, तो वह उसी आधार पर संबंधित विसंगति दूर कर सके।
अगर केवल बीएलओ के बयान या पंचनामे से विसंगति को संतोषजनक तरीक़े से दूर करना संभव न हो, तभी मतदाता से संबंधित अतिरिक्त दस्तावेज़ मांगे जाएं।
इसके बाद उन दस्तावेज़ों को जांच के लिए डीईओ के पास भेजा जा सकता है।
किसी विशेष विसंगति को दूर करने के लिए ज़रूरी दस्तावेज़ केवल मार्गदर्शक सूची में दिए गए 13 दस्तावेज़ों तक सीमित न रहें।
ईआरओ को ऐसा कोई भी दूसरा संबंधित और वैध दस्तावेज़ स्वीकार करने की सुविधा दी जाए, जिसे वह विसंगति दूर करने के लिए सही मानता हो।
4. 'पिछले एसआईआर का अंश' अपलोड करना वैकल्पिक हो
इस समय सभी तरह की तार्किक विसंगतियों के मामलों में 'पिछले एसआईआर का अंश' यानी 'एक्सट्रैक्ट ऑफ़ लास्ट एसआईआर' अपलोड करना अनिवार्य है।
लेकिन ये तार्किक विसंगतियां पिछले एसआईआर की मतदाता सूची से की गई मैपिंग के आधार पर ही तैयार की जा रही हैं।
इसलिए हर मामले में पिछले एसआईआर का अंश अपलोड करना ज़रूरी नहीं हो सकता।
प्रस्ताव है कि 'पिछले एसआईआर का अंश' अपलोड करना वैकल्पिक बनाया जाए।
मतदाता से यह अंश केवल उन मामलों में मांगा जाए, जहां सिस्टम में मौजूद पिछले एसआईआर की जानकारी और मतदाता की ओर से सही बताई गई या साबित की गई मैपिंग की जानकारी में अंतर हो।
5. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल और उनके जवाब जारी किए जाएं
राज्य में निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों के मन में नोटिस जारी करने की प्रक्रिया को लेकर कई सवाल हैं।
आगे किसी तरह की परेशानी से बचने के लिए चुनाव आयोग या मुख्य चुनाव अधिकारी की ओर से केवल मौखिक निर्देश देना पर्याप्त नहीं माना जा रहा है।
इसकी वजह यह है कि चुनाव और मतदाता पंजीकरण से जुड़े सभी काम हमेशा चुनाव आयोग के लिखित निर्देशों के मुताबिक़ किए जाते हैं।
अख़बारों में छपी ख़बरों के मुताबिक़, सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि इस प्रक्रिया को लेकर उठने वाले सवालों, आपत्तियों और शंकाओं के लिए तय जवाबों का एक संग्रह तैयार किया जाए और उसे सभी संबंधित लोगों को उपलब्ध कराया जाए।
इसलिए एसआईआर-2026 के तहत नोटिस, दस्तावेज़ जमा करने की प्रक्रिया, सुनवाई और मामलों का निपटारा करने से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवालों यानी एफ़एक्यू का एक दस्तावेज़ तैयार कर संबंधित ऑनलाइन माध्यमों पर उपलब्ध कराने की मांग की गई है।
महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी ने क्या कहा?
महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी एस. चोकलिंगम ने अपने भेजे गए पत्र पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।
लेकिन उन्होंने इस पर बात की कि क्या ईआरओ को मिले अधिकारों के मुताबिक़ सॉफ़्टवेयर में व्यवस्था की गई है। उन्होंने अब तक किए गए बदलावों की जानकारी भी दी।
एस. चोकलिंगम ने कहा, "मतदाताओं को सुनवाई के लिए व्यक्तिगत रूप से आने की ज़रूरत नहीं है। सुनवाई केवल तभी की जानी चाहिए, जब इसकी ज़रूरत हो।"
"जहां तक संभव हो, मतदाताओं से दस्तावेज़ लिए जाएं। निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी इन्हीं के आधार पर फ़ैसला करें।"
उन्होंने कहा, "क़ानून के तहत ईआरओ के पास पर्याप्त अधिकार हैं। वे मौके पर जांच कर फ़ैसला ले सकते हैं।"
"अगर मतदाता की योग्यता को लेकर कोई संदेह नहीं है, यानी वह 18 साल से ज़्यादा उम्र का है और भारत का नागरिक है, तो स्थानीय जांच के आधार पर फ़ैसला किया जा सकता है।"
उनसे पूछा गया कि निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों को मिले अधिकारों के मुताबिक़ ईसीआई सॉफ़्टवेयर में बदलाव किए गए हैं या नहीं और इसमें कितना समय लगेगा?
इसके जवाब में उन्होंने कहा, "चुनाव आयोग के साथ बैठक हुई है। सुनवाई से जुड़े अधिकार ईआरओ को दे दिए गए हैं। आयोग ने कहा है कि बाक़ी मामलों के बारे में बाद में जानकारी दी जाएगी।"
नए निर्देश क्या हैं?
1. जिन मतदाताओं की पुराने रिकॉर्ड से मैपिंग नहीं हुई है यानी जो 'नो मैपिंग' श्रेणी में हैं या जिनकी मैपिंग में तार्किक विसंगति है, उन्हें सुनवाई में आने के लिए नोटिस जारी किए गए होंगे।
लेकिन आयोग के संशोधित निर्देशों के मुताबिक़, नोटिस में सुनवाई के लिए उपस्थित होने को कहा गया हो, तब भी मतदाता को व्यक्तिगत रूप से सुनवाई में आने की ज़रूरत नहीं होगी।
2. जिन मतदाताओं को नोटिस मिला है, उनके घर बूथ लेवल अधिकारी यानी बीएलओ जाएंगे और ज़रूरी दस्तावेज़ जमा करेंगे।
इन दस्तावेज़ों के आधार पर ईआरओ या एईआरओ फ़ैसला लेंगे।
नोटिस पाने वाले मतदाता व्हाट्सऐप के ज़रिए भी संबंधित बीएलओ को ज़रूरी दस्तावेज़ या सबूत भेज सकेंगे।
3. जिन मतदाताओं के मामलों में तार्किक विसंगति है, उनसे केवल उसी विसंगति से जुड़े दस्तावेज़ लिए जाएंगे।
इन दस्तावेज़ों या बीएलओ की जांच रिपोर्ट अथवा पंचनामे के आधार पर फ़ैसला लिया जाएगा।
नोटिस पाने वाले मतदाता इन शिविरों में भी अपने दस्तावेज़ जमा कर सकेंगे।
6. बेघर मतदाताओं, मज़दूरों, ग़रीब लोगों, आदिवासी समुदाय और ख़ास तौर पर पीवीटीजी समूहों के लोगों, अनाथ समूहों के मतदाताओं और दूसरे कमज़ोर वर्गों के लिए विशेष शिविर या सहायता केंद्र लगाने के निर्देश दिए गए हैं।
7. भारत के चुनाव आयोग ने सभी निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों को विशेष सावधानी बरतने का निर्देश दिया है, ताकि किसी भी योग्य मतदाता का नाम मतदाता सूची में शामिल होने से न रह जाए।
8. जिन मामलों में पर्याप्त सबूत उपलब्ध नहीं हैं या मिले हुए दस्तावेज़ों के आधार पर फ़ैसला लेना संभव नहीं है, उनमें आगे की कार्रवाई से पहले मतदाता को ज़रूरी दस्तावेज़ जमा करने का मौक़ा दिया जाएगा।
इसके बाद सुनवाई की जाएगी और आदेश पारित किया जाएगा।
9. मतदाताओं से संपर्क करने और दस्तावेज़ जमा करने के लिए बूथ लेवल अधिकारी राजनीतिक दलों के बूथ स्तर के प्रतिनिधियों के साथ तालमेल रखेंगे।
What to Watch
AI outlook — possibilities, not facts
ईसीआईनेट सॉफ़्टवेयर में सुनवाई से छूट का विकल्प जोड़ा जाएगा।
Likely · Within months
Open Questions
- सॉफ़्टवेयर में सभी बदलाव कब तक लागू होंगे?
- क्या अन्य राज्यों में भी समान प्रक्रिया अपनाई जाएगी?




