
आईआईएससी की रिपोर्ट कहती है कि पुरस्कार मिलने से यह सुनिश्चित नहीं होता कि शहरों के लोग साफ हवा में सांस ले रहे हैं।
आईआईएससी बेंगलुरु के अध्ययन में कहा गया है कि स्वच्छ वायु सर्वेक्षण 2026 में पुरस्कृत शहरों की रैंकिंग में वास्तविक एक्यूआई शामिल नहीं है। लखनऊ को 200 में से 198 अंक मिले, लेकिन दिसंबर में उसका एक्यूआई 374 'बहुत खराब' श्रेणी में दर्ज किया गया। रिपोर्ट में प्रणाली में हितों के टकराव की भी बात कही गई है।
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स्वच्छ वायु सर्वेक्षण पिछले पांच साल से दिया जा रहा है। इसका मकसद उन 131 शहरों को प्रोत्साहित करना था जो 2011 से 2015 के दौरान राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों को पूरा करने में विफल रहे थे। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के तहत यह प्रणाली अपनाई गई है।
बेंगलुरु स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (आईआईएससी) की एक टीम ने हवा की गुणवत्ता को लेकर एक विश्लेषण किया है जो उन शहरों के बारे में है, जिन्हें साफ हवा के लिए उठाए गए कदम के लिए पुरस्कार मिले हैं।
इसमें कहा गया है कि सिर्फ पुरस्कार मिल जाने से यह सुनिश्चित नहीं हो जाता कि उन शहरों के लोग साफ हवा में सांस ले रहे हैं।
अच्छे एक्यूआई के लिए स्वच्छ वायु सर्वेक्षण 2026 में कुल 10 शहरों को पुरस्कार दिए गए।
इनमें तीन लाख से कम आबादी वाले शहरों से लेकर 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले शहर तक शामिल थे। ये अवॉर्ड पिछले पांच साल से दिए जा रहे हैं।
इस अवॉर्ड का मकसद उन 131 शहरों को हवा सुधारने के लिए प्रोत्साहित करना था, जो 2011 से 2015 के दौरान नेशनल एम्बिएंट एयर क्वालिटी स्टैंडर्ड्स (एनएएक्यूएस) को पूरा करने में नाकाम रहे थे।
हालांकि, भारतीय विज्ञान संस्थान की स्टडी में नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (एनसीएपी) के तहत अपनाए गए सिस्टम और अवॉर्ड देने के मानदंड पर सवाल उठाए गए हैं।
आईआईएससी की सस्टेनेबल ट्रांसपोर्टेशन लैब के संयोजक प्रोफेसर आशीष वर्मा ने बीबीसी न्यूज हिंदी से कहा, "मौजूदा कार्यप्रणाली वास्तविक प्रदूषण के स्तर का आकलन नहीं करती है. इसका ज्यादा ध्यान इस बात पर होता है कि प्रशासन ने तय नियमों और प्रक्रियाओं का पालन किया या नहीं."
दरअसल, इस मूल्यांकन के तरीके में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की ओर से जारी किया जाने वाला एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) भी शामिल नहीं किया जाता।
बीबीसी न्यूज हिंदी ने इस बारे में सीपीसीबी को ईमेल भेजा है. उनका जवाब मिलने के बाद इस रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा।
वहीं, बेंगलुरु के सेंटर फॉर स्टडी ऑफ साइंस, टेक्नोलॉजी एंड पॉलिसी यानी सीएसटीईपी में वायु गुणवत्ता टीम के प्रमुख प्रकाश दुरईस्वामी की राय थोड़ी अलग है।
उन्होंने बीबीसी न्यूज हिंदी से कहा, "रिपोर्ट में कुछ ऐसे पहलू हैं जिन पर विचार किया जाना चाहिए. लेकिन इसके कुछ प्वाइंट्स पर मेरी राय बिल्कुल अलग है."
'नंबर में लखनऊ आगे लेकिन हवा खराब'
प्रोफेसर आशीष वर्मा ने क्लीन एयर सर्वे 2026 में पहले और दूसरे स्थान पर रहे लखनऊ और इंदौर का उदाहरण दिया. ये दोनों शहर 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों की श्रेणी में हैं।
उन्होंने कहा, "इन शहरों को लगभग पूरे अंक मिले. लखनऊ को 200 में से 198 अंक मिले. इसका मतलब है कि उसने लगभग सभी तय मानदंड पूरे कर लिए हैं और उसके लिए करने को कुछ बचा नहीं है."
"लेकिन जब हमने पिछले एक साल के लखनऊ के एक्यूआई के आंकड़े देखे, तो पाया कि दिसंबर महीने में उसका एक्यूआई 374 था. सीपीसीबी के मानकों के मुताबिक 374 का एक्यूआई 'बहुत खराब' श्रेणी में आता है."
सीपीसीबी के मानक क्या हैं?
प्रोफेसर आशीष वर्मा ने बताया, "सीपीसीबी के एक्यूआई मानकों के अनुसार 0 से 50 के बीच का एक्यूआई अच्छा माना जाता है. 51 से 100 संतोषजनक, 101 से 200 मध्यम, 201 से 300 खराब, 301 से 400 बेहद खराब और 400 से ऊपर गंभीर श्रेणी में आता है."
उन्होंने कहा, "जब लखनऊ का एक्यूआई बेहद खराब श्रेणी में दर्ज किया गया है, तो उसे पूरी तरह मानकों का पालन करने वाला शहर मानना हैरान करने वाला है. पुरस्कार देने का मतलब तो ये निकलता है कि वहां सब कुछ ठीक है."
दूसरे शहरों का हाल भी ऐसा ही
आशीष वर्मा कहते हैं कि दूसरे शीर्ष रैंक वाले शहरों के आंकड़े भी कुछ ऐसे ही हैं।
उन्होंने कहा, "इंदौर का एक्यूआई 192, जबलपुर का 196, भोपाल का लगभग 202, आगरा का 324, सूरत का 229 और रायपुर का 238 रहा है."
"इसकी वजह ये है कि एक्यूआई के आंकड़ों को, जिन्हें सीपीसीबी खुद जुटाता है, रैंकिंग के मानदंडों में शामिल ही नहीं किया गया."
रिपोर्ट एक और अहम बात की ओर इशारा करती है. छत्तीसगढ़ का कोरबा शहर, जो दूसरी कैटेगरी में आता है. इसकी आबादी करीब 3.5 लाख है. ये कोयला आधारित उद्योगों का बड़ा केंद्र है।
वहीं तालचेर, अंगुल और कलिंग नगर शहर तीसरी कैटेगरी में आते हैं. यहां की आबादी तीन लाख से कम है. ये शहर बड़े कारखाने, एल्युमिनियम और थर्मल पावर प्लांट के लिए जाने जाते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है, "इन शहरों की पहचान मुख्य रूप से औद्योगिक शहरों के रूप में है और प्रति व्यक्ति औद्योगिक प्रदूषण के मामले में ये कई बड़े महानगरों से भी आगे हो सकते हैं."
प्रोफेसर आशीष वर्मा का कहना है, "असल में हुआ ये है कि एक चेकलिस्ट बना दी गई है. कितने ईवी चार्जिंग स्टेशन लगाए गए, कितना सीवेज एकत्र किया गया, निर्माण कार्यों से निकलने वाली धूल और मलबे को कैसे निपटाया गया."
"इन कामों की प्रगति के आधार पर अंक दिए जाते हैं. लेकिन, इन उपायों से हवा की गुणवत्ता में वास्तव में कितना सुधार हुआ, इसका आकलन इस प्रक्रिया में नहीं किया जाता."
प्रोफेसर आशीष वर्मा ने कहा, "स्कोरिंग और रैंकिंग की प्रक्रिया में प्रदूषण के वास्तविक स्तर को शामिल नहीं किया जाता. इसके अलावा, जो प्रशासनिक चेकलिस्ट वो पीएम 2.5 की जगह मुख्य रूप से पीएम 10 पर केंद्रित है."
पीएम10 हवा में मौजूद बेहद सूक्ष्म कण होते हैं, जिनका आकार इंसान के बाल की मोटाई का लगभग पांचवां हिस्सा होता है. वहीं पीएम 2.5 कण पीएम 10 से भी छोटे होते हैं।
पीएम 2.5 इतना खतरनाक क्यों है?
प्रोफेसर आशीष के अनुसार, "पीएम 2.5 स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं और प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों व समय से पहले होने वाली मौतों से जुड़े हैं."
"पीएम 2.5 अधिक खतरनाक होता है क्योंकि इसके कण इतने छोटे होते हैं कि वो शरीर की प्राकृतिक फिल्टर प्रणाली को पार कर भीतर गहराई तक पहुंच जाते हैं. कोई भी स्वास्थ्य विशेषज्ञ आपको बता सकता है कि ये कितना खतरनाक हैं."
उनके अनुसार, "अध्ययन के दौरान एक और चौंकाने वाली बात सामने आई. इसमें पाया गया कि इसमें कृषि अवशेष जलाने से पैदा होने वाले प्रदूषण को भी शामिल नहीं किया गया है, जबकि यही दिल्ली और दूसरे कई शहरों में दिखने वाले स्मॉग का एक प्रमुख कारण है."
कुल मिलाकर, रिपोर्ट बताती है कि शहरों को पुरस्कार देने की प्रणाली में 'हितों का टकराव' है।
उदाहरण देखें तो, शहरी स्थानीय निकाय ही इसे लागू करने वाले, डेटा जुटाने वाले, खुद का मूल्यांकन करने वाले और पुरस्कार पाने वाले बन जाते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में स्वतंत्र रूप से जमीनी स्तर पर सत्यापन नहीं होता. इसमें एक्यूआई यानी हवा की गुणवत्ता सूचकांक को शामिल न करने जैसी कमियां भी हैं।
'पूरी तरह खत्म करना समाधान नहीं'
प्रकाश दुरईस्वामी इस पूरे कार्यक्रम को खत्म करने के सुझाव से सहमत नहीं हैं, "मेरी राय में ऐसा करना सही नहीं होगा, मुझे लगता है कि इस कार्यक्रम ने काम करने के तरीकों में कुछ बदलाव किए हैं."
उन्होंने आगे कहा, "हमारा ध्यान इस पर होना चाहिए कि इसे और अधिक मजबूत कैसे बनाया जाए. इसके पैमानों में किस तरह के बदलावों की जरूरत है और इन पैमानों को मापने के लिए हम वास्तव में किन मार्कर्स का इस्तेमाल करते हैं."
हालांकि वो रिपोर्ट की एक बात से सहमत हैं. उनके मुताबिक एनसीएपी को शहरों से परे जाकर क्षेत्रीय नजरिए से देखना चाहिए।
उन्होंने कहा, "प्रदूषण के कई स्रोत शहर की सीमाओं के बाहर भी होते हैं. अभी सारा ध्यान शहरों और मुख्य रूप से प्राथमिक प्रदूषकों पर ही है."
दुरईस्वामी इस बात से भी सहमत हैं कि हवा की गुणवत्ता बहुत महत्वपूर्ण पहलू है, जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
वो कहते हैं, "खराब हवा हर एक व्यक्ति को प्रभावित करती है. खराब हवा का असर स्वास्थ्य पर पड़ता है. इसके अलावा, इसका आर्थिक और जलवायु से जुड़ा असर भी होता है."
कार्यक्रम की समीक्षा जारी
दुरईस्वामी का मानना है कि एनसीएपी कार्यक्रम अभी समीक्षा के दौर में है. वो विभिन्न संगठनों से इनपुट ले रहे हैं कि इसमें क्या शामिल किया जा सकता है और इसे कैसे बेहतर बनाया जा सकता है।
उन्होंने कहा, "एक बात साफ है कि शुरुआती चरण में पीएम 10 और धूल से जुड़े प्रदूषण स्रोतों पर ध्यान दिया गया है. अब व्यापक फीडबैक ये मिल रहा है कि हमें और बारीक कणों, यानी पीएम 2.5 आकार वाले कणों पर भी ध्यान देना शुरू करना चाहिए."
AI outlook — possibilities, not facts
सीपीसीबी इस रिपोर्ट का जवाब देगा और रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा।
Very likely · Within days
एनसीएपी कार्यक्रम की समीक्षा जारी रहेगी और इसमें पीएम 2.5 पर अधिक ध्यान दिया जा सकता है।
Likely · Within weeks
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