बंटवारे के दर्द और मानवीय रिश्तों की दास्तान: असग़र वजाहत के नाटक से लेकर 'बंटवारा 1947' तक
भारत के बंटवारे की पृष्ठभूमि पर बने नाटक और फिल्मों में महिलाओं के संघर्ष, दर्द और मानवीय रिश्तों की अनकही कहानियां।
Hızlı Bakış
असग़र वजाहत के प्रसिद्ध नाटक 'जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याई नइ' और फिल्म 'बंटवारा 1947' के जरिए भारत के विभाजन के दर्द, लाहौर में छूटी एक बूढ़ी हिंदू महिला और महिलाओं के संघर्ष की दास्तान बयां की गई है।
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भारत का 1947 का विभाजन और उससे जुड़े विस्थापन और मानवीय त्रासदी पर आधारित कला और साहित्य की चर्चा।
"अम्मा अगर हम लोग और माई (मां) एक ही घर में रह सकते हैं तो हिंदुस्तान में हिंदू और मुसलमान साथ में क्यों नहीं रह सकते थे."
ये सवाल 10-11 साल की तन्नो अपनी मां और परिवार से पूछती हैं.
ये मुस्लिम परिवार भारत के बंटवारे के बाद लखनऊ से उजड़कर लाहौर में एक हिंदू हवेली में रहने आया था.
लाहौर की एक ऐसी आलीशान हवेली जिसकी मालकिन एक बूढ़ी औरत है. विभाजन में परिवार खो चुकी वो मुस्लिम मोहल्ले में अकेली हिंदू बची हैं.
मौत का अब उन्हें ख़ौफ़ नहीं और अपना लाहौर छोड़ वो भारत जाने को तैयार नहीं.
ये दृश्य है असग़र वजाहत के नाटक 'जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याई नइ'.
इसी नाटक पर आमिर ख़ान और राज कुमार संतोषी की फ़िल्म बंटवारा '1947' बनी है जिसमें सनी दोओल और प्रीति ज़िंटा मिर्ज़ा परिवार के रोल में है.
नाटक की बूढ़ी हिंदू औरत यानी माई का रोल शबाना आज़मी ने निभाया है.
नाटक में बूढ़ी हिंदू औरत (शबाना आज़मी) का किरदार लेखक असग़र वजाहत की कल्पना नहीं हक़ीकत था.
उनके दोस्त और उर्दू पत्रकार संतोष कुमार बंटवारे के बाद दोबारा अपने शहर लाहौर लौटे थे ओर अपनी यादें लिखीं थीं. इनमें इस बूढ़ी औरत का ज़िक्र था.
लाहौर की ये हिंदू बूढ़ी औरत असग़र वजाहत के ज़हन में रह गईं. 1980 के आस पास यही किरदार दूसरे काल्पनिक किरदारों के साथ नाटक में बदलना शुरू हो गया.
नाटक में इस किरदार का कोई नाम तक नहीं था. केवल माई.
1990 के दशक में हबीब तनवीर ने भारत में 'जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याई नइ' नाटक का शो किया था और उन्हीं दिनों पाकिस्तान में ये नाटक बैन हो गया था.
नाटक के लेखक असग़र वजाहत ने अपने नाटक के परिचय में लिखा है कि कराची के रंगकर्मी ख़ालिद अहमद को कराची के पुलिस कमिश्नर ने नाटक प्रस्तुत करने की इजाज़त नहीं दी थी.
बावजूद इसके कलाकारों ने कराची के जर्मन सूचना केंद्र में ये नाटक किया.
बीबीसी से हुई बातचीत में असग़र वजाहत ने कहा था, "कराची पुलिस कमिश्नर ने निर्देशक को इसका ये कारण बताया था कि नाटक में मौलवी की हत्या हो जाती है, इसलिए इसका मंचन पाकिस्तान में नहीं हो सकता. ये मौलवी हिंदू मोहल्ले में बची अकेली हिंदू औरत का न सिर्फ़ सम्मान करता है बल्कि औरत की मौत के बाद कहता है कि उसका अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाज से किया जाए."
"मेरे ख़्याल में पुलिस अधिकारी नाटक को समझ नहीं पाए. उनकी दूसरी आपत्ति यह थी कि यह भारतीय लेखक का नाटक है."
मेरी दिलचस्पी ये जानने में है कि 79 साल पहले हुए विभाजन पर अब बन रही फ़िल्मों में युवा पीढ़ी की कितनी दिलचस्पी है?
गीतांजलि पंजाब में राजपुरा की रहने वाली हैं जिन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई ख़त्म की है.
वो बताती हैं, "मेरी दादी तब नौ साल की थीं. दादी ने बताया था कि जब उनका परिवार ट्रेन में पाकिस्तान से आ रहा था तो एक गरम तेल की कढ़ाई साथ लेकर चले थे. सारी लड़कियों को उसके पास बिठाया गया था ताकि अगर हमला हो तो सारी औरतों को गरम तेल की कढ़ाई में झोंक दिया जाए."
"बंटवारे पर फ़िल्में बननी चाहिए ताकि नई पीढ़ी के लोग भी ये सब जान सकें. स्कूल में जब मुझसे पूछते थे कि आपका गांव क्या है तो हमारा मज़ाक उड़ाया जाता था क्योंकि भारत में तो हमारा कोई गांव था नहीं था. वो पाकिस्तान में था. यह ट्रॉमा पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है."
वहीं यूपीएससी की तैयारी कर रही हैं खुशप्रीत बताती हैं, "मेरे कई दोस्त, आसपास के लोग, जिनके परिवारों ने बंटवारा नहीं देखा, मुझसे कहते हैं कि अब ये बातें पुरानी हो गई हैं, इसे भूल जाओ. वो हिंदुस्तान-पाकिस्तान की नफ़रत से बाहर नहीं निकलना चाहते. ऐसी फ़िल्में देखना मेरे लिए तक़लीफ़देह है पर ज़रूरी है."
"सबसे ज़्यादा शायद औरतों ने सहा. लेकिन अजीब बात है कि मैंने जब कई बुज़ुर्गों से बात की तो किसी ने नहीं बताया कि दोनों तरफ़ की औरतों के साथ क्या हुआ था. जब मैं अमृतसर के पार्टिशन म्यूज़ियम गई तो मुझे पहली बार पता चला कि कैसे औरतों के साथ बलात्कार हुआ, उन्हें अग़वा किया गया. इन औरतों की कहानी फ़िल्मों में दिखनी चाहिए."
मैं वापस आऊंगा की सहलेखिका नयनिका महतानी बताती हैं, "मेरी नानी शादी कर दिल्ली आ चुकी थीं. फिर बंटवारा हो गया लेकिन सरगोधा में नानी के परिवार ने अपना घर छोड़ने से मना कर दिया. मुस्लिम पड़ोसियों ने हिफ़ाज़त की और परिवार पाकिस्तान में ही रह गया. पर नानी हमेशा के लिए अपने परिवार से बिछड़ गईं."
फ़िल्म बंटवारा 1947 भले ही सनी दोओल को हीरो बनाकर पेश की जा रही है जो नफ़रत के ख़िलाफ़ खड़ा होता है. लेकिन मूल नाटक में सबसे बड़ी नायिका माई यानी वो दरियादिल बूढ़ी औरत ही है.
इतिहास ऐसी औरतों की असल कहानियों से भरा पड़ा है. वो औरतें जिनके परिवार विभाजन के बाद सरहद पार चले गए लेकिन वो पीछे छूट गईं या छोड़ दी गईं.
बंटवारे के बाद भारत में बाक़ायदा मिनिस्ट्री ऑफ़ रिलीफ़ और रिहैबीलिटेशन बनाई गई थी और इन तमाम औरतों को एक अनोखी कैटेगरी दी गई-अनअटैच्ड वूमेन.
औरतें जो दंगों में अग़वा कर ली गईं और जब मिलीं तो परिवारों ने अपनाने से मना कर दिया. वो माएं जिन्होंने बंटवारे के बाद बच्चों को जन्म दिया और उनके बच्चे छीन लिए गए.
वो औरतें जिनके साथ कोई मर्द नहीं था- सेक्स वर्कर्स, ग़ैर शादी शुदा, तलाक़ शुदा या विधवा. जैसे फ़िल्म 'बंटवारा 1947' की बूढ़ी हिंदू माई.
फ़िल्म 'बंटवारा 1947' के भावनात्मक असर के बारे में शबाना आज़मी कहती हैं, "फ़िल्म में एक सीन है जहां खलनायक मुझे घसीटता है और मेरा कुर्ता फाड़ देता है. उस पल मुझे नहीं लगता कि मैंने कभी खुद को इतना असुरक्षित और इतना बेपर्दा महसूस किया होगा, जितना उस समय किया था."
फ़िल्म में माई की हिफ़ाज़त करते सनी देओल कहते हैं, "मां को हिंदू-मुसलमान में न बांटिए. मां अपने आप में एक मज़हब है. हर इंसान का पहला मज़हब मां है."
ऐसी असल कहानियां अब धीरे-धीरे लोगों के ज़हन से मिटती जा रही हैं पर किताबों, कहानियों, नाटकों ने उन्हें ज़िंदा रखा है.
इस्मत चुग़ताई की कहानी 'जड़ें' में अम्मा भी तो असग़र वजाहत की माई की तरह ही हैं. बंटवारे के बावजूद अम्मा अपनी हवेली से नहीं हिली, उस विशाल पेड़ की जड़ों की तरह जो तूफ़ानों में भी नहीं गिरता.
या राजिंदर सिंह बेदी की कहानी 'लाजवंती' जिसमें सुंदरलाल दिलो-जान से मुहिम में लगा है कि बंटवारे में अग़वा की गई औरतों के मिलने के बाद परिवार उन्हें स्वीकार कर लें.
जब अचानक उसकी अग़वा की हुई पत्नी 'लाजवंती' वापस भारत लौट आती है तो पहले पत्नी को पीटने वाला सुंदरलाल उसे देवी बनाकर तो रखता है पर कभी स्वीकार नहीं कर पाता.
'जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याई नइ' नाटक और 'बंटवारा 1947' पर लौटें तो नाटक का सिकंदर मिर्ज़ा (सनी देओल) उतना मज़बूत या दिलेर नहीं है जैसा फ़िल्म बंटवारा 1947 में दिखाया गया है.
मसलन फ़िल्म में सनी देओल का बेटा गुंडों से कहता है, "तू मेरे बाप को नहीं जानता. वो न घर देखेंगे न सरहद. सीधा घुसकर मारेंगे."
जबकि नाटक का 'सनी देओल' तो एक वक़्त माई (शबाना आज़मी) को मरवाने के लिए गुंडों से भी बात कर लेता है.
लेकिन पाकिस्तान और हिंदुस्तान की सरहदों में नफ़रत के बीच, इसी पराई बूढ़ी औरत से वो एक अनोखा जुड़ाव या अटैचमेंट महसूस करने लगता है.
Açık Sorular
- युवा पीढ़ी विभाजन के इतिहास को किस रूप में देखती है?
- साहित्य और फिल्में समाज की सोच को कितना बदल सकती हैं?


