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ईरान बनाम न्यूज़ीलैंड मैच: स्टेडियम के बाहर राजनीति, अंदर फुटबॉल
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BBC हिंदी16.6.2026Welt4 Min. LesezeitIndia

ईरान बनाम न्यूज़ीलैंड मैच: स्टेडियम के बाहर राजनीति, अंदर फुटबॉल

Auf einen Blick

फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप के ईरान बनाम न्यूज़ीलैंड मैच में स्टेडियम के बाहर ईरानी असंतुष्टों ने मौजूदा सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया, जबकि अंदर टीम का समर्थन किया गया।

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Author, शाएमा ख़लील

पदनाम, बीबीसी उत्तरी अमेरिका संवाददाता, लॉस एंजेलिस से

प्रकाशित 2 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 6 मिनट

मैच के टिकटों और आधिकारिक सूची में फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप के इस मुक़ाबले को ईरान बनाम न्यूज़ीलैंड के रूप में प्रचारित किया गया था.

लेकिन स्टेडियम के बाहर और दर्शक दीर्घा में गूँज रहे नारों में ईरान के सबसे मुखर विरोधी न्यूज़ीलैंड नहीं, बल्कि स्वयं ईरान के असंतुष्ट नागरिक थे.

ईरानी टीम के अधिकारियों ने कई बार कहा है कि वे चाहते हैं कि फुटबॉल लोगों को एकजुट करे.

लेकिन यहाँ का माहौल बिल्कुल भी एकजुट नहीं था.

लॉस एंजेलिस स्टेडियम के बाहर का वातावरण पूरी तरह राजनीतिक रंग में रंगा हुआ था.

सैकड़ों ईरानी झंडे लहरा रहे थे. इनमें सबसे अधिक दिखाई देने वाले वे पूर्व-क्रांति वाले झंडे थे, जिन पर शेर और सूर्य का प्रतीक चिह्न था.

कई ईरानी-अमेरिकियों के लिए यह झंडा ईरान की मौजूदा सरकार के विरोध का प्रतीक बन चुका है.

फ़ीफ़ा ने इसे राजनीतिक प्रतीक मानते हुए स्टेडियम के अंदर प्रतिबंधित कर रखा है.

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'ईरान में सत्ता परिवर्तन चाहिए'

फिर भी यह झंडा स्टेडियम के अंदर दिखाई दे रहा था और कई लोगों की टी-शर्टों पर भी छपा हुआ था.

स्टेडियम के बाहर कई प्रदर्शनकारी फ़ीफ़ा के फ़ैसले और उस राष्ट्रीय टीम के ख़िलाफ़ इकट्ठा हुए थे, जिसे वे ईरानी जनता की बजाय इस्लामिक गणराज्य का प्रतिनिधि मानते हैं.

एक समूह नारे लगा रहा था, "मुल्लाओं की टीम मेरी टीम नहीं है."

दूसरा समूह गा रहा था, "ईरान में सत्ता परिवर्तन चाहिए."

इसके बाद उन्होंने ईरान में क्रांति से पहले का राष्ट्रीय गान गाना शुरू कर दिया.

जब एक युवा से उसका अर्थ पूछा गया तो वह मुस्कुराते हुए बोला, "इसका मतलब है आज़ादी और गर्व."

स्टेडियम के अंदर का माहौल बिल्कुल अलग था.

बाहर सरकार और टीम के ख़िलाफ़ नारे लग रहे थे, जबकि अंदर खिलाड़ियों के समर्थन में ज़ोरदार आवाज़ें गूँज रही थीं.

जब ईरान ने दो बार पिछड़ने के बाद न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ 2-2 से बराबरी की, तो दर्शकों ने ख़ूब जश्न मनाया.

मैच के दौरान विरोधाभास

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स्टैंड में हज़ारों ईरानी झंडे दिखाई दे रहे थे. दूर से वे एक जैसे लगते थे, लेकिन पास जाकर देखने पर उनकी कहानी अलग थी.

कुछ लोगों के हाथों में इस्लामिक गणराज्य का आधिकारिक झंडा था, जबकि कुछ ने शेर और सूर्य वाला झंडा थाम रखा था. सभी ने ईरान के राष्ट्रीय रंग पहन रखे थे.

यही वह स्थिति थी, जिसका सामना ईरानी फुटबॉलरों को करना पड़ रहा था- ईरान बनाम ईरान.

अमेरिका में पिछले 10 वर्षों से रह रही ईरानी-अमेरिकी समानेह कहती हैं, "यह बहुत जटिल स्थिति है. मैं यहाँ ईरान का समर्थन करने आई हूँ, सरकार का नहीं. मुझे अपना देश याद आता है."

उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय गान बजने पर उनकी आँखों में आँसू आ गए.

उन्होंने कहा, "मेरे पिता यहाँ हैं, लेकिन मेरी माँ क़ाग़ज़ी प्रक्रियाओं और राष्ट्रपति ट्रंप की यात्रा पाबंदियों के कारण ईरान में फँसी हुई हैं. मुझे हर समय उनकी चिंता रहती है. मैं ख़ुद भी वापस जाकर मिलने से डरती हूँ."

पूरे मैच के दौरान यह विरोधाभास साफ दिखाई देता रहा.

जब न्यूज़ीलैंड ने बढ़त बनाई, तब कुछ सरकार विरोधी दर्शकों ने शेर और सूर्य वाले झंडे लहराते हुए ख़ुशी मनाई.

स्टेडियम के बाहर आते ही राजनीति फिर चर्चा का केंद्र बन गई.

निनी नाम की एक महिला कहती हैं, "हमें कोई समझौता नहीं चाहिए."

वे अमेरिका और ईरान के बीच हुए हालिया समझौते की ओर इशारा कर रही थीं, जिसका उद्देश्य अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष समाप्त करना था.

उन्होंने कहा, "ईरान की जनता सत्ता परिवर्तन की हकदार है. तेहरान की सड़कों पर लोगों की निर्ममता से हत्या की गई."

शेर और सूर्य का प्रतीक वाली टी-शर्ट पहने फ़रीमा कहती हैं, "जनवरी में जो हुआ, उसे किसी खेल आयोजन के ज़रिए सामान्य नहीं बनाया जा सकता. यह टीम ईरान की जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करती."

पास ही खड़े कूरोश ने अपने गले में फांसी के फंदे का प्रतीक पहन रखा था.

वे कहते हैं, "यह ईरान में बहादुर और निर्दोष लोगों को दी जा रही फाँसी के विरोध का प्रतीक है."

यहाँ मौजूद कई लोगों की तरह उनका भी मानना है कि मैदान पर खेल रहे खिलाड़ी जनता नहीं, बल्कि सरकार का प्रतिनिधित्व करते हैं.

हालाँकि खिलाड़ी इस धारणा को अस्वीकार करते हैं.

मैच से पहले स्ट्राइकर मेहदी तारेमी ने कहा था कि टीम देश और विदेश में रहने वाले सभी ईरानियों के लिए खेलती है और राजनीति में शामिल नहीं होती.

स्टेडियम में आने वाले कुछ ईरानी भी इससे सहमत थे.

'फ़ुटबॉल लोगों को जोड़ने का माध्यम'

ईरानी-अमेरिकी मुस्तफा का मानना है कि फुटबॉल लोगों को जोड़ने का माध्यम होना चाहिए.

वे कहते हैं, "फुटबॉल दोस्ती, सांस्कृतिक संबंधों और राजनीति को अलग रखने का खेल है. मैं सरकार और टीम को अलग-अलग देखने की कोशिश करता हूँ."

पोरमंद सैन डिएगो से मैक्सिको के तिजुआना स्थित ईरान के प्रशिक्षण शिविर तक पहुँचे. वे क़तर और रूस में हुए पिछले दो विश्व कप भी देख चुके हैं.

सिर से पाँव तक ईरान के रंगों में सजे पोरमंद कहते हैं कि खिलाड़ी राजनीतिक नहीं हैं.

वे कहते हैं, "ईरान की जनता का प्रतिनिधित्व यही खिलाड़ी करते हैं. वे यहाँ यह दिखाने आए हैं कि हम इस मंच के योग्य हैं. यह दोस्ती और मानवीय मूल्यों का संदेश है."

ईरानी-अमेरिकी एलिका भी ख़ुद को दुविधा में महसूस करती हैं. उनका कहना है कि वे टीम और सरकार को अलग-अलग मानती हैं.

उनके पिता का 2020 में निधन हो गया था और दोनों विश्व कप में ईरान का मैच देखना चाहते थे.

वे कहती हैं, "मैं अपने पिता की याद में और उन ईरानियों के सम्मान में यहाँ आई हूँ, जो केवल शांति चाहते हैं और इस तरह के मैच का आनंद लेना चाहते हैं. मैं सरकार और टीम को अलग-अलग देखने की कोशिश करती हूँ."

मैच अमेरिका में, रह रहे हैं मैक्सिको में

इन्हीं परिस्थितियों के बीच खिलाड़ी अपना ध्यान फुटबॉल पर केंद्रित रखने की कोशिश कर रहे हैं.

स्टेडियम के बाहर खड़े होकर यह समझना मुश्किल था कि यहाँ फुटबॉल और राजनीति को अलग कैसे किया जा सकता है.

ईरानी टीम खेल के माध्यम से लोगों को जोड़ना चाहती है.

लेकिन इस पहले मुक़ाबले ने यह स्पष्ट कर दिया कि आज भी अनेक ईरानी काफ़ी बँटे हुए हैं.

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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