
तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में कश्मीर का ज़िक्र किया, भारत ने पहले ही इसे आंतरिक मामला बताया है।
तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में कश्मीर का मुद्दा उठाया। भारत ने ओआईसी के ऐसे बयानों को खारिज करते हुए इसे अपना आंतरिक मामला बताया है।
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तुर्की ने 2019 में अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद से कई बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का मुद्दा उठाया है। भारत इसे अपना आंतरिक मामला मानकर खारिज करता रहा है।
तुर्की ने एक बार फिर कश्मीद मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाया है. संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने कश्मीर का ज़िक्र किया है.
इसके साथ ही इस्लामी सहयोग संगठन (ओआईसी) के जम्मू-कश्मीर पर मिनिस्टीरियल कॉन्टैक्ट ग्रुप ने कश्मीरी लोगों के आत्म-निर्णय के अधिकार के लिए समर्थन दोहराया है.
तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन ने मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में कहा, "दक्षिण एशिया में यह ज़रूरी है कि कश्मीर के मुद्दे समेत सभी विवादों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर और संबंधित प्रस्तावों के दायरे में बातचीत के ज़रिए सुलझाया जाए."
अर्दोआन जब ये भाषण दे रहे थे तब सदन में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ मौजूद थे.
हालांकि भारत कश्मीर मुद्दे में किसी भी तीसरे पक्ष के दख़ल को नकारता रहा है और उसका कहना है कि इस पर केवल द्विपक्षीय बात ही हो सकती है.
तुर्की के हालिया बयान पर अभी भारत की ओर से कोई बयान नहीं आया है. हालांकि, भारतीय विदेश मंत्रालय इससे पहले तुर्की के ऐसे बयानों को पूरी तरह ख़ारिज कर चुका है.
ओआईसी के मिनिस्टीरियल कॉन्टैक्ट ग्रुप पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने ज़रूर बयान जारी किया है.
भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा है, "ओआईसी के पास ऐसे मामलों पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है जो पूरी तरह से भारत के आंतरिक मामले हैं. केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न और अविभाज्य अंग हैं, और राजनीतिक रूप से प्रेरित प्रचार को कितनी भी बार दोहराए जाने से यह वास्तविकता नहीं बदल सकती."
"इस तरह की प्रेरित कहानियों का बार-बार समर्थन करना केवल ओआईसी की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करता है. पाकिस्तान को अपने मनगढ़ंत और प्रेरित प्रचार को फैलाने के लिए एक मंच प्रदान करने के बजाय, ओआईसी को बेहतर सलाह यह होगी कि वह पाकिस्तान को सीख दे कि वह अपने गिरेबान में झांके और अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों से उत्पन्न होने वाले आतंकवाद के निरंतर खतरे से निपटे."
तुर्की पहले भी कर चुका है कश्मीर का ज़िक्र
लेकिन ऐसा पहली बार नहीं है जब अर्दोआन ने कश्मीर का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाया हो.
साल 2019 में कश्मीर के ख़ास दर्जे अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने के बाद तुर्की की विवादित टिप्पणी सामने आई थीं.
सितंबर 2019 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 74वें सत्र में अर्दोआन ने कहा था, "दुर्भाग्य से 80 लाख लोग लगभग घेराबंदी की स्थिति में हैं और कश्मीर से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं." उन्होंने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय पिछले 72 वर्षों में इस विवाद पर पूरी तरह से ध्यान देने में विफल रहा है.
इस बयान पर भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया दी थी. कई मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया था कि इस बयान के चलते पीएम मोदी ने अपना तुर्की दौरा रद्द कर दिया था. और आज तक प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए पीएम मोदी तुर्की दौरे पर नहीं गए हैं.
इसके बाद साल 2021 और 2025 में भी तुर्की ने कश्मीर के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच पर उठाया था.
ग़ौरतलब बात ये है कि तुर्की ने ये मुद्दा मक्का समझौते के बाद उठाया है जो पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच इस साल 7 अगस्त को हुआ है.
तुर्की का पाकिस्तान को समर्थन
भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में तनाव जगज़ाहिर है. बीते साल मई महीने में दोनों देशों के बीच सशस्त्र संघर्ष भी हुआ था. इस दौरान भी देखा गया था कि तुर्की ने खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया था.
संघर्ष के दौरान भारत ने दावा किया था कि आठ मई को पाकिस्तान ने बड़ी संख्या में ड्रोन से हमला किया था, जो तुर्की निर्मित सोनगार ड्रोन्स थे.
इसी बीच तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने कहा था कि पाकिस्तान के लोग भाई की तरह हैं और उनके लिए अल्लाह से दुआ करते हैं.
हालांकि सीज़फ़ायर की घोषणा के बाद तुर्की ने इस फ़ैसले का स्वागत किया था और कहा था कि दोनों देश इस मौक़े का इस्तेमाल सीधे और स्वस्थ बातचीत के लिए करें.
बीते साल मई में बीबीसी संवाददाता रजनीश कुमार ने सऊदी अरब में भारत के राजदूत रहे तलमीज़ अहमद से पूछा था कि तुर्की खुलेआम पाकिस्तान के समर्थन में क्यों है?
इस पर तलमीज़ अहमद ने कहा था, "पाकिस्तान के साथ इस्लाम के आधार पर तुर्की की वैचारिक क़रीबी है. इसके अलावा तुर्की और पाकिस्तान शीत युद्ध में अमेरिका के पार्टनर थे. इनका सुरक्षा सहयोग बहुत गहरा रहा है. कई पाकिस्तानी जनरलों का तुर्की के साथ निजी संबंध रहा है. रक्षा सहयोग अब दोनों देशों में काफ़ी बढ़ गया है.''
''मुझे लगता है कि अर्दोआन पाकिस्तान से पुराने संबंध को और मज़बूत कर रहे हैं. अर्दोआन ने ख़ुद को इस्लामिस्ट नेता भी बनाया है और वो इस्लामिक चीज़ों को अहमियत देते हैं. अर्दोआन अक्सर कश्मीर का मुद्दा उठाते हैं और इसे इस्लामिक मुद्दे के रूप में पेश करते हैं. तुर्की ने स्पष्ट कर दिया है कि वह पाकिस्तान के साथ खड़ा है.''
तलमीज़ अहमद कहते हैं, ''दिलचस्प यह है कि मध्य-पूर्व में दो अहम शक्तियां हैं, जिनमें तुर्की पूरी तरह से पाकिस्तान के साथ है और इसराइल भारत के साथ. तुर्की और पाकिस्तान के संबंध में इस्लाम की दस्तक अर्दोआन के आने के बाद हुई है. यानी दोनों देशों के संबंध 1950 से ही गहरे हैं लेकिन इस गहराई में इस्लाम अर्दोआन के आने के बाद आया और अब यह प्रमुखता से पैठ बना चुका है.''
क्या दो देशों का संबंध बिना फ़ायदे के केवल धर्म और विचार में क़रीबी से चल सकता है? यूएई और मिस्र में भारत के राजदूत रहे नवदीप सूरी से यही सवाल बीबीसी संवाददाता रजनीश कुमार ने पूछा था तो उन्होंने कहा था, ''तुर्की और पाकिस्तान में केवल वैचारिक क़रीबी ही नहीं है बल्कि तुर्की को पाकिस्तान का पूरा डिफेंस मार्केट भी मिल रहा है."
हाल में हुआ मक्का समझौता इसकी पुष्टि भी करता है. इस समझौते के तहत किसी एक देश पर हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा.
इस समझौते पर भारत की भी नज़र है. समझौते का असर इस बात पर निर्भर करेगा कि तीनों देश इसे भविष्य में कैसे लागू करते हैं. साथ ही इस समझौते की असली परीक्षा तब होगी, जब इनमें से किसी एक देश को सैन्य संकट का सामना करना पड़ेगा.
भारत से तुर्की की बढ़ती दूरी
तलमीज़ अहमद के मुताबिक़, पाकिस्तान के साथ तुर्की का सैन्य सहयोग तो पहले से ही था लेकिन अब इस्लाम भी आ गया है.
तलमीज़ अहमद ने कहा था, ''इस्लाम को एक मौक़ा परस्त स्लोगन के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. जब फ़ायदे की बात आती है तो इस्लाम का ज़िक्र करते हैं. जब जियोपॉलिटिक्स में अपने हित की बात आती है तो इस्लाम नेपथ्य में चला जाता है. मुझे लगता है कि तुर्की की इस्लाम में ज़ुबानी दिलचस्पी है. तुर्की पश्चिम एशिया में अपना प्रभुत्व उस्मानिया साम्राज्य वाला चाहता है. उसकी प्राथमिक चाहत यही है और इस चाहत में तुर्की पाकिस्तान को अहम सहयोगी के रूप में देखता है.''
तुर्की का पाकिस्तान के साथ होना क्या भारत के लिए झटका है?
तलमीज़ अहमद ने कहा था, ''तुर्की की भारत के साथ कभी हमदर्दी नहीं रही है. तुर्की कश्मीर पर हमेशा से भारत को छेड़ता रहा है. मध्य-पूर्व और गल्फ़ में भारत के हित इसराइल, सऊदी अरब, क़तर, यूएई और ईरान के साथ जुड़े हैं. इन देशों के साथ भारत के संबंधों में गर्मजोशी पर्याप्त है.''
नवदीप सूरी की मानें तो, ''दुनिया भर में क़रीब 200 देश हैं और उनमें से तुर्की का पाकिस्तान के साथ होना बहुत झटके के रूप में नहीं देखा जा सकता है. अर्दोआन की इस्लाम को लेकर एक पोजिशन रही है और वही पोजिशन साफ़ दिख रही है."

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