
रसोई गैस की सरकारी कीमतों और बाजार भाव में भारी अंतर के कारण आम जनता और छोटे व्यवसायी प्रभावित
पाकिस्तान में एलपीजी की कीमतें सरकारी दर से लगभग दोगुनी हो गई हैं। ऊर्जा मंत्री अली परवेज मलिक ने कालाबाजारी और आयात व्यवस्था की कमियों को जिम्मेदार ठहराया है, जबकि छोटे व्यवसायी और आम नागरिक आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं।
AI-generated summary
पाकिस्तान में एलपीजी की सरकारी कीमत और बाजार मूल्य में बड़ा अंतर है, जिससे आम जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ गया है। सरकार ने नई नीति के माध्यम से एकाधिकार खत्म करने और आपूर्ति सुधारने का दावा किया है।
पाकिस्तान में रसोई गैस की सरकारी क़ीमत और बाज़ार में मिलने वाली क़ीमत में बहुत अंतर आ गया है। इस वजह से लोगों को सरकारी क़ीमत से लगभग दोगुने दाम पर गैस ख़रीदनी पड़ रही है।
इस्लामाबाद के रहने वाले मुहम्मद सग़ीर भी ऐसे ही एक ग्राहक हैं। सरकारी संस्था ऑयल एंड गैस रेगुलेटरी अथॉरिटी (ओजीआरए) के मुताबिक़, एलपीजी की क़ीमत क़रीब 295 पाकिस्तानी रुपये प्रति किलो है। लेकिन मुहम्मद सग़ीर ने हाल ही में 12 किलो का घरेलू गैस सिलेंडर 6,500 रुपये में ख़रीदा। यानी उन्हें एक किलो गैस के लिए 550 रुपये से ज़्यादा देने पड़े।
मुहम्मद सग़ीर को नहीं पता कि उन्हें सरकारी क़ीमत पर एलपीजी कहां मिल सकती है या उन्हें उस क़ीमत पर गैस मिल भी सकती है या नहीं। लेकिन वह जानते हैं कि पिछले कुछ हफ़्तों से लगातार बढ़ रही गैस की क़ीमतों का उनके घर के ख़र्च पर कितना बुरा असर पड़ा है। उनके मुताबिक़, हालात इतने ख़राब हो गए हैं कि उन्हें अपने बच्चों को स्कूल से निकालना पड़ा है।
वह कहते हैं, "पिछले कुछ महीनों से गैस सिलेंडर के दाम हर 10 दिन में बढ़ रहे हैं। अब हालात ऐसे हैं कि हम एक समय का खाना तो बना लेते हैं, लेकिन दूसरे समय का खाना बनाने के लिए गैस नहीं बचती।" मुहम्मद सग़ीर की हर महीने की कमाई का बड़ा हिस्सा एलपीजी सिलेंडर ख़रीदने में ख़र्च हो जाता है।
वह और उनकी पत्नी काम करके अपने दो बच्चों और पिता का ख़र्च उठाते हैं। उनकी पत्नी घर के काम भी संभालती हैं। उनका परिवार इस्लामाबाद की एक निजी हाउसिंग सोसायटी में एक इमारत की छत पर बने कमरे में रहता है। वहां पाइपलाइन से गैस का कनेक्शन नहीं है। उस कमरे को बंद करने के लिए दरवाज़ा तक नहीं है। सर्दियों में उनके लिए कमरे को गर्म रखना भी मुमकिन नहीं है। देश के आर्थिक रूप से कमज़ोर तबके के कई परिवारों के हालात ऐसे ही हैं।
कई निजी हाउसिंग सोसायटियों में या तो पाइपलाइन से गैस का कनेक्शन नहीं है या कनेक्शन होने के बाद भी गैस नहीं मिलती। इस वजह से वहां रहने वाले परिवार पूरी तरह एलपीजी सिलेंडर पर निर्भर हैं। मुहम्मद सग़ीर को समझ नहीं आता कि उन्हें ओजीआरए की तय की गई सरकारी क़ीमत पर गैस क्यों नहीं मिल रही है। हालांकि, सरकार ने हाल ही में इस सवाल का जवाब दिया है।
पाकिस्तान के ऊर्जा मंत्री अली परवेज मलिक ने हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में माना कि खुले बाज़ार में एलपीजी सरकारी क़ीमत से काफ़ी ज़्यादा दाम पर बेची जा रही है। उन्होंने इसकी वजह अमेरिका-ईरान युद्ध के बाद पाकिस्तान की पश्चिमी सीमाएं बंद होने से पैदा हुई अव्यवस्था और कालाबाज़ारी को बताया। हालांकि, उन्होंने कहा कि सर्दियां शुरू होने से पहले ही ईरान के साथ सीमा बंद होने के कारण एलपीजी की सप्लाई पर असर पड़ने लगा था।
अली परवेज मलिक ने कहा, "इस हालात का फ़ायदा उठाकर ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने वाले लोग एलपीजी के लिए क़रीब 700 रुपये प्रति किलो वसूलने लगे।" अली परवेज मलिक के मुताबिक़, क़ीमतें बढ़ने की यह अकेली वजह नहीं है। एलपीजी आयात करने की व्यवस्था में कमियां और गैस को जमा करके रखने की सुविधाओं की कमी भी इस परेशानी की बड़ी वजह हैं। दूसरी ओर, गैस लाने वाले जहाज़ों के पाकिस्तान के बंदरगाहों पर रुकने की कोई सुविधा नहीं है।
वह कहते हैं, "और अगर गैस के बड़े कंटेनर आ भी जाएं, तो हम गैस रखेंगे कहां? इसके लिए कोई व्यवस्था नहीं है। पिछली सरकार के दौरान इस दिशा में कोई काम नहीं किया गया।" ऊर्जा मंत्री के मुताबिक़, क़ीमतें बढ़ने की एक और बड़ी वजह एलपीजी के आयात और बिक्री के लिए लागू कोटा व्यवस्था है। इसका फ़ायदा सिर्फ़ कुछ लोगों को मिलता है। उन्होंने कहा कि नई एलपीजी नीति के तहत सरकार कुछ लोगों का एकाधिकार ख़त्म करके ऐसी व्यवस्था ला रही है, जिसमें कंपनियों के बीच मुक़ाबला हो सके।
अली परवेज मलिक के मुताबिक़, पाकिस्तान में हर दिन एलपीजी की मांग क़रीब 6,500 से 7,000 टन है, जबकि देश में इसका उत्पादन क़रीब 2,000 से 2,500 टन ही होता है।
एलपीजी की क़ीमतें बढ़ने से रेस्टोरेंट, होटल, तंदूर और खाने-पीने से जुड़े दूसरे छोटे कारोबारों का ख़र्च काफ़ी बढ़ गया है। बड़े रेस्टोरेंट में एलपीजी की खपत ज़्यादा होती है। उनकी ज़रूरत पूरी करने के लिए बड़ी संख्या में बड़े सिलेंडरों की ज़रूरत पड़ती है।
इस्लामाबाद में एक रेस्टोरेंट के मैनेजर खिज़र शाह ने बीबीसी को बताया कि वह 45 किलो का सिलेंडर इस्तेमाल करते हैं। एक महीने पहले इसकी क़ीमत क़रीब 14,000 से 15,000 रुपये थी, जो अब बढ़कर 24,000 से 25,000 रुपये हो गई है। वह कहते हैं, "हम हर दिन एक सिलेंडर इस्तेमाल करते हैं। क़ीमत बढ़ने से हमारा ख़र्च कई गुना बढ़ गया है। सर्दियों में पहले से ही कारोबार धीमा रहता है। अगर गैस नहीं मिली या महंगी हो गई, तो कारोबार पूरी तरह ठप हो जाएगा।"
उनके मुताबिक़, पाइपलाइन से गैस नहीं मिलने के कारण रेस्टोरेंट पूरी तरह एलपीजी पर निर्भर हैं। वह कहते हैं, "अगर एलपीजी ख़त्म हो गई या इतनी महंगी हो गई कि हम उसे ख़रीद नहीं पाए, तो हमें रेस्टोरेंट बंद करने पड़ेंगे।"
बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में होटल चलाने वाले नवीद अहमद कहते हैं कि गैस की कटौती और बढ़ती महंगाई के कारण उन्हें अपने तीन में से दो होटल बंद करने पड़े हैं। वह कहते हैं, "अब हम सिर्फ़ एक होटल चला रहे हैं। गैस केवल पांच घंटे मिलती है और एलपीजी की क़ीमत 600 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है।"
पेशावर में तंदूर चलाने वाले जियाउर रहमान कहते हैं कि आटे और गैस, दोनों की क़ीमतें बढ़ने से उनकी कमाई लगभग ख़त्म हो गई है। वह कहते हैं, "आटे की एक बोरी 14,000 रुपये की है और गैस की क़ीमत 600 रुपये प्रति किलो हो गई है। हम छोटी रोटी 20 रुपये और बड़ी रोटी 30 रुपये में बेचते हैं। ऐसे में अब लगभग कोई मुनाफ़ा नहीं बचा है।"
पेशावर में एक स्थानीय होटल के मालिक लैल शाह के मुताबिक़, वह पिछले दस दिनों से अपने कर्मचारियों को वेतन नहीं दे पाए हैं। वह कहते हैं, "अगर हालात ऐसे ही बने रहे, तो मुझे होटल बंद करना पड़ेगा।"
ऊर्जा मंत्री अली परवेज मलिक के मुताबिक़, एलपीजी की क़ीमत तय करने में सरकार की भूमिका बहुत कम है। इसकी वजह यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में एलपीजी की शुरुआती क़ीमत सऊदी अरामको की तय क़ीमत से जुड़ी होती है, जबकि पाकिस्तान में ओजीआरए हर महीने इसकी क़ीमत की घोषणा करता है।
उन्होंने कहा कि सरकार सर्दियों के दौरान ऊर्जा की मांग पूरी करने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रही है। वह कहते हैं, "अगर पाइपलाइन के ज़रिए गैस की सप्लाई बनाए रखने के लिए हमें महंगा ईंधन ख़रीदना पड़ा, तो हम वह भी ख़रीदेंगे। वहीं, दिसंबर, जनवरी और फ़रवरी की मांग पूरी करने के लिए हम एलएनजी (तरल प्राकृतिक गैस) का इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगे।"
उनके मुताबिक़, प्रधानमंत्री के निर्देशों के अनुसार घरेलू उपभोक्ताओं को खाना बनाने के लिए दिन में कम से कम तीन बार गैस मिले, इसके लिए भी कोशिश की जा रही है। हालांकि, अली परवेज मलिक के मुताबिक़, जिन लोगों के पास पाइपलाइन से गैस का कनेक्शन नहीं है, उनके लिए एलपीजी ही ईंधन का सबसे बड़ा दूसरा विकल्प है।
अली परवेज मलिक के मुताबिक़, सरकार एलपीजी के कारोबार को नियमों के दायरे में लाना चाहती है। वह कहते हैं, "ऐसी व्यवस्था लाई जा रही है, जिससे सबसे सस्ता ईंधन आयात किया जा सके और लोगों को कम क़ीमत पर उपलब्ध कराया जा सके।"
उन्होंने कहा कि गैस की सप्लाई बनाए रखने और क़ीमतों पर क़ाबू पाने के लिए चार सरकारी संस्थाओं को फिर से एलपीजी आयात करने का आदेश दिया गया है। इन संस्थाओं में पाकिस्तान स्टेट ऑयल, पारको एलपीजी, पाकिस्तान एलएनजी लिमिटेड और सुई सदर्न गैस एलपीजी शामिल हैं। ऊर्जा मंत्री के मुताबिक़, इन संस्थाओं को एलपीजी आयात करने के प्रस्ताव भी मिले हैं। अगर आयात की गई एलपीजी को सप्लाई में शामिल किया जाता है, तो इसकी क़ीमत क़रीब 450 रुपये प्रति किलो हो सकती है।
उन्होंने कहा कि निजी आयातकों को भी कम क़ीमत पर एलपीजी ख़रीदने की अनुमति दी जाएगी। इससे कंपनियों के बीच मुक़ाबला बढ़ेगा और क़ीमतें कम होंगी। नई नीति के तहत देश में बनने वाली एलपीजी नीलामी के ज़रिए बेची जाएगी, जबकि कोटा व्यवस्था ख़त्म कर दी गई है। ओजीआरए घरेलू या आयात की गई एलपीजी की क़ीमत तय नहीं करेगा, बल्कि देश में बनने वाली गैस की क़ीमत नीलामी के ज़रिए तय होगी। घरेलू और आयात की गई एलपीजी की क़ीमतों के बीच का अंतर एक ख़ास फंड में जमा किया जाएगा। ऊर्जा मंत्री के मुताबिक़, इस फंड के ज़रिए बेनज़ीर इनकम सपोर्ट प्रोग्राम के तहत ज़रूरतमंद लोगों को कम क़ीमत पर एलपीजी दी जाएगी।
एलपीजी कारोबार से जुड़े लोगों का मानना है कि नई नीति से तुरंत क़ीमतें कम होने की उम्मीद कम है। इतना ही नहीं, इससे क़ीमतें और बढ़ भी सकती हैं। पाकिस्तान एलपीजी इंडस्ट्रीज़ एसोसिएशन के अध्यक्ष इरफ़ान खोखर कहते हैं, "हम ऐसी किसी भी नीति का समर्थन नहीं करेंगे, जिससे उपभोक्ताओं के लिए गैस और महंगी हो जाए।"
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि सरकार की नई नीति से गैस महंगी हो जाएगी, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में इसकी क़ीमतें पहले से बढ़ रही हैं। इरफ़ान खोखर का कहना है कि अगर सरकार एलपीजी के आयात पर लगने वाले टैक्स और टर्मिनल शुल्क को कम या ख़त्म कर दे, तो क़ीमतें तुरंत घट सकती हैं। उन्होंने सरकार से मांग की कि वह गैस की सही क़ीमत तय करना सुनिश्चित करे और ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने वालों के ख़िलाफ़ "न्यायिक जांच" कराए।
उनका कहना है कि आयातक विदेशों से महंगी एलपीजी ख़रीदते हैं और अलग-अलग टैक्स और दूसरे ख़र्चों के कारण उसे ओजीआरए की तय क़ीमत पर नहीं बेच पाते। वह कहते हैं, "स्थानीय माफ़िया ने देश में तय क़ीमत पर मिलने वाली गैस को आयात की गई गैस की क़ीमत पर बेचकर अरबों रुपये कमाए हैं।" इरफ़ान खोखर के मुताबिक़, अगर इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की जाए, तो ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने के लिए ज़िम्मेदार लोगों की पहचान की जा सकती है।
AI outlook — possibilities, not facts
सरकार एलपीजी आयात के लिए चार सरकारी संस्थाओं को सक्रिय करेगी।
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