
विनोद कापड़ी द्वारा निर्देशित फ़िल्म 'पायर' पलायन और जलवायु परिवर्तन के बीच एक बुज़ुर्ग दंपती के संघर्ष को दर्शाती है।
विनोद कापड़ी की फ़िल्म 'पायर' उत्तराखंड के एक सुदूर गांव में रह रहे एक बुज़ुर्ग दंपती की भावनात्मक कहानी है। यह फ़िल्म पलायन, जलवायु परिवर्तन और बुढ़ापे में अकेलेपन के गंभीर मुद्दों को संवेदनशीलता के साथ पेश करती है।
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पलायन के कारण हिमालयी क्षेत्रों के कई गांव खाली होकर भूतिया गांवों में बदल रहे हैं। यह फ़िल्म इसी सामाजिक और पर्यावरणीय संकट को एक दंपती के माध्यम से दिखाती है।
पूरे देश में समीक्षकों और दर्शकों का दिल जीत रही फ़िल्म पायर (Pyre) एक बुज़ुर्ग दंपती के प्रेम और उनकी ख़ामोश तन्हाई की कहानी है। फ़िल्म को तैयार होने के बाद सिनेमाघरों तक पहुंचने में दो साल लग गए।
111 मिनट की इस फ़िल्म का निर्देशन टीवी पत्रकार से फ़िल्मकार बने विनोद कापड़ी ने किया है। यह फ़िल्म पलायन के गंभीर मुद्दे को भी दिखाती है। पलायन की वजह से हिमालयन रेंज के सैकड़ों ख़ूबसूरत गांव खाली हो गए हैं और भूतिया गांवों में बदल गए हैं।
फ़िल्म जलवायु परिवर्तन के असर को भी दिखाती है, जिसने इस क्षेत्र के मौसम को पहले से ज़्यादा कठिन बना दिया है।
सोशल मीडिया पर कई भारतीयों ने ऐसे वीडियो साझा किए हैं, जिनमें दर्शक सिनेमाघरों से आंखों में आंसू लेकर बाहर निकलते दिख रहे हैं। कुछ लोगों ने लिखा कि किसी फ़िल्म ने उन्हें बहुत समय बाद इतना भावुक किया है।
फ़िल्म के मुख्य कलाकारों की भी काफ़ी तारीफ़ हुई है। ये साधारण ग्रामीण हैं, जिन्होंने पहले कभी कैमरे का सामना नहीं किया था। बॉलीवुड के सम्मानित कलाकार नसीरुद्दीन शाह और अनुपम खेर ने भी उनकी सराहना की है।
पायर के मुख्य पात्र पदम सिंह ने पदम का किरदार निभाया है। और तुलसी ने हीरा देवी का किरदार निभाया है। उन्हें स्थानीय भाषा में बुबू और आमा कहा जाता है, जिसका मतलब दादा और दादी होता है। यह दंपती उत्तराखंड राज्य के पहाड़ों में बने एक छोटे से घर में रहता है।
यह ऐसी जगह है जहां उम्र का हिसाब बड़ी ऐतिहासिक घटनाओं से लगाया जाता है। पदम सिंह का जन्म द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने से दो साल पहले हुआ था। तुलसी का जन्म उस साल हुआ था, जब जापान पर परमाणु बम गिराए गए थे।
उनके गांव में न सड़क है और न ही बिजली। जब भी इस दंपती को मदद की ज़रूरत पड़ती है, जो अक्सर पड़ती है क्योंकि तुलसी को कई बार अस्पताल ले जाना पड़ता है, तब पदम सिंह एक पारंपरिक लंबे सींग वाले वाद्य यंत्र को बजाकर पड़ोसियों को बुलाते हैं।
पड़ोसी उनकी मदद करते हैं। बदले में पदम सिंह उन्हें बकरियां देकर उनका आभार जताते हैं।
"यहां कुछ नहीं है। सिर्फ पहाड़ हैं।" ये डायलॉग फ़िल्म में मुख्य किरदार निभा रहे पदम सिंह कहते हैं। "इसलिए युवा बेहतर रोज़गार और बेहतर ज़िंदगी की तलाश में गांव छोड़ देते हैं। जो लोग इस ख़ूबसूरत लेकिन मुश्किलों से घिरी ज़मीन को छोड़ते हैं, वे बहुत कम ही वापस लौटते हैं।"
फ़िल्मकार विनोद कापड़ी कहते हैं कि उनकी फ़िल्म का केंद्र जीवन के आख़िरी दिनों में जी रहे बुज़ुर्ग दंपती की प्रेम कहानी है। कापड़ी ने बीबीसी से कहा, "उन्होंने 65 साल साथ बिताए हैं। पिछले 28 साल से वे अपने बेटे हरिया का इंतज़ार कर रहे हैं। हरिया काम की तलाश में मुंबई गया था। वे उसके लौटने का इंतज़ार कर रहे हैं। यह साथ निभाने, तन्हाई और इंतज़ार की कहानी है।"
फ़िल्म में दोनों का इंतज़ार अचानक और ज़्यादा अहम हो जाता है। इतने सालों बाद हरिया का एक ख़त आता है। उसमें वह अपने घर आने की तारीख़ बताता है। पदम सिंह और तुलसी दिन गिनने लगते हैं। इस बीच उनके आसपास रहने वाले कुछ गांववाले एक-एक करके गांव छोड़ देते हैं। आख़िर में यह दंपती विशाल पहाड़ी इलाक़े में बिल्कुल अकेला रह जाता है।
गांव छोड़कर जा रहा एक व्यक्ति पदम सिंह से कहता है, "तुम और तुलसी भी जितनी जल्दी हो सके यहां से चले जाओ। नहीं तो जब तुम या तुलसी की मौत होगी, तब तुम्हारे शव को पहाड़ से नीचे श्मशान की चिता तक ले जाने के लिए चार लोग भी नहीं मिलेंगे।" फिर वह मज़ाक में जोड़ता है, "या फिर हमारे जाने से पहले ही मर जाना।"
जब मदद के लिए बुलाने वाला कोई नहीं बचता, तब पदम सिंह अपने घर के बाहर साथ-साथ दो चिताएं बनाते हैं। एक अपनी पत्नी के लिए और एक अपने लिए। जब तुलसी इस फ़ैसले पर सवाल करती हैं, तब पदम सिंह उनसे कहते हैं, "अगर तुम्हारी मौत हो गई, तो मैं तुम्हें पहाड़ से नीचे कैसे ले जाऊंगा?"
उदास माहौल और गंभीर विषयों के बावजूद पायर में हास्य भी भरपूर है। फ़िल्म का मुख्य दंपती बेहद प्यारा लगता है। लंबे समय से साथ रह रहे कई पति-पत्नी की तरह, उनकी नोकझोंक भी प्यार जताने का एक तरीक़ा लगती है।
उत्तराखंड के रहने वाले विनोद कापड़ी को इस फ़िल्म का विचार 2018 में आया। उस समय उनकी मुलाक़ात राज्य के ख़ूबसूरत पहाड़ी क़स्बे मुनस्यारी में रहने वाले 84 वर्षीय एक व्यक्ति से हुई थी। वे कहते हैं, "मैं फ़ेसबुक पर उनकी तस्वीर देखने के बाद उनसे मिलने गया था। उनके चेहरे की झुर्रियों ने मुझे बहुत आकर्षित किया। उनका चेहरा बेहद अलग था।"
विनोद कापड़ी ने बताया कि उन्होंने उस व्यक्ति और उनकी पत्नी से पूछा कि उनकी सबसे बड़ी चिंता क्या है। "उन्होंने कहा, 'मेरी सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर मेरी मौत पहले हो गई, तो उनकी देखभाल कौन करेगा?' फिर उनकी पत्नी ने कहा, 'इन्हें खाना बनाना नहीं आता। इसलिए अगर मेरी मौत पहले हो गई, तो मुझे नहीं पता कि इनके लिए खाना कौन बनाएगा।' यह बात मेरे दिल को छू गई।"
विनोद कापड़ी कहते हैं कि शुरुआत में उन्होंने यह फ़िल्म "असल दंपती" के साथ बनाने की कोशिश की थी। लेकिन एक हफ़्ते की शूटिंग के बाद उन्होंने यह विचार छोड़ दिया। उन्हें लगा कि यह ठीक तरह से काम नहीं कर रहा था। इसके बाद उन्होंने मुख्य भूमिकाओं के लिए अभिनेता नसीरुद्दीन शाह और रत्ना पाठक से संपर्क किया। दोनों असल ज़िंदगी में भी पति-पत्नी हैं।
कापड़ी कहते हैं कि शाह को कहानी बहुत पसंद आई। लेकिन उनका मानना था कि वे और रत्ना पाठक उस क्षेत्र से नहीं हैं। इसलिए वे इन किरदारों के साथ पूरा न्याय नहीं कर पाएंगे। आख़िरकार कापड़ी को अपने ही परिवार में पदम सिंह मिल गए। यह किरदार उनके पिता के छोटे भाई ने निभाया। वे सेना से रिटायर हो चुके थे और अभिनय में रुचि रखते थे।
तुलसी के किरदार के लिए उन्हें दूसरे गांव में हीरा देवी मिलीं। हीरा देवी एक बुज़ुर्ग विधवा थीं। उन्होंने खेती, घास काटने और अपनी भैंसों की देखभाल करते हुए अपने बच्चों की परवरिश की थी।
पदम सिंह और हीरा देवी ने बीबीसी से कहा कि पिछले कई वर्षों में उन्होंने अपने आसपास ऐसे कई गांव देखे हैं जो धीरे-धीरे भूतिया गांव बन गए। उन्होंने यह भी देखा कि बच्चे काम की तलाश में गांव छोड़कर चले जाते हैं और बुज़ुर्ग पीछे छूट जाते हैं। उनका कहना है कि आज 'पायर' को मिल रहे प्यार और ध्यान से वे अभिभूत हैं।
विनोद कापड़ी बताते हैं कि 2024 से यह फ़िल्म दुनिया के कुछ सबसे बड़े फ़िल्म महोत्सवों में दिखाई जा चुकी है। फ़िल्म को 18 अवॉर्ड मिल चुके हैं। इनमें सर्वश्रेष्ठ फीचर फ़िल्म के तीन अवॉर्ड और दर्शकों की पसंद की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के 12 अवॉर्ड शामिल हैं।
"फ़िल्म महोत्सवों में सफलता मिलने के बावजूद 'पायर' को दो साल तक कोई वितरक नहीं मिला।" कापड़ी कहते हैं कि ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ने भी फ़िल्म को नहीं लिया। आख़िरकार उनके एक निर्माता मित्र ने सिनेमाघरों में रिलीज़ के लिए आर्थिक मदद की। इसके बाद फ़िल्म बड़े पर्दे तक पहुंच सकी।
विनोद कापड़ी कहते हैं कि 30 अक्तूबर को 70 स्क्रीन पर हुई इस सीमित रिलीज़ को दर्शकों से अच्छी प्रतिक्रिया मिली। लोगों ने एक-दूसरे को फ़िल्म देखने की सलाह दी। टिकटों की मांग बढ़ी। इसके साथ ही फ़िल्म के शो की संख्या भी बढ़ा दी गई।
उधर, पदम सिंह और हीरा देवी की वे सारी चिंताएं भी अब दूर हो चुकी हैं, जो कैमरे के सामने आने और संवाद भूल जाने को लेकर थीं। हीरा देवी कहती हैं कि उन्हें इस बात की भी चिंता थी कि उनके बच्चे क्या सोचेंगे। समाज क्या कहेगा। आज हीरा देवी और पदम सिंह फ़िल्म समीक्षकों की सकारात्मक प्रतिक्रियाओं और दर्शकों के प्यार का आनंद ले रहे हैं।
कई फिल्म स्क्रीनिंग के दौरान उनकी मुलाक़ात ऐसे लोगों से हुई जिनकी आंखों में आंसू थे। कई लोग उनके पैर छूना चाहते थे और उन्हें गले लगाना चाहते थे। बहुत से लोगों ने कहा कि इस फ़िल्म ने उन्हें अपने माता-पिता और दादा-दादी की याद दिला दी। वे गांवों, क़स्बों और शहरों में उनका इंतज़ार कर रहे हैं, जहां से वे कभी निकलकर आए थे।
पदम सिंह कहते हैं, "हमें बहुत ख़ुशी और संतोष मिला। हमें इतना प्यार और प्रेरणा मिली, जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी।" लेकिन उनके लिए सबसे ख़ास पल वह था, जब उनकी मुलाक़ात मुंबई में नसीरुद्दीन शाह से हुई।
वे कहते हैं, "उन्होंने पूरी फ़िल्म देखी और उनकी आंखों में आंसू थे। उन्होंने मुझे गले लगाया। उन्होंने कहा, 'बुबू, तुमने जो किरदार निभाया है, उसे मैं सात जन्मों में भी नहीं निभा पाता।"'
पदम सिंह कहते हैं कि वे उत्तराखंड और पूरे भारत के युवाओं को एक संदेश देना चाहते हैं। "मैं उनसे कहना चाहता हूं कि उन्हें अपनी मातृभूमि नहीं छोड़नी चाहिए। उस ज़मीन को नहीं छोड़ना चाहिए जहां उनका जन्म हुआ है।" वे आगे कहते हैं, "मैं सरकार से भी अपील करता हूं कि लोगों के रहने की जगहों पर ही शिक्षा और रोज़गार की व्यवस्था की जाए। ताकि लोगों को दूर-दूर भटकना न पड़े। जब ऐसा होगा, तब पीछे छूट रहे माता-पिता की भी देखभाल हो सकेगी।"
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