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इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग का फ़ायदा सच में उतना है, जितना बताया जाता है?
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BBC हिंदी5 hours agoHealth8 min readIndia

इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग का फ़ायदा सच में उतना है, जितना बताया जाता है?

किसी भी अन्य लाइफ़स्टाइल चेंज की तरह यह साबित करना कि इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग काम करती है, बहुत मुश्किल है। लेकिन नई टेक्नोलॉजी हमें यह बेहतर समझने में मदद करती है कि क्या काम करता है और क्या नहीं।

Quick Look

इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग के फ़ायदों और दावों पर हालिया सबूतों ने सवाल उठाए हैं। चूहों पर किए गए शोध के नतीजे इंसानों पर पूरी तरह लागू नहीं होते, और लोगों द्वारा खुद अपने खान-पान की सही जानकारी न देना (सेल्फ़-रिपोर्टिंग) सबसे बड़ी रुकावट है।

AI-generated summary

Why It Matters

इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग में हफ़्ते के कुछ दिनों में उपवास करना या दिन के कुछ घंटों में खाना शामिल है। यह वज़न घटाने और मेटाबॉलिज़्म सुधारने के लिए लोकप्रिय हो रही है।

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किसी भी अन्य लाइफ़स्टाइल चेंज की तरह यह साबित करना कि इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग काम करती है, बहुत मुश्किल है. लेकिन नई टेक्नोलॉजी हमें यह समझने में बेहतर मदद करती है कि क्या काम करता है और क्या नहीं.

ऐसा लगता है कि हर कुछ महीनों में इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग के फ़ायदों पर बहस का एक नया दौर शुरू हो जाता है.

इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग में हफ़्ते के कुछ दिनों में उपवास करना या दिन के कुछ घंटों में ही खाना शामिल है. आम तौर पर यह कैलोरी कम करने के तरीक़े की तुलना में वज़न घटाने को आसान बनाने के लिए जानी जाती है.

लेकिन इसके बताए जाने वाले फ़ायदे इससे कहीं ज़्यादा हैं. जिनमें कैंसर और दिमागी क्षमता में कमी के जोखिम को कम करना भी शामिल है. शायद यही वजह है कि इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग तेज़ी से लोकप्रिय हो रही है.

लेकिन हाल के सबूतों ने इन दावों की मज़बूती पर सवाल उठाए हैं. स्टडी के आधार पर इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग को दूसरी डाइट की तुलना में ज़्यादा असरदार या कम असरदार दिखाया जा सकता है.

एक स्टडी में तो यह भी कहा गया है कि इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग नुकसानदेह हो सकती है और इससे दिल की बीमारी का ख़तरा बढ़ सकता है.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ इलिनोइस एट शिकागो में न्यूट्रिशन की प्रोफ़ेसर क्रिस्टा वाराडी कहती हैं, "वैज्ञानिक भी हमेशा सभी तथ्यों पर सहमत नहीं होते. इन्फ़्लुएंसर की तो बात ही छोड़ दें. यह कोई जादू नहीं है."

तो क्या इंटरमिटेंट फास्टिंग को ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया है? या यह एक ऐसी असरदार डाइट है जो हमारी ज़िंदगी के साल बढ़ा सकती है? और इसके सबूत इतने अलग-अलग क्यों रहे हैं?

कई रिसर्चर का कहना है कि डेटा को और मज़बूत बनाने में सबसे बड़ी रुकावट ऐसी है जिसे हल करना भी सबसे मुश्किल है.

वराडी कहती हैं, "हमें पता ही नहीं होता कि लोग असल में क्या खा रहे है. यह बात कई दूसरे या शायद सभी तरह के डाइटरी बदलावों पर लागू होती है."

इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग का मकसद यह दिखाना है कि हमारे पूर्वज कैसे खाते थे. बाल्टीमोर में जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी में काम करने वाले न्यूरोसाइंटिस्ट मार्क मैटसन कहते हैं, "हम ऐसे माहौल में नहीं पले-बढ़े जहां हम दिन में तीन बार खाना और दो बार स्नैक खाते थे."

उपवास रखने से मेटाबॉलिज़्म में बदलाव आता है. शरीर पहले शुगर बर्न करने के बजाय खून में मौजूद फैट को बर्न करने लगता है. मेटाबॉलिज़्म में यह बदलाव सेल्स के व्यवहार को बदल देता है.

हेल्दी सेल्स पुराने और खराब हो चुके प्रोटीन को रीसाइकल करने लगते हैं. इस प्रोसेस को ऑटोफैगी कहते हैं. इससे सेल्स फिर से नए जैसे हो जाते हैं.

थ्योरी के हिसाब से इसका सीधा असर सेहत से जुड़े उन फ़ायदों पर पड़ता है जिनका दावा किया जाता है.

'न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ़ मेडिसिन' में छपी एक अहम स्टडी में मैटसन ने मेटाबॉलिज़्म में होने वाले इस बदलाव को लंबी उम्र और बीमारियों (जैसे डायबिटीज़ और कैंसर) के कम होने से जोड़ा है.

बस एक समस्या है. इसके सबसे मज़बूत सबूत चूहों, मक्खियों और कीड़ों पर की गई स्टडी से मिले. उनके लिए इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग एक अच्छे इलाज जैसा था.

चूहे उतनी ही कैलोरी खाते थे जितनी कि उन्हें खाने को दी जाती थी. लेकिन जब उनके खाने का समय सीमित रहता, वे बुढ़ापे तक फिट और स्वस्थ रहते. वहीं दूसरे चूहे मोटे और बीमार हो जाते.

हालांकि, इंसानों पर की गई स्टडी से मिले सबूत उतने पक्के नहीं हैं.

सवाल है कि मोटापे पर इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग का क्या असर होता है?

वराडी कहती हैं कि इंटरमिटेंट फास्टिंग के टाइप के बेस पर इंसानों में "इससे लगभग 5% वज़न कम होता है."

वह कहती हैं, "यह किसी भी अन्य डाइट स्ट्रेटेजी जितनी ही असरदार है. लेकिन इंसानों के मामले में वैसे ज़बरदस्त नतीजे नहीं मिले हैं जो चूहों में देखे गए थे."

इंटरमिटेंट फास्टिंग से थोड़ा सा वज़न कम होने पर भी निश्चित रूप से मेटाबोलिक फ़ायदे हो सकते हैं.

वराडी कहती हैं, "मेटाबोलिक रिस्क मार्कर में कुछ कमी आती है. जिसमें कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर शामिल हैं. ऐसा लगता है कि यह पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम के लक्षणों को भी कम करता है."

वह कहती हैं कि प्रोसेस शुरू करते समय व्यक्ति जितना कम स्वस्थ होता है, उसे उतने ही ज़्यादा स्वास्थ्य लाभ मिलते हैं. लेकिन चूहों में देखे गए फ़ायदों की तुलना में इंसानों में ये फ़ायदे कम साफ़ तौर पर दिखाई देते हैं.

इसके अलावा इंटरमिटेंट फास्टिंग के ज़्यादा सख़्त तरीके, जैसे कि एक दिन छोड़कर खाना, शरीर के बिना फैट वाले वज़न को कम करके व्यक्ति को मेटाबोलिक रूप से कम स्वस्थ बना सकते हैं.

बेहतर सोचने-समझने की क्षमता के दावों के मामले में एक जानी-पहचानी बात सामने आती है. वो ये है कि चूहों और इंसानों से मिले डेटा में साफ़ फ़र्क है. कैंसर रिसर्च से भी इसी तरह के मिले-जुले नतीजे मिले हैं.

जानवरों पर हुए ट्रायल में इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग को कैंसर से बचाव और टॉक्सिक कीमोथेरेपी को झेलने की बेहतर क्षमता से जोड़ा गया था. लेकिन चूहों में काम करने वाले तरीके पर की गई एक बड़ी स्टडी इंसानों पर नाकाम रही.

रिसर्चर ने एक खास डाइट बनाई थी जो लंबे समय तक भूखे रहने से शरीर में होने वाले बायोलॉजिकल बदलावों की नकल करती. थ्योरी के हिसाब से इससे हेल्दी सेल्स ज़्यादा मज़बूत होतीं और कैंसर सेल्स कमज़ोर पड़ जातीं. हालांकि, जिन लोगों पर यह आज़माया गया, उनमें वह मेटाबोलिक बदलाव नहीं हुआ जिसकी उम्मीद थी.

इसके बावजूद मेटास्टैटिक ब्रेस्ट कैंसर वाली महिलाओं के लिए 5:2 डाइट कीमोथेरेपी के दौरान फ़ायदेमंद हो सकती है. इससे उनकी ज़िंदगी की क्वालिटी बेहतर हो सकती है और बीमारी के बढ़ने की रफ़्तार धीमी हो सकती है.

उलझन भरे और एक-दूसरे से अलग नतीजों के बीच एक बात साफ़ तौर पर उभरकर आती है. जानवरों की तुलना में इंसानों पर इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग के फ़ायदे उतने प्रभावशाली नहीं होते. इसकी वजह क्या है?

इसका कुछ कारण बुनियादी बायोलॉजिकल अंतर भी हैं. उदाहरण के लिए चूहे का मेटाबोलिक रेट इंसान के मुकाबले बहुत ज़्यादा होता है, जो गलतफहमी पैदा कर सकता है.

हार्वर्ड स्कूल ऑफ़ पब्लिक हेल्थ में न्यूट्रिशन की एसोसिएट प्रोफेसर कोर्टनी पीटरसन कहती हैं, "चूहे का 16 घंटे का उपवास असल में इंसान के कई दिनों के उपवास के बराबर होता है क्योंकि उनका मेटाबोलिक रेट बहुत ज़्यादा होता है."

वराडी कहती हैं कि एक और बात यह है कि इन ट्रायल्स में इस्तेमाल होने वाले चूहे आमतौर पर एक-दूसरे की जेनेटिक कॉपी होते हैं, जिससे इंसानों में दिखने वाली विविधता का पता नहीं चल पाता. वह कहती हैं, "वे सच में एक बहुत खराब मॉडल हैं."

हालांकि शायद सबसे बड़ी रुकावट बायोलॉजी नहीं, बल्कि जानकारी है. पीटरसन कहती हैं, "यह जानना बहुत मुश्किल है कि लोग असल में क्या खा रहे हैं."

जानवरों पर किए गए टेस्ट में डाइट और उसके असर के बीच इतना साफ़ संबंध दिखने की एक वजह यह थी कि वे क्या खा रहे थे, इस पर कोई शक नहीं था.

चूहों और लैब में रखे दूसरे जानवरों के पास "डाइट पर बने रहने" के अलावा कोई चारा नहीं होता. वे ठीक उतना ही और उसी समय खाना खाते हैं जितना और जब रिसर्चर उन्हें देते हैं. इससे डाइट और बायोलॉजिकल या मेडिकल असर के बीच सीधा संबंध पता लगाना आसान हो जाता है.

हालांकि इंसानों पर किए जाने वाले ज़्यादातर टेस्ट में आप उनके न्यूट्रिएंट लेने के तरीके को कंट्रोल नहीं कर सकते. आप उन्हें वह डाइट बता सकते हैं जिसका वे पालन करें और उन्हें एक फ़ूड डायरी दे सकते हैं, चाहे वह कागज़ पर हो या कभी-कभी वर्चुअल.

फिर वे अपनी ज़िंदगी जीने और अपनी पसंद के हिसाब से चीज़ें चुनने लगते हैं. वराडी कहती हैं, "न्यूट्रिशन रिसर्च में हमारे पास यह मापने का कोई तरीका नहीं है कि लोग असल में क्या खा रहे हैं. इसलिए हम पूरी तरह से इस बात पर निर्भर हैं कि वे सच बोलें."

लेकिन ईमानदार लोगों की भी याददाश्त एकदम सही नहीं होती. हो सकता है कि वे अपनी फ़ूड डायरी में कोई खाना लिखना भूल जाएं. या डाइट का पालन न कर पाने की शर्मिंदगी की वजह से वे एक-दो ऐसी चीज़ें बताना भूल जाएं जो उन्होंने फास्टिंग के टाइम खाई थीं.

वराडी का अनुमान है कि उनकी रिसर्च में शामिल लोगों में से सिर्फ़ 50 फीसदी ही फ़ूड रिकॉर्ड वापस करते हैं. बाकी लोग कभी-कभी उसमें हेर-फेर कर देते हैं.

वराडी कहती हैं कि उन्हें यह जानकारी अनजाने में ही तब मिली जब वह न्यूट्रिशन की युवा प्रोफ़ेसर थीं. जब वह उस कमरे के पास से गुज़रीं जहां स्टडी में शामिल लोग अपने खाने का रिकॉर्ड जमा करने का इंतज़ार कर रहे थे, तो उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति जल्दी-जल्दी पूरे हफ़्ते के खाने का ब्यौरा लिख ​​रहा था.

वह कहती हैं, "वे बस मनगढ़ंत बातें लिख रहे थे. और मैंने सोचा 'अरे, यह तो बेकार डेटा है.' और फिर मेरे मन में आया 'और कितने लोग ऐसा कर रहे होंगे?'"

एबेरिस्टविथ यूनिवर्सिटी में न्यूट्रिशन रिसर्चर थॉमस विल्सन बताते हैं कि 2025 में रिसर्चर की एक इंटरनेशनल टीम ने एक इक्वेशन तैयार किया जिससे इस समस्या के दायरे का अंदाज़ा लगाया जा सका. इससे पता चला कि लगभग 30 फीसदी लोग अपने खाने की मात्रा कम बताते हैं.

वह आगे कहते हैं, "ऐसा बहुत कम होता है कि लोग खाने की मात्रा ज़्यादा बताएं."

'डबली लेबल्ड वॉटर स्टडीज़' यह पता लगाने का सबसे सटीक तरीका है कि कोई व्यक्ति असल में कितनी एनर्जी ले रहा है. इन टेस्ट में शामिल लोग हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के सुरक्षित स्टेबल आइसोटोप वाला पानी पीते हैं.

पसीने और यूरिन के ज़रिए ये शरीर से कितनी तेज़ी से बाहर निकलते हैं, इसे मापकर साइंटिस्ट यह हिसाब लगा सकते हैं कि उस दौरान शरीर ने कितनी एनर्जी इस्तेमाल की.

2025 के इक्वेशन से पता चला कि औसतन लोग 400 से 800 से ज़्यादा कैलोरी कम बताते हैं. लेकिन यह हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग हो सकता है.

जब वराडी ने यह पता लगाने के लिए इनका इस्तेमाल किया कि किसी व्यक्ति के खाने के बारे में यादें असलियत से कितनी अलग हैं, तो नतीजे चौंकाने वाले थे.

वह कहती हैं, "लोग रोज़ाना 1,600 से 2,000 कैलोरी खाने की बात कहते हैं. और जब हमें 'डबली लेबल्ड वॉटर' से असल डेटा मिलता है, तो पता चलता है कि वे 3,500 कैलोरी ले रहे होते हैं."

वहीं पीटरसन का कहना है कि न्यूट्रिशनिस्ट के लिए भी न्यूट्रिशन की सटीक जानकारी बताना मुश्किल होता है. खाने की मात्रा में बहुत अंतर होता है. और तो और वैज्ञानिक खाने की चीज़ों में मौजूद तत्वों का अंदाज़ा लगाने के लिए जिन न्यूट्रिशन कंपोज़िशन टेबल का इस्तेमाल करते हैं, जैसे कि बर्गर में कितने मैक्रोन्यूट्रिएंट्स हैं, उनमें सिर्फ़ औसत जानकारी होती है, न कि किसी खास प्रोडक्ट की पूरी जानकारी.

ये कमियां इतनी जानी-पहचानी और परेशान करने वाली हैं कि ऐसी स्टडीज़ को पब्लिश करना बंद करने की मांग की गई है जो लोगों द्वारा खुद बताई गई डाइट पर आधारित हों.

लेकिन असल में न्यूट्रिशनिस्ट रिकॉर्ड और सर्वे का इस्तेमाल करना छोड़ नहीं सकते. वराडी कहती हैं, "हमारे पास बस यही एक तरीका है।"

लेकिन शायद अब ऐसा ज़्यादा समय तक नहीं होगा.

इंसानों पर होने वाली सभी स्टडीज़ खुद से दी गई जानकारी पर निर्भर नहीं होतीं. इनपेशेंट फ़ीडिंग ट्रायल, एक सख़्त तरह की स्टडी है जिसमें रिसर्चर ठीक-ठीक कंट्रोल करते हैं कि पार्टिसिपेंट क्या खाते हैं. ये चूहों पर की गई स्टडीज़ जैसा ही सटीक डेटा दे सकते हैं.

इसमें हर कैलोरी को ध्यान से कंट्रोल किया जाता है. खाने का वज़न किया जाता है और अगर आपको उस समय कुछ स्नैक खाने का मन करे जब आपको फ़ास्टिंग करनी है, तो कुछ नहीं हो सकता. वहां कोई फ़्रिज नहीं होता.

पीटरसन ने ये ट्रायल किए हैं. उनकी स्टडीज़ में इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग के असर आम स्टडीज़ के मुक़ाबले ज़्यादा मज़बूत दिखे हैं. जैसे ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर में कमी, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस नाम के मॉलिक्यूलर डैमेज में कमी, और ऑटोफ़ेगी में बढ़ोतरी.

हालांकि लागत की वजह से ये ट्रायल बहुत छोटे और कम समय के होते थे. जिससे इनसे निकाले जा सकने वाले नतीजों पर कुछ हद तक सीमाएँ लग जाती हैं. बहुत कम पार्टिसिपेंट के पास छह महीने तक फ़ूड ट्रायल में शामिल होने का समय होता है.

लेकिन क्या हो अगर आप टेक्नोलॉजी की मदद से इन कड़ी निगरानी वाली स्थितियों जैसा माहौल बना सकें? न्यूट्रिशनिस्ट तेज़ी से ऐसे नए तरीकों की ओर देख रहे हैं जो सेल्फ़-रिपोर्टिंग पर कम, या बिल्कुल भी नहीं निर्भर करते हैं. कई नई टेक्नोलॉजी अब इस बात का ज़्यादा सटीक रिकॉर्ड दे सकती हैं कि लोग क्या खाते हैं.

उदाहरण के लिए कुछ स्टडीज़ में लोगों से कहा जाता है कि वे जो कुछ भी खाएं उसकी फ़ोटो लें. लेकिन इसमें लोगों को खुद डेटा रिकॉर्ड करना पड़ता है, इसलिए दूसरे लोग चश्मे या नेकलेस पर लगे कैमरों का इस्तेमाल करते हैं, जैसे कि फिटनिबल या ऑटोग्राफर.

ये कैमरे हर सात सेकंड में या जब भी उन्हें कुछ चबाने का पता चलता है, तब फ़ोटो लेते हैं. हालांकि कैमरों से प्राइवेसी से जुड़ी चिंताएं हो सकती हैं.

बिना कैमरों के खाने-पीने की चीज़ों पर नज़र रखने के लिए दूसरे सेंसर भी बनाए जा रहे हैं. इनमें ऐसे नेकलेस शामिल हैं जो चबाने की क्रिया को पहचानते हैं, स्मार्ट फ़ोर्क जो पता लगाते हैं कि कोई व्यक्ति कब और कितना खाना मुंह में ले जा रहा है, और दांतों पर लगने वाले न्यूट्रिएंट सेंसर.

इनमें से ज़्यादातर आइडिया अभी शुरुआती स्टेज में हैं. फ़िलहाल सबसे प्रैक्टिकल तरीका रेगुलर ब्लड और यूरिन टेस्ट करवाना है. जिनसे शरीर में प्रोसेस हो रहे मैक्रोन्यूट्रिएंट्स पर नज़र रखी जा सके. विल्सन कहते हैं, "यूरिन और ब्लड एनालिसिस से आपको खाने के कंपोज़िशन के बारे में कहीं ज़्यादा जानकारी मिलेगी."

विल्सन का कहना है कि कई नई और पुरानी टेक्नोलॉजी उपलब्ध हैं, लेकिन कोई भी एक टेक्नोलॉजी अकेले इस समस्या को हल नहीं कर पाएगी.

हालांकि उन्हें मिलाकर एक 'टेक-होम पैनोप्टिकॉन' यानी घर में ही निगरानी वाला सिस्टम बनाया जा सकता है. इस साल की शुरुआत में पब्लिश हुई एक स्टडी में विल्सन और उनके साथियों ने कई अलग-अलग तरीकों और टेक्नोलॉजी की समीक्षा की और सुझाव दिया कि अगर उन्हें एक साथ इस्तेमाल किया जाए, तो वे काम आ सकते हैं.

मैटसन का मानना ​​है कि इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग के क्लिनिकल ट्रायल को और आगे बढ़ना चाहिए. इसमें सिर्फ़ नियमों के पालन, खाने की चीज़ों और कैलोरी का डेटा ही नहीं, बल्कि शारीरिक गतिविधि और नींद का डेटा भी शामिल होना चाहिए.

ये ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें "जानवरों पर होने वाली स्टडीज़ में बहुत बारीकी से कंट्रोल किया जाता है."

एक तरफ़ जहां रिसर्चर और कंपनियां लोगों की प्राइवेसी और खाने-पीने के सही तरीकों को समझने के बीच एक मुश्किल संतुलन बनाने की कोशिश कर रही हैं.

वहीं दूसरी तरफ़ सोशल मीडिया इन्फ़्लुएंसर चूहों पर हुए नतीजों को इंसानों पर हुए नतीजों जैसा ही बता रहे हैं और इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग के कुछ फ़ायदों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं.

वराडी कहती हैं, "मैं एक यू-ट्यूब चैनल शुरू करने के बारे में सोच रही हूँ क्योंकि मैं बहुत सारी गलत जानकारी देख रही हूँ."

यह समस्या सिर्फ़ इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग तक ही सीमित नहीं है. वह बताती हैं, "इसीलिए लोग न्यूट्रिशन से जुड़ी रिसर्च से इतने परेशान हो जाते हैं."

वह कोलेस्ट्रॉल से जुड़ी सलाह की ओर इशारा करती हैं, जो सालों से कभी 'जानलेवा' तो कभी 'ठीक-ठाक' बताई जाती रही है. "ऐसा इसलिए है क्योंकि हमें पता ही नहीं होता कि लोग क्या खा रहे हैं."

Open Questions

  • इंसानों पर इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग के दीर्घकालिक सटीक परिणाम क्या हैं?
  • खान-पान की सही निगरानी के लिए कौन सी नई तकनीक सबसे असरदार होगी?

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