रूस ने ईरान के मक्का रक्षा गठबंधन में शामिल होने की संभावना जताई
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रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा कि भविष्य में ईरान भी सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के मक्का रक्षा गठबंधन का हिस्सा बन सकता है, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग में रूस के हित जुड़े हैं, जबकि विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की भागीदारी फिलहाल भरोसे की कमी और क्षेत्रीय मतभेदों के कारण अनिश्चित बनी हुई है।
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Why It Matters
सात अगस्त को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने मक्का रक्षा गठबंधन पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें किसी भी सदस्य पर सशस्त्र हमला सभी पर हमला माना जाएगा। रूसी विदेश मंत्री ने मॉस्को स्टेट इंस्टीट्यूट में कहा कि ईरान भी इस गठबंधन का हिस्सा बन सकता है।
रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के इस बयान ने कि भविष्य में ईरान भी मक्का रक्षा समझौते का हिस्सा बन सकता है, इस नए क्षेत्रीय रक्षा ढांचे के दायरे और भविष्य को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं.
सोमवार (सात सितंबर) को मॉस्को स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंटरनेशनल रिलेशंस में विद्यार्थियों और शिक्षकों को संबोधित करते हुए रूसी विदेश मंत्री ने कहा, "अब समय आ गया है कि सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान की मदद से देशों के बीच सहयोग को व्यवस्थित किया जाए."
मक्का समझौते का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस पर हस्ताक्षर करने वाले तीनों देशों के पास "सामूहिक सुरक्षा और रक्षा गठबंधन की एक अवधारणा मौजूद है."
ग़ौरतलब है कि पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने बीती सात अगस्त को एक संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. इसे "मक्का रक्षा गठबंधन" नाम दिया गया.
समझौते में तय किया गया था कि "तीनों देशों में से किसी के भी ख़िलाफ़ होने वाला कोई भी सशस्त्र हमला, सभी के ख़िलाफ़ हमला माना जाएगा."
हालांकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन यह स्पष्ट कर चुके हैं कि यह समझौता किसी देश के ख़िलाफ़ नहीं है.
उन्होंने यह भी कहा है कि क्षेत्र के दूसरे देश भी इसमें शामिल हो सकते हैं.
रूसी विदेश मंत्री ने क्या कहा
इसी बात का हवाला रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भी दिया.
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उन्होंने कहा, "और वे (पाकिस्तान, सऊदी अरब, तुर्की) कहते हैं कि इसमें शामिल होने के दरवाज़े दूसरे देशों के लिए भी खुले हैं. और सिर्फ़ ख़ाड़ी देशों के लिए ही नहीं, बल्कि मिस्र के लिए भी."
इस मौक़े पर उन्होंने कहा. "किसी चरण पर ऐसी शर्तों पर भी सहमति बन सकती है कि ईरान भी इस प्रक्रिया का हिस्सा बन जाए."
रूसी विदेश मंत्री ने कहा कि अगर ऐसा हो जाता है, यानी अगर ईरान भी मक्का रक्षा गठबंधन का हिस्सा बन जाता है तो "यह उस अवधारणा की दिशा में एक बहुत अच्छा व्यावहारिक क़दम होगा, जिसे रूस पहले ही पेश कर चुका है."
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़, इसी बातचीत में सर्गेई लावरोव ने यह भी कहा था कि रूस ने 20 साल पहले ही ऐसा एक प्रस्ताव दिया था.
इसमें कहा गया था कि खाड़ी देश, जिनमें "अरब राजसत्ताएं" और ईरान भी शामिल हों, क्षेत्रीय साझा सुरक्षा के लिए एक कार्ययोजना तैयार करने पर विचार करें.
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जिस दिन रूसी विदेश मंत्री ने यह बातचीत की, उसके अगले ही दिन सऊदी विदेश मंत्री शहज़ादा फ़ैसल बिन फ़रहान ने मॉस्को में उनसे मुलाक़ात की.
सऊदी अरब की सरकारी समाचार एजेंसी सऊदी प्रेस एजेंसी के मुताबिक़, इस बैठक में "क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामने आई ताज़ा घटनाओं पर चर्चा की गई. इसके अलावा तनाव कम करने और हालात को शांत करने के प्रयासों पर भी बातचीत हुई."
बैठक के बाद जारी समाचार में यह नहीं बताया गया कि रूसी विदेश मंत्री ने अपने सऊदी समकक्ष के साथ मक्का रक्षा गठबंधन में ईरान की भागीदारी पर बात की या नहीं.
सऊदी विदेश मंत्री का यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब यमन के हूतियों ने ड्रोन और मिसाइलों से सऊदी अरब के कई ठिकानों को निशाना बनाया है.
सऊदी विदेश मंत्रालय के अनुसार, हूतियों ने "नागरिक और आर्थिक" प्रतिष्ठानों पर हमले किए. इन हमलों में महिलाओं और बच्चों समेत 73 नागरिक घायल हुए.
यमन के हूतियों के बारे में कहा जाता है कि उन्हें ईरान का समर्थन हासिल है.
एक ओर जहाँ ईरान समर्थित हूती सऊदी अरब में हमले कर रहे हैं, वहीँ दूसरी ओर रूसी विदेश मंत्री सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के रक्षा गठबंधन में ईरान की संभावित भागीदारी की बात कर रहे हैं.
बीबीसी न्यूज़ उर्दू ने इस सवाल का जायज़ा लेने की कोशिश की है कि मक्का रक्षा समझौते में ईरान की भागीदारी कितनी व्यावहारिक है. रूस इस समझौते को किस नज़र से देख रहा है. और क्षेत्रीय रक्षा सहयोग की इस पूरी प्रक्रिया में मॉस्को के क्या हित हो सकते हैं.
ईरान का मक्का रक्षा गठबंधन का हिस्सा बनना कितना व्यावहारिक है?
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों और पूर्व राजनयिकों की इस बारे में अलग-अलग राय है.
कुछ के अनुसार, मौजूदा क्षेत्रीय परिस्थितियों में ईरान का इस गठबंधन का हिस्सा बनना मुश्किल लगता है. जबकि अन्य का मानना है कि लंबी अवधि में इस समझौते की उपयोगिता ही ईरान की भागीदारी पर निर्भर हो सकती है.
पूर्व राजनयिक अब्दुल बासित के अनुसार, इस समय मक्का समझौते में ईरान की भागीदारी की संभावना सीमित दिखाई देती है. क्योंकि रक्षा गठबंधनों की बुनियादी ज़रूरतों में सैन्य सहयोग, ख़ुफ़िया जानकारी साझा करना और आपसी भरोसा शामिल होता है.
बीबीसी न्यूज़ उर्दू से बातचीत में उनका कहना था कि ईरान और सऊदी अरब के बीच अभी भरोसे का वह स्तर मौजूद नहीं है, जो ऐसी सुरक्षा व्यवस्था के लिए ज़रूरी होता है.
उन्होंने यह भी कहा कि जब तक "ईरान की प्रॉक्सी मौजूद हैं" तब तक सऊदी अरब भी नहीं चाहेगा कि ईरान इस गठबंधन में शामिल हो. उनका इशारा यमन, लेबनान और इराक़ में ईरान समर्थित ग़ैर-राज्य सशस्त्र समूहों की ओर था.
अब्दुल बासित के अनुसार, हालांकि तेहरान ने मक्का समझौते का स्वागत किया है, लेकिन ईरान के भीतर भी शक्ति के अलग-अलग केंद्र मौजूद हैं.
उनका कहना था कि अभी यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि ईरान इस ढांचे में शामिल होने के लिए तैयार है.
क़ायदे आज़म यूनिवर्सिटी में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंटेलिजेंस एंड सिक्योरिटी स्टडीज़ के एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. ख़ुर्रम इक़बाल भी मानते हैं कि ईरान की भागीदारी तुरंत संभव नहीं दिखती. हालांकि उनकी दलील कुछ अलग है.
उनके अनुसार, ईरान, पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब इसराइल की बढ़ती क्षेत्रीय भूमिका को लेकर कुछ साझा चिंताएं रखते हैं. लेकिन इस चुनौती से निपटने के तरीक़ों पर उनके बीच मतभेद मौजूद हैं.
बीबीसी न्यूज़ उर्दू से बातचीत में डॉ. ख़ुर्रम का कहना था कि ईरान के भीतर मौजूद कुछ कट्टरपंथी वर्ग मक्का समझौते को एक विशेष सुन्नी ब्लॉक के रूप में भी देखते हैं. इसी वजह से तुरंत ईरान की भागीदारी मुश्किल नज़र आती है.
हालांकि, पूर्व विदेश सचिव शमशाद अहमद इससे सहमत नहीं हैं.
उनके अनुसार, मक्का समझौते की दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि क्या वह अपने दायरे को बढ़ाते हुए ईरान समेत अन्य क्षेत्रीय देशों को शामिल कर पाता है या नहीं.
बीबीसी न्यूज़ उर्दू से बातचीत में उनका कहना था कि यह कोई धार्मिक गठबंधन नहीं है. बल्कि यह क्षेत्रीय सुरक्षा की एक अवधारणा है.
उन्होंने कहा कि भविष्य में मिस्र, जॉर्डन, इराक़, ख़ाड़ी देशों और अन्य देशों की भागीदारी भी संभव हो सकती है.
उनके शब्दों में- "मक्का समझौता काग़ज़ का एक टुकड़ा बना रहेगा, जब तक ईरान इसमें शामिल नहीं होता."
ग़ौरतलब है कि ईरानी सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहसिन रज़ाई ने 22 अगस्त को सरकारी समाचार एजेंसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि ईरान मक्का समझौते का हिस्सा केवल उसी स्थिति में बन सकता है, जब उसे इस समझौते का "सह-संस्थापक" (को-फ़ाउंडर) माना जाए.
उन्होंने कहा था कि समझौते के मूल दस्तावेज़ तैयार करने में ईरान को भूमिका दी जानी चाहिए.
उन्होंने आगे कहा था. "ईरान और मिस्र ऐसे समझौतों से ग़ायब नहीं हो सकते. हालांकि उनकी भागीदारी संस्थापक देशों (को-फ़ाउंडर्स) के रूप में होनी चाहिए. यानी ऐसे पक्षों के रूप में, जिनकी अवधारणाएं और विचार हस्ताक्षरित दस्तावेज़ों की तैयारी में शामिल हों."
मक्का रक्षा गठबंधन में रूस का क्या हित है?
डॉ. ख़ुर्रम इक़बाल के अनुसार, रूस और चीन, दोनों देशों को ही मक्का रक्षा गठबंधन से फ़ायदा होगा.
बीबीसी से बातचीत में उनका कहना था कि रूस का बुनियादी हित मध्य पूर्व में ऐसी क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्थाओं को बढ़ावा देना है, जिनकी निर्भरता अमेरिका पर कम हो.
उनके अनुसार, मॉस्को लंबे समय से इस दृष्टिकोण का समर्थक रहा है कि क्षेत्रीय सुरक्षा समस्याओं का समाधान क्षेत्र के देश स्वयं तलाश करें.
"जितना अमेरिका की भूमिका एकमात्र सुरक्षा प्रदाता के रूप में कमज़ोर होगी, उतना ही रूस और चीन के लिए अपना राजनीतिक और कूटनीतिक प्रभाव बढ़ाने के अवसर पैदा होंगे."
वहीं शमशाद अहमद का मानना है कि रूस और चीन तो मक्का रक्षा समझौते के तहत बनने वाली व्यवस्था को सकारात्मक रूप से देखेंगे ही, यूरोपीय देश भी इसका समर्थन कर सकते हैं.
उनके अनुसार, रूस, चीन और यूरोप, सभी के इस क्षेत्र में हित मौजूद हैं. इसलिए क्षेत्र में एक स्थिर सुरक्षा ढांचा उनके हित में हो सकता है.
शमशाद अहमद का कहना है कि भविष्य में इस ढांचे का दायरा और बढ़ सकता है. कुछ परिस्थितियों में भारत भी इसमें रुचि ले सकता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि हालांकि मक्का रक्षा गठबंधन रूस की नज़र में क्षेत्रीय सुरक्षा की एक कार्ययोजना है और इसमें उसके हित भी जुड़े हैं. लेकिन इसमें ईरान की भागीदारी अभी भी अनिश्चित बनी हुई है.
What to Watch
AI outlook — possibilities, not facts
ईरान मक्का रक्षा गठबंधन में सह-संस्थापक के रूप में शामिल हो सकता है यदि उसे संस्थापक दस्तावेज़ों की तैयारी में भूमिका दी जाती है।
Possible · Within months
रूस और चीन मक्का रक्षा गठबंधन से अपने राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने का प्रयास करेंगे।
Likely · Within months
Open Questions
- क्या ईरान वास्तव में मक्का रक्षा गठबंधन में शामिल होगा?
- रूस इस गठबंधन से किन विशिष्ट रणनीतिक लाभों की उम्मीद कर रहा है?
- सऊदी-Arab और ईरान के बीच भरोसा कैसे बनाया जा सकता है?
- हूती हमलों का इस गठबंधन पर क्या प्रभाव पड़ेगा?





