
पेरिस के एफ़िल टावर में हाल ही में हुई एक घटना के बाद स्वामीनारायण संप्रदाय और बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था (बाप्स) में महिलाओं की भूमिका को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।
पेरिस के एफ़िल टावर में हुई एक घटना के बाद स्वामीनारायण संप्रदाय में महिलाओं की भूमिका और उनके साथ बरती जाने वाली दूरियों को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है, जिससे संप्रदाय की सदियों पुरानी परंपराएं चर्चा में हैं।
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फ़्रांस की राजधानी पेरिस के एफ़िल टावर में हाल ही में हुई एक घटना के बाद बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था (बाप्स) में महिलाओं की भूमिका को लेकर सवाल उठे हैं।
फ़्रांस की राजधानी पेरिस के मशहूर एफ़िल टावर में हाल ही में हुई एक घटना को लेकर विवाद पैदा हो गया है.
इस विवाद के बाद स्वामीनारायण संप्रदाय की एक शाखा, बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था (बाप्स) में महिलाओं की भूमिका को लेकर सवाल उठे हैं.
यह संप्रदाय क़रीब 200 साल पुराना है. इसकी स्थापना स्वामीनारायण ने की थी. उनका जन्म उत्तर प्रदेश में घनश्याम पांडे के रूप में हुआ था.
एफ़िल टावर से जुड़े विवाद ने एक बार फिर इस संप्रदाय की सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं को चर्चा में ला दिया है. बीबीसी ने इस मुद्दे से जुड़े कुछ सवालों की पड़ताल करने की कोशिश की, जैसे स्वामीनारायण संप्रदाय के धार्मिक ग्रंथों में महिलाओं के बारे में वास्तव में क्या लिखा गया है और साधु महिलाओं से इतनी दूरी क्यों बनाए रखते हैं?
स्वामीनारायण मंदिरों में नियमित रूप से आने वाले श्रद्धालुओं के मुताबिक, महिलाओं को आशीर्वाद लेने के लिए संतों के चरण स्पर्श करने की अनुमति नहीं है.
इस मुद्दे पर बीबीसी ने बाप्स के आधिकारिक प्रवक्ता से बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने इस विषय पर बात करने से इनकार कर दिया.
भारत में धार्मिक स्थलों पर महिलाओं को दूर रखने की परंपरा कोई नई बात नहीं है. केरल का सबरीमाला मंदिर महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को लेकर लंबे समय से विवाद के केंद्र में रहा है.
सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रतिबंध को हटाने का आदेश दिया था, लेकिन इस मामले में अंतिम फ़ैसला अब भी लंबित है.
बीबीसी गुजराती से बातचीत में सामाजिक कार्यकर्ता, लेखिका स्वरूप ध्रुव ने कहा, "मेरे विचार से हर धर्म ने महिलाओं को किसी न किसी तरह से अछूत माना है, लेकिन कुछ ने इसे अपनी ख़ासियत के तौर पर पेश किया है, जैसे स्वामीनारायण संप्रदाय ने."
समाजशास्त्री और स्वामीनारायण संप्रदाय के शोधकर्ता गौरांग जानी कहते हैं कि इस संप्रदाय का गठन समाज के वंचित और हाशिए पर मौजूद वर्गों के लोगों को आकर्षित करने के मक़सद से किया गया था.
19वीं सदी की शुरुआत में, जब हिंदू धर्म के भीतर कई संप्रदाय पहले से ही मौजूद थे, तब घनश्याम पांडे ने 1801 में एक नई परंपरा की शुरुआत की और इसे स्वामीनारायण संप्रदाय नाम दिया.
तब से इस संप्रदाय का मुख्यालय भारत के पश्चिमी राज्य गुजरात में रहा है.
साल 1801 में इसकी स्थापना के बाद से स्वामीनारायण परंपरा में शिष्यों के लिए, खासकर उसके संतों के ब्रह्मचर्य का पालन करने को लेकर, कड़े नियम रहे हैं. स्वामीनारायण के प्राचीन ग्रंथ 'शिक्षापत्री' के अनुसार, संत किसी महिला को छू या देख नहीं सकते.
हालांकि, बाप्स परंपरा के नियमित अनुयायियों के लिए यह कोई नई बात नहीं है.
उदाहरण के लिए, गौरांग जानी की मां नियमित रूप से स्वामीनारायण मंदिरों में दर्शन करने जाती थीं.
गौरांग जानी गुजरात यूनिवर्सिटी के समाजशास्त्र विभाग के हेड ऑफ डिपार्टमेंट रहे हैं.
उन्होंने देखा था कि उनकी मां को भगवान के सामान्य रूप से दर्शन करने या मंदिर में सामान्य तरीके से प्रवेश करने की भी अनुमति नहीं थी. महिलाओं को मंदिर में प्रवेश मिलता था, लेकिन उन्हें हमेशा पुरुषों से अलग रखा जाता था.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "जब धर्म की बात आती है, तो हमारा सामाजिक इतिहास बताता है कि महिलाओं ने इसे ईश्वर की निशानी के रूप में स्वीकार किया."
"शुरुआत से ही हमें सिखाया जाता है कि धार्मिक अनुष्ठानों और परंपराओं पर कोई सवाल नहीं करना चाहिए. इसलिए स्वामीनारायण मंदिरों में भी धीरे-धीरे यह प्रथा व्यापक रूप से स्वीकार कर ली गई, जहाँ बड़ी संख्या में महिलाएं नियमित रूप से दर्शन करने आती हैं."
गौरांग जानी का मानना है कि ब्रह्मचर्य के ये कड़े नियम ख़ुद को अन्य धार्मिक परंपराओं से अलग करने की कोशिश का हिस्सा थे.
उस समय इन परंपराओं के बीच अनुयायी हासिल करने के लिए प्रतिस्पर्धा चल रही थी.
उन्होंने कहा, "संप्रदाय को हिंदू धर्म के अन्य संप्रदायों, जैसे वैष्णव संप्रदाय, के साथ प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा था. इसलिए ख़ुद को अलग दिखाने के लिए उन्होंने कड़े ब्रह्मचर्य पर ज़ोर दिया और संप्रदाय का साधु बनने के लिए लोगों को ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिए प्रेरित करना शुरू किया."
स्वामीनारायण संप्रदाय की शुरुआत कैसे हुई?
पश्चिमी भारत में 19वीं सदी की शुरुआत में स्वामीनारायण संप्रदाय का उदय हुआ. इसके संस्थापक स्वामीनारायण का जन्म 1781 में आज के उत्तर प्रदेश में स्थित छपैया गांव में घनश्याम के रूप में हुआ था.
पूरे भारत में सात साल तक यात्रा करने के बाद वह गुजरात आए और 1801 में संप्रदाय की शुरुआत की.
वंचित और हाशिए पर धकेले गए वर्गों के लोगों के बीच मौजूद ख़ालीपन को भरने और उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने के लिए इस संप्रदाय की शुरुआत की गई थी. आगे चलकर, दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जाकर बसे गुजरात के पाटीदार समुदाय इस संप्रदाय के सबसे बड़े अनुयायी बन गए.
आज़ादी से पहले ही 1945 में नैरोबी में इस संप्रदाय का पहला अंतरराष्ट्रीय मंदिर बन गया था.
स्वामीनारायण संप्रदाय के साधुओं के राजनीतिक नेताओं के साथ अच्छे संबंध हैं. इनमें किसी भी शहर के मेयर से लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति तक के नेता शामिल हैं.
इस संप्रदाय के सबसे लोकप्रिय संत स्वामी महाराज के नाम दुनिया भर में सबसे अधिक मंदिरों के निर्माण का गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड है. दुनिया भर में करीब 1,300 मंदिर बनाए गए हैं.
स्वामीनारायण संप्रदाय में ब्रह्मचर्य का पालन क्यों किया जाता है?
स्वामीनारायण संप्रदाय के पवित्र ग्रंथ 'शिक्षापत्री' में अनुयायियों के लिए आचार संहिता दी गई है. 212 श्लोकों वाले इस ग्रंथ में गृहस्थों, महिलाओं, साधुओं और कठोर ब्रह्मचर्य व्रत लेने वाले संन्यासियों के लिए अलग-अलग नियम दिए गए हैं.
इस परंपरा का पालन करने वालों का मार्गदर्शन करने के लिए शिक्षापत्री लिखी गई थी. शिक्षापत्री में महिलाओं के लिए भी कुछ ख़ास नियम दिए गए हैं.
इसमें कहा गया है कि मासिक धर्म के दौरान महिला को तीन दिनों तक किसी व्यक्ति, कपड़े या बर्तन को नहीं छूना चाहिए. चौथे दिन स्नान करने के बाद वह ऐसा कर सकती हैं.
हालांकि, महिलाओं के साथ संपर्क को लेकर सबसे कड़े नियम महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि साधुओं या आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लेने वाले संन्यासियों के लिए हैं.
इसमें यह भी कहा गया है कि उन्हें जानबूझकर किसी महिला को छूना नहीं चाहिए, उससे बात नहीं करनी चाहिए या उसकी ओर देखना नहीं चाहिए.
संस्था की वेबसाइट के अनुसार, इस नियम का मक़सद महिलाओं को नीचा या अपवित्र मानना नहीं है. इसका मक़सद साधु को आध्यात्मिक साधना के दौरान सांसारिक इच्छाओं और आसक्ति से मुक्त रहने में मदद करना है.
इस प्रथा के आलोचकों का कहना है कि इसके पीछे भले ही धार्मिक कारण बताए जाते हों, लेकिन व्यवहार में इसका बोझ अक्सर महिलाओं पर पड़ता है, क्योंकि पुरुष साधु के ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करवाने की ज़िम्मेदारी महिलाओं को उठानी पड़ती है.
कई महिला कार्यकर्ताओं का मानना है कि संप्रदाय में मूल सवाल पुरुषों की भावनाओं और उनके संयम से जुड़ा था, लेकिन अंत में इसके प्रभाव और मुश्किलों का सामना महिलाओं को करना पड़ा.
स्वामीनारायण परंपरा की कुछ अन्य शाखाओं से अलग, गुजरात के वडोदरा में स्थित हरिधाम सोखड़ा में महिलाओं को साधुओं के संघ में प्रवेश करने की परंपरा है.
इसकी स्थापना स्वर्गीय हरिप्रसाद स्वामी ने की थी, जो बाप्स से अलग हो गए थे. तब से हरिधाम में संन्यास लेने वाली महिलाएं यानी साध्वियां भी हैं.
बीबीसी ने इसके आधिकारिक प्रवक्ता साधक स्वामी से बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.
महिलाएं क्या कहती हैं?
सामाजिक कार्यकर्ता, लेखिका स्वरूप ध्रुव ने बीबीसी गुजराती से बातचीत में कहा, "साधुओं की अपनी भावनाओं और इच्छाओं पर नियंत्रण रखने की कमज़ोर क्षमता के कारण ही इस संप्रदाय में महिलाओं के साथ इस तरह का व्यवहार किया जाता है."
उन्होंने कहा, "साधु महिलाओं के प्रति अपनी भावनाओं और संवेदनाओं को नियंत्रित नहीं कर सकते, इसलिए उन्हें महिलाओं की ओर देखने, उन्हें छूने या यहां तक कि किसी महिला की तस्वीर देखने की भी अनुमति नहीं है. इसलिए समस्या महिलाओं में नहीं, बल्कि इस संप्रदाय के साधुओं में है."
ध्रुव ने अपने लेखन और सड़क पर होने वाले नाट्य प्रदर्शनों के ज़रिए धर्मों में महिलाओं के प्रति अपनाए जाने वाले भेदभावपूर्ण रवैये के ख़िलाफ़ लगातार आवाज़ उठाई है.
जानी-माने कलाकार और सामाजिक कार्यकर्ता मल्लिका साराभाई का मानना है कि जो हुआ है और जो हो रहा है, वह पूरी तरह ग़लत है.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने भी कहा कि समस्या पुरुषों में है, महिलाओं में नहीं. "अगर किसी महिला के सामने आने पर पुरुष अपनी भावनाओं और संवेदनाओं पर नियंत्रण नहीं रख सकते, तो इसकी सज़ा महिलाओं को क्यों मिलनी चाहिए?"
"उन्हें अपनी आंखें बंद कर लेनी चाहिए या ऐसी जगहों पर नहीं जाना चाहिए जहाँ महिलाएं मौजूद हों. यह तो ऐसा हुआ कि मैं शाकाहारी हूँ, इसलिए जब मैं बाहर जाऊं तो मेरे आसपास मौजूद मांसाहारी भोजन की सभी दुकानों को बंद करने की मांग करूं."
फ़्रांस और महिलाओं के अधिकारों का इतिहास
एक ओर, भारत में स्वामीनारायण संप्रदाय में महिलाओं के साथ व्यवहार को लेकर कुछ विरोध देखने को मिला था, लेकिन पेरिस में भी ऐसा ही किए जाने के आरोपों के बाद वहां भारी विवाद खड़ा हो गया.
कई लोगों का मानना है कि फ्रांस में महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने वाली मज़बूत नारीवादी परंपरा के कारण यह मुद्दा वहाँ ज़्यादा चर्चा में आया.
इसमें क्रांतिकारी ओलिम्प द गूज का नाम उल्लेखनीय है. उन्होंने 1791 में 'डिक्लरेशन ऑफ द राइट्स ऑफ वुमन एंड ऑफ द फीमेल सिटिजन' नामक पुस्तक प्रकाशित की थी.
इसमें उन्होंने कहा था कि अगर महिलाओं को फांसी के तख्ते पर चढ़ने का अधिकार है, तो उन्हें राजनीतिक मंच पर खड़े होने का अधिकार भी होना चाहिए.
1789 की फ्रांसीसी क्रांति के दौरान आधुनिक यूरोपीय लोकतंत्र की बुनियादी विचारधारा का जन्म फ्रांस में हुआ था. हालांकि, महिलाओं को एक सदी से भी अधिक समय तक व्यवस्थित रूप से राजनीतिक क्षेत्र से दूर रखे जाने के आरोप लगते रहे हैं.
महिलाओं को भी मताधिकार मिलने वाली वास्तविक लोकतांत्रिक व्यवस्था 20वीं सदी के मध्य तक ही स्थापित हो सकी. इसके बाद महिलाओं को अपने शरीर और आर्थिक स्वतंत्रता से जुड़े अधिकार दिलाने के लिए दशकों तक क़ानूनी लड़ाइयां चलीं.
फ़्रांस की महिलाओं ने 29 अप्रैल, 1945 को स्थानीय निकायों के चुनाव में पहली बार मतदान किया.
फ़िलहाल फ्रांस में महिला-पुरुष समानता की स्थिति में काफ़ी सुधार हुआ है.
यूरोस्टैट के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़, राष्ट्रीय सरकारों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 48.6 प्रतिशत है.
इसमें सीनियर और जूनियर मंत्रियों को भी शामिल किया गया है. इस तरह फ्रांस महिला-पुरुष समानता की लगभग पूर्ण स्थिति के क़रीब पहुंच गया है.
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