
उज्ज्वला योजना की दस करोड़वीं लाभार्थी मीरा माझी के घर 2023 में पीएम मोदी ने चाय पी थी, अब परिवार आर्थिक तंगी और लोन चुकाने के संकट से जूझ रहा है।
वर्ष 2023 में पीएम नरेंद्र मोदी के अयोध्या में चाय पीने वाली उज्ज्वला योजना की लाभार्थी मीरा माझी का परिवार अब करीब तीन लाख रुपये के कर्ज और एनपीए संकट में फंस गया है, जिससे परिवार भारी आर्थिक तंगी का सामना कर रहा है।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 30 दिसंबर 2023 को उज्जवला योजना की 10 करोड़वीं लाभार्थी मीरा माझी के घर गए थे। बाद में जिला प्रशासन द्वारा परिवार को स्वरोजगार के लिए ऋण दिया गया था।
अयोध्या में मीरा माझी के घर में घुसते ही सामने एक छोटा सा मंदिर नज़र आता है. देवी-देवताओं की मूर्तियों के बीच स्टील की प्लेट में एक चीनी मिट्टी का रंगीन कप भी रखा है.
हमने मंदिर में कप रखने का कारण पूछा तो मीरा माझी ने कहा, "इसी कप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमारे घर में आकर चाय पी थी."
मीरा माझी का कहना है कि वे उस दिन से रोज सुबह देवी-देवताओं के साथ उस कप की पूजा करती हैं.
वह गुजरता हुआ साल 2023 था जिसकी तारीख़ 30 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अचानक मीरा माझी के घर पहुंचे थे. उन्होंने मीरा माझी के हाथों से तैयार चाय पी थी और परिवार के साथ समय बिताया था.
तब मीरा माझी, केंद्र सरकार की उज्जवला योजना की दस करोड़वीं लाभार्थी बनीं थीं, जिसके अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके घर पहुंचे थे.
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना केंद्र सरकार की एक प्रमुख योजना है, जिसके तहत गरीब परिवारों की महिलाओं को मुफ़्त एलपीजी गैस कनेक्शन दिया जाता है
पीएम मोदी ने मीरा माझी के परिवार के साथ करीब बीस मिनट का समय बिताया था.
उस मुलाक़ात के करीब तीन साल बाद मीरा माझी का परिवार आर्थिक मुश्किलों का सामना कर रहा है.
मीरा माझी का कहना है कि उन्हें उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री मोदी के उनके घर आने से उनकी मुश्किलें दूर हो जाएंगी और परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर होगी.
मीरा माझी ने 'बीबीसी न्यूज़' हिन्दी से बातचीत में उस दिन को याद करते हुए कहा, "2023 में हमारे घर प्रधानमंत्री मोदी जी आए थे. बहुत अच्छा लगा था, बहुत खुशी हुई थी. वो राम के रूप में आए थे. हमने उनको राम ही माना था क्योंकि वो आवास दिलाए थे. हम आवास के लिए बहुत दौड़े-धूपे थे. उज्ज्वला का सिलेंडर दिलाए थे, इस वजह से बहुत खुश थे."
लेकिन तीन साल बाद मीरा माझी का परिवार कर्ज के ऐसे जाल में उलझ गया है जहां से बाहर निकलने का कोई रास्ता उन्हें सूझ नहीं रहा.
मीरा माझी सरयू नदी के किनारे नया घाट पर फूल बेचकर और पति सूरज कुमार माझी मजदूरी कर जीवनयापन करते थे.
लेकिन प्रधानमंत्री के दौरे के बाद परिवार को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए जिला प्रशासन ने लोन के रूप में मदद की.
प्रशासन ने उन्हें एक ही दिन के भीतर प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) के तहत दो ऋण दिए. ये 5 सितंबर 2024 की तारीख़ थी.
प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम, केंद्र सरकार के एमएसएमई मंत्रालय की एक योजना है.
इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में नए सूक्ष्म उद्यमों के जरिए स्वरोज़गार के अवसर पैदा करना, बेरोज़गार युवाओं और पारंपरिक कारीगरों को व्यवसाय शुरू करने में मदद करना है.
यह ऋण मीरा माझी के पति सूरज कुमार माझी को दिया गया था. पहला लोन 2,61,250 रुपये और दूसरा, 23,750 रुपये का लोन दिया गया था.
इसी राशि से सूरज माझी ने अपनी नाव बनवाई थी और उसकी कमाई से लोन की किस्तें चुका रहे थे.
हालांकि, बकाया 2,04,616 रुपये जमा नहीं कर पाने के कारण उनका लोन एनपीए (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट) घोषित हो गया. इसके बाद बैंक ने 5 जुलाई 2026 को सूरज माझी को नोटिस जारी कर दिया.
मीरा माझी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, "लोन हम लोग नहीं मांगे थे. हम लोग सोचे कि देश के प्रधानमंत्री आए हैं हमारे घर. डीएम साहब जब दे रहे हैं, उन्होंने बोला 'टेंट की दुकान खुलवा दिया जाए.' जब टेंट की दुकान खुलवा रहे थे तो नाव क्या चीज़ है? नाव तो अपने पास से दे ही देंगे. लेकिन हमें तीन महीने बाद पता चला कि यह लोन पर है, जब पैसे के लिए मैसेज पर मैसेज आने लगा."
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी ने इस मामले में अयोध्या स्थित केनरा बैंक की शाखा के मैनेजर से बात करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने इस सन्दर्भ में कुछ भी कहने से इनकार कर दिया.
मीरा माझी का सात लोगों का परिवार दो कमरों के घर में रहता है. इस समय जिस घर में मीरा माझी रहती हैं वह प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बना हुआ है. घर में तीन बच्चे हैं, सभी सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं.
मीरा माझी के पति सूरज माझी नाव चलाकर ऋण की बकाया राशि जमा कर रहे थे लेकिन पूरी किस्त जमा नहीं कर सके.
सूरज माझी बीबीसी से कहा, "नाव बनवाकर हम लोग नाव चला रहे थे. नाव चलाते-चलाते हम कर्ज का क़िस्त जमा कर रहे थे. बैंक से लगातार फ़ोन आता रहता था कि इतना कम पैसा क्यों जमा कर रहे हो? पैसा और डालो. पैसा और डालो. लेकिन हम इतना पैसा नहीं कमा पा रहे थे. जैसे-तैसे एक डेढ़ लाख रुपया जमा किया. फिर अचानक से जब राम मंदिर में चोरी हो गया और काम धंधा ठप हो गया. तब यात्रियों की संख्या एकदम कम हो गई और हम उतना नहीं कमा नहीं पा रहे थे.
वह बताते हैं कि इसी बीच उनकी पत्नी मीरा माझी की घाट पर फूल बेचने की रोजीरोटी भी छिन गई.
सूरज कहते हैं, "हमारी पत्नी घाट पर फूल बेचती थी, इनका फूल बेचने वाला रोजी-रोटी भी वहां के पंडा लोग छीन लिए. वहां से इनको भगा के हटा दिए. ये भी घर पर बैठ गईं और हम भी घर पर बैठ गए. फिर ढाई महीने बाढ़ में सबका बोट बंद हो गया."
इस सवाल के जवाब में सूरज माझी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, "अयोध्या में नाव की संख्या बहुत ज़्यादा बढ़ गई है. यहां कम से कम तीन सौ नाव है, जिसमें डेढ़ सौ नाव राजघाट कंधरपुर की हैं लेकिन सौ से ज्यादा नाव बाहर से आ गई हैं. सबको काम नहीं मिल पाता है. सरयू के घाटों पर क्रूज बोट आने से भी असर पड़ा है. जो यात्री आते थे, हमारी नाव पर घूमते थे वो अब क्रूज बोट पर घूमने जाते हैं. इससे हमारा नुक़सान ही है, कोई फ़ायदा नहीं हो रहा है."
मीरा माझी पीएम मोदी के उनके घर जाने से पहले अपनी स्थिति को ज्यादा बेहतर मानती हैं.
वे कहती हैं कि जब घाट पर घूम कर फूल बेच रही थीं, ज्यादा अच्छी तरह परिवार चला रही थीं लेकिन बैंक से करीब तीन लाख का लोन मिलने के बाद फूल और नाव की कमाई से लोन चुका पाना मुश्किल हो गया.
मीरा माझी ने कहा, ''गरीब की कुटिया में देश के प्रधानमंत्री पधारे थे. हमने सोचा कि वो आए हैं तो हमारी दुख-तकलीफ़ें दूर हो जाएंगी. मुझे पूरा विश्वास था कि हमारी समस्याओं का समाधान होगा. इसलिए उन्हें भगवान मानकर उस कप-प्लेट को भगवान के पास रख दिया. प्रधानमंत्री जी हमारे तीन बच्चों के लिए सोच लिए होते तो हम उनका बहुत धन्यवाद करते."
मीरा आगे कहती हैं, "हम घूमकर फूल ही बेच रहे थे लेकिन हमारी स्थिति बहुत अच्छी थी, उनके आने के बाद हमारी स्थिति एकदम खराब हो गई क्योंकि हमारे हसबैंड को लोन दे दिया गया. हम उससे पहले एक समूह का क़िस्त चुका रहे थे. एक लोन और हो गया. दो लोन और तीन-तीन बच्चों का पालन पोषण करना बहुत मुश्किल हो गया. हम उनसे यही विनती करते हैं कि किसी के घर जाएं तो उसकी जिंदगी इतनी तहस-नहस न हो. हम यही कहेंगे कि आप हमारी स्थिति देखकर गए थे तो क्या आपको नहीं सोचना चाहिए था कि एक निषाद के घर में गए थे उसके लिए कुछ कर दें? हमारी जगह कोई अमीर होता उसके घर गए होते तो क्या से क्या हो जाता. क्या एक गरीब के घर में गए हैं तो उसके लिए कुछ नहीं किया जाता?"
मीरा माझी का मामला जब मीडिया के सामने आया तो लोग उनकी मदद कर रहे हैं.
मीरा माझी की प्रेस वार्ता के बाद 29 अक्टूबर को समाजवादी पार्टी के सरकार में पूर्व मंत्री पवन पांडेय ने 50 हजार रुपये और अयोध्या से बीजेपी महापौर गिरीश पति त्रिपाठी ने 60 हजार रुपये देकर मदद की.
लेकिन मीरा माझी का परिवार पिछले कुछ समय से प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को पत्र लिख कर मदद मांग रहा है.
मीरा के पति सूरज माझी ने 30 दिसंबर 2024 को जिलाधिकारी को पत्र लिख कर नाव चलवाने की मांग की थी.
वहीं, 17 अगस्त 2024 को मीरा माझी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर नया घाट पर फूल बेचने के लिए स्थायी जगह की मांग की थी. लेकिन, कोई जवाब नहीं मिला है.
17 अगस्त को ही मीरा माझी ने उत्तर प्रदेश सरकार को भी एक पत्र लिखा था.
मीरा कहती हैं, "हम कई लोगों के पास मदद के लिए गए थे लेकिन किसी ने हमारी मदद नहीं की. लोगों ने कहा अगर दो-चार हजार की बात होती तो हम मदद कर सकते थे लेकिन इतने पैसे की मदद नहीं कर पाएंगे."
कर्ज न चुका पाने के बीच परिवार की मनःस्थिति के बारे में बताते हुए मीरा रो पड़ती हैं, "हमारे पति एक दिन इतना तक फैसला कर लिए थे कि हम जहर खा लेंगे. यहां तक हम लोगों की नौबत आ गई थी. लेकिन हम लोग किसी तरह हिम्मत रखे और हमने कहा हम लोग कहीं आवाज़ उठाएंगे. हम कहीं आगे बढ़ेंगे."
फिलहाल, मीरा माझी तक कुछ मदद जरूर पहुंची है लेकिन वे उसे पूरा कर्ज चुका पाने के लिए अपर्याप्त मानती हैं.
मीरा माझी की बेहद ख़राब आर्थिक स्थिति की चर्चा तब सामने आई जब अयोध्या के यूथ कांग्रेस ने प्रदेश उपाध्यक्ष शरद शुक्ला ने मीरा माझी के साथ प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया.
शरद शुक्ला ने बीबीसी हिन्दी से कहा, "मीरा माझी के परिवार की माली हालत काफी बदतर हो चुकी थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके यहां चाय पी और कहा गया कि परिवार को तमाम योजनाओं से लाभ दिया गया. लेकिन इसमें विशेष क्या है? एक सामान्य गरीब परिवार को योजनाओं का लाभ मिलता ही है, वही लाभ उस परिवार को भी मिल रहा है."
"अगर नरेंद्र मोदी जी वास्तव में उस परिवार की मदद करना चाहते थे तो व्यापार के लिए अनुदान दे सकते थे. लेकिन जिस परिवार के पास आमदनी का कोई स्रोत नहीं था, उनके प्रशासन ने उसे लोन दिलवा दिया."
वे आगे कहते हैं, "जिस मीरा माझी के घर प्रधानमंत्री ने चाय पी थी, तीन साल बाद उनके यहां रिकवरी एजेंट आ रहे हैं. इससे साबित होता है कि विश्वगुरु की जो छवि गढ़ी जा रही है, वह पॉन्जी गुरु है."
भारतीय जनता पार्टी से अयोध्या महापौर गिरीश पति त्रिपाठी ने इसे विपक्ष का बनाया मुद्दा बताया है. वे मानते हैं कि मीरा माझी के परिवार को राज्य और केंद्र की जितनी भी योजनाएं हैं, उसका लाभ दिया जा रहा है.
गिरीश पति त्रिपाठी बीबीसी हिन्दी से कहा, "प्रधानमंत्री जी के जाने के बाद प्रधानमंत्री आवास के तहत इनका मकान निर्मित हो गया. उज्जवला योजना के तहत इनको गैस मिल गई. आयुष्मान के तहत इनके परिवार स्वास्थ्य के देख भाल के लिए स्वास्थ्य कार्ड की व्यवस्था हो गई."
"पीएम स्वनिधि के तहत 25 हजार रुपये का लोन नाव दुरुस्त करने के लिए मिला. तीन लाख का एक अन्य लोन मिला था, जिसमें 75 हजार की सब्सिडी थी. सवा दो लाख रुपये की किस्त की बात थी चूंकि ये कर नहीं पा रहे थे उसी को लेकर परेशान थे. लोन रिपेमेंट मामले में शासन-प्रशासन कुछ कर तो सकता नहीं, इसमें समाज ही कुछ कर सकता है."
वे कहते हैं, "मीरा माझी को आकर हम लोगों से मिलना चाहिए था. हम लोग इनकी मदद करते. यही चीज कुछ विपक्षी लोगों को पता चल गई. उन्होंने इस चीज का बतंगड़ (मुद्दा) बनाना शुरू कर दिया कि प्रधानमंत्री जी इनके यहां गए. प्रधानमंत्री जी के जाने के बाद राज्य और केंद्र की जितनी योजनाओं से लाभ दिया जा सकता था हम लोगों ने दे दिया है."
मीरा माझी का मामला प्रकाश में आने के बाद अयोध्या जिलाधिकारी शशांक त्रिपाठी ने प्रेस नोट जारी कर मीडिया को बताया कि मीरा माझी को प्रधानमंत्री उज्जवला योजना, आवास योजना, आयुष्मान कार्ड और अंत्योदय राशन कार्ड जैसी आवश्यक सुविधाओं का लाभ मिल रहा है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चाय पिलाने वाला कप मीरा माझी ने आज भी संभालकर रखा है. उस मुलाकात की यादें उनके लिए खास हैं. लेकिन परिवार के सामने अब भी कर्ज और रोजगार का संकट है.
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प्रशासन या राजनीतिक दलों द्वारा परिवार के कर्ज के समाधान के लिए मदद बढ़ाई जा सकती है।
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