इंडिया ब्लॉक सरकार पर प्रेशर बनाए रखने में कितना सफल होगा?
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इंडियन एक्सप्रेस की एसआईआर पर खोजी रिपोर्ट के बाद विपक्षी इंडिया गठबंधन में एकजुटता देखी गई है, जिसमें 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट तक मार्च और याचिका दायर की गई। हालांकि आम आदमी पार्टी और डीएमके जैसे दल गठबंधन से दूरी बनाए हुए हैं, जबकि पंजाब में कांग्रेस और आप के बीच तनाव जारी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि चुनाव आयोग का मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष को एकजुट कर सकता है, लेकिन संगठनात्मक कमजोरी और सीट शेयरिंग जैसे स्थानीय मुद्दे एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
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Why It Matters
इंडियन एक्सप्रेस की एसआईआर पर खोजी रिपोर्ट के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग के कामकाज में पारदर्शिता की मांग को लेकर प्रदर्शन शुरू किए। 12 अक्टूबर को इंडिया गठबंधन ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकालकर याचिका दायर की, जिसमें चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया को सार्वजनिक करने की मांग शामिल थी।
जब से एसआईआर पर इंडियन एक्सप्रेस की खोजी रिपोर्ट आई है, तब से विपक्षी गठबंधन में एक तरह की एकजुटता दिखाई दी है.
12 अक्तूबर को इंडिया गठबंधन के नेताओं ने एक मार्च निकाल कर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की जिसमें चुनाव आयोग में फ़ैसले लेने की प्रक्रिया को सार्वजनिक किए जाने समेत कई मांगें रखीं.
लंबे समय से एक के बाद एक चुनाव हारने वाले विपक्षी इंडिया गठबंधन के पास चुनाव आयोग का ताज़ा मुद्दा उसकी एकजुटता में एक नई जान फूंकने वाला है.
हालांकि बीते कुछ सालों में इंडिया गठबंधन का रास्ता काफ़ी मुश्किलों भरा रहा है. अभी भी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर प्रदर्शन हो रहे हैं, लेकिन डीएमके और आम आदमी पार्टी जैसे दल गठबंधन से दूरी बनाए हुए हैं.
12 अक्तूबर को जब इंडिया गठबंधन ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च किया तब आम आदमी पार्टी के नेताओं ने अलग से गिरफ़्तारी दी थी.
चुनाव आयोग के मुद्दे ने कुछ हद तक इंडिया ब्लॉक को एक हद तक फिर से एकजुट करने में सफलता हासिल की है. पश्चिम बंगाल चुनाव के समय दूरी बना चुकीं ममता बनर्जी भी इस मुद्दे पर साथ में हैं.
अभी पंजाब में चुनाव है तो आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच दूरियां बनी हुई हैं. आम आदमी पार्टी सीजेपी के साथ मिलकर प्रोटेस्ट कर रही है.
चुनावों में चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर उठे सवालों के बीच व्यापक असंतोष ने कांग्रेस और इंडिया ब्लॉक में नई जान फूंक दी है लेकिन क्या इंडिया ब्लॉक इन प्रदर्शनों की गति को बरकार रख पाएगा?
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वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी का मानना है कि 'चुनाव आयोग के कामकाज का मुद्दा काफ़ी आगे जा सकता है और इंडिया ब्लॉक की समझदारी पर निर्भर करता है कि वे राष्ट्रीय मुद्दों पर विपक्ष को कैसे एकजुट रखता है.'
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बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बात करते हुए नीरजा चौधरी कहती हैं, "जेन ज़ी और नौजवानों तबके की ओर से ग्राउंड से जिस तरह का रेस्पांस आ रहा है, वही विपक्षी दलों को प्रेरित कर रहा है कि वो इस तरह का स्टैंड लें."
वो कहती हैं, "ये प्रेशर कम होता नहीं दिख रहा है. ये क्या स्वरूप लेगा, अभी नहीं कहा जा सकता. क्या इसी तरह प्रदर्शन जारी रहेंगे या कुछ और होगा."
ग़ौरतलब है कि बीते दो अक्तूबर से कॉकरोच जनता पार्टी और इंडिया गठबंधन ने प्रदर्शन का एलान किया था और तबसे राजधानी दिल्ली में लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं. हालांकि इस बार जंतर-मंतर तक प्रदर्शनकारियों की पहुंच सरकार ने नहीं होने दी.
और 10 अक्तूबर को सीजेपी के प्रदर्शन के बाद 11 अक्तूबर को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने प्रदर्शन की अधिसूचित जगह से जंतर-मंतर को हटा दिया. फिर भी प्रदर्शन जारी रहे.
12 अक्तूबर को विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकालने का आह्वान किया तो भारी संख्या में लोग जुटे.
सीजेपी फ़ाउंडर अभिजीत दीपके ने जंतर-मंतर को डीनोटिफ़ाई करने पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पूरा देश जंतर-मंतर बनेगा.
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बीते 13 अक्तूबर को सीजेपी के आशुतोष रांका और सौरव दास ने भारी सुरक्षा के बावजूद जंतर-मंतर के अंदर पहुंच गए जहां उन्हें हिरासत में ले लिया गया. मंगलवार को उन्हें पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.
दीपके ने अब शुक्रवार को जंतर-मंतर से कुछ ही दूर कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में लोगों से इकट्ठा होने का आह्वान किया है.
सेंटर फ़ॉर पॉलिसी रिसर्च में रिसर्च फ़ेलो राहुल वर्मा ने मंगलवार को बीबीसी न्यूज़ हिन्दी के दिन भर पॉडकास्ट कार्यक्रम में कहा था कि सीजेपी के पिछले आंदोलन के बाद अब ऐसा माहौल बन रहा है कि किसी न किसी मुद्दे पर आंदोलन जारी रहने की संभावना बढ़ गई है.
नीरजा चौधरी का भी मानना है कि देश में मूड बदल रहा है.
उन्होंने कहा, "नीट पेपर लीक मामले में शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग ऐसी थी, जो हर परिवार को प्रभावित करता था. लोगों को अभी लग रहा है कि क्या मौजूदा आंदोलन उस हद तक जा पाएगा? हालांकि लोगों ख़ाकर पहली बार वोटर बनने वाले नौजवानों को चिंता हो रही है क्योंकि इससे बहुत सारी चीज़ें जुड़ी हैं, मसलन, सामाजिक कल्याण की स्कीमें, मां बाप की पेंशन, नागरिकता का मामला आदि."
एसआईआर प्रक्रिया को लेकर सवाल इसलिए भी खड़ा हुआ है कि देश भर में तकरीबन 13 करोड़ नाम मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए हैं.
सरकार का क्या है रुख़
दिल्ली को जिस तरह सुरक्षा के किले में तब्दील किया गया, प्रदर्शनकारियों को डिटेन किया गया.
स्वतंत्र पत्रकारों, यहां तक कि मुख्य धारा की मीडिया के संवाददाताओं के साथ पुलिस का जैसा रवैया सामने आया उसकी विपक्ष, मीडिया संगठनों और मानवाधिकार संगठनों ने तीखी आलोचना की है.
लेकिन बीजेपी ने सीजेपी, वामपंथी पार्टियों और कांग्रेस के मौजूदा प्रदर्शनों को 'अराजकता' करार दिया है.
सोमवार को बीबीसी न्यूज़ हिन्दी के 'द लेंस' कार्यक्रम में बीजेपी से जुड़े प्रोफ़ेसर गौरव वल्लभ ने कहा कि 'असहमति के अधिकार को सरकार दबाना नहीं चाहती लेकिन विपक्ष को भी ज़िम्मेदार होना चाहिए.'
उन्होंने कहा, "बहस, बातचीत और आंदोलन भी होना चाहिए. पहले जब बच्चों ने आंदोलन किया तो सरकार ने उनके साथ बातचीत की, उन्हें सुना और वास्तविक मुद्दों पर कार्रवाई की. शिक्षा में सुधार को लेकर एक उच्च स्तरीय कमेटी बनाई गई, संसद में बिल पारित किया गया. लेकिन मुद्दा उठाने का कोई तरीक़ा होना चाहिए. ये नहीं कि रोज़ कनॉट प्लेस पर बैठ जाएं."
गौरव बल्लभ ने कहा कि उनकी सरकार चुनाव आयोग का नहीं बल्कि 'लोकतंत्र और भारतीय गणराज्य का बचाव' कर रही है.
हालांकि एक हफ़्ते से ज़्यादा समय से चल रहे विरोध प्रदर्शनों और सोमवार को इंडिया ब्लॉक के विशाल मार्च के बाद माना जा रहा था कि सरकार के रुख़ में बदलाव आ सकता है.
लेकिन बीते मंगलवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 2029 में कॉन्ग्रेस की चौथी बार संभावित हार की घोषणा कर, अपने कड़े रुख़ का संकेत दे दिया.
उन्होंने कहा, "मैं राहुल गांधी और उनके सहयोगियों से यह भी कहना चाहता हूं कि वे 2029 में करारी हार के लिए तैयार रहें. 2029 के लोकसभा चुनाव में एनडीए को भारी बहुमत मिलने जा रहा है, जबकि कांग्रेस को लगातार चौथी हार का सामना करना पड़ेगा."
नीरजा चौधरी ने सुझाव दिया कि सरकार को सभी पक्षों के साथ बैठना चाहिए और बातचीत की पहल करनी चाहिए.
वह कहती हैं, "एसआईआर को लेकर कुछ गंभीर मुद्दे उठे हैं और उसमें सुधार करना चाहिए ये अहम मुद्दा है. मतदान के अधिकार को लेकर एक विश्वसनीयता को फिर से बहाल किए जाने की ज़रूरत है. इसलिए सरकार को एक पहल करनी चाहिए. उसे सीजेपी, नौजवानों और विपक्ष को एक साथ बिठाना चाहिए. इसे नाक का सवाल नहीं बनाना चाहिए."
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर शुरू हुए सीजेपी के दूसरे आंदोलन जिसे सीजेपी प्रोटेस्ट 2.0 कहा जा रहा है, उसके बाद पुलिस की कड़ी कार्रवाई को लेकर कई पत्रकारों ने हैरानी जताई है.
नीरजा चौधरी कहती हैं, "मैंने इमरजेंसी का दौर देखा है. इस तरह का माहौल नहीं देखा. हालांकि उस समय जॉर्ज फ़र्नांडिस को कोर्ट में हथकड़ी लगाकर पेश किया गया था. नौजवानों, महिलाओं और बुज़ुर्गों के साथ इस तरह का कड़ा एक्शन लिया जाता है तो, समाज में आक्रोश उतना ही बढ़ता है."
उनका मानना है कि यह रणनीति और 'उलटा असर करने वाली' साबित हो सकती है.
इंडिया ब्लॉक के सामने दो बड़ी चुनौतियां
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीचे से आ रहे दबाव के बावजूद इंडिया ब्लॉक के सामने चुनौतियां कम नहीं हुई हैं.
गठन के बाद से ही इंडिया ब्लॉक की स्थिति बहुत हिचकोलों वाली रही है. विपक्ष को एक बैनर तले लाने की अहम कोशिश करने वाले नीतीश कुमार बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अलग हो गए.
इसे इंडिया ब्लॉक के लिए बड़ा झटका माना गया.
जब पश्चिम बंगाल में चुनाव हुए तो ममता बनर्जी की टीएमसी और कांग्रेस के बीच कोई समझौता नहीं बन सका.
केरल में चुनाव हुआ तो सीपीएम और कांग्रेस के बीच दूरी बढ़ी. अभी पंजाब में चुनाव है तो वहां कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच दूरियां हैं.
सेंटर फ़ॉर पॉलिसी रिसर्च में रिसर्च फ़ेलो राहुल वर्मा ने कहा, "राहुल गांधी विपक्ष के शायद वो पहले नेता थे जिन्होंने महाराष्ट्र और हरियाणा चुनाव के बाद कथित वोट चोरी का मामला उठाया था. 2025 में जब बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले जब एसआईआर की घोषणा हुई तो राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने वोटर अधिकार यात्रा की थी."
उनके अनुसार, "अभी मौजूदा आंदोलन को लेकर आम आदमी पार्टी और स्टालिन की डीएमके पार्टी का रुख़ स्पष्ट नहीं है कि वो इंडिया गठबंधन के साथ किस तरह हैं."
नीरजा चौधरी भी इंडिया ब्लॉक में एकजुटता को एक बड़ी चुनौती मानती हैं. वो विपक्षी गठबंधन के लिए एकजुटता और सांगठनिक क्षमता को दो सबसे बड़ी चुनौती बताती हैं.
वो कहती हैं, "सवाल यह है कि क्या इंडिया ब्लॉक एकजुट रहेगा और एक मजबूत एकता के साथ पेश आएगा या सीट शेयरिंग जैसे छोटे छोटे स्थानीय मुद्दे हावी होंगे. या फिर बीजेपी को हराने की एक बड़ी पिक्चर रहेगी सामने. मौजूदा मुहिम की अगुवाई राहुल गांधी कर रहे हैं. लेकिन कांग्रेस का संगठन बहुत सारे राज्यों में बहुत कमज़ोर है."
उनके अनुसार, "अगर सांगठनिक क्षमता नहीं होगी तो सवाल ये है कि क्या समाज में भारी समर्थन के बावजूद यह वोटों में तब्दील हो पाएगा, क्या इससे चुनाव जीता जा सकता है. क्योंकि दूसरी तरफ़ बीजेपी की एक बहुत बड़ी चुनावी मशीनरी है, और चुनाव जीतने में वो माहिर हैं."
"प्रादेशिक पार्टियों की सांगठिक क्षमता को और बढ़ाना होगा. जैसे ममता बनर्जी और अखिलेश यादव की अपने प्रदेशों में अच्छा ख़ासा सांगठनिक नेटवर्क है. इस पर कांग्रेस को विश्वास करना पड़ेगा. अगर कांग्रेस ये सोचे कि वह अपने आप फिर से खड़ा होकर 2029 जीत जाएगी तो यह आज के समय ज़रा मुश्किल लगता है."
वो कहती हैं, "एक नई ऊर्जा आई है, नौजवानों के नए चेहरे और नेतृत्व आ रहे हैं. एक उत्साह बना है और जो एक सहमा सा माहौल था, वो भी ख़त्म हुआ है, वो भी थोड़ा टूट रहा है. इसलिए विपक्ष की समझदारी पर सारा दारोमदार निर्भर करता है."
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AI outlook — possibilities, not facts
चुनाव आयोग में सुधार को लेकर बातचीत शुरू हो सकती है अगर विपक्ष अपनी मांगों पर अड़ा रहा।
Possible · Within months
जंतर मंतर पर प्रतिबंध जारी रहेगा और प्रदर्शन alternativa स्थलों जैसे कनॉट प्लेस पर स्थानांतरित हो सकते हैं।
Likely · Within weeks
आम आदमी पार्टी और डीएमके का इंडिया गठबंधन से जुड़ाव अनिश्चित रहेगा और स्थानीय चुनावों में तनाव जारी रह सकता है।
Possible · Within months
Open Questions
- क्या विपक्षी गठबंधन अपनी एकजुटता को लंबे समय तक बनाए रख पाएगा?
- क्या सरकार चुनाव आयोग में सुधार के लिए कोई पहल करेगी?
- क्या जंतर मंतर पर प्रतिबंध हटाया जाएगा या प्रदर्शन जारी रहेंगे?
- क्या आम आदमी पार्टी और डीएमके इंडिया गठबंधन में पूरी तरह से शामिल होंगे?





