भारत के चुनाव आयोग के भीतर आंतरिक मतभेद: सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने उठाए सवाल
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज की हैं।
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भारत के चुनाव आयोग के भीतर कथित आंतरिक मतभेदों की रिपोर्ट सामने आई है, जहाँ दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में फ़ैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज की हैं।
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भारत में चुनाव आयोग की स्वायत्तता और निष्पक्षता पर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। पूर्व में भी अशोक लवासा और टीएन शेषन जैसे अधिकारियों के कार्यकाल के दौरान आंतरिक मतभेद सामने आए थे।
भारत में जब भी चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और उसकी स्वतंत्रता की बात की जाती है तो पूर्व चुनाव आयुक्त टीएन शेषन को याद किया जाता है.
शेषन दिसंबर 1990 से दिसंबर 1996 तक भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे थे. शेषन ने कहा था कि चुनाव आयोग भारत का होता है, न कि भारत सरकार का. भारत में चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर जब भी सवाल उठता है तो शेषन की यह टिप्पणी चर्चा में आ जाती है.
पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव से ही चुनाव आयोग विवादों के घेरे में है. चुनाव आयोग ने बिहार चुनाव से एसआईआर यानी स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न की शुरुआत की थी.
चुनाव आयोग ने इसे रूटीन प्रक्रिया बताया था. लेकिन बिहार से शुरू हुई इस प्रक्रिया के तहत अब तक वोटर लिस्ट से 13 करोड़ से ज़्यादा नाम हटाए जा चुके हैं. ऐसे में चुनाव आयोग की भूमिका पर तीखी बहस हो रही है कि वह भारतीयों की नागरिकता तय कर रहा है.
एसआईआर को लेकर भारत की विपक्षी पार्टियों का भी आरोप है कि मोदी सरकार चुनाव आयोग के ज़रिए अपने मन मुताबिक़ वोटर लिस्ट तैयार करवा रही है. केंद्र की मोदी सरकार इन आरोपों को ख़ारिज करती रही है लेकिन अब इस मामले में चुनाव आयोग के भीतर के कथित मतभेद की रिपोर्ट सामने आई है.
भारत के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल के मुताबिक़ तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के भीतर भी इन मुद्दों को लेकर बार-बार सवाल उठाए गए थे. ये सवाल किसी और ने नहीं, बल्कि दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने उठाए थे.
इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''देशभर में एसआईआर की प्रक्रिया तीनों चुनाव आयुक्तों की निगरानी में चल रही है. लेकिन संधू और जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की है. उनका कहना है कि कई फ़ैसले और आदेश उनकी जानकारी के बिना लिए और जारी किए गए. इनमें से एक दिन तो चार बार ऐसी आपत्तियां दर्ज की गईं."
चुनाव आयोग ने इस रिपोर्ट के बाद आठ बिंदुओं का एक बयान एक्स पर शेयर किया है. इसके पांचवें पॉइंट में चुनाव आयोग ने कहा है, "10 महीनों के दौरान लिए गए कई मंज़ूरी, फ़ैसले, निर्देश और पहल को नज़रअंदाज़ करके, सिर्फ़ कुछ ख़ास अंदरूनी नोट या बातों पर ज़ोर देने से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती."
"हाल के महीनों में, कमीशन ने कई फ़ैसले लिए हैं, निर्देश जारी किए हैं, लगभग 40 नई पहल शुरू की हैं और कई चुनावी सुधार किए हैं, जिनमें पूरे देश में वोटर लिस्ट में सुधार (एसआईआर सहित) शामिल है. ये सभी फ़ैसले पिछले एक साल में पूरे कमीशन की आम सहमति से लिए गए हैं."
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़- तीन चुनाव आयुक्तों में से दो ने शिकायत की कि उन्हें फ़ैसलों से अंधेरे में रखा जा रहा था. इनमें नए मतदाताओं को जोड़ने और मतदाता सूचियों से नाम हटाने से जुड़े फ़ैसले भी शामिल थे.
उन्होंने नए मतदाताओं को जोड़ने से जुड़े कुछ क़दमों को 'अनधिकृत और अवैध' बताया और चेतावनी दी कि मतदाता डेटाबेस तक पहुँच को दिल्ली में केंद्रीकृत करके राज्य के अधिकारियों को दरकिनार नहीं किया जाना चाहिए.
सॉफ्टवेयर की विश्वसनीयता को लेकर उठी चिंताओं के मामले में असहमति जताने वाले चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव से भी शिकायत की.
यह चुनाव आयोग के भीतर एक अभूतपूर्व दरार को दर्शाता है और उसके कामकाज को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़, इन सभी मुद्दों से जुड़ी आपत्तियों की प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गई थीं. कुछ आपत्तियां उन उप चुनाव आयुक्तों को भी भेजी गईं, जो संबंधित काम की निगरानी कर रहे थे.
एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, एक लिखित आपत्ति में संधू ने शिकायत की कि चुनाव आयोग ने दो चुनाव आयुक्तों की लिखित सलाह के ख़िलाफ़ जाकर कार्रवाई की और आरोप लगाया कि आयोग का यह क़दम 'अनधिकृत और अवैध' था.
तीनों चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति मोदी सरकार के कार्यकाल में 2023 के क़ानून के तहत हुई थी. नियुक्ति के लिए चयन समिति में प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष शामिल थे.
मार्च 2024 में जब सुखबीर सिंह संधू और ज्ञानेश कुमार को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था, तब समिति में विपक्ष के सदस्य कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी ने नियुक्ति प्रक्रिया पर अपनी असहमति दर्ज की थी. फ़रवरी 2025 में ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाए जाने और विवेक जोशी को चुनाव आयुक्त नियुक्त किए जाने के समय लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी अपनी असहमति दर्ज की थी.
यह पहली बार नहीं है, जब मोदी सरकार में चुनाव आयोग के भीतर असहमति सार्वजनिक हुई हो. इससे पहले मई 2019 में तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा से असहमति जताई थी.
मई 2019 में तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने मांग की थी कि आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन से जुड़े चुनाव आयोग के आदेशों में असहमति या अल्पमत की राय भी दर्ज की जाए. लेकिन तब के मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने उनकी मांग नहीं मानी थी.
ऐसे में 2019 में 16 मई को लवासा ने आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन से जुड़ी सभी बैठकों से खुद को अलग कर लिया था. उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि आदर्श आचार संहिता की शिकायतों का जल्दी निपटारा करने के उनके सुझाव पर कार्रवाई नहीं हुई थी और आयोग के अंतिम आदेशों में उनकी अल्पमत राय दर्ज नहीं की जा रही थी.
लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह पर आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के आरोपों में उन्हें दी गई क्लीन चिट पर लवासा ने पाँच मौक़ों पर असहमति जताई थी.
अशोक लवासा की असहमति पर तब के मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने कहा था कि चुनाव आयुक्तों के बीच किसी भी तरह की असहमति मुख्य रूप से चुनाव आयोग की चारदीवारी के भीतर ही रही है और तीनों सदस्यों से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वे एक-दूसरे से हूबहू सहमत हों.
अरोड़ा ने कहा था, "चुप्पी की ख़ूबसूरती को निभाना हमेशा मुश्किल होता है, लेकिन यह कहीं अधिक वांछनीय है, क्योंकि चुनाव प्रक्रिया को आगे बढ़ाना ज़रूरी है, न कि ग़लत समय पर विवाद खड़े करना."
जनवरी 2009 में मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को चुनाव आयुक्त नवीन चावला को पद से हटाने की सिफ़ारिश भेजी थी.
तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी के इस क़दम से स्वाभाविक रूप से बड़ा विवाद खड़ा हुआ और इसकी वैधता, समय और औचित्य को लेकर सवाल उठे.
टीएन शेषन ने 1993 के एक राष्ट्रपति अध्यादेश को रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया था और इसे असंवैधानिक बताया था.
इस अध्यादेश के ज़रिए शेषन के अलावा दो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करके चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय संस्था बना दिया गया था. शेषन ने इस अध्यादेश को चुनौती देते हुए कहा था कि यह पहले से स्थापित संवैधानिक सिद्धांतों के ख़िलाफ़ है.
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह अध्यादेश संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुरूप था. अदालत ने कहा था, "चुनाव आयोग एक सदस्यीय संस्था भी हो सकता है और बहुसदस्यीय भी."
Open Questions
- क्या चुनाव आयोग के भीतर के ये मतभेद चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करेंगे?
- वोटर लिस्ट से हटाए गए नामों की प्रक्रिया पर आयोग आगे क्या कदम उठाएगा?





