
हिंद महासागर में कांटेदार सीहॉर्स की एक नई प्रजाति 'हिप्पोकैम्पस अमांडाविन्सेटाए' की खोज में एक ऑटोरिक्शा चालक और मछुआरों की अहम भूमिका रही है।
तमिलनाडु में एक ऑटोरिक्शा ड्राइवर की बातचीत से शुरू हुई मदद के बाद, शोधकर्ताओं ने हिंद महासागर में कांटेदार सीहॉर्स की एक नई प्रजाति 'हिप्पोकैम्पस अमांडाविन्सेटाए' की खोज की है, जिससे 150 साल पुरानी उलझन खत्म हुई है।
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शालू कन्नन की पीएचडी रिसर्च के दौरान तमिलनाडु के तटीय शहर तूतीकोरिन में सीहॉर्स की एक नई प्रजाति की पहचान हुई।
आप सोच रहे होंगे कि एक ऑटो रिक्शा ड्राइवर का सीहॉर्स की खोज से क्या लेना-देना हो सकता है. सीहॉर्स एक छोटी समुद्री मछली है, जिसका सिर घोड़े जैसा और पूंछ मुड़ी हुई होती है.
लेकिन हिंद महासागर में कांटेदार सीहॉर्स की एक नई प्रजाति की खोज में उस ऑटोरिक्शा चालक की अहम भूमिका रही.
शालू कन्नन की रिसर्च से इस नई प्रजाति की पहचान हुई.
उन्होंने शालू कन्नन को एक ऐसे मछुआरे से मिलवाया, जिसने कांटेदार सीहॉर्स का पहला नमूना खोजने में उनकी मदद की.
शालू कन्नन बताती हैं कि 2019 की गर्मियों में वह अपनी पीएचडी थीसिस के लिए तमिलनाडु के तटीय शहर तूतीकोरिन (अब थूथुकुडी) में तीन हफ़्ते के लिए फील्ड स्टडी कर रही थीं.
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, "तीन हफ़्ते की फील्ड स्टडी के अंत में मैं काफ़ी निराश थी."
"मैं एक ऑटोरिक्शा में सफ़र कर रही थी. ड्राइवर ने मुझे और मेरे सहकर्मी को सीहॉर्स के बारे में बात करते हुए सुना. उन्होंने पूछा कि क्या हुआ है. मैंने उन्हें बताया कि हम एक ख़ास प्रजाति की तलाश कर रहे हैं, लेकिन उसे ढूंढ नहीं पाए."
"तब उन्होंने कहा कि वह एक मछुआरे को जानते हैं और उससे बात करेंगे."
अगले ही दिन, 27 अप्रैल 2019 को, उन्हें तूतीकोरिन मछली बंदरगाह पर बायकैच के ढेर में पहला नमूना मिल गया.
बायकैच उन छोटे समुद्री जीवों को कहा जाता है जो ट्रॉलरों के मछली पकड़ने वाले जाल में फंस जाते हैं.
जांच में पता चला कि यह नमूना आनुवंशिक रूप से हिप्पोकैम्पस हिस्ट्रिक्स से अलग था. पहले माना जाता था कि हिप्पोकैम्पस हिस्ट्रिक्स लाल सागर से लेकर पूरे हिंद महासागर और पश्चिमी प्रशांत महासागर तक फैला हुआ है.
लेकिन शालू कन्नन को एक और नमूने की ज़रूरत थी. वह उसके शारीरिक गुणों की पुष्टि करना चाहती थीं, ताकि भौगोलिक वितरण के आधार पर उसकी अलग पहचान साबित की जा सके.
वह मछुआरा उनके पुराने मछुआरे संपर्क "एलेक्स अंकल" के संपर्क में बना रहा. शालू कन्नन एलेक्स अंकल को 2018 से जानती थीं.
एलेक्स अंकल और दूसरे मछुआरों की मदद से उन्हें दूसरा नमूना लगभग पांच महीने बाद, 2 सितंबर 2019 को मिला.
काफ़ी रिसर्च और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बाद वह इस नई प्रजाति की खोज को प्रमाणित करने में सफल रहीं.
केरल यूनिवर्सिटी ऑफ़ फ़िशरीज़ एंड ओशन स्टडीज़ (कुफ़ोस) की टीम के नेतृत्व में हुए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में इस नई प्रजाति का नाम 'हिप्पोकैम्पस अमांडाविन्सेटाए' रखा गया.
इस नई प्रजाति का नाम सीहॉर्स की वैश्विक विशेषज्ञ अमांडा विन्सेंट के सम्मान में रखा गया है. वह दुनिया की प्रमुख समुद्री जीव वैज्ञानिकों में से एक हैं और प्रोजेक्ट सीहॉर्स की संस्थापक हैं.
वैज्ञानिक तौर पर, कुछ हफ़्ते पहले प्रमुख वर्गीकरण पत्रिका 'ज़ूटाक्सा' में प्रकाशित इस रिसर्च के नतीजे बताते हैं कि कांटेदार सीहॉर्स या स्पाइनी सीहॉर्स (हिप्पोकैम्पस हिस्ट्रिक्स) एक नहीं, बल्कि तीन अलग-अलग प्रजातियां हैं. इनमें हिप्पोकैम्पस अमांडाविन्सेटाए भी शामिल है.
कुफ़ोस में सहायक प्रोफ़ेसर और इस अध्ययन के वरिष्ठ लेखक राजीव राघवन ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "हमने इसके सभी बाहरी गुणों का अध्ययन किया और फ़ाइलोजेनेटिक विश्लेषण भी किया."
"इसके बाद हमें पता चला कि यह उन दोनों कांटेदार सीहॉर्स प्रजातियों से मेल नहीं खाता, जिन्हें हम तब तक जानते थे."
"तभी हमें एहसास हुआ कि यह एक नई प्रजाति हो सकती है."
इससे भी ज़्यादा अहम बात यह है कि इस रिसर्च के नतीजों ने 150 साल से ज़्यादा समय से चली आ रही वर्गीकरण संबंधी उलझन को ख़त्म कर दिया है.
रिसर्च पेपर प्रकाशित होने के बाद कुफ़ोस ने एक बयान में कहा, "यह खोज दुनिया भर के सीहॉर्स के संरक्षण के लिए भविष्य में होने वाले प्रयासों की एक मज़बूत बुनियाद तैयार करती है."
नई प्रजाति दूसरे सीहॉर्स से कितनी अलग है?
मूल रूप से सीहॉर्स को तटीय समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र की सेहत का एक महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है. इन्हें प्रमुख प्रतिनिधि प्रजातियों में गिना जाता है.
ये शिकार की संख्या को नियंत्रित करने में भूमिका निभाते हैं. ये छोटी मछलियां, प्लवक जीव और पानी में बहने वाले सूक्ष्म जलीय जीव खाते हैं.
राजीव राघवन ने कहा, "सीहॉर्स पानी की गुणवत्ता के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं."
"जहां गाद जमा होती हो या उनका आवास दबाव में हो, वहां आपको सीहॉर्स नहीं मिलेंगे."
"असल में सीहॉर्स की मौजूदगी इस बात का संकेत है कि तटीय आवास बहुत अच्छे हैं और उनका अच्छी तरह संरक्षण किया गया है."
प्रोजेक्ट सीहॉर्स दुनिया में सीहॉर्स की 46 प्रजातियों को मान्यता देता है. इनमें कांटेदार प्रजाति हिप्पोकैम्पस हिस्ट्रिक्स भी शामिल है.
हिप्पोकैम्पस अमांडाविन्सेटाए को इसकी थूथन की लंबाई दूसरे कांटेदार सीहॉर्स से अलग बनाती है. इसके सिर के ऊपरी हिस्से पर मौजूद कांटों की संख्या और उनका स्वरूप भी अलग है.
इसके धड़ और पूंछ की रिज संरचनाएं भी दूसरी प्रजातियों से भिन्न हैं.
लेकिन दूसरी कांटेदार सीहॉर्स प्रजातियों से इसका अंतर केवल शारीरिक बनावट तक सीमित नहीं है.
हिप्पोकैम्पस हिस्ट्रिक्स प्रशांत महासागर और दक्षिण चीन सागर में पाया जाता है. यह जापान, इंडोनेशिया और फिलीपींस के समुद्री इलाक़ों में भी मिलता है.
वहीं हिप्पोकैम्पस अमांडाविन्सेटाए हिंद महासागर में पाया जाता है. इसके नमूने बंगाल की खाड़ी और लक्षद्वीप सागर से मिले हैं.
इसके अलावा मेडागास्कर, मोज़ाम्बिक और सेशेल्स से भी इसके नमूनों की पुष्टि हुई है.
भारत के समुद्री जल क्षेत्र में सीहॉर्स की सात से नौ प्रजातियां पाई जाती हैं.
अध्ययन में यह भी पुष्टि हुई कि हिप्पोकैम्पस जयाकारी एक वैध कांटेदार सीहॉर्स प्रजाति है.
इसका पहली बार वर्णन वर्ष 1900 में ओमान की खाड़ी से किया गया था.
यह प्रजाति उत्तर-पश्चिमी हिंद महासागर तक सीमित है.
शालू कन्नन ने कहा, "पहली नज़र में मुझे भी लगा था कि हमें हिप्पोकैम्पस हिस्ट्रिक्स मिला है."
"लेकिन जब हमने आनुवंशिक विश्लेषण किया तो पता चला कि हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के नमूनों में स्पष्ट अंतर है."
"दोनों प्रजातियों के बीच छह से सात प्रतिशत से अधिक का अंतर पाया गया."
कुफ़ोस के शोधकर्ताओं ने यह पुष्टि करने के लिए ग्राहम शॉर्ट के साथ सहयोग करने का फ़ैसला किया कि सीहॉर्स के नमूने एक-दूसरे से कैसे अलग हैं.
ग्राहम शॉर्ट इस शोध पत्र के सह-लेखक हैं.
वह ऑस्ट्रेलियन म्यूज़ियम और कैलिफ़ोर्निया एकेडमी ऑफ़ साइंसेज़ में इच्थियोलॉजी के रिसर्च एसोसिएट भी हैं.
शालू कन्नन ने कहा, "इसमें काफ़ी समय लगा क्योंकि हमें लंदन और पेरिस के संग्रहालयों से भी पुष्टि करनी थी."
"वैसे भी ग्राहम शॉर्ट ऑस्ट्रेलिया में थे."
हिप्पोकैम्पस अमांडाविन्सेटाए की खोज के बाद केरल तट पर ज्ञात सीहॉर्स प्रजातियों की संख्या चार से बढ़कर पांच हो गई है.
अन्य प्रजातियों में सबसे प्रमुख हिप्पोकैम्पस ट्राइमैकुलेटस है.
इसके अलावा हिप्पोकैम्पस कूडा, हिप्पोकैम्पस केलोगी और हिप्पोकैम्पस फ़स्कस भी यहां पाए जाते हैं.
समुद्री माहौल के लिए इस खोज का क्या मतलब है?
सीहॉर्स की सभी प्रजातियां सुरक्षित जीवों की सूची में शामिल हैं.
इन्हें ख़तरे में पड़े जीवों और पौधों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार संबंधी समझौते (साइट्स) के तहत भी सुरक्षा मिली हुई है.
सीहॉर्स के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर रोक-टोक का मक़सद यह है कि इनकी संख्या बनी रहे और ये समुद्र से ख़त्म न हों. भारत में भी सीहॉर्स की सभी प्रजातियों को वन्यजीव संरक्षण क़ानून की सबसे ऊंची सुरक्षा वाली लिस्ट में रखा गया है.
राघवन कहते हैं, "हिंद महासागर में ही मिलने वाली नई प्रजाति की खोज बताती है कि इसे बचाने पर हमें ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है. हिंद महासागर दुनिया के उन समुद्री इलाक़ों में शामिल है, जहां मछली पकड़ने का दबाव बहुत ज़्यादा है."
"इस इलाक़े में बड़ी कारोबारी कंपनियां, छोटे पारंपरिक मछुआरे और बड़े उद्योग, सभी मछली पकड़ते हैं. ज़्यादातर सीहॉर्स उनके जाल में बायकैच के रूप में फंसते हैं. सीहॉर्स को सीधे पकड़ने की इजाज़त नहीं है, क्योंकि इस पर पाबंदी है."
यहीं से सीहॉर्स को बचाने की सबसे बड़ी चुनौती शुरू होती है.
राघवन कहते हैं, "सीहॉर्स को अनजाने में जाल में फंसने से बचाना है, तो समुद्र तल पर भारी जाल घसीटकर मछली पकड़ने वाली 'बॉटम ट्रॉलिंग' को रोकना होगा. हर दो-चार हफ़्ते में एयरपोर्ट या बंदरगाह पर सीहॉर्स की ग़ैर-क़ानूनी खेप पकड़े जाने की ख़बर आती है."
"इसकी वजह यह है कि पारंपरिक चीनी दवाओं में इस्तेमाल के लिए सीहॉर्स का बहुत बड़ा ग़ैर-क़ानूनी अंतरराष्ट्रीय बाज़ार है."
अमांडा विंसेंट की 2021 की एक व्यापार रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि भारत में 2015 से 2017 के बीच हर साल क़रीब एक करोड़ 30 लाख सीहॉर्स मछली पकड़ने वाले जालों में बायकैच के रूप में फंसे थे.
राघवन कहते हैं, "आमतौर पर इन सीहॉर्स को सुखाकर ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से दूसरे देशों में भेजा जाता है. कई बार इनका पाउडर बनाकर चोरी-छिपे बाहर भेज दिया जाता है."
पिछले साल 'जर्नल ऑफ़ डेयरी एंड वेटरनरी साइंसेज़' में एक रिसर्च पेपर छपा था. इसके लेखक अरुमुगम मुरुगन ने सीहॉर्स को एक बेहद दिलचस्प समुद्री जीव बताया.
उन्होंने लिखा कि पहले मछुआरे अपने समुदाय में कुछ स्वास्थ्य समस्याओं के पारंपरिक इलाज के लिए सीहॉर्स का इस्तेमाल करते थे. लेकिन बाद में पारंपरिक चीनी दवाओं और उनसे बने उत्पादों की मांग बढ़ी. इसी के साथ जंगल से पकड़े गए सीहॉर्स का बड़ा कारोबार भी शुरू हो गया.
'प्रोजेक्ट सीहॉर्स' की वेबसाइट पर जारी एक वीडियो संदेश में अमांडा विंसेंट ने कहा, "जब आपने अपना पूरा जीवन सीहॉर्स और समुद्र को बचाने के काम में लगा दिया हो और कोई आपके नाम पर सीहॉर्स की एक प्रजाति का नाम रख दे, तो यह बेहद ख़ास एहसास होता है."
"इससे मुझे बहुत ख़ुशी मिली है. अब मैं सीहॉर्स और दूसरे सभी समुद्री जीवों का भविष्य सुरक्षित करने के लिए पहले से दोगुनी मेहनत करना चाहती हूँ."
शालू कन्नन को किस बात का अफ़सोस?
शालू कहती हैं, "हमें सीहॉर्स की शारीरिक बनावट पर रिसर्च करनी थी, लेकिन हमारे पास केवल एक नमूना था. हमें एक और नमूना खोजना था. इसके लिए हम पारंपरिक मछुआरे एलेक्स अंकल से लगातार बात कर रहे थे."
"मैं उस समय नागरकोइल में काम कर रही थी. एलेक्स अंकल ही उस नमूने को तूतीकोरिन से नागरकोइल लेकर आए थे. मछुआरों की मदद के बिना हम यह खोज नहीं कर सकते थे."
शालू कन्नन अब भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के फ़िशरीज़ साइंस डिवीज़न में प्रोजेक्ट साइंटिस्ट हैं. उनकी पोस्टिंग पोर्ट ब्लेयर, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में है.
जब भी शालू को बायकैच से सीहॉर्स का नमूना मिला, उसके पीछे मछुआरों की ही मदद थी.
शालू बताती हैं, "मछली पकड़ने वाली नावें रात दो से तीन बजे के बीच वापस आती हैं. जब मैंने यह रिसर्च शुरू की, तो एलेक्स अंकल मेरे साथ अपनी बेटी जैसा व्यवहार करते थे."
"मैं इतनी रात में वहां नहीं जा सकती थी, इसलिए वह ख़ुद जाकर नमूने इकट्ठा करते थे. फिर मुझे फ़ोन करते और मैं जाकर उनसे नमूना ले आती थी."
लेकिन शालू को एक बात का अफ़सोस है. वो कहती हैं,
"हार्ड डिस्क ख़राब होने की वजह से उन दोनों मछुआरों की तस्वीरें मुझसे खो गईं." ये अफ़सोस इसलिए और बड़ा है, क्योंकि ऐसी रिसर्च और ख़ासकर किसी नई प्रजाति की खोज में आम लोगों की भूमिका बहुत अहम होती है. लेकिन इस कहानी का एक दूसरा पहलू भी है, कभी-कभी दूसरों की बातचीत सुन लेना भी काम आ जाता है.
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