जब नाना पाटेकर ने कहा था- मौत ही है, जो हमेशा साथ रहती है
वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार पराग छापेकर द्वारा अभिनेता नाना पाटेकर के साथ अपने व्यक्तिगत अनुभवों और उनकी जीवनशैली पर एक संस्मरण।
Quick Look
वरिष्ठ पत्रकार पराग छापेकर ने अभिनेता नाना पाटेकर के साथ अपने दशकों पुराने संबंधों को याद किया है। इस लेख में नाना के व्यक्तित्व, समय की पाबंदी, किसानों के प्रति संवेदनशीलता और उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है।
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Why It Matters
नाना पाटेकर एक प्रसिद्ध भारतीय अभिनेता हैं, जो अपने अभिनय कौशल और सामाजिक कार्यों के लिए जाने जाते हैं। उन पर तनुश्री दत्ता द्वारा शारीरिक उत्पीड़न के आरोप लगाए गए थे, जिन्हें बाद में अदालत ने खारिज कर दिया था।
आज सुबह-सुबह टीवी खोलते ही एक मनहूस ख़बर मेरे सामने चल रही थी कि नाना पाटेकर नहीं रहे.
नाना मेरे लिए सिर्फ़ अभिनेता या सितारा नहीं थे. मैं उनसे बहस कर लेता था, झगड़ लेता था, अपनी बात मनवा लेता था और वह भी कई बार बड़े भाई की तरह मेरी बात मान लेते थे.
किसी के जाने के बाद उसकी ज़िंदगी से जुड़ी यादों की पूरी फ़िल्म आंखों के सामने चलने लगती है.
नाना के जाने की ख़बर भी मेरे लिए एक लंबे सफ़र के ख़त्म होने जैसी है.
मुझे आज भी वह दिन याद है. इंदौर के जाने-माने विद्वान और रंगकर्मी वसंत दादा पोद्दार के यहां मैं नाना से मिलने गया था. मार्तंड चौक पर कुछ बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे. नाना अचानक वहां गए और क्रिकेट खेलने लगे. मैं भी शामिल हो गया. उस समय मैं शायद हायर सेकेंडरी में था या कॉलेज के पहले साल में. नाना तब आज जितने बड़े नाम नहीं थे. आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि मैं उस दिन किसी आम नहीं बल्कि एक महत्वपूर्ण घटना में शामिल था.
सालों बाद मैं मुंबई आ गया. नाना को उनके लैंडलाइन पर फ़ोन किया और मिलने की इच्छा जताई. उन दिनों वह लोखंडवाला में ससुराल रेस्तरां के ऊपर रहते थे. औपचारिक बातचीत के बाद नाना ने पूछा, "चाय पिएगा?" मैंने हां में सिर हिलाया. उन्होंने कहा, "मेरे लिए भी बना लो." मैं कुछ पल के लिए चौंक गया था. लेकिन कुछ ही घंटों में एक ऐसा रिश्ता शुरू हो गया, जो ज़िंदगी भर चलता रहा.
मैंने एक मीडिया संस्थान के साथ पत्रकारिता शुरू की. नाना से मुलाक़ातें होती रहीं. कभी फ़िल्म के इंटरव्यू के सिलसिले में, कभी कहीं और. मैं लगभग हर साल उनके गणपति में जाता था. नाना गणपति को बहुत श्रद्धा और दिल से मनाते थे. जब तक गणपति उनके घर में रहते, उन्हें वहां से निकालना लगभग असंभव होता था.
उन दिनों उनकी फ़िल्म 'कमाल धमाल मालामाल' रिलीज़ होने वाली थी. यह प्रियदर्शन की फ़िल्म थी. ओम पुरी, परेश रावल और श्रेयस तलपड़े जैसे कलाकार भी इसमें थे. गणपति के दौरान इंटरव्यू तय हुआ. नाना के लिए माटुंगा से जोगेश्वरी जाना ही मुश्किल था. वह ट्रैफ़िक में फंस गए और देर से पहुंचे तो बेहद ग़ुस्से में थे. प्रोडक्शन टीम को डांट लगाने लगे. इतने में प्रचार टीम की एक सदस्य मेरे पास आई और कहा कि आप ही बात कर लो, वरना इंटरव्यू नहीं हो पाएगा. मैं भी हिम्मत करके उनके पास गया और कहा, "नाना, ये मेरा इंटरव्यू है." तब वह थोड़ा शांत हुए और बोले, "पता नहीं यार, ये कौन-सा ताजमहल है, जो मुझे इतनी दूर बुलाया है." इंटरव्यू बहुत अच्छा हुआ. जाते समय उन्होंने कहा, "टोणग्या, तुझा होता म्हणून झाला." यानी तेरे लिए था, इसलिए हो गया.
समय के साथ रिश्ता और गहरा होता गया. नाना के खड़कवासला वाले फ़ार्महाउस में वसंतोत्सव होता था. मैं वहां भी जाता था. एक बार नाना ने एक लड़के से मिलवाया और कहा कि वह बहुत अच्छा गाता है. यह दिवंगत शास्त्रीय गायक वसंतराव देशपांडे का पोता है. उस लड़के ने बहुत अच्छा गाया. वही लड़का आगे चलकर मशहूर गायक पंडित राहुल देशपांडे बना. नाना हमेशा नए और प्रतिभाशाली कलाकारों के साथ एक मज़बूत सहारे की तरह खड़े रहे.
साल 2007 में, मैं किसी अन्य मीडिया संस्थान में काम कर रहा था. एक दिन नाना का फ़ोन आया, "क्या कर रहा है?" मैंने कहा, "ऑफ़िस में हूं." उन्होंने कहा, "घर आ जा." मैं गाड़ी लेकर माटुंगा की तरफ़ निकल गया. नाना के बेटे मल्हार को फ़ोन किया तो पता चला कि बाबा पुणे वाले घर या फ़ार्महाउस पर हैं. मैंने नाना को फ़ोन किया. उन्होंने फिर कहा, "आ जा." मैंने कहा कि ऑफ़िस के समय इतनी दूर नहीं आ सकता, कैमरा लेकर आ सकता हूं. हम पूरी यूनिट लेकर फ़ार्महाउस पहुंच गए. नाना खेत में काम कर रहे थे. दादा कोंडके की तरह हाफ़ पैंट और नेहरू टोपी पहने हुए थे. मैंने पूछा, "क्यों बुलाया?" उन्होंने कहा, "ये दो बैल हैं और हम दोनों. चलो, मिलकर खेती करेंगे." मैं हंस पड़ा. मैंने कहा, "मेरे बाप ने भी हल नहीं चलाया है." इसके बाद झूले पर बैठकर एक यादगार इंटरव्यू हुआ. नाना ने अपने खेत के बैंगन की सब्ज़ी बनवाई और हमने साथ बैठकर खाई.
जाते समय नाना मुझे खेत के एक कोने में ले गए और कहा कि उनके जाने के बाद उन्हें वहीं दफ़ना देना या अंतिम संस्कार कर देना. उनका आख़िरी ठिकाना वही होना चाहिए. मैंने कहा, "ऐसी बातें मत करो, अभी बहुत समय है." उन्होंने कहा, "मौत ही है, जो हमेशा साथ रहती है. उसे भूलकर फ़ायदा नहीं है." मैं मुंबई लौट आया. कुछ समय बाद वह बात यादों में कहीं दब गई.
नाना और अशोक सराफ़ की दोस्ती भी अपने आप में एक मिसाल थी. दोनों रंगमंच के दिनों से दोस्त थे. उन दिनों नाना को एक शो के 50 रुपये मिलते थे और अशोक सराफ़ को 250 रुपये. नाना मज़ाक में पांच रुपये लेकर अशोक सराफ़ की चंपी कर देते थे. अशोक जानते थे कि नाना को पैसों की ज़रूरत है. एक बार गणपति के दिनों में नाना के पास पैसे नहीं थे. अशोक सुबह-सुबह उनके पास पहुंचे और एक ब्लैंक चेक देते हुए कहा कि खाते में 15 हज़ार रुपये हैं, जितने चाहिए निकाल लेना. सालों बाद नाना ने तीन हज़ार रुपये लौटाए. अशोक सराफ़ ने मज़ाक में कहा, "पाटेकर, अब तुम पैसे वाले हो गए हो." नाना ने कहा, "पैसा वापस करने लायक तो हो गया हूं, लेकिन समय वापस नहीं कर पाऊंगा." दोनों की दोस्ती आख़िरी दिनों तक रही. जब भी अशोक और नाना मिलते, नाना उनके पैर दबाते थे.
एक बार नाना ने एक प्रोड्यूसर को फ़ोन करके कहा कि एक बहुत अच्छी स्क्रिप्ट सुनने के लिए लोग भेजो. नाना ने कहा कि दोपहर तीन बजे पुणे के फ़ार्महाउस पर आ जाना. मैंने उस प्रोड्यूसर से ख़ास तौर पर कहा था कि नाना समय को लेकर बहुत सख़्त हैं, समय पर पहुंचना. लेकिन ट्रैफ़िक और दूसरी वजहों से वह टीम शाम 4.45 बजे पहुंची. नाना बाहर खड़े थे. उन्होंने ग़ुस्से में कहा कि जो लोग समय की क़द्र नहीं करते, उनके साथ वह काम नहीं करेंगे. उन्होंने उन्हें वापस जाने को कह दिया. पानी तक नहीं पूछा. प्रोड्यूसर ने मुझसे शिकायत की. मैंने नाना से कहा कि मैंने उन्हें पहले ही समय के बारे में बता दिया था. नाना ने कहा कि उन्होंने सबके लिए खाना बनाया था, इंतज़ार करते रहे, ख़ुद भूखे बैठे रहे और उन लोगों ने खाना भी ख़राब करवा दिया. वह ऐसे लोगों के साथ काम नहीं करेंगे. नाना किसानों के दर्द को भीतर से महसूस करते थे. खाने की बर्बादी भी उन्हें उतनी ही तकलीफ़ देती थी.
नाना के करियर के साथ विवाद भी जुड़े रहे. तनुश्री दत्ता ने फ़िल्म 'हॉर्न ओके प्लीज़' की शूटिंग के दौरान नाना पाटेकर पर शारीरिक उत्पीड़न का आरोप लगाया था. इस आरोप के बाद नाना पाटेकर को काफ़ी विवाद और क़ानूनी परेशानियों का सामना करना पड़ा. नाना ने इन आरोपों से लगातार इनकार किया. बाद में इस मामले में दर्ज शिकायत को अदालत ने ख़ारिज कर दिया था.
बतौर पत्रकार उनके काम को क़रीब से देखने का मौक़ा मिला. नाना का अभिनय कभी सिर्फ़ संवाद बोलना नहीं रहा. उनके भीतर रंगमंच की गहरी पकड़ थी और किरदार को अपने तरीक़े से जीने की एक बेचैनी भी. 'परिंदा', 'अंकुश', 'प्रहार', 'क्रांतिवीर' और 'अब तक छप्पन' जैसी फ़िल्मों में उनके अलग-अलग रंग दिखाई दिए. 'अब तक छप्पन' के बाद हाल ही में मराठी फ़िल्म 'नटसम्राट' में उन्होंने एक बार फिर साबित कर दिया कि वह विश्वस्तरीय अभिनेता हैं. इस फ़िल्म के बाद उनसे हुई बातचीत में पहली बार ऐसा महसूस हुआ कि उनके भीतर का अभिनेता अपने काम से बेहद ख़ुश है. शायद उन्हें भी लगा था कि उन्होंने अपने अभिनय के ज़रिए वह हासिल किया है, जिसे लेकर वह भीतर से संतुष्ट हैं.
नाना को समझने का एक दूसरा पहलू भी था. मुंबई की 'बंबईया संस्कृति' के साथ उनका तालमेल कभी सहज नहीं रहा. वह अपने स्वभाव, अपनी भाषा और अपनी शर्तों के साथ रहे. फिर भी वह इस शहर और फ़िल्म इंडस्ट्री में इतने लंबे समय तक टिके रहे. शायद इसलिए कि उन्होंने अपने काम से अपनी जगह बनाई और किसी दूसरे ढांचे में फ़िट होने की कोशिश नहीं की.
कभी-कभी सोचता हूं कि नाना को आख़िर परिभाषित कैसे किया जाए? क्या वह ऐसे इंसान थे, जो हद दर्जे तक समय के पाबंद थे? या वह आदमी, जिसका दिल किसी से लग जाता था तो फिर उसके साथ जमकर मस्ती करता था, दोस्तों और फ़िल्म यूनिट के लिए खाना बनाता था और लोगों की मदद के लिए खड़ा हो जाता था. या वह नाना, जो किसानों के दर्द को भीतर से महसूस करता था, जिसने पानी की कमी को समझा और उसके लिए दिल लगाकर काम किया. या वह इंसान, जो किसी इंसान को पसंद आने पर ही फ़िल्म करता था, वरना नहीं. ज़िंदगी ने उन्हें तल्ख़ बनाया, लेकिन दिल ऐसा दिया कि लोग उनसे बेहद प्यार करें. तो क्या थे नाना? एक बेहतरीन कलाकार या उससे भी बेहतर इंसान? जो भी थे, एक बात तय है, नाना को कोई भुला ही नहीं सकता.
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- नाना पाटेकर के निधन की आधिकारिक पुष्टि क्या है?




