'मेरी जगह अस्पताल में नहीं, फ़ाइटिंग केज में है': कश्मीर की एमएमए फ़ाइटर फ़िज़ा
जम्मू-कश्मीर की एकमात्र महिला मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स फ़ाइटर फ़िज़ा ने अपने पिता का सपना पूरा करने के लिए डॉक्टरी की पढ़ाई छोड़कर एमएमए को अपनाया।
Quick Look
जम्मू-कश्मीर की पहली महिला एमएमए फ़ाइटर फ़िज़ा ने डॉक्टरी छोड़कर मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स में करियर बनाया और भारत के लिए कई अंतरराष्ट्रीय मेडल जीते।
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Why It Matters
जम्मू-कश्मीर की फ़िज़ा अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत के लिए मेडल जीतने वाली एकमात्र महिला मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स फ़ाइटर हैं।
"अगर मेरा बेटा होता, तो वो विश्व चैंपियन बनता."
जब जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर के निवासी और पूर्व खिलाड़ी नज़ीर अहमद 25 साल पहले अपने दोस्त से अपनी यह इच्छा बता रहे थे, तो उनकी बेटी फ़िज़ा उनकी बातचीत सुन रही थीं.
उस वक़्त फ़िज़ा पास में ही खेल रही थीं और उनकी उम्र महज़ चार साल थी.
फ़िज़ा बताती हैं, "मैंने उसी वक़्त तय कर लिया था कि मैं एक एथलीट बनूंगी और मैंने अगले ही साल से ट्रेनिंग शुरू कर दी."
उन्होंने बताया, "स्कूल और कॉलेज पहुँचने तक मैं राष्ट्रीय खेलों में हिस्सा ले चुकी थी और मेडल जीत चुकी थी."
नज़ीर अहमद को उम्मीद नहीं थी कि उनकी बेटी मार्शल आर्ट्स जैसे आक्रामक खेल को चुनेगी, जिससे लड़के भी डरते हैं.
फ़िज़ा कहती हैं, "मेरे माता-पिता ख़ुश थे कि खेलों में मेरा भविष्य दिख रहा था, लेकिन वे इस बात से ज़रूर परेशान होंगे कि मैं एक ख़तरनाक खेल में थी, जहां चोट लगने का ख़तरा हमेशा बना रहता था."
फ़िज़ा अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत के लिए मेडल जीत चुकी हैं. वो जम्मू-कश्मीर की एकमात्र महिला मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स (एमएमए) फ़ाइटर हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कई बार सफलता हासिल की है.
थाईलैंड में एक प्रतियोगिता के दौरान लगी चोट के कारण वो श्रीनगर लौट आई हैं.
फ़िज़ा कहती हैं, "चोट लगना खेल का हिस्सा है. मेरे माता-पिता तो मेरी लड़ाई देखते भी नहीं हैं, वे सिर्फ़ मेरी जीत के जश्न की तस्वीरें देखते हैं."
फ़िज़ा का कहना है कि वो पांच साल की उम्र से ही मार्शल आर्ट्स से जुड़ी हुई हैं.
उन्होंने बताया, "मैंने थांगटा से शुरुआत की, जो जूडो-कराटे शैली का खेल है. लेकिन 2019 में मुझे लगा कि मुझे असल में एक वैश्विक मंच की ज़रूरत है, तब मैंने मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स में अपनी एक अलग पहचान बनाने की यात्रा शुरू की, जिसमें मुझे बड़ी सफलता मिली."
फ़िज़ा ने पिछले दो सालों में अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया है. कुल मिलाकर उन्होंने अब तक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 40 से अधिक मेडल जीते हैं.
फ़िज़ा ने कई सालों तक अपने माता-पिता को अपना करियर शुरू करने के लिए मनाने की कोशिश की.
वो डॉक्टर बनने के लिए ज़रूरी परीक्षाओं की तैयारी में भी व्यस्त थीं, लेकिन एक दिन उन्होंने अचानक यह रास्ता छोड़ दिया.
फ़िज़ा कहती हैं, "मुझे यह यकीन हो गया था कि मेरी जगह अस्पताल में नहीं, बल्कि फ़ाइटिंग केज में है. ख़ुद को समझाना आसान था क्योंकि एमएमए फ़ाइटर बनना मेरा सपना था, लेकिन मेरे माता-पिता ज़ाहिर तौर पर इस आक्रामक खेल से बहुत डरे हुए थे और मेरे जुनून को देखकर घबरा गए थे. लेकिन फिर धीरे-धीरे सब कुछ ठीक हो गया."
फ़िज़ा पिछले चार सालों से थाईलैंड में हैं, क्योंकि भारत में एमएमए कोचिंग की गुणवत्ता विश्व स्तरीय नहीं है.
वो बताती हैं, "मुझे थाईलैंड जाना पड़ा. वहां नियमित तौर पर अकादमी में ट्रेनिंग दी जाती है. अगर हम कश्मीर की बात करें, तो यहां न तो बुनियादी ढांचा है और न ही लोग मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स के बारे में ज़्यादा जानते हैं. इस खेल में बॉक्सिंग, किकबॉक्सिंग और जूडो की सभी तकनीकें इस्तेमाल होती हैं और इसके लिए गुणवत्तापूर्ण कोचिंग बहुत ज़रूरी है."
Open Questions
- फ़िज़ा को थाईलैंड में किस प्रतियोगिता के दौरान चोट लगी?
- वह चोट से उबरने के बाद रिंग में कब वापसी करेंगी?

