
गायत्री गोपीचंद और त्रिशा जॉली ने नई दिल्ली में आयोजित बीडब्ल्यूएफ़ वर्ल्ड चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज़ मेडल जीतकर इतिहास रचा।
गायत्री गोपीचंद और त्रिशा जॉली की जोड़ी ने नई दिल्ली में आयोजित बीडब्ल्यूएफ़ वर्ल्ड चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज़ मेडल जीता। यह उपलब्धि भारतीय महिला युगल बैडमिंटन के लिए एक बड़ी सफलता है, जिसे कोच पुलेला गोपीचंद ने अपनी बेटी की ऐतिहासिक जीत के रूप में देखा।
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पुलेला गोपीचंद ने 2001 में ऑल इंग्लैंड ओपन जीता था, लेकिन वर्ल्ड चैंपियनशिप नहीं जीत पाए। उनकी बेटी गायत्री ने अब वर्ल्ड चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज़ मेडल जीतकर एक नया मुकाम हासिल किया है।
पुलेला गोपीचंद के शानदार खेल जीवन की सबसे यादगार बातों में से एक उनकी 2001 में बर्मिंघम में ऑल इंग्लैंड ओपन जीत है। हालांकि वो बीडब्लूएफ़ वर्ल्ड चैंपियनशिप नहीं जीत पाए।
जिस दौर में भारतीय बैडमिंटन विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनाने की जद्दोजहद कर रहा था गोपीचंद ने प्रकाश पादुकोण के पदचिह्नों पर चलते हुए, भारतीय बैडमिंटन के उभार का एक प्रमुख चेहरा बनने का गौरव हासिल किया।
उल्लेखनीय है कि प्रकाश पादुकोण ने 1980 में यह प्रतिष्ठित ख़िताब जीता था।
पुलेला गोपीचंद की उसके बाद की यात्रा एक चैंपियन खिलाड़ी से ऐसे कोच बनने तक पहुँची, जिसने भारतीय बैडमिंटन के कई सितारों को तराशा। इनमें साइना नेहवाल, पीवी सिंधु, किदांबी श्रीकांत, एचएस प्रणय और कई अन्य खिलाड़ी शामिल हैं।
लेकिन इस सप्ताहांत 52 साल के गोपीचंद ने अपने 30 साल के करियर में पहली बार एक नया अनुभव हासिल किया। उन्होंने पहले भी अपने शागिर्दों को वर्ल्ड चैंपियनशिप पोडियम पर चढ़ते देखा था। इस बार उस मंच पर उनकी अपनी बेटी गायत्री खड़ी थी।
गायत्री और उनकी महिला युगल जोड़ीदार त्रिशा जॉली ने नई दिल्ली में आयोजित बीडब्ल्यूएफ़ वर्ल्ड चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज़ मेडल जीता। वे इस प्रतियोगिता में मेडल जीतने वाली भारत की केवल दूसरी महिला युगल जोड़ी बनीं।
इससे पहले 2011 में लंदन में ज्वाला गुट्टा और अश्विनी पोनप्पा ने ब्रॉन्ज़ मेडल जीता था।
गायत्री-त्रिशा की बिना वरीयता प्राप्त जोड़ी ने इस टूर्नामेंट की सबसे प्रेरक कहानियों में से एक की इबारत लिखी। उन्होंने कई स्थापित खिलाड़ियों को हराया और सेमीफ़ाइनल तक पहुँचने के रास्ते में दो बार चीनी जोड़ियों को मात दी।
सेमीफ़ाइनल में उन्होंने ओलंपिक मेडल विनर लियू शेंग शू और तान निंग के ख़िलाफ़ पहला गेम जीता, लेकिन बाद में 18-21, 21-13, 21-8 से हार गईं।
इस ब्रॉन्ज़ मेडल के साथ वर्ल्ड चैंपियनशिप में भारत के कुल पदकों की संख्या 16 हो गई। गायत्री और त्रिशा इस प्रतियोगिता में पदक जीतने वाले भारतीय खिलाड़ियों के एलीट ग्रुप में शामिल हो गईं।
पूरे अभियान के दौरान गोपीचंद लगातार टीम के साथ मौजूद थे और एक साथ दो भूमिकाएँ निभा रहे थे। एक तरफ़ वे कोच थे, जो इस जोड़ी को उनके करियर के सबसे बड़े टूर्नामेंट के लिए तैयार कर रहे थे। दूसरी तरफ़ वे एक पिता थे, जो अपनी बेटी को दुनिया के सबसे बड़े मंच पर खेलते हुए देख रहे थे।
जब उनसे पूछा गया कि उन्हें किस बात पर ज़्यादा गर्व है, पिता होने पर या कोच होने पर, तो गोपीचंद ने किसी एक को नहीं चुना।
उन्होंने कहा, "मुझे लगता है दोनों पर। जब मैं कोर्ट पर होता हूँ तो मैं कोच होता हूँ। लेकिन मेरा मानना है कि त्रिशा और गायत्री, दोनों ने हम सबका सिर गर्व से ऊँचा किया है।"
यह जवाब उसी संतुलित अंदाज़ का था, जिसके लिए गोपीचंद जाने जाते हैं। उन्होंने दशकों तक बैडमिंटन कोर्ट के आसपास अपनी भावनाओं को नियंत्रित रखना सीखा है। फिर भी उनकी मुस्कान और चेहरे की सहजता बता रही थी कि यह पल कुछ अलग था।
जब उनसे पूछा गया कि अपनी बेटी को इतना शानदार खेल दिखाते देख कैसा महसूस हो रहा है, तो इसे शब्दों में बयां करने में मुश्किल साफ़ दिखी।
उन्होंने कहा, "सच कहूँ तो मुझे नहीं पता कि मैं इसे ठीक से शब्दों में कैसे ज़ाहिर करूँ। मेरे खिलाड़ी जब भी खेलते हैं, मुझे हमेशा एक जैसी भावना महसूस होती है। गायत्री के लिए भी मेरे मन में वैसा ही भाव है जैसा मेरे किसी भी खिलाड़ी के लिए रहा है, उससे ज़्यादा कुछ नहीं।"
भावुक होने के बजाय कोच गोपीचंद ने खेल के उन पहलुओं पर बात की, जिसने इस जोड़ी को सफलता दिलाई।
उन्होंने कहा, "यह देखने लायक था कि त्रिशा कैसे लगातार नेट पर आक्रामक रहीं और मुकाबले पर नियंत्रण हासिल करती गईं। गायत्री का बैककोर्ट खेल बहुत अच्छा था और उनकी सर्विस की लय भी बेहतरीन रही। निर्णायक क्षणों में इन दोनों बातों ने उन्हें जीत की ओर बढ़ाया।"
गोपीचंद के लिए यह पदक कठिन दौर के बाद मिली सफलता का एक पुरस्कार भी था। यह जोड़ी एक समय विश्व रैंकिंग में नौवें स्थान तक पहुँच गई थी, लेकिन त्रिशा के टखने की चोट ने उनकी बढ़त को रोक दिया था।
उन्होंने कहा, "इनका साल चुनौतीपूर्ण रहा है। ऐसे में वापसी कर यहाँ इस तरह प्रदर्शन करना बहुत बड़ी बात है। यह दिखाता है कि उनमें कितनी क्वालिटी है। करियर के इस चरण में इस उपलब्धि को हासिल करना बेहद शानदार है।"
इस उपलब्धि को और ख़ास बनाते हुए गायत्री और त्रिशा को 2025 के अर्जुन पुरस्कार के लिए भी चुना गया।
गोपीचंद ने कहा, "भगवान की कृपा से हमारे परिवार में अब दो अर्जुन पुरस्कार विजेता हैं। यह बहुत कम देखने को मिलता है। मैं ईश्वर का आभारी हूँ कि उन्होंने उसे यह अवसर दिया। उसके प्रदर्शन और पूरे टूर्नामेंट में उसके व्यवहार पर मुझे गर्व है।"
गायत्री के जीवन में बैडमिंटन हमेशा मौजूद रहा। पाँच साल की उम्र से ही वह कभी-कभी अपने पिता के साथ ट्रेनिंग सेशंस में जाती थीं और कोर्ट, खिलाड़ियों और कोचों के बीच ही बड़ी हुईं। अकादमी में गोपीचंद की बेटी होने का मतलब था कि लोग उन पर थोड़ा अधिक ध्यान देते थे।
हालाँकि, गोपीचंद ने हमेशा कोशिश की कि उनकी पहचान बेटी के लिए बोझ न बन जाए। वे जानते थे कि गोपीचंद नाम की विरासत को संभालना आसान नहीं है।
गायत्री ने एक बार कहा था, "उन्होंने कभी मुझ पर दबाव नहीं डाला। एक पिता के रूप में उनकी सिर्फ़ यही इच्छा थी कि मैं खुश रहूँ। कोर्ट पर हो या उसके बाहर, उनका समर्थन हमेशा मेरे साथ रहा है।"
यह सोच शायद चीन की जिया यिफान और झांग शू शियान पर क्वार्टर फ़ाइनल जीत के बाद सबसे अच्छी तरह दिखाई दी।
उस जीत ने गायत्री और त्रिशा का पदक पक्का कर दिया था। त्रिशा तुरंत दौड़कर गोपीचंद के पास पहुँचीं और उन्हें गले लगा लिया। वहीं गायत्री पहले अपने प्रतिद्वंद्वियों से हाथ मिलाने गईं, फिर अपने पिता की ओर बढ़ीं।
गोपीचंद ने उनके माथे को चूम लिया। यह दृश्य विश्व चैंपियनशिप की सबसे यादगार तस्वीरों में से एक बन गया।
बिल्कुल अपने पिता की तरह, गायत्री ने करियर की शुरुआत एकल खिलाड़ी के रूप में की थी और बाद में युगल स्पर्धा की ओर रुख़ किया। त्रिशा ने भी शुरुआत एकल वर्ग से की थी, लेकिन बाद में उन्हें युगल वर्ग में अपनी सही जगह मिली।
साल 2021 में दोनों ने एक साथ खेलना शुरू किया। उनकी खेल शैली में अंतर उनके लिए फ़ायदेमंद साबित हुआ। त्रिशा का बैककोर्ट से आक्रामक खेल और गायत्री की नेट के पास की समझ एक-दूसरे की कमी को पूरा करती थी। समय के साथ यह साझेदारी और मज़बूत हुई और उन्हें दुनिया की शीर्ष 10 जोड़ियों में पहुँचा दिया।
गायत्री के युगल वर्ग में आने के फैसले पर गोपीचंद ने कहा, "हाँ, मुझे लगता है कि यह बिल्कुल सही फैसला था।"
हालाँकि, इस साझेदारी को कई कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ा। इस साल त्रिशा की चोट के कारण विश्व चैंपियनशिप की तैयारी प्रभावित हुई और टीम के पास पूरी फ़िटनेस हासिल करने के लिए केवल 45 दिन बचे थे।
गोपीचंद ने कहा, "पिछले छह हफ्तों में हमने जो मेहनत की, उसका फायदा मिला। जब अभ्यास का परिणाम कोर्ट पर दिखाई देता है, तो उसे देखकर अच्छा लगता है।"
गायत्री और त्रिशा का यह ऐतिहासिक ब्रॉन्ज़ मेडल सिर्फ़ गोपीचंद परिवार के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है। ज्वाला और अश्विनी के बाद भारतीय महिला युगल बैडमिंटन ऐसी जोड़ी की तलाश में था जो लगातार विश्व स्तर पर अच्छे प्रदर्शन कर सके। इस युवा जोड़ी ने नई उम्मीदें जगाई हैं।
लेकिन उनके लिए यह ब्रॉन्ज़ पदक अंतिम मंज़िल नहीं है।
त्रिशा ने कहा, "विश्व चैंपियनशिप का पदक और अर्जुन पुरस्कार हमें आत्मविश्वास देते हैं। यह तो सिर्फ़ शुरुआत है और हम यहीं से आगे बढ़ेंगे।"
एशियाई खेल अब उनका अगला बड़ा लक्ष्य है, लेकिन त्रिशा चाहती हैं कि अगली चुनौती की तैयारी वर्तमान खुशी को कम न कर दे।
उन्होंने कहा, "आज हमें इस उपलब्धि का आनंद लेना चाहिए। हम पूरी टीम के साथ जश्न मनाएँगे। और हाँ, मेन्यू में आइसक्रीम तो ज़रूर होगी!"
गोपीचंद के लिए भी जल्द ही काम फिर शुरू हो जाएगा। एक और टूर्नामेंट होगा, एक और प्रतिद्वंद्वी होगा और एक नई चुनौती उनका इंतज़ार करेगी।
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AI outlook — possibilities, not facts
गायत्री और त्रिशा एशियाई खेलों में भाग लेंगी।
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