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Backडोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के मक्का रक्षा समझौते का स्वागत किया
डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के मक्का रक्षा समझौते का स्वागत किया
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BBC हिंदी15 hours agoWorld5 min readIndia

डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के मक्का रक्षा समझौते का स्वागत किया

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते का स्वागत करते हुए इसे एक बड़ा और अहम कदम बताया है, जिसपर विशेषज्ञों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।

Quick Look

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते का स्वागत किया है। इस समझौते के तहत किसी एक देश पर हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। इस पर विशेषज्ञों ने भारत के लिए चिंता और भू-राजनीतिक बदलावों को लेकर अपनी राय रखी है।

AI-generated summary

Why It Matters

सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने 7 अगस्त, 2026 को मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत एक देश पर हमला तीनों पर हमला माना जाएगा।

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते का स्वागत किया है.

उन्होंने तीनों देशों के नेताओं को बधाई देते हुए इसे एक बड़ा, मज़बूत और अहम क़दम बताया.

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ट्रुथ सोशल पर समझौते को लेकर ख़ुशी जाहिर की.

उन्होंने लिखा, "यह देखकर बहुत ख़ुशी हुई कि सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने हाल ही में मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं."

"यह दिखाता है कि मध्य पूर्व एक साथ आ रहा है. ये देश अपने बचाव के लिए पहले से ज़्यादा मज़बूत तरीक़े से क़दम उठा सकेंगे. तीनों देशों के महान नेतृत्व को बधाई. यह एक बड़ा, मज़बूत और अहम क़दम है- वाह."

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि मक्का रक्षा समझौते को डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ग्रीन सिग्नल मिलना भारत के लिए हाल में बड़ी चिंता की बात नहीं है.

हालांकि, कुछ कहते हैं कि भारत इस स्थिति में अपनी जगह नहीं तलाश पा रहा.

मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में कहा गया है कि यदि इन तीनों (सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान) देशों में से किसी भी एक देश पर हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा.

दरअसल, डोनाल्ड ट्रंप की 'अमेरिका फ़र्स्ट' नीति का मुख्य आधार यह रहा है कि अमेरिका को अन्य देशों के आंतरिक संघर्षों या महंगे विदेशी युद्धों में उलझने से बचना चाहिए.

ट्रंप का मानना है कि विदेशी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उठाने के बजाय अन्य देशों को अपनी रक्षा और स्थिरता की ज़िम्मेदारी ख़ुद उठानी चाहिए.

कूटनीतिक मामलों की विशेषज्ञ पत्रकार निरुपमा सुब्रमण्यम ने हाल ही में बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा था कि तीनों देशों का एक साथ आना इस बात का संकेत है कि क्षेत्र के कुछ देश अब अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहते.

सुब्रमण्यम ने कहा, "अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से नेटो सहयोगियों से अपनी सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदारी उठाने की मांग करते रहे हैं. लेकिन अब पश्चिम एशिया में तीन देश ख़ुद यह संदेश दे रहे हैं कि वे अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय अपनी ख़ुद की सुरक्षा व्यवस्था तैयार करना चाहते हैं."

हालांकि, उनका मानना है कि अमेरिका को क्षेत्र में सुरक्षा गारंटर के तौर पर अपनी भूमिका को बचाने की कोशिश करनी होगी.

मध्य पूर्व मामलों के जानकार और इंडियन काउंसिल ऑफ़ वर्ल्ड अफ़ेयर्स के सीनियर फ़ेलो डॉक्टर फ़ज़्ज़ुर रहमान मानते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप का बयान उन्हीं की एक अवधारणा का विरोधाभासी है.

वो कहते हैं, "डोनाल्ड ट्रंप इस बात पर ज़ोर देते रहे हैं कि सभी देशों को अपनी सुरक्षा ख़ुद करनी चाहिए, वो नेटो देशों के लिए भी ऐसा ही कहते रहे हैं. फिर भी उन्होंने एक ऐसे समझौते का स्वागत किया है, जिसमें देश सुरक्षा का ज़िम्मा ख़ुद उठाने के बजाय एक-दूसरे के साथ बाँट रहे हैं."

ट्रंप का ग्रीन सिग्नल भारत के लिए कितनी बड़ी चिंता?

सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने 7 अगस्त, 2026 को मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए.

समझौते में सैन्य अभ्यास, खुफिया सहयोग, रक्षा तकनीक और संयुक्त सैन्य क्षमताओं को बढ़ाने की भी बात है.

समझौते के एलान के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा था कि वह इस घटनाक्रम पर नज़र बनाए हुए है.

हालांकि, कुछ विशेषज्ञों ने माना कि इस समझौते से भारत की चिंताएं बढ़ सकती हैं. पाकिस्तान से तो भारत का छत्तीस का आंकड़ा है ही, लेकिन सऊदी के साथ भारत के रिश्ते काफ़ी बेहतर हैं, जो प्रभावित हो सकते हैं.

लेकिन क्या डोनाल्ड ट्रंप की ओर से मक्का समझौते पर सकारात्मक टिप्पणी आने से भारत की चिंता और बढ़ गई है?

इस सवाल पर फ़ज़्ज़ुर रहमान कहते हैं कि ट्रंप की टिप्पणी को तात्कालिक प्रतिक्रिया के तौर पर देखा जाना चाहिए.

उन्होंने कहा, "फ़िलहाल पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की से अमेरिका के रिश्ते अच्छे हैं. पाकिस्तान ईरान-अमेरिका के बीच मध्यस्थता कर रहा है, जबकि सऊदी अरब से अमेरिका को ट्रिलियन डॉलर्स का फ़ायदा होता है. लिहाज़ा, ट्रंप ने इन देशों का समर्थन किया है. उन्होंने इन देशों की महत्ता को देखते हुए इन्हें हाल में भारत से ज़्यादा अहमियत दी है."

हालांकि, वो एक परिस्थिति का उदाहरण देते हुए कहते हैं, "यदि पाकिस्तान और भारत के रिश्ते बद से बदतर होते हैं तो इसकी संभावना बहुत कम है कि सऊदी अरब पाकिस्तान के साथ आकर खड़ा हो. पाकिस्तान और सऊदी के बीच पहले से ही एक रक्षा समझौता है, लेकिन हाल ही में इसकी लिमिटेशन देखने को मिली थी. अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तनाव हुआ तो सऊदी ने खुलकर पाकिस्तान का समर्थन नहीं किया."

उनका मानना है कि ऐसी ही परिस्थितियां भविष्य में बनती हैं तो इन देशों का एक-दूसरे के साथ खुलकर आना आसान नहीं होगा. लेकिन वो इस पर सहमति जताते हैं कि ट्रंप ने इस स्थिति में निजी फ़ायदा देखते हुए इन तीन देशों को भारत से ज़्यादा तरजीह दी है.

इंडो पेसिफ़िक मामलों के एक्सपर्ट प्रोफ़ेसर डेरेक जे ग्रॉसमैन ने कहा कि इस मामले में अमेरिका ने भारत और इसराइल के हितों का ध्यान नहीं रखा है.

उन्होंने एक्स पर ट्रंप के बयान को शेयर करते हुए लिखा, "भारत और इसराइल के लिए इसका क्या मतलब हो सकता है, इस पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया गया, जबकि आप जानते हैं कि ये हमारे अच्छे दोस्त हैं."

मिशिगन यूनिवर्सिटी के जेराल्ड आर. फ़ोर्ड स्कूल ऑफ़ पब्लिक पॉलिसी में 'एसोसिएट प्रोफ़ेसर ऑफ़ प्रैक्टिस' जावेद अली मानते हैं कि भारत को हाल-फ़िलहाल में चिंता नहीं करनी चाहिए.

वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि भारत के लिए सबसे ज़रूरी यह देखना है कि यह समझौता आगे चलकर क्या रूप लेता है, बजाय इसके कि शुरुआत से ही इसे भारत के ख़िलाफ़ गुट मान लिया जाए."

उन्होंने कहा, "पाकिस्तान की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय पहचान निश्चित रूप से नई दिल्ली के लिए महत्वपूर्ण होगी. पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच बढ़ते सुरक्षा सहयोग की संभावना पर भी भारत की नज़र रहेगी. भारत यह भी देखेगा कि चीन इस समझौते को किस तरह देखता है और क्या इस मामले में बीजिंग की भूमिका बदलती है."

हालांकि, उन्होंने माना कि जिन देशों के अमेरिका और चीन के साथ क़रीबी रिश्ते रहे हैं, वे अब एक खेमे में जाने के बजाय आपस में साझेदारी बना रहे हैं.

जावेद अली कहते हैं, "मक्का समझौता भी इस बदलाव का एक और संकेत हो सकता है. अब सबसे ज़रूरी यह देखना होगा कि ये वादे असल में कैसे काम करते हैं, ख़ासकर तब जब इनमें से किसी एक देश के सामने सुरक्षा का कोई बड़ा संकट खड़ा हो."

'भारत अपनी जगह नहीं तलाश पा रहा'

जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के 'सेंटर फ़ॉर वेस्ट एशियन स्टडीज़' में प्रोफ़ेसर डॉ. सुजाता ऐश्वर्या कहती हैं भारत के लिए बड़ी चिंता यही है कि इस स्थिति में वह अपनी जगह नहीं देख पा रहा है.

उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "ट्रंप की मक्का समझौते की खुली सराहना यह बताती है कि अमेरिका इस नई व्यवस्था को अपने हित में देख रहा है. भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस पूरे बदलाव में नई दिल्ली की आवाज़ कहीं नहीं है."

सुजाता ऐश्वर्या का कहना है कि सबसे बड़ी बात यह है कि अब तक नई दिल्ली की तरफ़ से इस पर खुलकर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, विदेश मंत्रालय ने कहा है कि वो इस स्थिति पर नज़र बनाए हुए हैं.

उन्होंने कहा, "यह एक तरह की चुप्पी है, जो ख़ुद एक बयान है. शायद यह इस बात का संकेत है कि भारत अभी भी यह समझने की कोशिश कर रहा है कि इस नई भू-राजनीतिक व्यवस्था में उसकी जगह कहां है."

उनका कहना है कि भारत के लिए एक और बड़ी चिंता सऊदी अरब के साथ रिश्तों को लेकर है. सऊदी अरब में नब्बे लाख से ज़्यादा भारतीय नागरिक काम करते हैं, सऊदी का भारत में बड़ा निवेश है और हमारी ऊर्जा ज़रूरतों का एक बड़ा हिस्सा वहां से आता है.

दूसरी ओर, विदेशी मामलों के जानकार और टीआरटी वर्ल्ड के सीनियर एडिटर अभिषेक जी. भाया का मानना है कि इस समझौते को भारत के संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए.

"मक्का समझौता अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान के ख़िलाफ़ विनाशकारी जंग का सीधा नतीजा है. उनका कहना है कि इस घटनाक्रम से संकेत मिलता है कि मध्य पूर्व के देश अब अमेरिका को क्षेत्रीय सुरक्षा का सबसे बड़ा गारंटर नहीं मान रहे हैं."

What to Watch

AI outlook — possibilities, not facts

  • भारत इस समझौते और इसके परिणामों पर अपनी नज़र बनाए रखेगा।

    Very likely · Within months

Open Questions

  • क्या यह समझौता भारत की सुरक्षा को सीधे प्रभावित करेगा?
  • क्या चीन इस समझौते में अपनी कोई भूमिका निभाएगा?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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