
नीट पेपर लीक से लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग तक, वामपंथी छात्र नेता नेहा बोरा कैसे देश के युवा आंदोलनों का प्रमुख चेहरा बन गईं.
उत्तराखंड से ताल्लुक रखने वाली और जेयूएन में पीएचडी कर रही नेहा बोरा देश में युवा और छात्र आंदोलनों का एक प्रमुख चेहरा बनकर उभरी हैं। नीट पेपर लीक और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग जैसे आंदोलनों में उनकी सक्रियता ने व्यापक ध्यान खींचा है।
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नेहा बोरा वामपंथी छात्र संगठन आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और विभिन्न छात्र आंदोलनों के जरिए चर्चा में आई हैं।
जुलाई 2026 में नीट पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठे अभिजीत दीपके और सोनम वांगचुक के साथ एक और चेहरे ने पूरे देश का ध्यान खींचा।
ये थीं नेहा बोरा जो कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के इस प्रोटेस्ट के समर्थन में अपने कुछ साथियों के साथ भूख हड़ताल कर रही थीं।
सीपीआई एमएल (लिबरेशन) के स्टूडेंट संगठन ऑल स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा इसके बाद फिर चर्चा में तब आईं जब वो झारखंड पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों के ख़िलाफ़ स्टूडेंट प्रोटेस्ट में हिस्सा लेने रांची पहुंची थीं।
उस दौरान उनके चेहरे पर स्याही फेंकी गई। लेकिन नेहा ने कहा, ''स्याही फेंके जाने से मैं डरने वाली नहीं हूँ। दिल्ली के आंदोलन के दौरान मैं पैलेट गन और लाठीचार्ज का भी सामना कर चुकी हूँ।"
उन्होंने विरोधियों को ललकारते हुए कहा था, ''क्या उन्हें लगता है कि स्याही से देशभर के छात्रों और युवाओं के गुस्से को दबाया जा सकता है?"
इसके बाद वो उन स्टूडेंट्स को रिहा करने की मांग को लेकर बिहार पहुँची थीं जिन्हें विरोध प्रदर्शन के दौरान गिरफ़्तार किया गया था। पिछले कुछ वर्षों से स्टूडेंट राजनीति में सक्रिय नेहा अब देश में चल रहे युवा और स्टूडेंट्स आंदोलनों का एक प्रमुख चेहरा बन कर उभरी हैं।
अपने तेवरों, बेबाक भाषणों और जुझारू रवैये की वजह से नेहा बोरा इन दिनों मीडिया में छाई हुई हैं। सोशल मीडिया में उनके भाषणों की कई रील वायरल हैं।
अब नेहा एक बार फिर दिल्ली में अपने समर्थकों के साथ प्रदर्शन कर रही हैं।
इस बार वो और उनके समर्थक मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग को लेकर मैदान में उतरे हैं। कई विपक्षी दलों का आरोप है कि देश में चल रही एसआईआर प्रक्रिया में हुई कथित गड़बड़ी के लिए ज्ञानेश कुमार जिम्मेदार हैं और इसकी वजह से करोड़ों लोग अपने वोट देने के अधिकार से हाथ धो बैठे हैं।
हाल ही में अंग्रेजी अख़बार 'इंडियन एक्सप्रेस' ने अपनी एक खोजी रिपोर्ट में कहा था कि एसआईआर प्रक्रिया को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्तों में मतभेद थे।
नेहा का सफ़र- यूनिवर्सिटी से युवा आंदोलन का चेहरा तक
नेहा उत्तराखंड की रहने वाली हैं। उन्होंने पहले दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया और फिर आंबेडकर यूनिवर्सिटी दिल्ली से एमए की पढ़ाई की। अभी वो दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) से पीएचडी कर रही हैं।
नेहा दिल्ली और जेएनयू में वामपंथी स्टूडेंट्स आंदोलन का चेहरा हैं। सीपीआई एमएल (लिबरेशन) के स्टूडेंट संगठन आइसा का नेतृत्व करते हुए वो यूनिवर्सिटी में ख़ासी सक्रिय दिखती हैं।
दरसल, वो इस समय देश में जन आंदोलनों और वामपंथी आंदोलनों की मुखर प्रवक्ता के तौर पर सामने आ रही हैं।
आंदोलन ने क्या सिखाया, नेहा ने बताया
पिछले महीने 'फ़्रंटलाइन' से एक इंटरव्यू में नेहा ने कहा था, ''जंतर-मंतर पर भी बड़ी संख्या में जो पोस्टर लगाए गए थे. उनमें कहा गया था, 'आप गोडसे में विश्वास करते हैं, हम भगत सिंह में विश्वास करते हैं। यही आपके और मेरे बीच मूल अंतर है और इसी वजह से आपको जाना (सत्ता से) चाहिए। लोगों ने लगातार यह बात कही कि जो लोग गोडसे में विश्वास करते हैं, वे इस देश पर शासन नहीं करेंगे।"
उन्होंने कहा था, ''इसमें आरएसएस की उस विरासत की बात की जा रही थी, जिसमें उस पर लोगों के साथ विश्वासघात करने के आरोप लगाए जाते हैं। इसमें कहा जा रहा था कि वे गोडसे के पक्ष में खड़े हैं और हम भगत सिंह के पक्ष में। इसमें इस बात पर चर्चा हो रही थी कि उनकी विभाजन की राजनीति ने देश को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया है, जहां पेपर लीक कोई बड़ी बात नहीं रह जाती, लेकिन हिंदू-मुसलमान का नैरेटिव अचानक लोगों का पूरा ध्यान खींच लेता है। लोग लगातार इन मुद्दों पर बात कर रहे थे।"
नेहा ने कहा था, ''मुझे लगता है कि इन प्रदर्शनों ने यह दिखाया कि देश के युवा अब मौजूदा सत्ता से क्या नहीं चाहते। मुझे लगता है कि इस आंदोलन ने हम सभी को जो सबक सिखाए, वे इस बात से कहीं आगे थे कि फासीवादियों से भी जवाबदेही तय कराई जा सकती है। इसी वजह से जब मैं भूख हड़ताल से वापस आई और माइक पर बोल रही थी, तो मैंने यही कहा था कि युवाओं को इस भावना को याद रखना चाहिए। एक-दूसरे के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि एक-दूसरे के लिए लड़ने की भावना।"
विचारधारा को लेकर परिवार से मतभेद
नेहा एक पारंपरिक परिवार से आती हैं। इस तरह के परिवार से आकर वामपंथी आंदोलन का चेहरा बनना लोगों को चौंकाता है।
नेहा ने अपने इस इंटरव्यू में कहा था, ''मेरे अपने परिवार में बीजेपी के कट्टर समर्थक हैं और हमारे घर में बड़े मतभेद रहे हैं। मेरे घर में यह मतभेद बहुत लंबे समय से है। जब से मैं दिल्ली आई और राजनीतिक रूप से सक्रिय हुई, तब से मेरे घर में यह मतभेद रहा है।"
''कई बार स्थिति बहुत तनावपूर्ण हो जाती है। मुझे लगता है कि आर्थिक रूप से और अपनी ज़िंदगी से जुड़े फैसलों में मैं अपने फ़ैसले खुद लेने के लिए काफ़ी हद तक स्वतंत्र रही हूं। यह आज़ादी मुझे ग्रेजुएशन की पढ़ाई के दूसरे या तीसरे साल से ही मिल गई थी, क्योंकि वह मेरे लिए एक निर्णायक मोड़ था।"
'युवा राजनीति को लंबा रास्ता तय करना है'
नेहा के मुताबिक़ सीजेपी आंदोलन की अहमियत धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से आगे है।
उनका मानना है कि युवाओं ने सीखा है कि एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े होने के बजाय एक-दूसरे के लिए लड़ने से बदलाव संभव है।
वह चाहती हैं कि जंतर-मंतर आंदोलन से पैदा हुई ऊर्जा एसआईआर, परिसीमन, मजदूरों के अधिकार और महिला आरक्षण जैसे दूसरे मुद्दों से जुड़े आंदोलनों तक पहुंचे।
उनके लिए यह आंदोलन लोकतंत्र और देश के लोकतांत्रिक, समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष ढांचे की बड़ी लड़ाई का हिस्सा है।
'लोगों ने एक दूसरे का हाथ थामना सीख लिया है'
नेहा ने बीबीसी के साथ एक इंटरव्यू में जंतर-मंतर पर आंदोलन के बारे में बात करते हुए कहा था कि इसने दिखाया कि इसे किसी कैटेगरी में नहीं रखा जा सकता। ये चीज इस मूवमेंट की ताक़त है और ये इस तरह बनी रहे।
उन्होंने कहा था, '' जंतर-मंतर आंदोलन के दौरान कई लोगों ने कहा कि उनकी मांओं ने कहा था कि प्रोटेस्ट में जाओ। कइयों ने कहा कि वो स्कूल नहीं गए क्योंकि वो प्रोटेस्ट में आना चाहते थे। वो इस बात का संकेत है कि जिस देश को नफ़रत के लिए प्रशिक्षित किया गया था उसमें लोगों ने एक-दूसरे का हाथ थामना सीख लिया है।"
नेहा ने इस इंटरव्यू में बताया था कि प्रदर्शन के दौरान बीजेपी समर्थक माता-पिता और बुजुर्ग भी उनके पास आए, कुछ रोए और छात्रों की स्थिति के लिए माफ़ी मांगी।
'फ्रंटलाइन' को दिए इंटरव्यू में उन्होंने अपने परिवार का उदाहरण देते हुए बताया था कि उनकी बीजेपी समर्थक मां ने पुलिस कार्रवाई अपनी आंखों से देखने के बाद प्रदर्शनकारियों के प्रयासों की सराहना की। नेहा के मुताबिक़ इस तरह के बदलाव ने आंदोलन को व्यापक सामाजिक असर दिया है।
अभिजीत दीपके से तुलना
पिछले दिनों सोशल मीडिया पर एक दिलचस्प चर्चा देखने को मिली। लोग सीजेपी के फ़ाउंडर अभिजीत दीपके से नेहा बोरा की तुलना करते हुए बहस करने लगे कि कौन ज्यादा परिपक्व है।
अमोक नाम के एक एक्स यूज़र ने नेहा बोरा की तस्वीर लगाकर लिखा, ''परिपक्वता तब है, जब आपको एहसास हो कि नेहा बोरा, अभिजीत दीपके से ज़्यादा प्रतिभाशाली हैं। वह जेन ज़ी की एकदम आइकॉन हैं और उनका स्वैग ग़ज़ब का है।"
इस पोस्ट को रीपोस्ट करते हुए अभिजीत ने लिखा है- मैं इससे सहमत हूं।
इस पोस्ट के कुछ देर बाद ही नेहा ने एक्स पर लिखा, ''तुलना नहीं, एकजुटता। हम इसके ख़िलाफ़ मिलकर लड़ते हैं।"
खुद नेहा ने सीजेपी प्रोटेस्ट के दौरान जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान कहा था दीपके विनम्र हैं, सुझाव लेने के लिए तैयार रहते हैं और उन्होंने प्रदर्शनकारियों को ऐसा महसूस कराया कि वह भी उनकी तरह इस संघर्ष में एक छात्र और साथी हैं।
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