
राहुल गांधी के हालिया बयान के बाद एक बार फिर मनुस्मृति चर्चा में है। जानिए इस प्राचीन ग्रंथ का इतिहास, इसमें महिलाओं और वर्ण व्यवस्था के बारे में क्या लिखा है और क्यों इसे लेकर अलग-अलग राय हैं।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा मनुस्मृति की आलोचना के बाद इस प्राचीन ग्रंथ पर बहस छिड़ गई है। यह लेख मनुस्मृति की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, इसमें महिलाओं व वर्ण व्यवस्था संबंधी प्रावधानों और डॉ. आंबेडकर द्वारा इसके विरोध के कारणों का विश्लेषण करता है।
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मनुस्मृति एक प्राचीन धर्मशास्त्रीय ग्रंथ है जिसे ब्रिटिश शासन के दौरान कानूनी संदर्भों में इस्तेमाल किया गया था। डॉ. आंबेडकर ने 1927 में सामाजिक असमानता के विरोध में इसे सार्वजनिक रूप से जलाया था।
लोकसभा में नेता, प्रतिपक्ष राहुल गांधी के हालिया बयान के बाद एक बार फिर से मनुस्मृति को लेकर बहस छिड़ गई है.
राहुल गांधी ने मनुस्मृति की आलोचना करते हुए कहा था कि इसमें महिला विरोधी बातें लिखी हैं.
पुणे में शनिवार को 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम में राहुल गांधी ने मनुस्मृति का ज़िक्र किया. इसके बाद भारतीय जनता पार्टी (बीजपी) ने उनकी आलोचना की है.
राहुल ने मनुस्मृति में महिलाओं के बारे में लिखे गए एक उद्धरण को शर्मनाक बताया. उन्होंने कहा, "महिलाएं किसी के अधीन नहीं हो सकती हैं."
राहुल गांधी ने कहा, "एक समस्या है और काफ़ी बड़ी समस्या है. जब भी मैं पुरुषों से बात करता हूं, महिलाओं को तीन बॉक्स में रखा जाता है. महिलाओं को बेटी, पत्नी या मां के रूप में."
"मां, पत्नी और बेटी के रूप में देखे जाने में कोई बुराई नहीं है. लेकिन सिर्फ़ यही एक आपकी पहचान नहीं हो सकती."
ऐसे में बीबीसी हिन्दी पर छपा एक पुराना आर्टिकल फिर से शेयर कर रहे हैं जिसमें जानने की कोशिश है कि मनुस्मृति में आख़िर क्या लिखा है और महिलाओं के बारे में क्या कहा गया है?
मनुस्मृति में क्या लिखा है?
"एक लड़की हमेशा अपने पिता के संरक्षण में रहनी चाहिए, शादी के बाद पति उसका संरक्षक होना चाहिए, पति की मौत के बाद उसे अपने बच्चों की दया पर निर्भर रहना चाहिए, किसी भी स्थिति में एक महिला आज़ाद नहीं हो सकती."
मनुस्मृति के पांचवें अध्याय के 148वें श्लोक में ये बात लिखी है. ये महिलाओं के बारे में मनुस्मृति की राय साफ़ तौर पर बताती है.
मनुस्मृति में दलितों और महिलाओं के बारे में कई ऐसे श्लोक हैं जिनकी वजह से अक्सर विवादों का जन्म होता है.
मनुस्मृति में लिखी हुई बातें बीते कई सालों से विवादों की वजह बनी हैं. लेकिन क्या मनुस्मृति सच में इतनी विवादित किताब है?
इतिहासकार नरहर कुरुंदकर बताते हैं, "स्मृति का मतलब धर्मशास्त्र होता है. ऐसे में मनु द्वारा लिखा गया धार्मिक लेख मनुस्मृति कहा जाता है. मनुस्मृति में कुल 12 अध्याय हैं जिनमें 2684 श्लोक हैं. कुछ संस्करणों में श्लोकों की संख्या 2964 है."
कुरुंदकर मनुस्मृति पर अपनी सोच को बताते हुए कहते हैं, "मैं उन लोगों में शामिल हूं जो मनुस्मृति को जलाने में विश्वास करते हैं."
कुरुंदकर कहते हैं, "इस किताब की रचना ईसा के जन्म से दो-तीन सौ सालों पहले शुरू हुई थी. पहले अध्याय में प्रकृति के निर्माण, चार युगों, चार वर्णों, उनके पेशों, ब्राह्मणों की महानता जैसे विषय शामिल हैं. दूसरे अध्याय में ब्रह्मचर्य और अपने मालिक की सेवा पर आधारित है."
"तीसरे अध्याय में शादियों की किस्मों, विवाहों के रीति रिवाजों और श्राद्ध यानी पूर्वज़ों को याद करने का वर्णन है. चौधे अध्याय में गृहस्थ धर्म के कर्तव्य, खाने या न खाने के नियमों और 21 तरह के नरकों का ज़िक्र है."
"पांचवें अध्याय में महिलाओं के कर्तव्यों, शुद्धता और अशुद्धता आदि का ज़िक्र है. छठे अध्याय में एक संत और सातवें अध्याय में एक राजा के कर्तव्यों का ज़िक्र है. आठवां अध्याय अपराध, न्याय, वचन और राजनीतिक मामलों आदि पर बात करता है. नौवें अध्याय में पैतृक संपत्ति, दसवें अध्याय में वर्णों के मिश्रण, ग्यारहवें अध्याय में पापकर्म और बारहवें अध्याय में तीन गुणों और वेदों की प्रशंसा है. मनुस्मृति की यही सामान्य रूपरेखा है."
पंजाब यूनिवर्सिटी में इतिहास पढ़ाने वाले राजीव लोचन बताते हैं कि ब्रितानी लोगों के भारत आने से पहले इस किताब को क़ानून की किताब के रूप में प्रयोग नहीं किया गया था.
राजीव लोचन मनुस्मृति के इतिहास को समझाते हुए कहते हैं, "जब ब्रितानी लोग भारत आए तो उन्हें लगा कि जिस तरह मुस्लिमों के पास क़ानून की किताब के रूप में शरिया है, उसी तरह हिंदुओं के पास भी मनुस्मृति है. इसकी वजह से उन्होंने इस किताब के आधार पर मुक़दमों की सुनवाई शुरू कर दी. इसकी वजह से ये धारणा बनी कि मनुस्मृति हिंदुओं का मानक धर्मग्रंथ है."
राजीव लोचन बताते हैं, "जब बुद्ध संघों की भारत में ख्याति फैलने लगी थी तो ब्राह्मणों ने प्रभुत्व कम होता देख इस किताब को लिखकर अपने प्रभुत्व को फिर से जमाने की कोशिश की. उन्होंने एक मिथक रचा कि ब्राह्मण का स्थान समाज में सबसे ऊपर है और समाज में ब्राह्मणों और दूसरे लोगों के लिए अलग-अलग नियम हैं."
"वर्णों के मुताबिक़, इसी वजह से ब्राह्मणों को कम सज़ा मिलती थी लेकिन दूसरे लोगों को कड़ी सज़ा मिलती थी. ये किताब बताती है कि किसी भी स्थिति में ब्राह्मणों का सम्मान किया जाना चाहिए. एक महिला को किसी तरह के धार्मिक अधिकार नहीं हैं. वह अपने पति की सेवा करके स्वर्ग प्राप्त कर सकती है."
राजीव लोचन बताते हैं, "महात्मा ज्योतिबा फुले मनुस्मृति को चुनौती देने वाले पहले व्यक्ति थे."
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने 25 जुलाई, 1927 को महाराष्ट्र के कोलाबा ज़िले में (वर्तमान में रायगड) के महाड में सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति को जलाया.
आंबेडकर अपनी किताब 'फ़िलॉसफ़ी ऑफ हिंदूइज़्म' में लिखते हैं, "मनु ने चार वर्ण व्यवस्था की वकालत की थी. मनु ने इन चार वर्णों को अलग-अलग रखने के बारे में बताकर जाति व्यवस्था की नींव रखी."
जेएनयू में पढ़ाने वाले प्रोफेसर विवेक कुमार कहते हैं, "कांशी राम कहा करते थे कि जातियों की रचना मनु स्मृति के आधार पर हुई है. इससे असमानताओं वाले समाज की रचना हुई."
इतिहासकार नरहर कुरुंदकर समझाते हुए कहते हैं, "मनुस्मृति के समर्थकों का एक गुट कहता हैं कि इस सृष्टि की रचना ब्रह्मा ने की थी और दुनिया का कानून प्रजापति-मनु-भृगु की परंपरा से आया है. ऐसे में इसका सम्मान किया जाना चाहिए."
विवादित नेता संभाजी भिड़े ने अपने एक भाषण में दावा किया है कि मनु ने विश्व कल्याण के लिए ये किताब लिखी और वह एक बड़े क़ानून विशेषज्ञ थे.
सनातन संस्था भी मनुस्मृति का समर्थन करती है. इस संस्था का दावा है कि एक समय में समाज मनुस्मृति के हिसाब से ही चलता था.
कुरुंदकर कहते हैं, "आधुनिक शिक्षा इन लोगों के लिए आधुनिक दिमाग़ की रचना नहीं कर सकी. इसलिए ये लोग परंपरा को मानने वाले और रूढ़िवादी बने रहे."

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