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अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में रिकॉर्ड बढ़ोतरी: वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारत पर क्या होगा असर?
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अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में रिकॉर्ड बढ़ोतरी: वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारत पर क्या होगा असर?

ईरान युद्ध और वैश्विक अनिश्चितता के बीच अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड में 25 साल की रिकॉर्ड वृद्धि से दुनिया भर के शेयर बाजारों और कर्ज की लागत पर गहरा असर पड़ने की आशंका है।

Quick Look

अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड में 25 साल की रिकॉर्ड बढ़ोतरी ने वैश्विक वित्तीय बाजारों में हलचल मचा दी है। सुरक्षित निवेश के रूप में अमेरिकी बॉन्ड की ओर निवेशकों का झुकाव बढ़ने से भारत सहित उभरते बाजारों से पूंजी निकासी और कर्ज महंगा होने का संकट गहरा गया है।

AI-generated summary

Why It Matters

अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड 25 साल के उच्च स्तर 5.56% पर पहुंच गई है। यह वृद्धि वैश्विक स्तर पर कर्ज को महंगा बना रही है और शेयर बाजारों पर दबाव डाल रही है।

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ईरान युद्ध की वजह से दुनिया भर के बाज़ारों में तेल की बढ़ती क़ीमतों के बीच अमेरिका में बॉन्ड यील्ड में रिकॉर्ड बढ़ोतरी पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बनी हुई है.

यूएस ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड पिछले सप्ताह मंगलवार को 25 साल की रिकॉर्ड बढ़ोतरी के साथ 5.56 फ़ीसदी पर पहुंच गई. दस साल की बॉन्ड यील्ड 5.22 फ़ीसदी और दो साल की बॉन्ड यील्ड 4.86 फ़ीसदी पर पहुंच गईं.

बॉन्ड यील्ड सरकार की ओर से एक ख़ास अवधि के लिए कर्ज पर निवेशक को दी जाने वाली रिटर्न होती है. बॉन्डहोल्डर को सालाना दी जाने वाली ब्याज दर कूपन रेट कहलाती है.

अमेरिकी सरकार के लिए बॉन्ड यील्ड बढ़ाकर लंबी अवधि के लिए कर्ज़ जुटाना राहत की बात हो सकती है लेकिन अमेरिका के निवेशकों, कारोबारियों समेत दुनिया के दूसरे देशों की अर्थव्यवस्था, निवेशकों, शेयर बाज़ारों और कारोबारियों के लिए ये चिंता की बात है.

अगर अमेरिका में बॉन्ड यील्ड ऊंची है तो जाहिर है सारी दुनिया के निवेशक इसमें निवेश करने के लिए खिंचे चले आएंगे. यानी दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं से निवेशक पैसा निकालकर यहां लगाने लगेंगे.

इसकी एक बड़ी वजह तो ये है कि अमेरिकी सरकार को कर्ज़ देना सबसे सुरक्षित माना जाता है. क्योंकि ये आम धारणा है कि अमेरिकी सरकार उसके निवेशकों को पूरा रिटर्न देगी और कभी डिफॉल्ट नहीं करेगी.

इसका मतलब ये है कि दुनिया भर में होम लोन समेत सभी तरह के लोन महंगे हो सकते हैं क्योंकि कर्ज़ देने वाली एजेंसियां दूसरी सरकारों और कारोबारियों के लिए अपना लोन महंगा कर देंगी. क्योंकि उनके लिए अमेरिकी सरकार को कर्ज़ देना ज़्यादा सुरक्षित है.

ये बाक़ी देशों के लिए संकट साबित हो सकता है. क्योंकि इससे उनकी घरेलू अर्थव्यवस्था में कर्ज़ महंगा होने का ख़तरा रहता है. महंगा कर्ज़ अर्थव्यवस्था को धीमा कर सकता है क्योंकि इससे महंगाई का दबाव और बढ़ जाएगा.

उद्योगों को महंगा कर्ज़ मिलने से आर्थिक गतिविधियां धीमी हो जाएंगी. इससे बेरोज़गारी बढ़ सकती है, लोगों के ख़र्च करने की क्षमता कम हो जाएगी. ख़र्च कम होने का मतलब अर्थव्यवस्था में मांग घटना. जाहिर है इन सबसे आर्थिक विकास में गिरावट आएगी.

ये एक तरह का आर्थिक दुष्चक्र है, जिससे दुनिया अभी किसी भी क़ीमत पर बचना चाहेगी. ख़ासकर ऐसे वक़्त में जब रूस-यूक्रेन और अमेरिका-ईरान, दो युद्धों की वजह से पूरी दुनिया महंगाई की मार झेल रही है.

दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का कर्ज़ बहुत ज़्यादा है. अमेरिका भी इससे अछूता नहीं है. ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़ उसका डेट टु जीडीपी रेश्यो 126 फ़ीसदी है.

ओईसीडी के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में जी7 देशों में इटली पर सबसे ज्यादा कर्ज़ था, जो उसकी जीडीपी का 149 फ़ीसदी था. फ़्रांस भी 117 फ़ीसदी के साथ ज़्यादा पीछे नहीं है.

सवाल ये है कि इतना ज़्यादा कर्ज़ से लदे होने की बावजूद अमेरिकी सरकार बॉन्ड यील्ड बढ़ाकर और कर्ज़ क्यों जुटा रही है. इसका सीधा संबंध जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता से है. अमेरिकी सकार को भी ख़ुद मालूम नहीं है कि ईरान के साथ उसका युद्ध कब ख़त्म होगा और तेल संकट का निकट भविष्य में कोई हल निकलेगा या नहीं. रूस-यूक्रेन युद्ध पर भी उसका कोई नियंत्रण नहीं है.

दूसरी दिक्कत अमेरिकी केंद्रीय फेडरल रिज़र्व के रुख़ को लेकर है. अभी जो हालात हैं उससे लगता नहीं है कि फेडरल रिज़र्व ब्याज दरों में कटौती करेगी जिससे अमेरिकी सरकार को सस्ता कर्ज़ मिल सके.

इसलिए भी अमेरिकी सरकार भविष्य के किसी भी संकट से बचने के लिए कर्ज़ जुटाने में लगी है भले ही इसके लिए यील्ड दरें बढ़ानी पड़ें.

'टी रो' प्राइस की मुख्य अमेरिकी अर्थशास्त्री बेलेरिना उरुसी ने वॉल स्ट्रीट जर्नल से कहा कि निकट अवधि में बॉन्ड बाज़ार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है, लेकिन यील्ड का रुझान ऊपर की ओर है. उनके मुताबिक़, यील्ड बढ़ने की कई स्ट्रक्चरल वजहें भी हैं और आगे भी ये बरकरार रहेंगी.

उनका कहना है कि कोविड और युद्ध जैसी अप्रत्याशित घटनाओं ने मौजूदा स्तर तक यील्ड बढ़ाने में भूमिका निभाई है. इनमें बढ़ता सरकारी कर्ज़ और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में निवेश का उछाल भी शामिल हैं.

दुनिया के कई देश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में काफ़ी पैसा लगा रहे हैं और ये पैसा बॉन्ड से जुटाया जा सकता है.

सरकार जब बॉन्ड जारी करती है, तो वह पहले ही तय कर देती है कि वह उस पर कितना ब्याज देगी. इस ब्याज को कूपन कहते हैं. लेकिन सरकारी बॉन्ड, जारी होने के बाद खुले बाज़ार में लगातार खरीदे और बेचे जाते हैं. यहां बॉन्ड की कीमत बदलती रहती है और उसके साथ उसकी यील्ड भी बदलती है. क्योंकि मांग में बदलाव होता रहता है.

उदाहरण के लिए अगर अमेरिकी बाज़ार में दस डॉलर के कूपन का 100 डॉलर के बॉन्ड पर किसी निवेशक को 110 डॉलर मिलेंगे. लेकिन अगर महंगाई बढ़ती है तो बॉन्ड होल्डर इसे सेकेंडरी मार्केट में बेचना चाहेगा क्योंकि बढ़ी हुई महंगाई की वजह से 10 डॉलर की वास्तविक कीमत कम हो जाएगी.

बॉन्ड होल्डर इसे बेचकर पैसा कहीं और लगाना चाहेगा जहां उसे इससे ज़्यादा रिटर्न मिले. लेकिन जो बॉन्ड ख़रीदार होगा वो भी इसे 100 डॉलर पर इसे नहीं ख़रीदना चाहेगा क्योंकि महंगाई उसके रिटर्न को कम कर देगी.

मान लें कि अब इसकी कीमत घटकर 90 डॉलर हो जाती है. लेकिन कूपन दर तो पुरानी ही रहेगी यानी कम निवेश पर उसका रिटर्न ज़्यादा होगा. यानी 90 डॉलर पर बॉन्ड ख़रीदने पर भी उसे 100 डॉलर पर मिलने वाला दस डॉलर ही रिटर्न मिलेगा. इस तरह बॉन्ड की क़ीमत गिरने की तुलना में उसकी यील्ड बढ़ती है.

भारतीय शेयर बाज़ार अभी कई संकटों से जूझ रहा है. गुरुवार तक शेयर बाज़ार लगातार आठ सप्ताह तक गिरावट का शिकार हो चुका था. पिछले 25 साल में पहली बार ऐसा हुआ.

एक अनुमान के मुताबिक अकेले इस सप्ताह में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में मिडकैप कंपनियों के 20 लाख करोड़ रुपये डूब गए. शुक्रवार को एक ही दिन में निवेशकों को छह लाख करोड़ रुपये डूब गए.

भारतीय शेयर बाज़ार विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी, कच्चे तेल के दाम में बढ़ोतरी और रुपये में गिरावट की वजह से लगातार कमजोर होता जा रहा है.

जब बॉन्ड यील्ड बढ़ती है तो आमतौर पर शेयर बाज़ार पर दबाव बढ़ जाता है. क्योंकि फिक्स्ड-इनकम निवेश उतार-चढ़ाव भरे निवेश से ज्यादा आकर्षक होते हैं. निवेशक ज़्यादा और सुरक्षित रिटर्न के लिए बगैर जोख़िम वाले रिटर्न की ओर बढ़ते हैं.

अविनाश मेंटर रिसर्च के संस्थापक और प्रमुख शोधकर्ता अविनाश गोरक्षकर ने लाइव मिंट से कहा, "अमेरिकी सरकार के कर्ज़ लेने और बॉन्ड जारी करने में बढ़ोतरी के साथ यील्ड ऊंची बनी रहने की संभावना है."

"यह भारतीय शेयर बाज़ार के लिए भी नकारात्मक है, क्योंकि विदेशी संस्थागत निवेशकों को अमेरिकी फिक्स्ड-इनकम परिसंपत्तियां ज्यादा आकर्षक लग सकती हैं और वे उभरते बाज़ारों के शेयरों में कम पूंजी लगा सकते हैं. इसलिए लंबे समय तक ऊंची बॉन्ड यील्ड सेंसेक्स और निफ्टी पर दबाव डाल सकती है."

वहीं, एसएस वेल्थस्ट्रीट की संस्थापक सुगंधा सचदेवा ने लाइव मिंट से कहा कि जब निवेशकों को अमेरिकी सरकारी कर्ज़ में ज्यादा रिटर्न मिलने लगता है तो वे उभरते बाज़ारों के शेयरों में निवेश के लिए भी ज़्यादा रिटर्न की मांग करते हैं.

इससे विदेशी निवेशक भारत में अपना निवेश घटा सकते हैं, ख़ासकर तब जब शेयरों की वैल्युएशन पहले से ऊंची हो और कंपनियों के कमजोर कमाई नतीजों की गुंजाइश कम हो. उन्होंने कहा कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और कमजोर रुपये से यह दबाव और बढ़ जाता है. भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है.

What to Watch

AI outlook — possibilities, not facts

  • भारतीय शेयर बाजार पर लंबे समय तक दबाव बना रहेगा।

    Likely · Within months

Open Questions

  • क्या फेडरल रिज़र्व ब्याज दरों में कटौती करेगा?
  • ईरान-अमेरिका युद्ध की स्थिति का वैश्विक तेल कीमतों पर अंतिम प्रभाव क्या होगा?

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This article was originally published by BBC हिंदी.