नोएडा डीएम मेधा रूपम के मामले में सुप्रीम कोर्ट में आउट-ऑफ़ टर्न लिस्टिंग पर सवाल
Quick Look
नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम के खिलाफ एनएसए के तहत छात्रा आकृति चौधरी की हिरासत के लिए पाँच लाख रुपये की वसूली के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में आउट-ऑफ़ टर्न लिस्टिंग को लेकर विवाद है, जबकि रोस्टर के अनुसार इस तरह के मामलों की सुनवाई जस्टिस बीवी नागरत्ना की बenche के पास होनी चाहिए थी।
AI-generated summary
Why It Matters
नोएडा में श्रमिक आंदोलन के दौरान अप्रैल 2026 में दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत हिरासत में लिया गया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सितंबर 2026 में इस हिरासत को गैर-कानूनी बताते हुए नोएडा की डीएम मेधा रूपम और अन्य अधिकारियों से पाँच लाख रुपये की वसूली का आदेश दिया था।
नोएडा की डीएम मेधा रूपम से जुड़ी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में आउट-ऑफ टर्न लिस्टिंग को लेकर सवाल
प्रकाशित एक मिनट पहले
पढ़ने का समय: 7 मिनट
नोएडा की डीएम मेधा रूपम के मामले में सुप्रीम कोर्ट में 'आउट-ऑफ़ टर्न' लिस्टिंग को लेकर विवाद हो रहा है.
सुप्रीम कोर्ट के सामने नोएडा में श्रमिक आंदोलन के दौरान दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा आकृति चौधरी को एनएसए के तहत हिरासत में लिए जाने पर मेधा रूपम और अन्य अधिकारियों से पाँच लाख रुपये की रिकवरी को चुनौती देने वाली याचिका थी. रिकवरी का ये आदेश सितंबर की शुरुआत में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिया था.
मेधा रूपम का केस सुप्रीम कोर्ट के रोस्टर की उपेक्षा करते हुए जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा के कोर्ट में लिस्ट किया गया.
मेधा रूपम से जुड़ी याचिकाओं पर 23 सितंबर को जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एनके सिंह की बेंच ने सुनवाई की, जबकि 13 जुलाई 2026 से लागू रोस्टर के अनुसार, प्रिवेंटिव डिटेंशन से जुड़े मामलों की सुनवाई उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं थी.
यह मामला इसलिए और भी अहम है क्योंकि मज़दूरों के उसी विरोध प्रदर्शन से जुड़ी हिरासत की अन्य याचिकाएं जस्टिस बीवी नागरत्ना की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने पहले से लंबित हैं.
सुप्रीम कोर्ट में इस सुनवाई के दौरान बहस को म्यूट करने को लेकर भी विवाद हो रहा है. ऐसा क्यों किया गया, इसकी कोई वजह नहीं बताई गई है.
वकीलों के संगठन लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कंस्ट्यूिशन ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत को खुली चिट्ठी लिखकर मेधा रूपम के मामले में रोस्टर बदलने की आलोचना की है.
इसने कहा है कि एक ख़ास बेंच के सामने लिस्टिंग से न्यायिक प्रक्रिया में लोगों का विश्वास नहीं बढ़ा है.
छोड़कर सबसे अधिक पढ़ी गईं आगे बढ़ें
सबसे अधिक पढ़ी गईं
समाप्त
लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्सिट्यूशन ने लिखा है कि ये मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि याचिकाकर्ता एक लोकसेवक हैं और भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी हैं.
सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील प्रशांत भूषण ने भी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर मामले का ज़िक्र करते हुए लिखा कि आख़िर सुप्रीम कोर्ट में चल क्या रहा है.
वहीं कॉकरोच जनता पार्टी के सह-संयोजक सौरव दास ने लिखा कि जूडिशरी में इस तरह का मामला निष्पक्ष न्याय की उम्मीद नहीं जगाता.
मेधा रूपम का मामला क्या है?
जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने अपने फ़ैसले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फ़ैसले पर स्टे लगा दिया जिसमें कहा गया था कि नोएडा की डीएम मेधा रूपम और दूसरे अधिकारी अपने वेतन से दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा आकृति चौधरी को पाँच लाख रुपये का मुआवजा दें.
इलाहाबाद हाई कोर्ट का कहना था कि इस साल अप्रैल में नोएडा के श्रमिक आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (एनएसए) के तहत आकृति को हिरासत में लेना ग़ैर-क़ानूनी था.
लेकिन सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एनके सिंह की बेंच ने मेधा रूपम की याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट की प्रतिकूल टिप्पणी और मुआवजा देने के फ़ैसले पर स्टे लगा दिया.
हालांकि आकृति चौधरी को एनएसए के तहत गिरफ़्तार करने के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट का आदेश कायम रहेगा.
सुनवाई को लेकर क्यों उठे सवाल?
बेंच के फ़ैसले से ज़्यादा चर्चा इस इस आरोप कि है कि बेंच बदलकर और आउट-ऑफ टर्न लिस्टिंग के ज़रिये मेधा रूपम की मदद की गई.
लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन ने सीजेआई को लिखा है, ''कोर्ट में सुनवाई पब्लिक हियरिंग होती है. इसे वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के ज़रिये, वकीलों, वादियों और पत्रकारों को मुहैया कराया जाता है. मामला श्रमिकों के समर्थन में आंदोलन के दौरान एनएसए के तहत स्टूडेंट्स की गिरफ़्तारी का था. ये पत्रकारों और जनता के लिए अहम मामला था. इसके बावजूद वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग की एक्सेस बंद कर दी गई.''
''ये गंभीर मामला है और लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन किसी को इस मामले में ख़ास सुविधा दिए जाने का विरोध करता है. जनता के लिए ये भारी चिंता का विषय है.''
छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
Dinbhar: आवाज़ वही, अंदाज़ नया
देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां.
एपिसोड
समाप्त
कॉकरोच जनता पार्टी के सह-संयोजक सौरव दास ने इस मामले में एक्स पर लिखा है, ''सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा रिटायर होने से महज दो महीने दूर हैं.''
''अगर आपको याद हो, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नोएडा की डीएम और ज्ञानेश कुमार की बेटी मेधा रूपम पर एक छात्र कार्यकर्ता के नोएडा श्रमिक विरोध-प्रदर्शन के ख़िलाफ़ कथित तौर पर तर्कहीन तरीक़े से एनएसए लगाने के मामले में पाँच लाख रुपये का जुर्माना लगाया था. इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी.''
''समाचार पोर्टल लाइव लॉ ने रिपोर्ट किया कि ज्ञानेश कुमार की बेटी का मामला सुप्रीम कोर्ट की रोस्टर व्यवस्था, नियमों और परंपराओं का उल्लंघन करते हुए जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच दे दिया गया. यह मामला जस्टिस नागरत्ना की बेंच के सामने जाना चाहिए था''
''दो दिन पहले जब इस मामले की सुनवाई हुई तो जस्टिस शर्मा की बेंच ने सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही का ऑडियो बंद कर दिया. यह बेहद असामान्य है और ऐसा लगभग कभी नहीं किया जाता. यह चिंताजनक है. जज की तरफ़ से यह नहीं बताया गया कि ज्ञानेश कुमार की बेटी के मामले में ऐसा असाधारण क़दम क्यों उठाया गया?''
प्रशांत भूषण ने इस मामले में टिप्पणी करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा, ''ये चौंकाने वाली बात है कि स्टूडेंट एक्टिविस्ट की प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश को रद्द करने वाले इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के ख़िलाफ़ अपील सुप्रीम कोर्ट की सबसे जूनियर बेंच, जस्टिस एससी शर्मा की बेंच के सामने लिस्ट की गई, जबकि रोस्टर के मुताबिक़ ऐसे मामलों की सुनवाई का अधिकार सिर्फ़ चार सबसे सीनियर बेंचों के पास था. सुप्रीम कोर्ट में आख़िर हो क्या रहा है?
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आकृति चौधरी के मामले में क्या कहा था
इस महीने की शुरुआत में इलाहाबाद हाई कोर्ट की जस्टिस अचल सचदेव दिल्ली यूनिवर्सिटी की 24 वर्षीय लॉ स्टूडेंट और सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी को हिरासत में लिए जाने को लेकर पुलिस और प्रशासिक अधिकारियों पर जुर्माना लगाया था.
बेंच ने 'साफ़ तौर पर तथ्य गढ़ने' की बात कही थी और निर्देश दिया था कि उनके फ़ैसले को इन अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड का हिस्सा बनाया जाए.
इस फ़ैसले में राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (एनएसए) के तहत आकृति चौधरी की हिरासत को ग़लत बताया गया था.
एनएसए के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए ख़तरे से जुड़े मामलों में किसी व्यक्ति को बिना मुक़दमे के हिरासत में रखने की अनुमति है.
लेकिन अदालत ने ये भी स्पष्ट किया कि एनएसए के तहत एहतियातन हिरासत एक अपवाद है, और इसका इस्तेमाल सामान्य क़ानून के विकल्प के तौर पर नहीं किया जा सकता.
जस्टिस सचदेव और श्रीधरन की दो सदस्यीय बेंच ने आकृति चौधरी को पाँच लाख रुपये का मुआवज़ा देने का आदेश दिया था.
अदालत ने आदेश दिया कि यह रक़म गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) की ज़िलाधिकारी और हिरासत का आदेश जारी करने के लिए ज़िम्मेदार अन्य अधिकारियों के वेतन से वसूली जाए.
आकृति 'मज़दूर बिगुल' अख़बार के लिए नोएडा के विरोध प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग करते हुए इन प्रदर्शनों से जुड़ी थीं. आकृति पिछले दो-तीन सालों से स्टूडेंट और मज़दूरों के अधिकारों से जुड़े संगठनों के साथ बतौर वॉलंटियर भी काम कर रही थीं.
आकृति ने मज़दूरों के प्रदर्शन से जुड़ने की वजह पूछे जाने पर अपने दोस्त के ज़रिए कहा था "प्रदर्शन करने वाले वे लोग हैं जो हमारे देश का निर्माण करते हैं. वे बहुत बुनियादी चीज़ों की मांग कर रहे हैं, जैसे महँगाई और शोषण से राहत."
What to Watch
AI outlook — possibilities, not facts
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कंस्टिट्यूशन की चिट्ठी पर प्रतिक्रिया देंगे और रोस्टर उल्लंघन की जांच का आदेश दे सकते हैं।
Likely · Within days
इलाहाबाद हाई कोर्ट का आकृति चौधरी को मुआवजा देने का आदेश最终 रूप से बहाल रखा जा सकता है।
Possible · Within weeks
Open Questions
- क्या सुप्रीम कोर्ट ने आउट-ऑफ़ टर्न लिस्टिंग के लिए कोई आधिकारिक कारण दिया?
- क्या जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने प्रिवेंटिव डिटेंशन मामलों की सुनवाई का अधिकार रोस्टर के अनुसार रखा?
- वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की एक्सेस क्यों बंद की गई?
- क्या इस मामले में कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी?



