Backसुभाष चंद्रा के 22,000 करोड़ रुपये के क़र्ज़ मामले में एनसीएलटी का 99.97% 'हेयरकट' का आदेश
सुभाष चंद्रा के 22,000 करोड़ रुपये के क़र्ज़ मामले में एनसीएलटी का 99.97% 'हेयरकट' का आदेश
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सुभाष चंद्रा के 22,000 करोड़ रुपये के क़र्ज़ मामले में एनसीएलटी का 99.97% 'हेयरकट' का आदेश

नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के हालिया फ़ैसले के तहत मीडिया कारोबारी डॉक्टर सुभाष चंद्रा के मामले में 99.97% क़र्ज़ माफ़ी को मंज़ूरी दी गई है, जिस पर राजनीतिक और कानूनी बहस शुरू हो गई है।

Quick Look

नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल ने मीडिया कारोबारी सुभाष चंद्रा के 22,000 करोड़ रुपये से अधिक के बकाए पर 99.97% के 'हेयरकट' यानी क़र्ज़ माफ़ी को मंज़ूरी दी है।

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Why It Matters

डॉ. सुभाष चंद्रा की कंपनियों द्वारा क़र्ज़ चुकाने में डिफ़ॉल्ट करने पर इंडियाबुल्स हाउसिंग फ़ाइनेंस ने 2022 में इन्सॉल्वेंसी कार्यवाही शुरू की थी।

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जब भारत में किसी शख़्स पर क़र्ज़दाताओं का हज़ारों करोड़ रुपये बकाया हो, तो समझौते के तहत उस क़र्ज़ का कितना हिस्सा क़ानूनी रूप से माफ़ किया जा सकता है?

बीते मंगलवार को भारत के नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) के आदेश ने इसका चौंकाने वाला जवाब दिया.

अगर क़ानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाए और क़र्ज़दाताओं का ज़रूरी बहुमत समझौते के पक्ष में हो, तो संभावित रूप से लगभग पूरा क़र्ज़ माफ़ किया जा सकता है.

यह मामला मीडिया कारोबारी डॉक्टर सुभाष चंद्रा से जुड़ा था, जिन्होंने ख़ुद से जुड़ी कंपनियों की ओर से लिए गए क़र्ज़ के लिए व्यक्तिगत गारंटी दी थी.

जब इन कंपनियों ने उन क़र्ज़ों को चुकाने में डिफ़ॉल्ट किया तब एक लेनदार इंडियाबुल्स हाउसिंग फ़ाइनेंस ने डॉ. चंद्रा के ख़िलाफ़ 2022 में इन्सॉल्वेंसी कार्यवाही शुरू की.

अगस्त 2022 में डॉ. चंद्रा की एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अंतरिम आदेश के ज़रिए इस कार्यवाही पर रोक लगा दी थी, जिसके चलते यह प्रक्रिया लगभग दो साल तक रुकी रही.

बाद में सुप्रीम कोर्ट ने ये रोक हटा दी. अप्रैल 2024 में इस याचिका को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया गया, जिससे समाधान प्रक्रिया चालू हुई.

एनसीएलटी के आदेश के अनुसार क़र्ज़ देने वालों ने उनके ख़िलाफ़ अपने दावों की कुल राशि 22,000 करोड़ रुपये से अधिक बताई थी.

जिस रीपेमेंट प्लान को मंज़ूरी दी गई उसमें क़रीब 6.5 करोड़ रुपये वापस करने की पेशकश की गई है.

इसमें क़र्ज़ देने वालों के लिए 6.25 करोड़ रुपये और दिवालियापन प्रक्रिया की लागत के लिए 25 लाख रुपये शामिल हैं.

यह दावों की कुल राशि का क़रीब 0.03 फ़ीसदी ही है. फ़ाइनेंस की भाषा में इसे "हेयरकट" कहा जाता है, यानी क़र्ज़दाताओं को वापस की जाने वाली राशि में कमी, जो इस मामले में 99.97 फ़ीसदी है.

वहीं सुभाष चंद्रा ने अपने बचाव में दावा किया है कि वह अपनी संपत्तियां और कंपनियां बेचकर 45,000 करोड़ रुपये के कुल क़र्ज़ में से लगभग 43,000 करोड़ रुपये पहले ही चुका चुके हैं.

25 अगस्त 2026 का हेयरकट का यह फ़ैसला एनसीएलटी के सदस्य नीलेश शर्मा ने सुनाया है.

नीलेश शर्मा के फ़ैसले में इस बात का ज़िक्र है कि इससे पहले, ट्रिब्यूनल के दो सदस्य इस मामले में 3 सितंबर, 2025 को अलग-अलग निष्कर्षों पर पहुंचे थे और उनका फ़ैसला बंटा हुआ था.

उन्होंने रीपेमेंट प्लान को मंज़ूरी देने का समर्थन किया, लेकिन साथ ही पाया कि कुछ दावों को ग़लत तरीके से स्वीकार किया गया था और उन्हें हटाने का आदेश दिया.

यह समझने के लिए कि इतनी बड़ी क़र्ज़ माफ़ी को क़ानूनी मंजूरी कैसे मिली, उस दिवालियापन क़ानून की व्यवस्था को समझना ज़रूरी है, जिसके तहत ट्रिब्यूनल ने यह फ़ैसला दिया.

दिवाला और दिवालियापन संहिता (इन्सॉल्वेंसी और बैंकरप्सी कोड- आईबीसी) के तहत व्यक्तिगत दिवाला समाधान प्रक्रिया में, जब कोई कंपनी क़र्ज़ नहीं चुका पाती है, तो उस क़र्ज़ की व्यक्तिगत गारंटी देने वाले लोगों के ख़िलाफ़ भी क़ानूनी कार्रवाई की जा सकती है.

इसके तहत दिवालियापन की प्रक्रिया को संभालने के लिए नियुक्त पेशेवर, क़र्ज़दार की संपत्तियों का आकलन करता है और रीपेमेंट प्लान तैयार करने में मदद करता है. इसके बाद इस योजना को क़र्ज़दाताओं की समिति के सामने वोटिंग के लिए रखा जाता है.

अगर वोटिंग में 75% हिस्सेदारी वाले क़र्ज़दाता योजना को मंज़ूरी दे देते हैं, तो अंतिम क़ानूनी मंज़ूरी के लिए योजना एनसीएलटी के पास भेजी जाती है.

आदेश के अनुसार सुभाष चंद्रा के मामले में योजना को 80.81 फ़ीसदी मतों से मंज़ूरी मिली.

हालांकि तीन सार्वजनिक वित्तीय संस्थान – यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया, केनरा बैंक और एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस समेत सार्वजनिक वित्तीय संस्थान उन क़र्ज़दाताओं में शामिल थे, जिन्होंने इसका विरोध किया.

उनका कहना था कि 6.5 करोड़ रुपये की पेशकश, डॉक्टर चंद्रा की पहले घोषित कुल संपत्ति का एक बहुत छोटा हिस्सा थी, जो साल 2018 में 40 हज़ार करोड़ रुपये से अधिक थी.

इन संस्थानों ने यह भी आरोप लगाया कि योजना के पक्ष में मतदान करने वाले क़र्ज़दाता डॉक्टर चंद्रा के परिवार से जुड़े थे.

आईबीसी के तहत, हितों के टकराव को रोकने के लिए क़र्ज़दाता से जुड़े "सहयोगी" या संबंधित पक्षों को रीपेमेंट प्लान पर मतदान करने से क़ानूनी तौर पर रोक है.

शुरुआती पीठ के न्यायिक सदस्य ने योजना को मंज़ूरी दे दी और कहा कि एनसीएलटी क़र्ज़दाताओं की "व्यावसायिक समझ" पर सवाल नहीं उठा सकता.

ट्रिब्यूनल के तकनीकी सदस्य ने सितंबर 2025 के अपने फ़ैसले में इससे असहमति जताई और कहा कि समाधान तक पहुंचने की प्रक्रिया "जल्दबाज़ी" और "अपारदर्शी" तरीक़े से की गई थी.

खंडित फ़ैसले के कारण, यह मामला नीलेश शर्मा को सौंप दिया गया, जिन्होंने अंत में न्यायिक सदस्य का पक्ष लिया. उनके फ़ैसले में कहा गया कि एनसीएलटी का काम यह तय करना नहीं है कि कोई वित्तीय समझौता उचित है या हेयरकट बहुत अधिक है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि क़ानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया है.

क्योंकि योजना को ज़रूरी 75 फ़ीसदी बहुमत मिला था और क्योंकि इसे मंज़ूरी देने वाली संस्थाएं क़ानूनी तौर पर "सहयोगी" की परिभाषा में पूरी तरह से नहीं आती थीं, इसलिए न्यायाधिकरण आईबीसी के प्रावधानों के तहत क़ानूनी रूप से 99.97 फ़ीसदी क़र्ज़ माफ़ी को मंज़ूरी देने के लिए बाध्य था.

नीलेश शर्मा के सामने मुख्य क़ानूनी सवाल यह था कि आईबीसी के तहत "सहयोगी" की श्रेणी में कौन आता है?

असहमति जताने वाले बैंकों ने तर्क दिया कि योजना के पक्ष में मतदान करने वाली संस्थाओं का नियंत्रण डॉक्टर चंद्रा की एक्सटेंडेड फ़ैमिली के पास था.

उन्होंने ट्रिब्यूनल से क़ानून की "उद्देश्यपूर्ण व्याख्या" करने को कहा, जिसका मतलब है कि अदालत को क़ानून बनाने के मक़सद को देखना चाहिए, जो यह है कि क़र्ज़दार परिवार के नियंत्रण वाली कंपनियों का इस्तेमाल दिवालियापन की प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए न कर सकें.

हालांकि नीलेश शर्मा ने आईबीसी की धारा 79(2)(जी) की सख़्त और शाब्दिक व्याख्या पर भरोसा किया, जिसमें सहयोगी की परिभाषा ऐसी कंपनी के रूप में दी गई है, जिसमें क़र्ज़दार अकेले या अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर शेयर पूंजी के 50 फ़ीसदी से अधिक का मालिक हो या जिसका बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स पर अपना कंट्रोल हो.

उन्होंने कहा कि डॉ. चंद्रा के पास इन मतदान करने वाली संस्थाओं में सीधे तौर पर कोई शेयर नहीं था.

यह मानते हुए कि इन कंपनियों का नियंत्रण अप्रत्यक्ष रूप से उनसे जुड़े लोगों के पास था, उन्होंने फ़ैसला दिया कि विधायिका ने व्यक्तिगत दिवालियापन के मामलों के लिए जानबूझकर संकीर्ण और ख़ास भाषा का इस्तेमाल किया है.

कॉर्पोरेट दिवालियापन के मामलों के विपरीत, जहां "संबंधित पक्ष" की परिभाषा अधिक व्यापक है, व्यक्तिगत गारंटरों के लिए नियम केवल सीधे क़ानूनी स्वामित्व और नियंत्रण पर निर्भर करते हैं, न कि केवल कारोबारी या पारिवारिक क़रीबी पर.

आदेश में कहा गया, "जहां विधायिका ने क़ानून के एक हिस्से में जानबूझकर कोई विशेष अधिकार दिया है और दूसरे हिस्से में उसे शामिल नहीं किया है, वहां न्यायिक व्याख्या के ज़रिए उस कमी को पूरा नहीं किया जा सकता."

डॉक्टर चंद्रा की कथित तौर पर अघोषित संपत्ति का पता लगाने के लिए फॉरेंसिक ऑडिट कराने की बैंकों की मांग पर नीलेश शर्मा ने फैसला दिया.

उन्होंने कहा कि शुरुआती रीपेमेंट प्लान का चरण एक सहायक और अदालत के बाहर होने वाली समझौता प्रक्रिया के रूप में बनाया गया है, जिसके लिए आईबीसी फॉरेंसिक ऑडिट अनिवार्य नहीं करता.

उनके मुताबिक़, अगर क़र्ज़दाताओं को धोखाधड़ी या छिपी हुई संपत्तियों का संदेह है, तो उनके पास योजना के ख़िलाफ़ मतदान करने और क़र्जदार को औपचारिक दिवालियापन प्रक्रिया में भेजने का विकल्प है, जिसके तहत अधिक गहराई से जांच की जा सकती है.

उन्होंने कहा था कि क्योंकि बहुमत ने योजना के पक्ष में मतदान किया था, इसलिए ट्रिब्यूनल अल्पमत के संदेह के आधार पर एकतरफ़ा जांच का आदेश नहीं दे सकता था.

हालांकि, शर्मा ने दिवालियापन प्रक्रिया में एक कमी की ओर भी इशारा किया.

उन्होंने आदेश में पाया कि 1,060 लोगों की ओर से दाखिल किए गए दावों को पर्याप्त ज़रूरी दस्तावेज़ों के बिना स्वीकार कर लिया गया था.

उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि ऐसे दावों की पुष्टि करना रिज़ॉल्युशन प्रोफ़ेशनल की ज़िम्मेदारियों के मुताबिक़ नहीं था.

लेकिन उन्होंने इस कमी को रीपेमेंट प्लान को अमान्य घोषित करने के लिए पर्याप्त गंभीर नहीं माना.

इसके बजाय, उन्होंने निर्देश दिया कि इन 1,060 दावों को बाहर किया जाए और योजना के तहत उपलब्ध राशि को बाक़ी वाजिब क़र्ज़दाताओं के बीच बांटा जाए.

'द इकोनॉमिक टाइम्स' के अनुसार यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया, केनरा बैंक और एलआईसी हाउसिंग फ़ाइनेंस ने घोषणा की है कि वे राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण (एनसीएलएटी) में इस आदेश को चुनौती देंगे.

आईबीसी के तहत रिज़ॉल्यूशन प्लान को मंज़ूरी देने वाले एनसीएलटी के आदेशों के ख़िलाफ़ अपील के तय आधार हैं, जैसे कि प्लान का क़ानून के ख़िलाफ़ होना या रिज़ॉल्यूशन प्रोफ़ेशनल द्वारा अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करने में "बड़ी अनियमितता" होना.

सुभाष चंद्रा साल 2016 में बीजेपी के समर्थन से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर राज्यसभा के लिए चुने गए थे.

मौजूदा मामले में क़र्ज़ में भारी कटौती, करदाताओं के पैसे से चलने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की भागीदारी और सुभाष चंद्रा की सत्तारूढ़ बीजेपी के साथ कथित क़रीबी के कारण लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने यह आरोप लगाया है कि उन्हें मोदी सरकार का "दोस्त" होने के कारण फ़ायदा मिला.

'विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी' के सह-संस्थापक देबांशु मुखर्जी ने बीबीसी से कहा, "एनसीएलटी ने कानून में लिखे प्रावधानों को लागू किया है, लेकिन सरकारी बैंकों से जुड़े इतने बड़े हेयरकट को लेकर जनता के बीच बनने वाली धारणा को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है."

उन्होंने कहा, "यह तर्क दिया जा सकता है कि ऐसे बड़े दिवालियापन के मामलों में, जहां व्यक्तियों पर बहुत बड़ी राशि का क़र्ज़ हो और यह एक तरह से कॉर्पोरेट क़र्ज़ जैसा हो, इससे जुड़े पक्षों को मतदान से बाहर रखा जाना चाहिए. जैसा कि कॉर्पोरेट दिवालियापन के मामलों में किया जाता है."

हालांकि, मुखर्जी ने एक मामले के आधार पर पूरे आईबीसी के फ्रेमवर्क को असफल मानने से सावधान किया है.

उन्होंने कहा, "साल 2017 में आईबीसी लागू होने के बाद से सार्वजनिक बैंकिंग क्षेत्र में नॉन परफ़ॉर्मिंग एसेट्स (एनपीए) काफ़ी कम हुई हैं."

केंद्रीय वित्त मंत्रालय के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की ग्रॉस एनपीए वास्तव में मार्च 2021 में 9.11 फ़ीसदी से घटकर मार्च 2025 में 2.58 फ़ीसदी हो गई है.

साथ ही, क़ानून में दिवाला मामलों के निपटारे के लिए 330 दिनों की समयसीमा तय की गई है लेकिन रेटिंग एजेंसी आईसीआरए के आंकड़ों से पता चलता है कि समाधान में लगने वाला औसत समय 744 दिन तक है. वहीं, क़र्ज़दाता अपने स्वीकार किए गए दावों की औसतन केवल 31 फीसदी राशि ही वसूल कर पाते हैं.

व्यावसायिक वकील और न्यूमेन लॉ ऑफिसेज़ के पार्टनर आरुष खन्ना के अनुसार, एनसीएलटी की क़ानून की सख्त व्याख्या, भले ही ट्रिब्यूनल के मुताबिक़ प्रक्रिया के अनुरूप थी, लेकिन यह एक "महत्वपूर्ण मोड़" है.

इसकी वजह यह है कि मामला काफ़ी चर्चित था और किसी व्यक्तिगत गारंटर के दिवालिया मामले में इतनी बड़ी क़र्ज़ माफ़ी पहले कभी नहीं देखी गई थी.

खन्ना ने इस बात पर चिंता जताई कि ट्रिब्यूनल ने क़र्ज़दाताओं के उस समूह की गहराई से जांच नहीं की, जिसने योजना के पक्ष में वोट दिया था

उन्होंने कहा, "जब आपके पास ऐसे शेड्यूल्ड वित्तीय संस्थान हैं, जो योजना से असंतुष्ट हैं और पक्ष में मतदान करने वाले दो-तिहाई से अधिक लोगों पर संबंधित पक्ष होने का आरोप है, तो पहली नज़र में यह योजना की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है."

यह स्वीकार करते हुए कि क़र्ज़दाताओं की व्यावसायिक समझ क़ानूनी तौर पर सबसे अहम है, आरुष खन्ना ने तर्क दिया कि ऐसे असाधारण हालात में ट्रिब्यूनल को सावधानी बरतनी चाहिए.

उन्होंने कहा, "एनसीएलटी को ख़ुद को महज़ मुहर लगाने वाला ट्रिब्यूनल नहीं बना लेना चाहिए, क्योंकि पहली नज़र में कुछ आपत्तियां ऐसी हैं जिन पर वैध रूप से हस्तक्षेप किया जाना चाहिए, जैसे संबंधित पक्षों की मौजूदगी और व्यक्तिगत गारंटर की कुल संपत्ति में भारी गिरावट."

इतने बड़े पैमाने के 'हेयरकट' का हाल का तुलनात्मक उदाहरण वीडियोकॉन समूह का मामला रहा है.

वीडियोकॉन पर बैंकों का क़रीब 65,000 करोड़ रुपये का क़र्ज़ था, जिसके निपटारे के लिए वेदांता समूह की कंपनी 'ट्विनस्टार टेक्नोलॉजीज़' ने 2,962 करोड़ रुपये – यानी 95 प्रतिशत से अधिक का हेयरकट – का प्रस्ताव दिया था.

हालांकि, वह एक कॉर्पोरेट दिवालिया समाधान प्रक्रिया थी, जबकि डॉ. चंद्रा का मामला एक व्यक्तिगत गारंटर के दिवालियापन से जुड़ा है.

एनसीएलटी ने जुलाई 2021 में इस योजना को मंज़ूरी दे दी थी, लेकिन बाद में क़र्ज़दाता बैंकों ने ख़ुद इस भारी नुक़सान पर आपत्ति जताते हुए एनसीएलएटी का रुख़ किया.

उन्होंने दावा किया कि उन पर देश के वित्तीय सिस्टम को 'निचोड़ने' के जो आरोप लग रहे हैं, वे केवल उनकी छवि ख़राब करने की एक कोशिश हैं. चंद्रा के मुताबिक़, उन्होंने अपने और परिवार की संपत्ति के साथ-साथ ज़ी कंपनी को बेचकर 45,000 करोड़ रुपये की कुल देनदारी में से लगभग 43,000 करोड़ रुपये पहले ही चुका दिए हैं.

बैंकों द्वारा उनकी संपत्ति में भारी गिरावट पर उठाए गए सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा, "2016 में जब मैं राज्यसभा का सदस्य बना. उस समय मेरी नेटवर्थ 39 करोड़ रुपये थी, तो 2017 में वो 45 हज़ार करोड़ कैसे बन जाएगी?"

उन्होंने वित्तमंत्री और बैंकिंग सचिव को चुनौती दी कि वे उनके दावों की सच्चाई परखने के लिए एक स्वतंत्र ऑडिटर नियुक्त करें. चंद्रा ने यह भी कहा कि वह अपने घर के हिस्से को किराये पर देकर अपना ख़र्च चला रहे हैं.

चंद्रा ने रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के चेयरमैन मुकेश अंबानी और ग्रुप की मीडिया कंपनियों पर आरोप लगाया है कि वे उनके क़र्ज़ और हाल की एनसीएलटी कार्यवाही के बारे में गुमराह करने वाली बातें फैला रहे हैं.

हालांकि इस पर रिलायंस ग्रुप ने एक बयान में कहा कि वह सुभाष चंद्रा की "बेबुनियाद टिप्पणियों" से निराश है.

रिलायंस के प्रवक्ता ने कहा, "हम रिलायंस ग्रुप का हिस्सा रहे मीडिया संस्थानों पर लगाए गए आरोपों और इशारों को पूरी तरह ख़ारिज करते हैं."

ग्रुप ने कहा कि उसके मीडिया ब्रांड्स का इस्तेमाल कभी किसी पर हमला करने के लिए नहीं किया गया और न ही भविष्य में ऐसा किया जाएगा.

रिलायंस के प्रवक्ता ने कहा कि ग्रुप सुभाष चंद्रा को एक कारोबारी और उद्यमी के तौर पर काफी सम्मान देता है और उनके अच्छे भविष्य की कामना करता है.

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AI outlook — possibilities, not facts

  • यूनियन बैंक, केनरा बैंक और एलआईसी हाउसिंग फ़ाइनेंस एनसीएलएटी में इस आदेश को चुनौती देंगे।

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Open Questions

  • क्या एनसीएलएटी इस फ़ैसले को पलट देगा?
  • क्या फॉरेंसिक ऑडिट के आदेश दिए जाएंगे?

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This article was originally published by BBC हिंदी.

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