3,000 साल बाद खुली क़ब्र: तूतनख़ामेन की खोज और राजा के श्राप की कहानी
बीबीसी आर्काइव से पुरातत्वविद हावर्ड कार्टर की 1924 की रिकॉर्डिंग और तूतनख़ामेन के मकबरे की खोज का इतिहास
Quick Look
1922 में पुरातत्वविद हावर्ड कार्टर ने मिस्र के किंग्स वैली में तूतनख़ामेन के 3,000 साल पुराने मकबरे का पता लगाया, जिससे सोने का खजाना और राजा के श्राप की कहानियाँ सामने आईं।
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Why It Matters
1922 में हावर्ड कार्टर ने मिस्र के किंग्स वैली में तूतनख़ामेन के 3,000 साल पुराने मकबरे की खोज की, जो लगभग पूरी तरह सुरक्षित था और सोने के खजाने से भरा था।
1936 में बीबीसी की एक आर्काइव क्लिप में ब्रिटिश पुरातत्वविद् हावर्ड कार्टर अपनी टीम के साथ दिख रहे हैं. वो पल उनके और उनकी टीम के लिए बेहद ख़ास था. 3,300 वर्षों के इतिहास में वे पहले ऐसे व्यक्ति बन गए जो मिस्र के राजा के सामने पहुंच सके. यह 12 फ़रवरी, 1924 को हुआ, जिसे इस क्लिप में दिखाया गया था.
उन्होंने कहा, "हम जिस फ़र्श पर खड़े थे, उस पर आख़िरी बार किसी इंसान के क़दम पड़े हुए 33 सदियाँ बीत चुकी थीं. फिर भी हमारे चारों ओर हाल की मानवीय मौजूदगी के निशान मौजूद थे."
अब करीब 90 साल के बाद, पुरातत्वविद् हावर्ड कार्टर की साफ़ और सधी हुई आवाज़ ख़ुद किसी प्राचीन धरोहर जैसी लगती है.
जब उन्होंने 1936 में बीबीसी रेडियो पर बात की थी, तब तूतनख़ामेन के ख़ज़ानों से भरे मक़बरे की खोज किए हुए कई साल बीत चुके थे.
बीबीसी आर्काइव के मुताबिक़, तूतनख़ामेन प्राचीन मिस्र के 18वें राजवंश के 11वें फ़ैरो या राजा थे.
वे अपने शासनकाल के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध नहीं थे. उन्हें प्रसिद्धि इसलिए मिली क्योंकि पुरातत्वविद् हावर्ड कार्टर ने उनका पूरी तरह सुरक्षित मिला मक़बरा खोज निकाला था.
तूतनख़ामेन के लगभग मूल स्वरूप में सुरक्षित मिले मक़बरे की खोज को कार्टर और उनकी विशेषज्ञ टीम ने चमत्कारी माना. इस खोज ने उन्हें दुनिया भर में मशहूर कर दिया.
इसके बाद प्राचीन मिस्र से जुड़ी हर चीज़ को लेकर लोगों में एक नया आकर्षण पैदा हो गया.
1924 की घटनाओं की समीक्षा करने वाले एक कार्यक्रम में कार्टर ने उस अनोखे एहसास को याद किया.
यह एहसास उन्हें 12 फ़रवरी 1924 को हुआ था, जब उनकी टीम आख़िरकार तूतनख़ामेन के सरकोफ़ेगस तक पहुँची थी.
सरकोफ़ेगस पत्थर का वह ताबूत होता है, जिसमें कोई शव हज़ारों वर्षों तक बिना किसी नुक़सान के दफ़न रहते थे.
जब कार्टर "गारे से आधा भरा कटोरा, कालिख़ से काला पड़ा दीपक और एक लापरवाह बढ़ई के फ़र्श पर छोड़े गए लकड़ी के टुकड़े" जैसी चीज़ों का ज़िक्र करते हैं, तो उनकी हैरानी और रोमांच आज भी महसूस किया जा सकता है.
उन्होंने कहा, "हम दो कक्षों को पार कर चुके थे. लेकिन जब हम एक स्वर्णिम मंदिरनुमा संरचना तक पहुँचे, जिसके दरवाज़े बंद और मुहरबंद थे, तब हमें एहसास हुआ कि हम एक ऐसे दृश्य के साक्षी बनने जा रहे हैं जिसे हमारे समय में शायद ही किसी व्यक्ति ने देखने का सौभाग्य पाया हो."
उन्होंने वह क़ीमती मुहर हटाई और दरवाज़ा खोला. उसके भीतर एक दूसरी संरचना दिखाई दी, जो कारीगरी के मामले में पहली से भी अधिक शानदार थी.
जब दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला, तो उनके सामने पीले क्वार्टज़ाइट पत्थर से बना एक विशाल सरकोफ़ेगस था. यह पत्थर का ताबूत था, जिसमें फ़ैरो (राजा) का शव रखा गया था.
आगे बढ़ने का कोई रास्ता नहीं था, जब तक उसका पत्थर का ढक्कन न हटाया जाए. इस ढक्कन का वज़न लगभग 1,130 किलोग्राम था.
विशिष्ट अतिथियों और गणमान्य लोगों की मौजूदगी में एक जटिल पुली प्रणाली की मदद से उसे उठाया गया.
जब कार्टर ने पत्थर का ढक्कन हटाया, तो ताबूत के भीतर रोशनी पहुँची.
उन्होंने कहा, "हमारी आँखों के सामने जो दृश्य था, वह इतना अद्भुत था कि हैरानी से हमारी साँसें थम-सी गईं."
उन्होंने कहा, "अंदर युवा राजा की एक स्वर्णिम प्रतिमा दिखाई दी, जिसकी कारीगरी बेहद शानदार थी. वह तीन ताबूतों की श्रृंखला का केवल सबसे बाहरी ढक्कन था."
उन्होंने बताया, "इन तीनों ताबूतों को एक-दूसरे के भीतर रखा गया था. इनके अंदर युवा राजा तूतनख़ामेन के पार्थिव अवशेष सुरक्षित थे."
दुनिया की सबसे बड़ी पुरातात्विक खोजों में से एक करने के बावजूद हावर्ड कार्टर ने कोई औपचारिक शिक्षा या प्रशिक्षण नहीं लिया था.
उन्होंने 15 साल की उम्र में स्कूल छोड़ दिया था. उनकी चित्रकारी की प्रतिभा को देखते हुए एक अभिजात परिवार ने उन्हें संरक्षण दिया. इंग्लैंड के नॉरफ़ॉक स्थित उनके ग्रामीण घर के पास यह परिवार रहता था.
एमहर्स्ट परिवार के डिडलिंग्टन हॉल में ब्रिटेन में मिस्र से जुड़ी वस्तुओं का सबसे बड़ा निजी संग्रह था. इन्हीं वस्तुओं और उनसे जुड़ी कहानियों ने कार्टर की दिलचस्पी प्राचीन मिस्र में बढ़ा दी.
17 साल की उम्र में उनकी चित्रकारी की कुशलता ने उन्हें मिस्र में ड्रॉफ़्ट्समैन और ट्रेसर के रूप में काम दिलाया.
वे उस दौर में मिस्र पहुँचे, जब पुरातत्व के क्षेत्र में तेज़ी से काम हो रहा था. इन अभियानों को अक्सर धनी शौक़ीन लोग और ब्रिटिश अभिजात वर्ग वित्तीय सहायता देते थे.
इसके बाद दो दशकों से ज़्यादा समय तक कार्टर ने काम करते हुए ही पुरातत्व की बारीकियाँ सीखीं.
तूतनख़ामेन के मक़बरे की हैरतअंगेज़ खोज में काफ़ी हद तक अच्छी क़िस्मत की भी भूमिका थी.
कार्टर कई वर्षों से किंग्स वैली में खुदाई कर रहे थे, लेकिन उन्हें बहुत कम सफलता मिली थी. नील नदी के पश्चिम में स्थित यह इलाक़ा प्राचीन मिस्र के फ़ैरो का मुख्य दफ़न स्थल था.
तूतनख़ामेन के मक़बरे का प्रवेश द्वार लंबे समय तक प्राचीन मलबे की कई परतों के नीचे छिपा रहा.
इसी कारण वह न तो क़ब्र लूटने वालों की नज़र में आया और न ही पुरातत्वविदों की पहुँच में.
उन्हें निर्णायक सफलता नवंबर 1922 में मिली. उस समय कार्टर ने एक मोमबत्ती उठाई और दरवाज़े में बनाई गई एक छोटी-सी दरार से अंधेरे में झाँका.
पास खड़े उनके धनी संरक्षक लॉर्ड कार्नरवॉन ने घबराते हुए पूछा कि क्या उन्हें कुछ दिखाई दे रहा है.
मशहूर कहानी के अनुसार, कार्टर ने जवाब दिया, "हाँ, अद्भुत चीज़ें."
कार्टर ने अपनी डायरी में लिखा, "जैसे-जैसे मेरी आँखें रोशनी की आदी होती गईं, कमरे की चीज़ें धीरे-धीरे धुंध से उभरने लगीं."
उन्होंने लिखा, "अजीब जानवरों की आकृतियाँ, मूर्तियाँ और सोना. हर तरफ़ सोने की चमक दिखाई दे रही थी."
यह पूरा ख़ज़ाना तूतनख़ामेन की परलोक यात्रा में उनके साथ जाने के लिए रखा गया था.
मिस्र के 18वें राजवंश के 11वें फ़ैरो तूतनख़ामेन की मृत्यु लगभग 17 वर्ष की उम्र में हुई थी. माना जाता है कि उन्होंने आठ या नौ साल की उम्र में सिंहासन संभाला था.
उनकी मृत्यु का कारण आज भी स्पष्ट नहीं है. इसके बारे में अलग-अलग सिद्धांत हैं.
कुछ लोग हत्या की आशंका जताते हैं, जबकि कुछ का मानना है कि उनकी मौत शिकार के दौरान हुए किसी हादसे में हुई थी.
नवंबर 1922 में हुई यह खोज सिर्फ़ शुरुआत थी. इससे उस हिस्से का पता चला जिसे कार्टर ने मक़बरे का बाहरी कक्ष बताया था.
तूतनख़ामेन के पत्थर के ताबूत तक पहुँचने में उनकी टीम को 15 महीने और लगे.
जब द टाइम्स अख़बार ने इस खोज पर अपनी विशेष रिपोर्ट प्रकाशित की, तो उसने इसे "इस सदी की सबसे सनसनीख़ेज़ मिस्र-विज्ञान संबंधी खोज" बताया.
इसी खोज़ से किंग तुत के प्रति लोगों का आकर्षण शुरू हुआ. 1920 के दशक में प्राचीन मिस्र को लेकर एक तरह का जुनून दुनिया भर में फैल गया.
इसका असर फ़ैशन, कला, डिज़ाइन, मूक फ़िल्मों और जैज़ संगीत तक में दिखाई देने लगा.
पिरामिड और कमल के फूल जैसी मिस्री आकृतियाँ कपड़ों, आभूषणों और आर्ट डेको डिज़ाइनों में इस्तेमाल होने लगीं.
इस खोज के बाद कार्टर और लॉर्ड कार्नरवॉन अंतरराष्ट्रीय हस्तियाँ बन गए.
हालाँकि यह दौर ज़्यादा लंबा नहीं चला. मक़बरे के सार्वजनिक रूप से सामने आने के कुछ ही महीनों बाद लॉर्ड कार्नरवॉन की रक्त विषाक्तता (पॉइज़निंग) से मौत हो गई. बताया जाता है कि यह संक्रमण एक कीड़े के काटने के बाद हुआ था.
उनकी मौत ने तूतनख़ामेन की कहानी को नया मोड़ दे दिया. वो पुरातत्व प्रेमी थे और तूतनख़ामेन के मक़बरे की खोज में वित्तीय सहायता देने के लिए उन्हें दुनिया भर में जाना जाता है.
इसके बाद ममी के श्राप और तूतनख़ामेन के बदले की कहानियाँ फैलने लगीं. इन किस्सों ने इस खोज से जुड़े रहस्य और मिथकों को और भी बढ़ा दिया.
यह सब उस समय हो रहा था, जब मिस्र राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुज़र रहा था. 1882 से मिस्र पर ब्रिटिश सेना का क़ब्ज़ा था.
लेकिन 1922 की शुरुआत में उसे आंशिक स्वतंत्रता मिल गई थी.
कार्टर मिस्र सरकार की अनुमति से काम कर रहे थे. मिस्र सरकार चाहती थी कि सबसे महत्वपूर्ण पुरावशेष उसकी राजधानी काहिरा में रखे जाएँ.
कार्टर का स्वभाव काफ़ी तेज़ माना जाता था. उनकी मिस्र की पुरावशेष सेवा के साथ अक्सर तनातनी रहती थी. यही संस्था उनकी खुदाई के काम की निगरानी करती थी.
तूतनख़ामेन धीरे-धीरे देश के औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्ति के संघर्ष का प्रतीक बन गए.
इस खोज में स्थानीय जानकारी और अनुभव देने वाले कई मिस्रवासियों का नाम बाद में कहानी से लगभग ग़ायब कर दिया गया.
मक़बरे की जगह को साफ़ करने वाले मज़दूरों के अलावा कार्टर ने कई कुशल फ़ोरमैन के साथ भी काम किया था. इनमें अहमद गेरीगर, गाद हसन, हुसैन अबू अवाद और हुसैन अहमद सईद जैसे लोग शामिल थे.
जब बीबीसी पर बजी 3 हज़ार साल पुरानी तुरहियां
तूतनख़ामेन का ममीकृत शव किंग्स वैली में ही रहा. लेकिन उससे जुड़े कई दूसरे ख़ज़ाने बाद में काहिरा संग्रहालय ले जाए गए.
इनमें दो तुरहियाँ भी थीं. इनमें से एक चाँदी की और दूसरी कांसे की बनी थी.
1939 में ये तुरहियाँ बीबीसी के एक असाधारण रेडियो कार्यक्रम का हिस्सा बनीं.
रेडियो निर्माता रेक्स कीटिंग ने मिस्र की पुरावशेष सेवा को राज़ी कर लिया था कि बीबीसी ऐसा स्वर प्रसारित कर सके, जो लगभग 3,000 वर्षों से किसी ने नहीं सुना था.
इस कार्यक्रम में प्रस्तुति देने के लिए संगीतकार जेम्स टैपर्न को चुना गया था. अनुमान था कि दुनिया भर में लगभग 15 करोड़ लोग यह प्रसारण सुनेंगे.
कार्यक्रम शुरू होने से पहले रेक्स कीटिंग ने श्रोताओं को सावधान किया. उन्होंने कहा कि इन दोनों तुरहियों से स्पष्ट ध्वनि निकालना आसान नहीं है.
लेकिन उनकी चिंता ग़लत साबित हुई. इन दोनों प्राचीन वाद्ययंत्रों की रहस्यमय ध्वनि साफ़ और स्पष्ट सुनाई दी.
राहत महसूस करते हुए कीटिंग ने नाटकीय अंदाज़ में कार्यक्रम का समापन किया.
उन्होंने कहा, "3,000 वर्षों से ज़्यादा समय की ख़ामोशी के बाद मिस्र के गौरवशाली अतीत की ये दो आवाज़ें अब पूरी दुनिया में गूँज रही हैं."
हालाँकि कार्टर इस प्रसारण को सुनने के लिए जीवित नहीं थे.
इस कार्यक्रम के प्रसारित होने से कुछ सप्ताह पहले ही 64 वर्ष की उम्र में कैंसर से उनकी मृत्यु हो चुकी थी.
1970 के दशक में तूतनख़ामेन को लेकर लोगों का आकर्षण फिर से बढ़ा. इसकी वजह "ट्रेज़र्स ऑफ़ तूतनख़ामेन" प्रदर्शनी की अंतरराष्ट्रीय सफलता थी.
इस प्रदर्शनी का सबसे बड़ा आकर्षण तूतनख़ामेन का सोने का मुखौटा था. 1972 में ब्रिटिश म्यूज़ियम में लगी इस प्रदर्शनी को 16 लाख से ज़्यादा लोगों ने देखा.
आज भी यह ब्रिटिश म्यूज़ियम की सबसे लोकप्रिय प्रदर्शनी मानी जाती है. इसके बाद यह प्रदर्शनी दो वर्षों के लिए सोवियत संघ गई.
फिर 1976 से 1979 के बीच इसे अमेरिका के छह शहरों में प्रदर्शित किया गया.
वहाँ इसे लेकर लोगों में इतना उत्साह था कि मशहूर कॉमेडियन स्टीव मार्टिन ने "किंग तुत" नाम का एक हास्य गीत भी बनाया.
सैटरडे नाइट लाइव कार्यक्रम में उन्होंने सपाट लहजे में कहा, "मुझे लगता है कि ताबीज़ों, खिलौनों, टी-शर्टों और पोस्टरों के ज़रिए इसका अत्यधिक व्यावसायीकरण करना राष्ट्रीय शर्म की बात है."
अब भी रहस्य बना है यह मकबरा
उन्होंने कहा, "हम 5,000 से ज़्यादा अलग-अलग वस्तुओं की बात कर रहे हैं. मेरा मानना है कि इनकी विशाल संख्या ने इस विषय को कुछ हद तक कठिन बना दिया है."
उन्होंने कहा, "इस समूह की कुछ वस्तुओं को समझना और व्यवस्थित करना बेहद मुश्किल है, क्योंकि इनके जैसा दूसरा कोई उदाहरण मौजूद नहीं है."
2025 में पहली बार तूतनख़ामेन के मक़बरे की पूरी सामग्री एक नए संग्रहालय में प्रदर्शित की गई.
ग्रैंड इजिप्शियन म्यूज़ियम के पूर्व प्रमुख डॉ. तारेक तौफ़ीक़ ने बीबीसी से कहा, "इस तरह दर्शक पूरे मक़बरे का अनुभव कर सके. यह अनुभव वैसा ही है जैसा हावर्ड कार्टर को 100 साल से भी ज़्यादा पहले मिला था."
यह संग्रहालय गीज़ा में स्थित ख़ुफ़ू के महान पिरामिड के पास बनाया गया है. यह पिरामिड प्राचीन दुनिया के सात अजूबों में से एक माना जाता है.
तूतनख़ामेन का स्वर्ण मुखौटा अब संग्रहालय में रखा गया है. लेकिन उनकी ममी अब भी किंग्स वैली में ही सुरक्षित है.
यही वह जगह है जहाँ कार्टर और उनकी टीम ने हैरानी से भरे उन "हाल की मानवीय मौजूदगी के निशानों" को देखा था.
बीबीसी पर अपने प्रसारण में कार्टर ने एक छोटी-सी फूलों की माला का भी ज़िक्र किया था. यह माला सरकोफ़ेगस (ताबूत) के स्वर्णिम बाहरी ढक्कन पर रखी हुई थी.
कार्टर का मानना था कि यह संभवतः युवा रानी की अपने दिवंगत पति को दी गई आख़िरी विदाई भेंट थी.
उन्होंने कहा, "उस पूरे शाही वैभव के बीच वे कुछ मुरझाए हुए फूल सबसे सुंदर चीज़ थे."
उन्होंने कहा, "उन्होंने हमें एहसास कराया कि 3,300 साल का समय भी वास्तव में कितना छोटा लगता है."
Open Questions
- क्या तूतनख़ामेन की मृत्यु का सही कारण पता चलेगा?
- मकबरे में पाए गए सभी वस्तुओं का पूर्ण विवरण कब उपलब्ध होगा?

