
1990 में दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग में अगवा किए गए कवि और शिक्षक सर्वानंद कौल 'प्रेमी' और उनके बेटे की हत्या के मामले में पुलिस ने फिर से जांच शुरू की है।
1990 में अनंतनाग में कश्मीरी पंडित शिक्षक सर्वानंद कौल 'प्रेमी' और उनके बेटे वीरेंद्र कौल की हत्या के मामले में जम्मू-कश्मीर पुलिस ने 36 साल बाद फिर से जांच शुरू की है। परिवार को अब भी न्याय की प्रतीक्षा है।
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1990 के दशक में कश्मीर में चरमपंथ के दौरान कश्मीरी पंडितों को लक्षित किया गया था। सर्वानंद कौल 'प्रेमी' एक सम्मानित शिक्षक थे जिन्हें उनके बेटे के साथ अगवा कर मार दिया गया था।
जब दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग ज़िले के सोफ़ शाली गांव में 30 अप्रैल 1990 की सुबह मोहम्मद अहसान नज़र ने अपने पड़ोस से महिलाओं के ज़ोर-ज़ोर से रोने की आवाज़ें सुनीं, तो वो घबरा गए.
उनके पड़ोसी सर्वानंद कौल 'प्रेमी' और उनके बेटे वीरेंद्र कौल को पिछली रात नक़ाबपोश बंदूक़धारियों ने अगवा कर लिया था. वो एक सम्मानित कश्मीरी पंडित शिक्षक, समाजसेवी और कवि थे.
अहसान नज़र ने बीबीसी को बताया कि उन्हें इस घटना से गहरा दुख पहुंचा था. उन्होंने कहा कि जब उनके घर में खाने के लिए पर्याप्त भोजन नहीं होता था, तब प्रेमी का घर हमेशा उनके लिए खुला रहता था.
उन्होंने कहा, "प्रेमी जी एक नेक और साफ़-दिल इंसान थे. हम सभी को उम्मीद थी कि वह और उनका बेटा, जो हाल ही में पिता बना था, जल्द ही सकुशल घर लौट आएंगे."
1990 के दशक की शुरुआत में कश्मीर में चरमपंथ के बढ़ने के साथ ही लक्षित हमलों की एक लहर चली. इसके बाद बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडित जम्मू और देश के अन्य हिस्सों की ओर पलायन कर गए.
लेकिन सोफ़ शाली गांव का इकलौता हिंदू परिवार, प्रेमी परिवार, गांव में ही रहने का फ़ैसला कर चुका था.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 1989 से 2004 के बीच कश्मीर घाटी में चरमपंथ के सबसे हिंसक दौर के दौरान चरमपंथियों ने 219 कश्मीरी पंडितों की हत्या की थी.
चरमपंथ से जुड़ी हिंसा में मारे गए 40,000 से 70,000 लोगों में ज़्यादातर मुसलमान थे.
प्रेमी के बेटे राजिंदर कौल ने बीबीसी को बताया, "हम वहां खुशी और गर्व के साथ रहते थे. मेरे पिता कभी कश्मीर छोड़कर कहीं और नहीं जाना चाहते थे. वह कहते थे कि अपने मुस्लिम पड़ोसियों को छोड़कर जाना बुज़दिली और पाप है."
प्रेमी के बेटे राजिंदर कौल ने बताया, "अगवा किए जाने से दो दिन पहले मेरे पिता के बुलावे पर हमारे घर में गांव के बुज़ुर्गों की एक बैठक हुई थी. उस बैठक में उस समय के तनावपूर्ण हालात पर चर्चा की गई थी."
उन्होंने कहा, "हमारे पड़ोसियों और गांव के बुज़ुर्गों ने हमें भरोसा दिलाया था कि हम सुरक्षित हैं और कोई हमारा नुक़सान नहीं करेगा. हमें उनकी बात पर पूरा भरोसा था."
सोफ़ शाली के व्यापारी मोहम्मद रमज़ान शेरी ने बताया कि प्रेमी का परिवार सुख-दुख, दोनों में अपने मुस्लिम पड़ोसियों के साथ खड़ा रहता था.
"वे रोज़ गाँव के सूफ़ी दरगाह पर जाकर मत्था टेकते, अगरबत्ती जलाते और मुसलमानों और हिंदुओं दोनों की भलाई के लिए दुआ करते थे. वे पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष हिंदू थे और गाँव के ज़्यादातर मुसलमानों से ज़्यादा क़ुरान के बारे में जानते थे."
सूफ़ी संत बाबा नसीब-उद-दीन की दरगाह सोफ़ शाली के एकमात्र सरकारी स्कूल के पास स्थित है.
गांव के बुज़ुर्ग दुकानदार ग़ुलाम रसूल अहंगर का दावा है कि प्रेमी अक्सर आर्थिक तंगी से जूझ रहे लोगों की मदद करते थे. हालांकि वे उनसे यह वादा भी करवाते थे कि वे किसी और को इसके बारे में नहीं बताएंगे.
अहंगर ने कहा, "मैं उन्हें अक्सर सुबह-सुबह दरगाह पर देखा करता था. लेकिन मेरे मन में उनके लिए इतना सम्मान था कि उनकी मौजूदगी में मैं दरगाह के भीतर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था."
राजिंदर कौल को 29 अप्रैल 1990 की वह रात आज भी अच्छी तरह याद है, जब दो नक़ाबपोश बंदूक़धारी उनके घर पहुंचे और उनके पिता से कहा कि उन्हें उनके "कमांडर" से मिलने के लिए साथ चलना होगा.
उन्होंने बताया कि बंदूक़धारियों ने भरोसा दिलाया था कि प्रेमी को केवल उनके ठिकाने पर जाकर कमांडर से बातचीत करनी है और वह जल्द ही घर लौट आएंगे.
कौल ने कहा, "कुछ स्थानीय लोगों ने भी हमें भरोसा दिलाया था कि कुछ ग़लत नहीं होगा. इसलिए वीरेंद्र उनके साथ चले गए. लेकिन जब वे अगले दिन भी वापस नहीं लौटे, तो पूरे गांव में हड़ताल हो गई."
सोफ़ शाली के निवासी मोहम्मद शफ़ी के परिवार का प्रेमी परिवार से क़रीबी संबंध था. वे बताते हैं कि ग्रामीणों ने सामूहिक हड़ताल कर इसका विरोध जताया.
उन्होंने कहा, "इसी वजह से पुलिस को गांव आना पड़ा और लोगों को भरोसा दिलाना पड़ा कि प्रेमी जी जल्द ही वापस आ जाएंगे."
लेकिन कौल के अनुसार, 1 मई 1990 को उनके पिता और भाई के शव गांव से लगभग 20 किलोमीटर दूर बुलबुल नौगाम इलाक़े में एक सरसों के खेत में पेड़ से लटके हुए मिले.
उन्होंने कहा, "उनके (पिता) के पूरे शरीर पर यातनाओं के निशान थे. मेरे पिता का कद इतना बड़ा था कि मैंने सुना था, पाकिस्तान ने भी इन हत्याओं की निंदा की थी."
प्रेमी को क़रीब से जानने वाले कश्मीरी कवि और सामाजिक कार्यकर्ता ज़रीफ़ अहमद ज़रीफ़ कहते हैं कि उनमें शुद्ध कविता रचने की असाधारण प्रतिभा थी.
उन्होंने कहा, "मुझे इस घटना के बारे में रेडियो बुलेटिन से पता चला था. इस ख़बर ने पूरे कश्मीर को ख़ामोश कर दिया था."
कौल ने बताया कि सोफ़ शाली में मुस्लिम समुदाय के कुछ बुज़ुर्गों ने ब्रिंगी नदी के किनारे उनके पिता और भाई का अंतिम संस्कार किया था.
उन्होंने कहा, "उसके बाद मैं कभी गांव वापस नहीं गया."
शफ़ी ने गांव में नए बने खेल मैदान के पास उस जगह की ओर इशारा करते हुए कहा, जहां अंतिम संस्कार किया गया था, "प्रेमी जी के परिवार के अलावा डर के कारण एक भी कश्मीरी पंडित अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो सका."
जानी-मानी कश्मीरी पंडित शिक्षाविद् नीरजा मट्टू याद करती हैं कि प्रेमी अपने इलाक़े और समुदाय में एक "बेहद नेक इंसान" के रूप में जाने जाते थे.
उन्होंने कहा कि प्रेमी समाज सुधार की मार्क्सवादी सोच से प्रभावित थे.
श्रीनगर में रहने वाली मट्टू ने कहा, "यह एक भयावह घटना थी, जिसका असर पूरे कश्मीर के पंडित समुदाय पर पड़ा. अगर इतने सम्मानित शिक्षक के साथ बिना किसी वजह के ऐसा हो सकता है, तो लोगों को लगा कि वे भी सुरक्षित नहीं हैं."
शफ़ी का मानना है कि प्रेमी और उनके बेटे की हत्या एक बड़ी साज़िश का हिस्सा थी.
उन्होंने कहा, "चरमपंथियों ने शायद यह सोचकर उन्हें निशाना बनाया कि इस ख़बर से बाकी पंडित भी डर जाएंगे और कश्मीर छोड़कर चले जाएंगे. बाद में वही हुआ भी."
विस्थापित कश्मीरी मुस्लिम मोहम्मद शफ़ी ने कहा, "गांव में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिस पर उनकी दयालुता और उदारता का असर न पड़ा हो. वे सोफ़ शाली के कई ग़रीब परिवारों की बेटियों की शादी के लिए आर्थिक मदद किया करते थे."
राजिंदर कौल ने बताया कि उनके पिता, जो 1979 में शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त हुए थे, ने भगवद्गीता, रामायण, रवींद्रनाथ टैगोर की गीतांजलि और रूसी लोककथाओं का कश्मीरी भाषा में अनुवाद किया था.
उन्होंने बताया कि उनके पिता की कविता की लगभग एक दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हुई थीं.
कौल के अनुसार, उनके पिता एक साहित्यकार और स्वतंत्रता सेनानी भी थे. उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया था और डोगरा शासन के ख़िलाफ़ भी संघर्ष किया था.
उन्होंने कहा कि कश्मीर के मशहूर कवि ग़ुलाम अहमद महजूर ने ही सर्वानंद कौल को 'प्रेमी' उपनाम दिया था.
कौल ने कहा, "मेरे पिता ने शेख़ अब्दुल्ला के दौर में डोगरा राज के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी थी. उनकी एक कविता पर महाराजा हरि सिंह ने प्रतिबंध लगा दिया था, जिसके बाद उन्हें 12 साल तक कश्मीर से बाहर रहना पड़ा."
राजिंदर कौल ने बताया कि अंतिम संस्कार के बाद पुलिस ने उन्हें गांव छोड़ने की सलाह दी थी.
उन्होंने कहा, "जो कुछ हुआ था, उससे गांव के लोग शर्मिंदा थे क्योंकि वे अपने वादे पर खरे नहीं उतर पाए थे. बाद में हम दिल्ली में अपने भाई के पास रहने चले गए, क्योंकि मेरी मां चाहती थीं कि परिवार के सभी लोग एक ही छत के नीचे रहें."
कौल का आरोप है कि दूरू पुलिस थाने में दर्ज एफ़आईआर संख्या 45/1990 में ग़लत तरीके से यह दावा किया गया था कि उनके घर में सुरक्षा बल मौजूद थे.
उन्होंने कहा, "हमारे मंदिर को 1992 में ध्वस्त कर दिया गया और 1998 में हमारे घर में आग लगा दी गई."
कौल के अनुसार, प्रेमी फ़ारसी और संस्कृत सहित छह भाषाओं के जानकार थे.
1997 में जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने उन्हें मरणोपरांत स्वर्ण पदक देकर सम्मानित किया था.
1994 में चरमपंथी हिंसा से बचने के लिए जम्मू चले गए मोहम्मद शफ़ी का दावा है कि इस घटना के पीछे राजौरी का रहने वाला शेर ख़ान था, जिसे उस समय एक संदिग्ध चरमपंथी के तौर पर जाना जाता था और जो अक्सर गांव में आया-जाया करता था.
उन्होंने कहा, "उसके गिरोह ने गांव में लोगों को डराने-धमकाने के लिए एक तरह का चेकपॉइंट बना रखा था. उस समय हमारे गांव से कोई स्थानीय युवक चरमपंथी गतिविधियों में शामिल नहीं था."
सोफ़ शाली की एक महिला निवासी, जिन्होंने पहचान उजागर न करने की शर्त पर बीबीसी से बात की, उन्होंने बताया कि इस दोहरे हत्याकांड से कुछ महीने पहले शेर ख़ान और उसके साथी रात के समय उनके घर में घुस आए थे.
उन्होंने कहा, "उसका रूप बहुत डरावना था. मेरी सास उस घटना से इतनी सदमे में आ गई थीं कि जीवन भर उसे नहीं भुला सकीं. मरने से पहले भी वे अक्सर घबराकर कहती थीं कि शेर ख़ान आ रहा है और हमें दरवाज़ा खुला नहीं छोड़ना चाहिए."
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, शेर ख़ान इस मामले का मुख्य संदिग्ध था और बाद के वर्षों में वह एक मुठभेड़ में मारा गया.
हालांकि प्रेमी के बेटे राजिंदर कौल का कहना है कि उनके परिवार को कभी यह नहीं बताया गया कि जांच कहां तक पहुंची और उसमें क्या प्रगति हुई.
उन्होंने कहा कि अपने पिता को न्याय दिलाने के लिए उन्हें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा.
राजिंदर कौल ने बताया कि उनका परिवार उनकी छोटी बहन की शादी की तैयारी कर रहा था. इसके लिए सोने के गहने और अन्य क़ीमती सामान ख़रीदे गए थे.
उन्होंने कहा, "जब मेरे पिता और भाई का अपहरण हुआ, तब लगभग 15 लाख रुपये की संपत्ति लूट ली गई, जिसमें चार लाख रुपये नक़द भी शामिल थे. बाद में, जब हम गांव छोड़कर चले गए, तो नया घर बनाने के लिए रखा गया सामान भी नहीं बख्शा गया. हमारी पुश्तैनी ज़मीन पर भी क़ब्ज़ा कर लिया गया. हो सकता है कि मेरे कुछ रिश्तेदारों ने अपनी ज़मीन का हिस्सा बेच दिया हो, लेकिन मैंने अपनी ज़मीन नहीं बेची है. मुझे अपनी ज़मीन वापस चाहिए."
जम्मू-कश्मीर पुलिस ने 36 साल बाद इस मामले की दोबारा जांच शुरू की है. जांच का मक़सद यह पता लगाना है कि क्या इस घटना में और लोग भी शामिल थे. इस महीने की शुरुआत में कई जगहों पर छापेमारी की गई, जिनमें राजौरी में ख़ान का घर भी शामिल था.
कश्मीरी पंडित सरला भट के मामले के बाद, प्रेमी और उनके बेटे का मामला दूसरा ऐसा चर्चित मामला है, जिसे जम्मू-कश्मीर पुलिस ने फिर से खोला है.
बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने उन कश्मीरी पंडितों को न्याय दिलाने का वादा किया है, जो घाटी में चरमपंथी हिंसा का निशाना बने थे.
सोफ़ शाली में, जहां कभी प्रेमी का दोमंज़िला घर हुआ करता था, वहां अब कई दुकानें और कुछ रिहायशी मकान बने हुए हैं. उनकी पत्नी उमा कौल का 2018 में निधन हो गया. परिवार के मुताबिक, वह इस अफ़सोस के साथ दुनिया से विदा हुईं कि उनके पति को इंसाफ़ नहीं मिल सका.
कुछ साल पहले गांव के स्कूल और खेल मैदान का नाम प्रेमी के नाम पर रखा गया था. लेकिन राजिंदर कौल अब भी पूरी सच्चाई जानना चाहते हैं.
इसके साथ ही वह अपने पिता की अप्रकाशित रचनाओं को संकलित कर उनकी साहित्यिक विरासत को संरक्षित करने की कोशिश में भी जुटे हैं.
उन्होंने कहा, "अगर पुलिस इस मामले की फिर से जांच करना चाहती है और अन्य साज़िशकर्ताओं तक पहुंचना चाहती है, तो उन्हें रोकने वाला मैं कौन होता हूं?"
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