नेपाल के लिए जिसे वरदान कहा गया वो अब क्यों घिरा हुआ है ख़तरे में
ग्लोबल वॉर्मिंग और हालिया बाढ़ ने नेपाल की जलविद्युत महत्वाकांक्षाओं और बुनियादी ढांचे के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
Quick Look
नेपाल में हालिया भीषण बाढ़ ने 12 जलविद्युत संयंत्रों को क्षतिग्रस्त कर दिया है, जिससे देश की 10% से अधिक बिजली उत्पादन क्षमता ठप हो गई है। यह आपदा हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते जोखिमों के बीच नेपाल की जलविद्युत-केंद्रित ऊर्जा नीति पर सवाल उठा रही है।
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Why It Matters
नेपाल की बिजली का लगभग 100% हिस्सा जलविद्युत से आता है। हिमालय के ऊँचे इलाक़े वैश्विक औसत से 50% तेज़ी से गर्म हो रहे हैं, जिससे पर्यावरणीय जोखिम बढ़ गए हैं।
नेपाल की बिजली का लगभग 100% हिस्सा जलविद्युत या हाइड्रोपावर से आता है. यह उत्पादन क्षमता इतनी है कि नेपाल हर साल भारत और बांग्लादेश को बिजली बेचकर क़रीब 200 मिलियन डॉलर कमाता है.
लेकिन जिन ग्लेशियरों और पहाड़ों ने नेपाल को यह प्राकृतिक वरदान दिया है, वही अब ग्लोबल वॉर्मिंग की चपेट में हैं - और पिछले बुधवार (26 अगस्त) की भीषण बाढ़ ने देश की जलविद्युत महत्वाकांक्षाओं के जोखिम को उजागर कर दिया है.
इस आपदा में 1,300 से अधिक लोगों की मौत हो गई, जबकि हज़ारों अब भी लापता हैं.
नेपाल-तिब्बत सीमा के पास पूरे-पूरे गाँव बह गए. त्रिशूली नदी बेसिन में 12 जलविद्युत संयंत्र बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए और नेपाल की कुल बिजली उत्पादन क्षमता के 10% से अधिक हिस्से को ठप कर दिया.
संयंत्र संचालकों ने बीबीसी को बताया कि उन्हें अभी तक यह भी नहीं पता कि इनमें से कोई संयंत्र दोबारा चालू हो भी पाएगा या नहीं.
इन 12 में से छह संयंत्र सरकार के स्वामित्व वाली नेपाल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (एनईए) के हैं. उसने घरेलू उपभोक्ताओं को भरोसा दिलाया है कि आपूर्ति में फ़िलहाल कोई बाधा नहीं आएगी.
लेकिन इसके प्रवक्ता राजन ढकाल ने स्वीकार किया कि जैसे जलवायु-जनित आपदाएँ लगातार बढ़ रही हैं, अब "वक़्त आ गया है कि अपनी जलविद्युत नीति पर दोबारा विचार किया जाए."
2010 तक नेपाल में केवल दो-तिहाई आबादी तक ही बिजली पहुँची थी. और इन घरों में भी रोज़ाना 16 घंटे तक बिजली कटौती होती थी.
भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने और मौसमी कमी को पूरा करने के लिए भारत से बिजली आयात बढ़ाने के साथ-साथ जलविद्युत ढाँचे के विस्तार ने 2018 तक हालात बदल दिए. उस समय तक नेपाल के अधिकांश हिस्सों में 24 घंटे बिजली मिलने लगी.
नेपाल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी के अनुसार वर्तमान में नेपाल में 225 जलविद्युत संयंत्र हैं, जिनकी कुल स्थापित क्षमता 3,900 मेगावॉट से अधिक है. इस क्षमता से एक साथ लगभग 30 लाख घरों को बिजली दी जा सकती है.
सैकड़ों नए संयंत्र निर्माणाधीन हैं या पाइपलाइन में हैं. इनमें से अधिकांश पहाड़ों की ऊँचाई पर बनाए जा रहे हैं, जहाँ तेज़ बहाव वाली धाराओं से बिजली पैदा की जा सकती है. इन परियोजनाओं में भंडारण प्रणाली की ज़रूरत बहुत कम या बिल्कुल नहीं होती.
हालाँकि हिमालय के ऊँचे इलाक़े वैश्विक औसत से 50% तेज़ी से गर्म हो रहे हैं, जिससे पर्यावरणीय जोखिम और बढ़ गए हैं. पिछले हफ़्ते आई अचानक बाढ़ की शुरुआती जाँच में इसका कारण एक ग्लेशियर और उसकी चट्टानी परत के ढहने को बताया गया है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी जलवायु परिवर्तन से सीधा संबंध जोड़ना जल्दबाज़ी होगी. लेकिन नेपाल के आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण ने पहले ही कहा था कि 2018 से 2024 के बीच दर्ज की गई आपदाओं में से 90% से अधिक 'जलवायु से संबंधित' थीं.
नेपाल के पूर्व ऊर्जा मंत्री कुलमान घिसिंग ने इस विनाशकारी बाढ़ को 'सदी में एक बार' होने वाली घटना कहा है लेकिन उनका मानना है कि इससे संयंत्रों के डिज़ाइन और निर्माण स्थलों के चयन में सबक़ लेना ज़रूरी है.
उन्होंने पर्यावरणीय न्यूज़ आउटलेट मोंगाबे को बताया, "हमें संयंत्रों को इस तरह डिज़ाइन करना होगा कि वे बाढ़ को झेलने के लिए अधिक लोचशील हों. सबसे अहम है शुरुआती चेतावनी प्रणाली और ठोस आपातकालीन निकासी उपाय अपनाना."
आशंका है कि जलविद्युत प्लांट के सैकड़ों मज़दूर, इंजीनियर और स्थानीय निवासी इन संयंत्रों की कीचड़ से भरी सुरंगों में फँसे हुए हैं.
नेपाल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी के राजन ढकाल का कहना है कि जलविद्युत रणनीति पर 'पुनर्विचार' में ऐसे रिज़र्वॉयर-आधारित संयंत्र शामिल हो सकते हैं जिन्हें पहाड़ों की ऊँचाई पर बनाने की ज़रूरत नहीं होगी. इनमें पानी को ज़रूरत के मुताबिक़ जमाकर छोड़ा जा सकता है, लेकिन इसके आर्थिक और पर्यावरणीय ख़र्च भी भारी होंगे.
कुछ विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं कि क्या नेपाल ने जलविद्युत पर बहुत अधिक निर्भरता बना ली है.
नवीकरणीय ऊर्जा विशेषज्ञ कुशल गुरूंग, जिन्होंने विंडपावर नेपाल नामक क्लीन टेक कंपनी की स्थापना की है, वो कहते हैं, "ऐसे ख़तरनाक समय में हमें सारे अंडे एक ही टोकरी में नहीं रखने चाहिए. हमें सौर और पवन ऊर्जा जैसे विकल्पों को गंभीरता से अपनाना होगा. इसके लिए ऊर्जा नीति में बदलाव ज़रूरी है, जो अभी बहुत अधिक जलविद्युत-केन्द्रित है."
कोलंबिया विश्वविद्यालय के सेंटर ऑन ग्लोबल एनर्जी पॉलिसी के शोधकर्ता विवेक शास्त्री भी उनकी बात का समर्थन करते हैं. उनका कहना है कि "पवन और सौर उत्पादन का सार्थक विस्तार एक लचीलेपन वाली रणनीति है, जिससे भविष्य में केंद्रित या आपस में जुड़े हुए बिजली तंत्र के नाकाम होने की आशंकाएं सीमित हो जाएंगी."
एक जर्मन सहायता एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार नेपाल में जलविद्युत की तुलना में सौर ऊर्जा से उत्पादन की तकनीकी क्षमता लगभग 10 गुना अधिक है.
नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिंगापुर के इंस्टीट्यूट ऑफ़ साउथ एशियन स्टडीज़ में वरिष्ठ रिसर्च फ़ेलो पुष्प शर्मा मानते हैं कि नेपाल को ऊर्जा स्रोतों में विविधता लानी चाहिए, लेकिन चेतावनी देते हैं कि यह 'केवल सीमित स्तर तक' ही किया जा सकता है.
क्षेत्र में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के कई तुलनात्मक अध्ययनों के हवाले से वह कहते हैं, "सौर और पवन में क्षमताओं का इस्तेमाल होना अभी बाकी है, लेकिन वास्तव में जलविद्युत ही है जो नेपाल को अपने दक्षिण एशियाई पड़ोसियों के मुकाबले भारी प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त देती है."
नेपाल में बड़े पैमाने पर निवेश अब भी जलविद्युत पर ही केन्द्रित है. कुछ जलवायु कार्यकर्ताओं का कहना है कि आपदा जोखिमों के पहले से पता होने के बावजूद फ़ंडिंग जारी रही है.
अपर त्रिशूली-1 परियोजना, जो पिछले हफ़्ते की बाढ़ में लगभग पूरी तरह तबाह हो गई, नेपाल की सबसे बड़ी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश योजनाओं में से एक थी. इसकी कीमत लगभग 647 मिलियन डॉलर आँकी गई थी. इसे वित्तीय सहायता देने वालों में एशियाई विकास बैंक और इंटरनेशनल फ़ाइनेंस कॉरपोरेशन शामिल थे.
बुरी तरह प्रभावित अपर त्रिशूली 3ए में पैसा चीन के एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बैंक ने लगाया था.
हिमांशु ठक्कर साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल के संयोजक हैं. वह कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय क़र्ज़दाता "इस चरम ख़तरे से पूरी तरह वाक़िफ़ थे, जिसमें वे हज़ारों मज़दूरों, अधिकारियों, निवासियों, नदियों, ढाँचे और भू-भाग को झोंक रहे थे."
वो कहते हैं, "उनकी अपनी रिपोर्ट बार-बार इस पर ज़ोर दे रही थीं. लेकिन उन्होंने रोकथाम के लिए कोई क़दम नहीं उठाए, चेकिंग की सख़्त व्यवस्था नहीं बनाई, और न ही वे उस आपदा के लिए तैयार थे जिसके आने की आशंका का उन्हें पता था."
ठक्कर याद दिलाते हैं कि त्रिशूली नदी बेसिन पहले भी अस्थिर रहा है. पिछले दो वर्षों में यहाँ बाढ़ आई थी. सितंबर 2024 में त्रिशूली और भोटेकोशी नदी बेसिन पर भयंकर रूप से बादल फटा था, जिससे रसुवा, नुवाकोट और धादिंग में अचानक बाढ़ आई - वही बस्तियाँ जो पिछले हफ़्ते की बाढ़ में सबसे ज़्यादा प्रभावित हुईं.
फिर जुलाई 2025 में तिब्बत के ग्यिरोंग काउंटी की एक ग्लेशियर झील फट गई और इसी नदी मार्ग से नेपाल में आई, जिससे कम से कम 11 लोगों की मौत हुई. उस बाढ़ ने अहम ढाँचे को नुक़सान पहुँचाया और व्यस्त नेपाल-चीन कॉरिडोर पर व्यापार रोक दिया. सीमा पर आवाजाही छह महीने तक बंद रही और इस साल एक जनवरी को दोबारा खुल पाई.
नेपाल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी के ढकाल मानते हैं कि भले ही जलवायु जोखिम आकलन सही ढंग से किया गया हो, लेकिन "संयंत्रों को डिज़ाइन उसके अनुसार नहीं किया गया था."
उन्होंने कहा, "साफ़ है कि हमें जलविद्युत संयंत्रों के निर्माण और संचालन के तरीक़े में सुधार करना होगा."
निजी संचालक पहले ही आर्थिक असर महसूस कर रहे हैं. इंडिपेंडेंट पावर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन ऑफ़ नेपाल के उत्तम भ्लोन लामा के अनुसार, बीमा कंपनियों ने पिछले तीन सालों में 20 से ज़्यादा निजी संयंत्रों को बाढ़ से हुए नुक़सान के लिए लगभग 40 मिलियन डॉलर का भुगतान किया है.
उन्होंने चेतावनी दी कि बीमा प्रीमियम तेज़ी से बढ़ रहे हैं और कारोबार की लागत 'अव्यावहारिक' होती जा रही है.
संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में नेपाल के जलवायु प्रतिनिधिमंडल के सदस्य मंजीत ढकाल का कहना है कि यह आपदा दिखाती है कि जलवायु जोखिम अंतरराष्ट्रीय हैं और नेपाल अकेले इन्हें संभाल नहीं सकता.
वह ज़ोर देते हैं कि सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को मिलकर डेटा साझा करना चाहिए, असर का आकलन करना चाहिए और शुरुआती चेतावनी प्रणाली विकसित करनी चाहिए.
वह कहते हैं, "जिनसे ये जोखिम बढ़े हैं उस ग्रीनहाउस उत्सर्जन के लिए नेपाल सबसे कम ज़िम्मेदार देशों में है."
"विडंबना यह है कि हमारा हाइड्रोपावर उद्योग हमारे पहले से ही बहुत कम उत्सर्जन को और कम करने की एक कोशिश है. हमें इन जोखिमों का अकेले सामना करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए."
What to Watch
AI outlook — possibilities, not facts
नेपाल सरकार अपनी जलविद्युत नीति की समीक्षा करेगी।
Likely · Within months
Open Questions
- क्या क्षतिग्रस्त संयंत्रों को दोबारा चालू किया जा सकेगा?
- ऊर्जा नीति में सौर और पवन ऊर्जा को कितनी प्राथमिकता दी जाएगी?

